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Sri Annapurna Ashtottara Shatanamavali – श्री अन्नपूर्णा अष्टोत्तरशतनामावलिः

Sri Annapurna Ashtottara Shatanamavali – श्री अन्नपूर्णा अष्टोत्तरशतनामावलिः
॥ श्री अन्नपूर्णा अष्टोत्तरशतनामावलिः ॥ ॥ नामावली ॥ ॐ अन्नपूर्णायै नमः । ॐ शिवायै नमः । ॐ देव्यै नमः । ॐ भीमायै नमः । ॐ पुष्ट्यै नमः । ॐ सरस्वत्यै नमः । ॐ सर्वज्ञायै नमः । ॐ पार्वत्यै नमः । ॐ दुर्गायै नमः । ॐ शर्वाण्यै नमः । ॐ शिववल्लभायै नमः । ॐ वेदवेद्यायै नमः । ॐ महाविद्यायै नमः । ॐ विद्यादात्र्यै नमः । ॐ विशारदायै नमः । ॐ कुमार्यै नमः । ॐ त्रिपुरायै नमः । ॐ बालायै नमः । ॐ लक्ष्म्यै नमः । ॐ श्रियै नमः । ॐ भयहारिण्यै नमः । ॐ भवान्यै नमः । ॐ विष्णुजनन्यै नमः । ॐ ब्रह्मादिजनन्यै नमः । ॐ गणेशजनन्यै नमः । ॐ शक्त्यै नमः । ॐ कुमारजनन्यै नमः । ॐ शुभायै नमः । ॐ भोगप्रदायै नमः । ॐ भगवत्यै नमः । ॐ भक्ताभीष्टप्रदायिन्यै नमः । ॐ भवरोगहरायै नमः । ॐ भव्यायै नमः । ॐ शुभ्रायै नमः । ॐ परममङ्गलायै नमः । ॐ भवान्यै नमः । ॐ चञ्चलायै नमः । ॐ गौर्यै नमः । ॐ चारुचन्द्रकलाधरायै नमः । ॐ विशालाक्ष्यै नमः । ॐ विश्वमात्रे नमः । ॐ विश्ववन्द्यायै नमः । ॐ विलासिन्यै नमः । ॐ आर्यायै नमः । ॐ कल्याणनिलयायै नमः । ॐ रुद्राण्यै नमः । ॐ कमलासनायै नमः । ॐ शुभप्रदायै नमः । ॐ शुभायै नमः । ॐ अनन्तायै नमः । ॐ वृत्तपीनपयोधरायै नमः । ॐ अम्बायै नमः । ॐ संहारमथन्यै नमः । ॐ मृडान्यै नमः । ॐ सर्वमङ्गलायै नमः । ॐ विष्णुसंसेवितायै नमः । ॐ सिद्धायै नमः । ॐ ब्रह्माण्यै नमः । ॐ सुरसेवितायै नमः । ॐ परमानन्ददायै नमः । ॐ शान्त्यै नमः । ॐ परमानन्दरूपिण्यै नमः । ॐ परमानन्दजनन्यै नमः । ॐ परायै नमः । ॐ आनन्दप्रदायिन्यै नमः । ॐ परोपकारनिरतायै नमः । ॐ परमायै नमः । ॐ भक्तवत्सलायै नमः । ॐ पूर्णचन्द्राभवदनायै नमः । ॐ पूर्णचन्द्रनिभांशुकायै नमः । ॐ शुभलक्षणसम्पन्नायै नमः । ॐ शुभानन्दगुणार्णवायै नमः । ॐ शुभसौभाग्यनिलयायै नमः । ॐ शुभदायै नमः । ॐ रतिप्रियायै नमः । ॐ चण्डिकायै नमः । ॐ चण्डमथन्यै नमः । ॐ चण्डदर्पनिवारिण्यै नमः । ॐ मार्ताण्डनयनायै नमः । ॐ साध्व्यै नमः । ॐ चन्द्राग्निनयनायै नमः । ॐ सत्यै नमः । ॐ पुण्डरीकहरायै नमः । ॐ पूर्णायै नमः । ॐ पुण्यदायै नमः । ॐ पुण्यरूपिण्यै नमः । ॐ मायातीतायै नमः । ॐ श्रेष्ठमायायै नमः । ॐ श्रेष्ठधर्मात्मवन्दितायै नमः । ॐ असृष्ट्यै नमः । ॐ सङ्गरहितायै नमः । ॐ सृष्टिहेतवे नमः । ॐ कपर्दिन्यै नमः । ॐ वृषारूढायै नमः । ॐ शूलहस्तायै नमः । ॐ स्थितिसंहारकारिण्यै नमः । ॐ मन्दस्मितायै नमः । ॐ स्कन्दमात्रे नमः । ॐ शुद्धचित्तायै नमः । ॐ मुनिस्तुतायै नमः । ॐ महाभगवत्यै नमः । ॐ दक्षायै नमः । ॐ दक्षाध्वरविनाशिन्यै नमः । ॐ सर्वार्थदात्र्यै नमः । ॐ सावित्र्यै नमः । ॐ सदाशिवकुटुम्बिन्यै नमः । ॐ नित्यसुन्दरसर्वाङ्ग्यै नमः । ॐ सच्चिदानन्दलक्षणायै नमः । ॥ इति श्री अन्नपूर्णा अष्टोत्तरशतनामावलिः सम्पूर्णा ॥

श्री अन्नपूर्णा अष्टोत्तरशतनामावलिः — विस्तृत परिचय एवं दार्शनिक आधार (Introduction)

श्री अन्नपूर्णा अष्टोत्तरशतनामावलिः (Sri Annapurna Ashtottara Shatanamavali) सनातन धर्म के महान स्तोत्र साहित्य का एक अत्यंत मंगलकारी हिस्सा है। यह नामावली भगवती पार्वती के उस दिव्य स्वरूप "अन्नपूर्णा" को समर्पित है, जो इस चराचर जगत के पोषण का आधार हैं। हिंदू दर्शन में भोजन केवल शरीर की आवश्यकता नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक अनुष्ठान (यज्ञ) माना गया है। "अन्नपूर्णा" का शाब्दिक अर्थ है — "वह जो अन्न (पोषण) से पूर्ण है और जो दूसरों को भी पूर्ण करती है"। १०८ नामों का यह संकलन माँ के उन अनंत गुणों को दर्शाता है जो भक्त को दरिद्रता से मुक्त कर उसे संपन्नता और ज्ञान के शिखर पर ले जाते हैं।
पौराणिक संदर्भों, विशेषकर काशी खंड के अनुसार, भगवती अन्नपूर्णा का प्रादुर्भाव भगवान शिव के साथ हुए एक दार्शनिक संवाद के परिणाम स्वरूप हुआ। जब शिव ने कहा कि "संसार एक माया है और भोजन भी केवल एक भ्रम है", तब माँ पार्वती ने यह सिद्ध करने के लिए कि भौतिक जगत और पोषण भी ईश्वर का ही एक रूप है, स्वयं को संसार से अदृश्य कर लिया। इसके परिणामस्वरूप चराचर जगत में भीषण अकाल पड़ गया। अंततः महादेव को स्वयं आभास हुआ कि संसार के अस्तित्व के लिए 'शक्ति' के पोषण रूप की आवश्यकता अनिवार्य है। तब माँ पार्वती ने काशी में "अन्नपूर्णा" के रूप में प्रकट होकर स्वयं महादेव को भिक्षा प्रदान की। इस नामावली के १०८ नाम उसी परम करुणा और पोषण शक्ति का कीर्तन हैं।
दार्शनिक रूप से, माँ अन्नपूर्णा का स्वरूप "अद्वैत" का प्रतीक है। उनके एक हाथ में स्वर्ण का पात्र है और दूसरे हाथ में रत्नजड़ित कड़छी (Ladle), जो यह संकेत देती है कि वे केवल पेट की भूख नहीं मिटातीं, बल्कि आत्मा को "ज्ञान-वैराग्य" के अमृत से भी तृप्त करती हैं। नामावली में प्रयुक्त नाम जैसे "महाविद्या", "परमानन्ददायै" और "सच्चिदानन्दलक्षणायै" यह स्पष्ट करते हैं कि माँ अन्नपूर्णा साक्षात् ब्रह्म-विद्या का स्वरूप हैं। इन नामों का सस्वर जप साधक के भीतर एक ऐसी ऊर्जा जाग्रत करता है जिससे वह भौतिक अभावों से ऊपर उठकर मानसिक शांति और संतोष प्राप्त करता है। १०८ की संख्या ब्रह्मांडीय पूर्णता और मानव चेतना के मुख्य बिंदुओं (मर्म स्थानों) का प्रतिनिधित्व करती है।
वर्तमान कलयुग के इस भागदौड़ भरे युग में, जहाँ मनुष्य निरंतर असुरक्षा और मानसिक अशांति का अनुभव कर रहा है, माँ अन्नपूर्णा की नामावली का पाठ एक "दिव्य सुरक्षा कवच" की तरह कार्य करता है। जब हम प्रत्येक नाम के आरंभ में और अंत में "नमः" (समर्पण) जोड़ते हैं, तो वह नाम एक जाग्रत मंत्र बन जाता है। यह पाठ न केवल घर में अन्न-धन की बरकत लाता है, बल्कि जातक के परिवार में प्रेम, सौहार्द और स्वास्थ्य का भी संचार करता है। माँ अन्नपूर्णा की कृपा से व्यक्ति के जीवन से केवल भौतिक दरिद्रता ही नहीं, बल्कि बौद्धिक और आध्यात्मिक दरिद्रता का भी समूल नाश होता है। यह नामावली वास्तव में पोषण के उस शाश्वत स्रोत की स्तुति है, जो सूर्य, वायु और जल के रूप में हमें निरंतर जीवन प्रदान कर रही है।

विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व एवं 'ज्ञान-वैराग्य' (Significance)

अन्नपूर्णा नामावली का महत्व इसलिए सर्वोपरि है क्योंकि इसमें "अन्न" को "ब्रह्म" माना गया है (अन्नं ब्रह्म)। आदि गुरु शंकराचार्य ने भी अपनी स्तुति में माँ से "ज्ञान-वैराग्य-सिद्धयर्थम्" अर्थात् ज्ञान और वैराग्य की सिद्धि के लिए भिक्षा मांगी थी। यह नामावली सिद्ध करती है कि बिना पोषण के ज्ञान की साधना संभव नहीं है।
विशेष रूप से उन घरों में जहाँ आर्थिक तंगी रहती है या कलह का वातावरण रहता है, वहाँ इन १०८ नामों का अर्चन चमत्कारी प्रभाव डालता है। "भक्ताभीष्टप्रदायिन्यै" नाम यह सुनिश्चित करता है कि माँ अपने भक्त की हर सात्विक इच्छा को पूर्ण करती हैं। यह पाठ साधक को 'अयाचक' (बिना मांगे सब कुछ पाने वाला) बना देता है।

फलश्रुति: नामावली पाठ के अभूतपूर्व लाभ (Benefits)

शास्त्रों और ऋषि-मुनियों के वचनों के अनुसार, श्री अन्नपूर्णा नामावली के नित्य पाठ से निम्नलिखित लाभ मिलते हैं:
  • अक्षय अन्न-धन प्राप्ति: जिस घर में यह नामावली पढ़ी जाती है, वहाँ कभी अन्न की कमी नहीं होती और लक्ष्मी का स्थायी निवास होता है।
  • आरोग्य और दीर्घायु: पोषण की देवी होने के नाते, माँ का नाम जप शारीरिक व्याधियों को दूर कर जातक को उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करता है।
  • ज्ञान और बुद्धि का विकास: "विद्यादात्र्यै" — यह नामावली विद्यार्थियों के लिए विशेष रूप से लाभकारी है, इससे स्मरण शक्ति और मेधा बढ़ती है।
  • पाप मुक्ति और शांति: "भवरोगहरायै" — संसार रूपी रोगों और संचित पापों का शमन होता है, जिससे मन को अपार शांति मिलती है।
  • पारिवारिक सामंजस्य: घर की गृहणी द्वारा इस पाठ को करने से पूरे परिवार में आपसी प्रेम और सुख-सौहार्द बढ़ता है।

पाठ विधि एवं अर्चना विधान (Ritual Method)

माँ अन्नपूर्णा भाव की भूखी हैं, परन्तु शास्त्रीय विधि से पूजन करने पर ऊर्जा का प्रभाव तीव्र होता है:

साधना के मुख्य नियम:

  • समय: प्रातःकाल स्नान के पश्चात या रसोई में भोजन बनाने से पूर्व। मंगलवार और शुक्रवार का दिन विशेष फलदायी है।
  • स्थान: पूजा घर या रसोई का शुद्ध कोना। मुख उत्तर या पूर्व दिशा की ओर रखें।
  • वस्त्र: श्वेत या पीले वस्त्र पहनकर पाठ करना शुभ माना जाता है।
  • अर्चन: १०८ नामों के साथ अक्षत (बिना टूटे चावल) या श्वेत पुष्प माँ के चरणों में अर्पित करें।
  • नैवेद्य: केसरिया भात, हलवा या ताजे फलों का भोग लगाएँ।
  • विशेष: पाठ के पश्चात किसी निर्धन को भोजन कराना या पक्षियों को दाना डालना माँ को अत्यंत प्रिय है।

विशेष मनोकामना हेतु:

  • दरिद्रता निवारण के लिए: लगातार २१ शुक्रवार तक घी का दीपक जलाकर नामावली का १०८ बार जप करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. माँ अन्नपूर्णा कौन हैं?

माँ अन्नपूर्णा साक्षात् देवी पार्वती का वह अवतार हैं जो चराचर जगत को भोजन और आध्यात्मिक पोषण प्रदान करती हैं। वे काशी की प्रधान देवी मानी जाती हैं।

2. अन्नपूर्णा नामावली का पाठ कब करना चाहिए?

इसका पाठ प्रतिदिन प्रातःकाल करना सर्वोत्तम है। इसके अतिरिक्त अक्षय तृतीया, अन्नपूर्णा जयंती और शुक्रवार को इसका विशेष महत्व है।

3. क्या यह नामावली रसोई में पढ़ी जा सकती है?

हाँ, यदि रसोई शुद्ध और साफ है, तो भोजन बनाने से पूर्व इन नामों का जप करने से भोजन 'प्रसाद' बन जाता है और घर में कभी बरकत कम नहीं होती।

4. १०८ नामों से अर्चन करने की विधि क्या है?

प्रत्येक नाम के आरंभ में और अंत में नमः बोलकर एक-एक चावल का दाना (अक्षत) माँ के चित्र पर अर्पित करना ही अर्चन विधि है।

5. 'ज्ञान-वैराग्य सिद्धि' से अन्नपूर्णा का क्या संबंध है?

माँ अन्नपूर्णा केवल पेट नहीं भरतीं, बल्कि वे वह बुद्धि प्रदान करती हैं जिससे मनुष्य सत्य को जान सके और संसार की व्यर्थ की इच्छाओं से मुक्त (वैराग्य) हो सके।

6. क्या पुरुष भी इस नामावली का पाठ कर सकते हैं?

निश्चित रूप से। भगवत भक्ति में कोई लिंग भेद नहीं है। सुख, शांति और समृद्धि चाहने वाला कोई भी व्यक्ति इसे पढ़ सकता है।

7. माँ अन्नपूर्णा के हाथों में कड़छी और पात्र का क्या अर्थ है?

पात्र (बर्तन) अनंत संसाधनों का प्रतीक है और कड़छी (Ladle) उस ज्ञान का प्रतीक है जिससे वे सबको समान रूप से लाभान्वित करती हैं।

8. पाठ के दौरान ॐ और नमः क्यों जोड़ा जाता है?

ब्रह्मांड की आदि ध्वनि है और नमः पूर्ण समर्पण का भाव। इनके जुड़ने से नाम एक सिद्ध मंत्र बन जाता है।

9. क्या इस पाठ से घर की दरिद्रता दूर होती है?

जी हाँ, माँ अन्नपूर्णा दरिद्रता नाशिनी हैं। उनके नामों का अर्चन करने से आर्थिक मार्ग खुलते हैं और घर में अभाव समाप्त होते हैं।

10. 'सदाशिवकुटुम्बिन्यै' नाम का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है — "भगवान सदाशिव (महादेव) की पत्नी या उनके परिवार की स्वामिनी"। यह नाम उनके और शिव के अटूट संबंध को दर्शाता है।