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Sri Ayyappa Ashtottara Shatanamavali – श्री अय्यप्प अष्टोत्तरशतनामावली

Sri Ayyappa Ashtottara Shatanamavali – श्री अय्यप्प अष्टोत्तरशतनामावली
॥ श्री अय्यप्प अष्टोत्तरशतनामावली ॥ ॥ अर्चना ॥ ॐ महाशास्त्रे नमः । ॐ महादेवाय नमः । ॐ महादेवसुताय नमः । ॐ अव्ययाय नमः । ॐ लोककर्त्रे नमः । ॐ लोकभर्त्रे नमः । ॐ लोकहर्त्रे नमः । ॐ परात्पराय नमः । ॐ त्रिलोकरक्षकाय नमः । ९ ॐ धन्विने नमः । ॐ तपस्विने नमः । ॐ भूतसैनिकाय नमः । ॐ मन्त्रवेदिने नमः । ॐ महावेदिने नमः । ॐ मारुताय नमः । ॐ जगदीश्वराय नमः । ॐ लोकाध्यक्षाय नमः । ॐ अग्रण्ये नमः । १८ ॐ श्रीमते नमः । ॐ अप्रमेयपराक्रमाय नमः । ॐ सिंहारूढाय नमः । ॐ गजारूढाय नमः । ॐ हयारूढाय नमः । ॐ महेश्वराय नमः । ॐ नानाशस्त्रधराय नमः । ॐ अनर्घाय नमः । ॐ नानाविद्याविशारदाय नमः । २७ ॐ नानारूपधराय नमः । ॐ वीराय नमः । ॐ नानाप्राणिनिषेविताय नमः । ॐ भूतेशाय नमः । ॐ भूतिदाय नमः । ॐ भृत्याय नमः । ॐ भुजङ्गाभरणोत्तमाय नमः । ॐ इक्षुधन्विने नमः । ॐ पुष्पबाणाय नमः । ३६ ॐ महारूपाय नमः । ॐ महाप्रभवे नमः । ॐ मायादेवीसुताय नमः । ॐ मान्याय नमः । ॐ महानीताय नमः । ॐ महागुणाय नमः । ॐ महाशैवाय नमः । ॐ महारुद्राय नमः । ॐ वैष्णवाय नमः । ४५ ॐ विष्णुपूजकाय नमः । ॐ विघ्नेशाय नमः । ॐ वीरभद्रेशाय नमः । ॐ भैरवाय नमः । ॐ षण्मुखध्रुवाय नमः । ॐ मेरुशृङ्गसमासीनाय नमः । ॐ मुनिसङ्घनिषेविताय नमः । ॐ देवाय नमः । ॐ भद्राय नमः । ५४ ॐ जगन्नाथाय नमः । ॐ गणनाथाय नमः । ॐ गणेश्वराय नमः । ॐ महायोगिने नमः । ॐ महामायिने नमः । ॐ महाज्ञानिने नमः । ॐ महास्थिराय नमः । ॐ देवशास्त्रे नमः । ॐ भूतशास्त्रे नमः । ६३ ॐ भीमहासपराक्रमाय नमः । ॐ नागहाराय नमः । ॐ नागकेशाय नमः । ॐ व्योमकेशाय नमः । ॐ सनातनाय नमः । ॐ सगुणाय नमः । ॐ निर्गुणाय नमः । ॐ नित्याय नमः । ॐ नित्यतृप्ताय नमः । ७२ ॐ निराश्रयाय नमः । ॐ लोकाश्रयाय नमः । ॐ गणाधीशाय नमः । ॐ चतुष्षष्टिकलामयाय नमः । ॐ ऋग्यजुःसामरूपिणे नमः । ॐ मल्लकासुरभञ्जनाय नमः । ॐ त्रिमूर्तये नमः । ॐ दैत्यमथनाय नमः । ॐ प्रकृतये नमः । ८१ ॐ पुरुषोत्तमाय नमः । ॐ कालज्ञानिने नमः । ॐ महाज्ञानिने नमः । ॐ कामदाय नमः । ॐ कमलेक्षणाय नमः । ॐ कल्पवृक्षाय नमः । ॐ महावृक्षाय नमः । ॐ विद्यावृक्षाय नमः । ॐ विभूतिदाय नमः । ९० ॐ संसारतापविच्छेत्त्रे नमः । ॐ पशुलोकभयङ्कराय नमः । ॐ रोगहन्त्रे नमः । ॐ प्राणदात्रे नमः । ॐ परगर्वविभञ्जनाय नमः । ॐ सर्वशास्त्रार्थतत्वज्ञाय नमः । ॐ नीतिमते नमः । ॐ पापभञ्जनाय नमः । ॐ पुष्कलापूर्णसम्युक्ताय नमः । ९९ ॐ परमात्माय नमः । ॐ सताङ्गतये नमः । ॐ अनन्तादित्यसङ्काशाय नमः । ॐ सुब्रह्मण्यानुजाय नमः । ॐ बलिने नमः । ॐ भक्तानुकम्पिने नमः । ॐ देवेशाय नमः । ॐ भगवते नमः । ॐ भक्तवत्सलाय नमः । १०८ इति श्री अय्यप्प अष्टोत्तरशतनामावली समाप्ता ।

श्री अय्यप्प अष्टोत्तरशतनामावली: धर्मशास्ता का दिव्य विज्ञान (Introduction)

श्री अय्यप्प अष्टोत्तरशतनामावली (Sri Ayyappa Ashtottara Shatanamavali) सनातन धर्म के "कलियुग वरदन्" भगवान अय्यप्पा को समर्पित १०८ पावन मन्त्रों का संग्रह है। भगवान अय्यप्पा, जिन्हें 'हरिहरपुत्र' के नाम से जाना जाता है, शिव (हर) और विष्णु (हरि) के मोहिनी अवतार के मिलन से उत्पन्न हुए हैं। १०८ नामों का यह पाठ साधक के सूक्ष्म शरीर की चक्र ऊर्जा को संतुलित करने और शनि जैसे क्रूर ग्रहों के दुष्प्रभाव को शांत करने के लिए अमोघ माना गया है। अय्यप्पा की महिमा केरल के सबरीमला पर्वत पर विराजमान है, जहाँ "तत्वमसि" का महावाक्य भक्त और भगवान की एकता को दर्शाता है।
भगवान अय्यप्पा की उत्पत्ति का उद्देश्य राक्षसी महिषी का वध करना था, जिसे ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त था कि उसका अंत केवल शिव और विष्णु के अंश से उत्पन्न संतान ही कर सकती है। चूँकि वे दो परम शक्तियों के तेज से प्रकट हुए, इसलिए उनकी नामावली में "ॐ महाशैवाय नमः" और "ॐ वैष्णवाय नमः" जैसे नाम एक साथ आते हैं, जो हिंदू धर्म के सांप्रदायिक भेदों को समाप्त करने का संदेश देते हैं। गले में मणि धारण करने के कारण उन्हें "मणिकण्ठ" कहा गया, और उन्होंने पंपा नदी के तट पर अपनी बाल-लीलाओं से राजा राजशेखर का हृदय जीत लिया। बाघिन का दूध लाने की उनकी वीरता आज भी भक्तों में अदम्य साहस का संचार करती है।
दार्शनिक आधार: अय्यप्पा साधना "कठोरता" और "अनुशासन" का मार्ग है। सबरीमला की यात्रा से पूर्व भक्त ४१ दिनों का मण्डल व्रत रखते हैं, जिसमें पूर्ण ब्रह्मचर्य, नंगे पैर चलना और तामसिक भोजन का त्याग अनिवार्य है। इस दौरान १०८ नामों का जाप साधक के अहंकार (Ego) को गलाकर उसे "स्वामी" (ईश्वर) के चरणों में समर्पित कर देता है। नामों में देवी-देवताओं का अद्भुत समन्वय है—वे ही "ॐ भैरवाय नमः" हैं और वे ही "ॐ परमात्माय नमः"। यह नामावली हमें सिखाती है कि धर्म का पालन (Dharma Sastha) ही जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि है।
आधुनिक शोधों के अनुसार, इन नामों की ध्वनि तरंगें मष्तिष्क के उन केंद्रों को जाग्रत करती हैं जो एकाग्रता और आत्म-नियंत्रण के लिए उत्तरदायी हैं। अय्यप्पा को शनि ग्रह का अधिपति माना जाता है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, जिन जातकों पर शनि की साढ़ेसाती या ढैया का प्रभाव होता है, उनके लिए शनिवार को इस नामावली का अर्चन करना मानसिक शांति और विपत्तियों से सुरक्षा का एकमात्र मार्ग है। यह पाठ केवल एक धार्मिक विधि नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक चिकित्सा (Spiritual Healing) है जो भक्त को भयमुक्त कर उसे परम आनंद (नित्यानन्द) की ओर ले जाती है।

अय्यप्पा नामावली का विशिष्ट तांत्रिक महत्व (Significance)

अय्यप्पा अष्टोत्तरशतनामावली का महत्व उसके प्रत्येक नाम में छिपे तात्विक अर्थ में निहित है:
  • शैव-वैष्णव समन्वय: हरि और हर के पुत्र होने के नाते वे हिंदू धर्म की दो सबसे बड़ी धाराओं के मिलन बिंदु हैं।
  • शनि पीड़ा शांति: भगवान अय्यप्पा को शनि का गुरु माना गया है। शनिवार को इन नामों से अर्चना करने पर शनि दोष का प्रभाव ५०-७०% तक कम हो जाता है।
  • आत्म-बोध: नामों के अंत में आने वाले मन्त्र साधक को "तत्वमसि" (वह परब्रह्म तू ही है) की अनुभूति की ओर ले जाते हैं।
  • दश-दिक्पाल सुरक्षा: अय्यप्पा को "ॐ त्रिलोकरक्षकाय नमः" कहा गया है, जो सभी दिशाओं से साधक की रक्षा सुनिश्चित करता है।

नामावली पाठ के चमत्कारी लाभ (Benefits)

श्रद्धापूर्वक १०८ नामों के अर्चन से निम्नलिखित फल प्राप्त होते हैं:
  • भय और शत्रुओं का नाश: "ॐ परगर्वविभञ्जनाय नमः" — शत्रुओं का अहंकार चूर होता है और साधक को विजय मिलती है।
  • स्वास्थ्य और आयु वृद्धि: अय्यप्पा को 'महावैद्य' माना जाता है। उनके नामों का जाप रोगों को दूर कर आरोग्य प्रदान करता है।
  • विद्या और बुद्धि: विद्यार्थियों के लिए 'नानाविद्याविशारदाय' नाम का जप एकाग्रता और स्मरण शक्ति बढ़ाता है।
  • आर्थिक उन्नति: "ॐ भूतिदाय नमः" होने के कारण वे ऐश्वर्य और धन की कमी को दूर करते हैं।
  • विपत्ति निवारण: "ॐ संसारतापविच्छेत्त्रे नमः" — जीवन के त्रिविध तापों और अकारण आने वाले कष्टों का अंत होता है।

अय्यप्पा अर्चन विधि एवं नियम (Ritual Method)

भगवान अय्यप्पा की अर्चना के लिए विशेष शुद्धि अनिवार्य है। इस विधि का पालन करें:
१.
समय और शुद्धि: प्रातःकाल स्नान के पश्चात काले, नीले या भगवा वस्त्र पहनें। संध्या काल में घी का दीपक जलाकर पाठ करना सर्वोत्तम है।
२.
दिशा और आसन: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें।
३.
अर्चना सामग्री: प्रत्येक नाम के साथ (जैसे- ॐ महाशास्त्रे नमः) भगवान अय्यप्पा के चित्र पर भस्म (Vibhuti), चन्दन, या लाल पुष्प अर्पित करें।
४.
मंत्र उद्घोष: पाठ के अंत में "स्वामिये शरणम् अय्यप्पा" का ३ बार उच्च स्वर में उद्घोष करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. ॐ और ओं में क्या अंतर है?

ॐ (Om) साक्षात् प्रणव मंत्र है और वेदों का मूल है। 'ओं' उसी का एक सरलीकृत रूप है, लेकिन तांत्रिक और वैदिक अर्चना में शुद्ध का प्रयोग ही मन्त्रों को सिद्ध करता है।

2. क्या इस नामावली का पाठ शनि दोष दूर करता है?

जी हाँ, शनि देव ने भगवान अय्यप्पा को वचन दिया था कि जो भी उनकी शरण में आएगा, शनि उसे कभी कष्ट नहीं देंगे। शनिवार को यह पाठ करना रामबाण उपाय है।

3. भगवान अय्यप्पा को 'हरिहरपुत्र' क्यों कहते हैं?

हरि (भगवान विष्णु) और हर (भगवान शिव) के दिव्य सम्मिलन से प्रकट होने के कारण उन्हें हरिहरपुत्र कहा जाता है।

4. क्या स्त्रियाँ यह १०८ नाम पढ़ सकती हैं?

बिल्कुल, भगवती स्वरूपा स्त्रियाँ घर पर भगवान अय्यप्पा की भक्ति और नामावली का पाठ कभी भी कर सकती हैं। सबरीमला मंदिर के विशेष नियम केवल मंदिर प्रवेश के लिए हैं, भक्ति के लिए नहीं।

5. अर्चना के लिए कौन से फूल सबसे प्रिय हैं?

भगवान अय्यप्पा को नीलकमल, तुलसी, बिल्वपत्र और चन्दन अत्यंत प्रिय हैं। कुमकुम और भस्म से अर्चन करना भी विशेष फलदायी है।

6. 'मणिकण्ठ' नाम का क्या अर्थ है?

मणिकण्ठ का अर्थ है—"जिसके गले (कण्ठ) में दिव्य मणि सुशोभित हो"। जब वे नवजात शिशु के रूप में मिले थे, तब उनके गले में एक मणि थी।

7. क्या पाठ के दौरान ब्रह्मचर्य आवश्यक है?

यदि आप विशेष संकल्प या मण्डल व्रत (४१ दिन) कर रहे हैं, तो पूर्ण ब्रह्मचर्य अनिवार्य है। सामान्य भक्ति के लिए मानसिक पवित्रता पर्याप्त है।

8. 'तत्वमसि' का अय्यप्पा भक्ति में क्या महत्व है?

'तत्वमसि' एक उपनिषदिक महावाक्य है जिसका अर्थ है— "वह ईश्वर तू ही है"। यह भक्त को आत्मज्ञान की पराकाष्ठा तक ले जाता है।

9. 'भूतनाथ' नाम से क्या तात्पर्य है?

इसका अर्थ है "समस्त प्राणियों (पंचभूतों) के स्वामी" और "नकारात्मक शक्तियों (भूत-प्रेत) के नियंता"।

10. क्या मकर संक्रांति पर पाठ करना विशेष है?

हाँ, मकर संक्रांति (मकर विलक्कु) अय्यप्पा पूजा का सबसे बड़ा दिन है। इस दिन १०८ नामों का पाठ करने से वर्ष भर की बाधाएं शांत होती हैं।