Sri Arunachaleshwara Ashtottara Shatanamavali – श्री अरुणाचलेश्वर अष्टोत्तरशतनामावली

॥ श्री अरुणाचलेश्वर अष्टोत्तरशतनामावली ॥
॥ नामावली ॥
ॐ शोणाद्रीशाय नमः ।
ॐ अरुणाद्रीशाय नमः ।
ॐ देवाधीशाय नमः ।
ॐ जनप्रियाय नमः ।
ॐ प्रपन्नरक्षकाय नमः ।
ॐ धीराय नमः ।
ॐ शिवाय नमः ।
ॐ सेवकवर्धकाय नमः ।
ॐ अक्षिपेयामृतेशानाय नमः ।
ॐ स्त्रीपुंभावप्रदायकाय नमः ।
ॐ भक्तविज्ञप्तिसमादात्रे नमः ।
ॐ दीनबन्धुविमोचकाय नमः ।
ॐ मुखराङ्घ्रिपतये नमः ।
ॐ श्रीमते नमः ।
ॐ मृडाय नमः ।
ॐ मृगमदेश्वराय नमः ।
ॐ भक्तप्रेक्षणाकृते नमः ।
ॐ साक्षिणे नमः ।
ॐ भक्तदोषनिवर्तकाय नमः ।
ॐ ज्ञानसम्बन्धनाथाय नमः ।
ॐ श्रीहालाहलसुन्दराय नमः ।
ॐ आहुवैश्वर्यदाताय नमः ।
ॐ स्मृतसर्वाघनाशनाय नमः ।
ॐ व्यतस्तनृत्याय नमः ।
ॐ ध्वजधृते नमः ।
ॐ सकान्तिने नमः ।
ॐ नटनेश्वराय नमः ।
ॐ सामप्रियाय नमः ।
ॐ कलिध्वंसिने नमः ।
ॐ वेदमूर्तिने नमः ।
ॐ निरञ्जनाय नमः ।
ॐ जगन्नाथाय नमः ।
ॐ महादेवाय नमः ।
ॐ त्रिनेत्रे नमः ।
ॐ त्रिपुरान्तकाय नमः ।
ॐ भक्तापराधसोढाय नमः ।
ॐ योगीशाय नमः ।
ॐ भोगनायकाय नमः ।
ॐ बालमूर्तये नमः ।
ॐ क्षमारूपिणे नमः ।
ॐ धर्मरक्षकाय नमः ।
ॐ वृषध्वजाय नमः ।
ॐ हराय नमः ।
ॐ गिरीश्वराय नमः ।
ॐ भर्गाय नमः ।
ॐ चन्द्ररेखावतंसकाय नमः ।
ॐ स्मरान्तकाय नमः ।
ॐ अन्धकरिपवे नमः ।
ॐ सिद्धराजाय नमः ।
ॐ दिगम्बराय नमः ।
ॐ आगमप्रियाय नमः ।
ॐ ईशानाय नमः ।
ॐ भस्मरुद्राक्षलाञ्छनाय नमः ।
ॐ श्रीपतये नमः ।
ॐ शङ्कराय नमः ।
ॐ सृष्टाय नमः ।
ॐ सर्वविद्येश्वराय नमः ।
ॐ अनघाय नमः ।
ॐ गङ्गाधराय नमः ।
ॐ क्रतुध्वंसिने नमः ।
ॐ विमलाय नमः ।
ॐ नागभूषणाय नमः ।
ॐ अरुणाय नमः ।
ॐ बहुरूपाय नमः ।
ॐ विरूपाक्षाय नमः ।
ॐ अक्षराकृतये नमः ।
ॐ अनाद्यन्तरहिताय नमः ।
ॐ शिवकामाय नमः ।
ॐ स्वयम्प्रभवे नमः ।
ॐ सच्चिदानन्दरूपाय नमः ।
ॐ सर्वात्माय नमः ।
ॐ जीवधारकाय नमः ।
ॐ स्त्रीसङ्गवामभागाय नमः ।
ॐ विधये नमः ।
ॐ विहितसुन्दराय नमः ।
ॐ ज्ञानप्रदाय नमः ।
ॐ मुक्तिदाय नमः ।
ॐ भक्तवाञ्छितदायकाय नमः ।
ॐ आश्चर्यवैभवाय नमः ।
ॐ कामिने नमः ।
ॐ निरवद्याय नमः ।
ॐ निधिप्रदाय नमः ।
ॐ शूलिने नमः ।
ॐ पशुपतये नमः ।
ॐ शंभवे नमः ।
ॐ स्वयंभुवे नमः ।
ॐ गिरीशाय नमः ।
ॐ सङ्गीतवेत्रे नमः ।
ॐ नृत्यज्ञाय नमः ।
ॐ त्रिवेदिने नमः ।
ॐ वृद्धवैदिकाय नमः ।
ॐ त्यागराजाय नमः ।
ॐ कृपासिन्धवे नमः ।
ॐ सुगन्धिने नमः ।
ॐ सौरभेश्वराय नमः ।
ॐ कर्तवीरेश्वराय नमः ।
ॐ शान्ताय नमः ।
ॐ कपालिने नमः ।
ॐ कलशप्रभवे नमः ।
ॐ पापहराय नमः ।
ॐ देवदेवाय नमः ।
ॐ सर्वनाम्ने नमः ।
ॐ मनोवासाय नमः ।
ॐ सर्वाय नमः ।
ॐ अरुणगिरीश्वराय नमः ।
ॐ कालमूर्तये नमः ।
ॐ स्मृतिमात्रेणसन्तुष्टाय नमः ।
ॐ श्रीमदपीतकुचाम्बासमेत श्रीअरुणाचलेश्वराय नमः ।
॥ इति श्री अरुणाचलेश्वर अष्टोत्तरशतनामावली सम्पूर्णम् ॥
श्री अरुणाचलेश्वर अष्टोत्तरशतनामावली — विस्तृत परिचय एवं दार्शनिक रहस्य (Introduction)
श्री अरुणाचलेश्वर अष्टोत्तरशतनामावली (Sri Arunachaleshwara Ashtottara Shatanamavali) महादेव के उस आदि और अनंत स्वरूप का कीर्तन है, जिसे तमिलनाडु के तिरुवन्नामलई में "अग्नि लिंगम" के रूप में पूजा जाता है। यह नामावली केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि उस ज्योतिर्मय स्तम्भ की स्तुति है जिसने ब्रह्मा और विष्णु के अहंकार को चूर कर ब्रह्मांड में महादेव की सर्वोच्चता को स्थापित किया था। "अरुणाचल" शब्द दो शब्दों का मेल है — "अरुण" (लाल या प्रकाश) और "अचल" (पर्वत)। यह वह पर्वत है जिसे स्वयं भगवान शिव का स्थूल स्वरूप माना जाता है। इस नामावली का पाठ साधक को उस अविनाशी प्रकाश से जोड़ता है जो अज्ञान के अंधकार को मिटाने वाला है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद हुआ, तब भगवान शिव एक असीमित अग्नि स्तंभ (Jyotirlinga) के रूप में प्रकट हुए। उन्होंने दोनों को इस स्तंभ का आदि और अंत खोजने की चुनौती दी। विष्णु (वराह रूप में) पाताल गए और ब्रह्मा (हंस रूप में) आकाश की ओर उड़े, परन्तु दोनों ही इसके अंत तक नहीं पहुँच सके। अंततः, इस अग्नि स्तंभ ने पर्वत का रूप धारण किया, जिसे आज हम अरुणाचल कहते हैं। इस नामावली के १०८ नाम इसी विराट गाथा और महादेव के विविध गुणों का वर्णन करते हैं। जैसे "शोणाद्रीशाय नमः" (लाल पर्वत के स्वामी) और "ज्योतिर्मयाय नमः" (प्रकाश स्वरूप)। ये नाम साधक को यह बोध कराते हैं कि सत्य असीमित है और समर्पण ही उसे पाने का मार्ग है।
दार्शनिक रूप से, अरुणाचलेश्वर "पंचभूत स्थलों" में अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। अग्नि जिस प्रकार अशुद्धियों को जलाकर शुद्ध सोना प्रकट करती है, वैसे ही अरुणाचल के १०८ नामों का जप साधक के काम, क्रोध और मोह जैसे मानसिक विकारों को भस्म कर देता है। भगवान शिव के इस स्वरूप का संबंध "मणिपुर चक्र" से माना जाता है, जो ऊर्जा और आत्मविश्वास का केंद्र है। तिरुवन्नामलई की भूमि पर महर्षि रमण जैसे संतों ने केवल इस पर्वत का ध्यान करके ही आत्म-साक्षात्कार प्राप्त किया था। नामावली में प्रयुक्त प्रत्येक नाम के अंत में लगा "नमः" (न मम — मेरा नहीं, सब तेरा है) साधक के अहंकार को विसर्जित करने की एक सूक्ष्म तांत्रिक प्रक्रिया है।
वर्तमान कलयुग के इस अशांत और भ्रमित समय में, श्री अरुणाचलेश्वर नामावली का पाठ एक "आध्यात्मिक टॉर्च" की तरह कार्य करता है। जब हम अंकों (Numbers) के बिना, निरंतरता के साथ इन नामों का सस्वर अर्चन करते हैं, तो हमारे मस्तिष्क के ऊर्जा केंद्र संतुलित होते हैं। कहा जाता है कि "काशी में मरने से, चिदंबरम में दर्शन से, और अरुणाचल के मात्र स्मरण से मोक्ष मिलता है।" इस नामावली का पाठ इसी "स्मरण" की विधि को जीवंत करता है। भगवान के नेत्रों की अग्नि ज्ञान का प्रतीक है जो मृत्यु के भय को जड़ से मिटा देती है। यह नामावली वास्तव में ब्रह्मांड के उस आदि प्रकाश की स्तुति है, जो हर जीव के भीतर चैतन्य रूप में विद्यमान है।
विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व एवं अग्नि लिंगम (Significance)
अरुणाचलेश्वर नामावली का महत्व इसलिए सर्वोपरि है क्योंकि इसमें "स्थिरता" (Achala) और "प्रकाश" (Aruna) का अद्भुत संगम है। अरुणाचल को 'मृत्युंजय स्थल' भी माना जाता है। यहाँ महादेव अग्नि के रूप में प्रकट होकर जीव के अज्ञान रूपी प्रारब्ध को जलाते हैं। कार्तिकेय दीपम के समय जब पर्वत के शिखर पर विशाल ज्योति प्रज्वलित की जाती है, तब इस नामावली का पाठ अनंत गुना फलदायी होता है।
विशेष रूप से "सेवकवर्धकाय नमः" और "भक्तदोषनिवर्तकाय नमः" जैसे नाम यह सुनिश्चित करते हैं कि महादेव अपने भक्तों के दोषों को क्षमा कर उन्हें आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाते हैं। यह पाठ उन लोगों के लिए रामबाण है जो जीवन में मानसिक शांति, एकाग्रता और मोक्ष की तलाश में हैं।
फलश्रुति: नामावली पाठ के अभूतपूर्व लाभ (Benefits)
शास्त्रों और तिरुवन्नामलई की परंपराओं के अनुसार, अरुणाचलेश्वर नामावली के अर्चन से निम्नलिखित लाभ मिलते हैं:
- अखंड मोक्ष की पात्रता: "मुक्तिदाय नमः" — मात्र स्मरण और नाम जप से जीव जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होने की ओर अग्रसर होता है।
- पाप मुक्ति और आत्मशुद्धि: "स्मृतसर्वाघनाशनाय" — यह नामावली हमारे पिछले जन्मों के संचित पापों को जलाकर चित्त को निर्मल बनाती है।
- मानसिक शांति और निर्भयता: यह पाठ तनाव, चिंता और अज्ञात भयों को दूर कर मन को हिमालय जैसी दृढ़ता और शांति प्रदान करता है।
- आरोग्य और दीर्घायु: अग्नि लिंगम की ऊर्जा शरीर के रोगों को नष्ट कर जातक को उत्तम स्वास्थ्य और ओज प्रदान करती है।
- सच्चा ज्ञान और विवेक: "ज्ञानप्रदाय नमः" — छात्रों और साधकों के लिए यह एकाग्रता बढ़ाने और प्रज्ञा को तीव्र करने का सिद्ध मंत्र है।
पाठ विधि एवं अर्चना विधान (Ritual Method)
भगवान अरुणाचलेश्वर "आशुतोष" हैं, वे बहुत ही सहज भाव से प्रसन्न हो जाते हैं। पूर्ण फल प्राप्ति हेतु निम्न विधि अपनाएँ:
पूजा के मुख्य नियम:
- समय: प्रातःकाल 'ब्रह्म मुहूर्त' सर्वश्रेष्ठ है। विशेषकर सोमवार, प्रदोष व्रत, और कार्तिकेय पूर्णिमा पर अर्चन करना महापुण्यकारी है।
- शुद्धि: स्नान के पश्चात स्वच्छ श्वेत या केसरिया वस्त्र धारण करें। मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखें।
- अर्चन सामग्री: १०८ नामों के साथ शिवलिंग पर 'बिल्वपत्र' (Bael leaves) या लाल पुष्प अर्पित करें। अरुणाचल को लाल रंग प्रिय है।
- नैवेद्य: पंचामृत, दूध या सादा नारियल का भोग लगाएँ।
- विशेष: पाठ के दौरान मन में "अरुणाचल-शिव" का ध्यान करें और संभव हो तो पाठ के पश्चात दीपक जलाकर पर्वत का मानसिक ध्यान करें।
विशेष प्रयोग:
- गिरि वलम (Girivalam): यदि आप तिरुवन्नामलई में हैं, तो पर्वत की प्रदक्षिणा करते समय इन नामों का जप करना साक्षात् शिव सायुज्य प्रदान करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. भगवान अरुणाचलेश्वर कौन हैं?
भगवान अरुणाचलेश्वर साक्षात् महादेव के वह स्वरूप हैं जो तिरुवन्नामलई के अरुणाचल पर्वत पर "अग्नि लिंगम" के रूप में विराजमान हैं।
2. 'अरुणाचल' शब्द का अर्थ क्या है?
'अरुण' का अर्थ है प्रकाश या सूर्य की लालिमा (ज्ञान), और 'अचल' का अर्थ है पर्वत। अतः इसका अर्थ है "ज्ञान का वह पर्वत जो स्थिर और अविनाशी है"।
3. इस नामावली का पाठ कब करना सर्वोत्तम है?
सूर्योदय के समय प्रातःकाल पाठ करना सर्वश्रेष्ठ है। सोमवार और कार्तिकेय दीपम उत्सव के दौरान इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है।
4. क्या इस नामावली का पाठ घर में किया जा सकता है?
हाँ, घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित कर श्रद्धापूर्वक इस नामावली का अर्चन किया जा सकता है। इससे घर की नकारात्मकता समाप्त होती है।
5. १०८ नामों से अर्चना करने की सही विधि क्या है?
प्रत्येक नाम के आरंभ में ॐ और अंत में नमः लगाकर शिवलिंग पर एक बिल्वपत्र या पुष्प चढ़ाना अर्चना की सही विधि है।
6. 'स्मृतिमात्रेणसन्तुष्टाय' नाम का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है — "वह देव जो मात्र याद करने (स्मरण) मात्र से संतुष्ट और प्रसन्न हो जाते हैं"। यह अरुणाचल की सबसे बड़ी महिमा है।
7. क्या अरुणाचलेश्वर और तिरुवन्नामलई के शिव एक ही हैं?
जी हाँ, तिरुवन्नामलई मंदिर के मुख्य विग्रह का नाम अरुणाचलेश्वर है, जो स्वयं को अग्नि स्तंभ के रूप में प्रदर्शित करते हैं।
8. पाठ के दौरान ॐ और नमः का क्या महत्व है?
ॐ ब्रह्मांड की मूल शक्ति है और नमः पूर्ण शरणागति का प्रतीक। इनके जुड़ने से नाम एक शक्तिशाली सिद्ध मंत्र बन जाता है।
9. क्या स्त्रियाँ भी इस नामावली का पाठ कर सकती हैं?
निश्चित रूप से। भगवत भक्ति में कोई भेदभाव नहीं है। स्त्रियाँ भी पूर्ण पवित्रता और श्रद्धा के साथ महादेव के इन १०८ नामों का जप कर सकती हैं।
10. 'गिरि वलम' क्या है और इसमें नामावली का क्या उपयोग है?
पर्वत की १४ किमी की पैदल प्रदक्षिणा को गिरि वलम कहते हैं। इस दौरान नामावली का जप करना साक्षात् शिव लोक की प्राप्ति का साधन माना गया है।