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Sri Kakaradi Kali Shatanama Namavali – श्रीकालीककारादिनामशताष्टकनामावली

Sri Kakaradi Kali Shatanama Namavali – श्रीकालीककारादिनामशताष्टकनामावली
॥ श्रीकालीककारादिनामशताष्टकनामावली (मुण्डमालातन्त्रे) ॥ श्रीकाल्यै नमः । श्रीकपालिन्यै नमः । श्रीकान्तायै नमः । श्रीकामदायै नमः । श्रीकामसुन्दर्यै नमः । श्रीकालरात्रयै नमः । श्रीकालिकायै नमः । श्रीकालभैरवपूजितायै नमः । श्रीकुरुकुल्लायै नमः । श्रीकामिन्यै नमः । १० श्रीकमनीयस्वभाविन्यै नमः । श्रीकुलीनायै नमः । श्रीकुलकर्त्र्यै नमः । श्रीकुलवर्त्मप्रकाशिन्यै नमः । श्रीकस्तूरीरसनीलायै नमः । श्रीकाम्यायै नमः । श्रीकामस्वरूपिण्यै नमः । श्रीककारवर्णनिलयायै नमः । श्रीकामधेनवे नमः । श्रीकरालिकायै नमः । २० श्रीकुलकान्तायै नमः । श्रीकरालास्यायै नमः । श्रीकामार्त्तायै नमः । श्रीकलावत्यै नमः । श्रीकृशोदर्यै नमः । श्रीकामाख्यायै नमः । श्रीकौमार्यै नमः । श्रीकुलपालिन्यै नमः । श्रीकुलजायै नमः । श्रीकुलकन्यायै नमः । ३० श्रीकलहायै नमः । श्रीकुलपूजितायै नमः । श्रीकामेश्वर्यै नमः । श्रीकामकान्तायै नमः । श्रीकुञ्जरेश्वरगामिन्यै नमः । श्रीकामदात्र्यै नमः । श्रीकामहर्त्र्यै नमः । श्रीकृष्णायै नमः । श्रीकपर्दिन्यै नमः । श्रीकुमुदायै नमः । ४० श्रीकृष्णदेहायै नमः । श्रीकालिन्द्यै नमः । श्रीकुलपूजितायै नमः । श्रीकाश्यप्यै नमः । श्रीकृष्णमात्रे नमः । श्रीकुलिशाङ्ग्यै नमः । श्रीकलायै नमः । श्रीक्रींरूपायै नमः । श्रीकुलगम्यायै नमः । श्रीकमलायै नमः । ५० श्रीकृष्णपूजितायै नमः । श्रीकृशाङ्ग्यै नमः । श्रीकिन्नर्यै नमः । श्रीकर्त्र्यै नमः । श्रीकलकण्ठ्यै नमः । श्रीकार्तिक्यै नमः । श्रीकम्बुकण्ठ्यै नमः । श्रीकौलिन्यै नमः । श्रीकुमुदायै नमः । श्रीकामजीविन्यै नमः । ६० श्रीकुलस्त्रियै नमः । श्रीकीर्तिकायै नमः । श्रीकृत्यायै नमः । श्रीकीर्त्यै नमः । श्रीकुलपालिकायै नमः । श्रीकामदेवकलायै नमः । श्रीकल्पलतायै नमः । श्रीकामाङ्गवर्धिन्यै नमः । श्रीकुन्तायै नमः । श्रीकुमुदप्रीतायै नमः । ७० श्रीकदम्बकुसुमोत्सुकायै नमः । श्रीकादम्बिन्यै नमः । श्रीकमलिन्यै नमः । श्रीकृष्णानन्दप्रदायिन्यै नमः । श्रीकुमारीपूजनरतायै नमः । श्रीकुमारीगणशोभितायै नमः । श्रीकुमारीरञ्जनरतायै नमः । श्रीकुमारीव्रतधारिण्यै नमः । श्रीकङ्काल्यै नमः । श्रीकमनीयायै नमः । ८० श्रीकामशास्त्रविशारदायै नमः । श्रीकपालखट्वाङ्गधरायै नमः । श्रीकालभैरवरूपिण्यै नमः । श्रीकोटर्यै नमः । श्रीकोटराक्ष्यै नमः । श्रीकाश्यै नमः । श्रीकैलासवासिन्यै नमः । श्रीकात्यायिन्यै नमः । श्रीकार्यकर्यै नमः । श्रीकाव्यशास्त्रप्रमोदिन्यै नमः । ९० श्रीकामाकर्षणरूपायै नमः । श्रीकामपीठनिवासिन्यै नमः । श्रीकङ्किन्यै नमः । श्रीकाकिन्यै नमः । श्रीक्रीडायै नमः । श्रीकुत्सितायै नमः । श्रीकलहप्रियायै नमः । श्रीकुण्डगोलोद्भवप्राणायै नमः । श्रीकौशिक्यै नमः । श्रीकीर्तिवर्द्धिन्यै नमः । १०० श्रीकुम्भस्तन्यै नमः । श्रीकटाक्षायै नमः । श्रीकाव्यायै नमः । श्रीकोकनदप्रियायै नमः । श्रीकान्तारवासिन्यै नमः । श्रीकान्त्यै नमः । श्रीकठिनायै नमः । श्रीकृष्णवल्लभायै नमः । १०८ ॥ इति मुण्डमालातन्त्रान्तर्गता ककारादिकालीशतनामावलिः समाप्ता ॥

ककारादिकालीशतनामावलिः: विस्तृत तांत्रिक पृष्ठभूमि (Extensive Tantric Background)

सनातन धर्म के शाक्त संप्रदाय और तन्त्र साहित्य में 'मुण्डमाला तन्त्र' का स्थान अत्यंत उच्च, रहस्यमयी और प्रमाणिक माना गया है। इसी महाग्रंथ से श्रीकालीककारादिनामशताष्टकनामावली का प्रादुर्भाव हुआ है। तन्त्र शास्त्र में 'नामावली' और 'स्तोत्र' में एक सूक्ष्म परंतु महत्वपूर्ण अंतर होता है। स्तोत्र लयबद्ध श्लोकों का समूह होता है जिसका सस्वर पाठ किया जाता है, जबकि नामावली का निर्माण मुख्य रूप से 'अर्चन' (Archana) अर्थात् देवी को प्रत्यक्ष रूप से पुष्प, कुमकुम, अक्षत या अन्य पवित्र सामग्रियां अर्पित करने के लिए किया जाता है। इस नामावली में प्रत्येक नाम के अंत में 'नमः' (प्रणाम) लगा हुआ है, जो इसे हवन, मार्जन और तर्पण के लिए भी पूर्णतः उपयुक्त बनाता है।
यह नामावली भगवान शिव और माता पार्वती के उस गुह्य संवाद का परिणाम है जहाँ पार्वती जी ने अपने पति से एक ऐसा साधन पूछा था जो कलयुग के जीवों को बिना कठोर तपस्या के ही 'मन्त्रसिद्धि' और 'अष्टसिद्धि' प्रदान कर सके। तब महादेव ने इस 'ककारादि' रहस्य का उद्घाटन किया, जिसमें माँ काली के 108 अत्यंत शक्तिशाली और ऊर्जावान नामों का संकलन किया गया है।

'ककार' (क अक्षर) का दार्शनिक और तांत्रिक रहस्य (Philosophical Secret of the Letter 'Ka')

इस नामावली की सबसे अद्वितीय विशेषता यह है कि इसके सभी 108 नाम देवनागरी वर्णमाला के प्रथम व्यंजन "क" (ककार) से ही प्रारंभ होते हैं। तन्त्र शास्त्र और नाद-विज्ञान (Science of Sound) में इसका एक अत्यंत गहरा और वैज्ञानिक महत्व है।
  • सृष्टि का मूल नाद: 'क' वर्ण को साक्षात् ब्रह्म और आदि-चेतना का स्वरूप माना गया है। यह कंठ से उच्चारित होने वाला प्रथम ध्वनि-तत्व है। जब साधक 108 बार 'क' ध्वनि का नाद करता है, तो उसके विशुद्धि चक्र (Throat Chakra) से लेकर मूलाधार चक्र तक एक तीव्र स्पंदन (Vibration) उत्पन्न होता है।
  • बीजाक्षरों से संबंध: तन्त्र के सबसे शक्तिशाली बीज मंत्रों का मूलाधार 'क' ही है। जैसे— काली का बीज 'क्रीं' (Kreem), कामराज (आकर्षण) का बीज 'क्लीं' (Kleem), और कूर्म (स्थिरता) का बीज 'क्रूं' (Kroom)। 'क' अक्षर कामदेव (इच्छा शक्ति), काली (क्रिया शक्ति) और काल (समय) तीनों का एकीकरण है। 'श्रीककारवर्णनिलयायै नमः' (नाम 18) यह स्पष्ट करता है कि देवी स्वयं इस 'क' वर्ण में ही निवास करती हैं।
  • कुण्डलिनी जागरण: मूलाधार चक्र (जहाँ कुण्डलिनी शक्ति सोई हुई है) के चार दलों पर 'व', 'श', 'ष', 'स' वर्ण हैं, परंतु जब कुण्डलिनी ऊपर उठती है तो वह 'क' से 'ठ' तक के वर्णों को जाग्रत करती है। इस नामावली का नित्य अर्चन साधक की सुप्त चेतना को जगाकर उसे उर्ध्वगामी बनाता है।

नामावली के प्रमुख नामों की आध्यात्मिक व्याख्या (Spiritual Meaning of Key Names)

इस नामावली में देवी के केवल भयंकर या संहारक रूपों का ही वर्णन नहीं है, बल्कि यह उनके अत्यंत कोमल, मातृवत, और वैष्णव स्वरूपों का एक परिपूर्ण गुलदस्ता है।
  • संहारक और उग्र स्वरूप: 'श्रीकरालास्यायै' (भयंकर मुख वाली), 'श्रीकङ्काल्यै' (कंकाल धारण करने वाली), 'श्रीकालरात्रयै' (प्रलयंकारी रात्रि), और 'श्रीकालभैरवरूपिण्यै' जैसे नाम देवी की उस प्रचंड ऊर्जा को दर्शाते हैं जो नकारात्मकता, बुरी शक्तियों, अहंकार और शत्रुओं को क्षण भर में भस्म कर देती है।
  • सौम्य, आकर्षक और ऐश्वर्य प्रदायिनी: 'श्रीकमलायै' (लक्ष्मी), 'श्रीकामदायै' (इच्छा पूर्ण करने वाली), 'श्रीकामसुन्दर्यै' (अत्यंत रूपवान), और 'श्रीकमनीयस्वभाविन्यै' (मनोहर स्वभाव वाली) नाम यह सिद्ध करते हैं कि जो माता दुष्टों के लिए काल हैं, वही अपने भक्तों के लिए करुणा और ऐश्वर्य की साक्षात् मूर्ति हैं।
  • कौल परंपरा और कुलाचार: 'श्रीकुलपालिन्यै', 'श्रीकौलिन्यै', 'श्रीकुलाचारप्रियायै'—ये नाम तन्त्र के वामाचार और कौलाचार मार्ग से संबंधित हैं। 'कुल' का अर्थ शक्ति है। जो साधक शिव-शक्ति के सामंजस्य (कुल) को जानता है, देवी उसकी रक्षा करती हैं।
  • शाक्त और वैष्णव समन्वय (कृष्ण-काली अभेद): नाम 43 से 46 तक—'श्रीकृष्णायै', 'श्रीकृष्णदेहायै', 'श्रीकृष्णमात्रे', और अंत में 'श्रीकृष्णवल्लभायै' का उल्लेख है। मुण्डमाला तन्त्र का यह स्पष्ट उद्घोष है कि कलयुग में भगवान कृष्ण और माँ काली एक ही परम तत्व हैं। देवी ही योगमाया के रूप में कृष्ण की संगिनी और उनकी मूल शक्ति हैं।

अर्चन का महत्व और फलश्रुति (Significance of Archana & Benefits)

नामावली का मुख्य उपयोग 'अर्चन' के लिए होता है। तन्त्र शास्त्र के अनुसार, जब साधक अपने हाथों से देवी के एक-एक नाम का उच्चारण करते हुए पुष्प अर्पित करता है, तो उसकी उंगलियों के माध्यम से एक सूक्ष्म ऊर्जा का प्रवाह होता है। इस ककारादि नामावली के अर्चन से निम्नलिखित अमोघ लाभ प्राप्त होते हैं:
  • मन्त्रसिद्धि की तत्काल प्राप्ति: यदि साधक लंबे समय से किसी मंत्र (विशेषकर नवार्ण मंत्र या काली मंत्र) का जप कर रहा है और उसे सिद्धि नहीं मिल रही है, तो इस नामावली से 41 दिन तक अर्चन करने से वह मंत्र 'उत्कीलित' (जाग्रत) हो जाता है और पूर्ण फल देता है।
  • अखंड वशीकरण और आकर्षण: 'काम' बीज से युक्त नामों (कामाकर्षणरूपायै, कामेश्वर्यै) के प्रभाव से साधक के व्यक्तित्व में एक अतींद्रिय आकर्षण उत्पन्न होता है। समाज, अधिकारी और विरोधी उसके वशीभूत हो जाते हैं।
  • अकाल मृत्यु और रोगों से रक्षा: 'कालहन्त्र्यै' और 'कालदमनायै' (काल/मृत्यु को जीतने वाली) नामों का जप साधक को गंभीर दुर्घटनाओं, अकाल मृत्यु और असाध्य रोगों से सुरक्षित रखता है।
  • वाक-सिद्धि और विद्या लाभ: 'काव्यशास्त्रप्रमोदिन्यै' और 'कीर्तिवर्द्धिन्यै' नामों के प्रभाव से विद्यार्थियों, कवियों और लेखकों को असीम मेधा, वाक-सिद्धि और विश्वव्यापी कीर्ति प्राप्त होती है।
  • कुमारी पूजन का अनंत फल: 'कुमारीपूजनरतायै' नाम का अर्चन करने से साधक को वह पुण्य प्राप्त होता है जो नवरात्रि में साक्षात नव-कन्याओं के पूजन और भोजन कराने से मिलता है।

संपूर्ण पूजा और अर्चन विधि (Complete Ritual & Archana Method)

ककारादि काली शतनामावली से अर्चन करना एक अत्यंत फलदायी तांत्रिक अनुष्ठान है। इसे पूर्ण पवित्रता और विधि-विधान के साथ करना चाहिए।
अर्चन की तैयारी: स्नानादि से निवृत्त होकर लाल या काले वस्त्र धारण करें। आसन भी लाल ऊनी होना चाहिए। दक्षिण दिशा (माँ काली की दिशा) की ओर मुख करके बैठें। सामने लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर माँ काली का चित्र, यंत्र, या महाकाली का कोई प्रतीक (जैसे नारियल) स्थापित करें। तिल के तेल या सरसों के तेल का दीपक प्रज्वलित करें।
अर्चन सामग्री: एक पात्र में 108 लाल गुड़हल के फूल (Japakusum), लाल गुलाब, या लाल कनेर के फूल रख लें। यदि 108 फूल उपलब्ध न हों, तो कुमकुम (रोली) और साबुत चावल (अक्षत) को मिलाकर रख लें। लौंग या कमलगट्टे का प्रयोग भी किया जा सकता है।
अर्चन की प्रक्रिया: संकल्प लेने के पश्चात, दाएँ हाथ की मध्यमा, अनामिका और अंगूठे (मृगी मुद्रा) से एक फूल या चुटकी भर कुमकुम लें। नामावली का पहला नाम बोलें—"ॐ श्रीकाल्यै नमः"—और फूल को देवी के चरणों या यंत्र पर अर्पित कर दें। इसी प्रकार 108 नामों तक यह प्रक्रिया दोहराएं। अर्चन के समय मन पूर्णतः देवी के उस विशिष्ट स्वरूप पर केंद्रित होना चाहिए।
विशेष मुहूर्त और अवसर: यद्यपि नित्य अर्चन किया जा सकता है, किन्तु अमावस्या की रात्रि (विशेषकर दीपवाली की महानिशा), कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी (काली चौदस), नवरात्रि की अष्टमी/नवमी, और प्रत्येक मंगलवार व शनिवार की रात्रि में किया गया अर्चन अत्यंत शीघ्र फलदायी और शक्तिशाली होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. यह नामावली 'ककारादि' क्यों कहलाती है?
क्योंकि इसमें माँ काली के सभी 108 नाम देवनागरी वर्णमाला के प्रथम अक्षर 'क' (ककार) से शुरू होते हैं। 'क' तंत्र में एक अत्यंत शक्तिशाली बीज है जो काम, काल और कुण्डलिनी का प्रतीक है।
2. 'नामावली' और 'स्तोत्र' में क्या अंतर है?
नामावली में नामों की सूची होती है (जैसे श्रीकाल्यै नमः), जिसका प्रयोग मुख्य रूप से 'अर्चन' (पूजा में फूल, कुमकुम आदि चढ़ाने) और हवन के लिए होता है। स्तोत्र लयबद्ध श्लोकों का समूह होता है जिसका सस्वर पाठ या गान किया जाता है।
3. क्या इस नामावली का कोई ज्ञात तांत्रिक स्रोत है?
जी हाँ। यह नामावली शाक्त परंपरा के अत्यंत प्रामाणिक और गोपनीय ग्रंथ 'मुण्डमाला तन्त्र' पर आधारित है, जहाँ भगवान शिव ने पार्वती को इसका उपदेश दिया था।
4. 'क्रींरूपायै' का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?
'क्रीं' (Kreem) माँ काली का मूल बीज मंत्र है। इस नाम का अर्थ है 'वह जो स्वयं क्रीं मंत्र का साकार रूप है'। इस एक नाम का अर्चन करने से सम्पूर्ण काली मंत्र के जप का फल प्राप्त हो जाता है।
5. क्या एक सामान्य गृहस्थ इस तांत्रिक नामावली का अर्चन कर सकता है?
हाँ, बिल्कुल। सात्विक भाव से, अपनी सुरक्षा, सुख-समृद्धि और मनोकामना पूर्ति के लिए कोई भी गृहस्थ इसका अर्चन कर सकता है। यह पूर्णतः सुरक्षित और कल्याणकारी है।
6. 'कुण्डगोलोद्भवप्राणायै' (नाम 98) का क्या अर्थ है?
यह एक अत्यंत गूढ़ तांत्रिक नाम है। 'कुण्ड' और 'गोल' तांत्रिक दीक्षा और कौलाचार शक्ति के दो विशेष स्रोतों का प्रतीक हैं। देवी उन दोनों से उत्पन्न होने वाली मूल प्राण शक्ति हैं।
7. माँ काली के अर्चन के लिए कौन से पुष्प सर्वोत्तम माने गए हैं?
माँ काली के अर्चन के लिए लाल गुड़हल (Hibiscus) के फूल सर्वोत्तम माने जाते हैं। इसके अभाव में लाल गुलाब, लाल कनेर या केवल कुमकुम-मिश्रित अक्षत का प्रयोग किया जा सकता है।
8. 'कुल' और 'कौल' नामों का यहाँ क्या संदर्भ है?
तंत्र में 'कुल' का अर्थ है शक्ति और 'अकुल' का अर्थ है शिव। 'कौल' वह साधक है जो शिव-शक्ति के सामंजस्य (अद्वैत) की साधना करता है। देवी कौल साधकों पर विशेष कृपा करती हैं, इसलिए उन्हें 'कुलपूजिता' कहा गया है।
9. क्या स्त्रियाँ भी इस नामावली का पाठ और अर्चन कर सकती हैं?
हाँ, सनातन धर्म और तंत्र शास्त्र में देवी की उपासना का अधिकार सभी को है। स्त्रियाँ भी पूर्ण शुद्धि और श्रद्धा के साथ इस नामावली का पाठ और अर्चन कर सकती हैं।
10. इस अर्चन के लिए सबसे शक्तिशाली समय कौन सा है?
तांत्रिक देवी होने के कारण, मध्यरात्रि (निशीथ काल), अमावस्या की रात, ग्रहण का समय, और मंगलवार या शनिवार की रातें इस पाठ और अर्चन के लिए सबसे शक्तिशाली मानी जाती हैं।