॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री तिरस्करिणी वाराही मन्त्र जप प्रयोगः ॥
१. विनियोगः
अस्य श्री तिरस्करिणी महामन्त्रस्य । दक्षिणामूर्ति ऋषिः । पङ्क्तिश्छन्दः ।
श्री तिरस्करिणी वाराही देवता ।
ऐं बीजं । हुं शक्तिः । फट् कीलकं ।
मम सर्वशत्रु क्षयार्थे शत्रोः मनश्चक्षुः स्तंभनार्थे जपे विनियोगः ॥
२. ऋष्यादि न्यासः
श्री दक्षिणामूर्ति ऋषये नमः शिरसि ।
पङ्क्तिश्छन्दसे नमः मुखे ।
श्री तिरस्करिणी वाराही देवतायै नमः हृदि ।
ऐं बीजाय नमः गुह्ये ।
हुं शक्तये नमः पादयोः ।
फट् कीलकाय नमः नाभौ ।
विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ॥
३. कर न्यासः
ॐ ऐं अंगुष्ठाभ्यां नमः ।
ॐ नमो तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ भगवति मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ महामाये अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ सकल पशुजन मनश्चक्षुस्तिरस्करणं कुरु कुरु कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ हुं फट् स्वाहा करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।
४. षडङ्ग न्यासः
ॐ ऐं हृदयाय नमः ।
ॐ नमो शिरसे स्वाहा ।
ॐ भगवति शिखायै वषट् ।
ॐ महामाये कवचाय हुम् ।
ॐ सकल पशुजन मनश्चक्षुस्तिरस्करणं कुरु कुरु नेत्रत्रयाय वौषट् ।
ॐ हुं फट् स्वाहा अस्त्राय फट् ।
भूर्भुवस्सुवरोमिति दिग्बन्धः ॥
५. ध्यानम्
कृष्णां घोरां मुक्तकेशीं घोररूपां महाबलाम् ।
दंष्ट्रायुधं भीमनादां पशुजन-भयंकरीम् ॥
सव्ये खड्गं च मुसलं बिभ्रतीं शत्रुमर्दिनीम् ।
अभयं वरदं चैव दक्षिणे तु भुजद्वये ॥
श्यामलां महिषारूढां सर्वालंकारभूषिताम् ।
तिरस्करिणीं प्रपद्येऽहं शत्रूणां भयवर्धिनीम् ॥
६. पञ्चपूजा
लँ - पृथिव्यात्मिकायै गन्धं समर्पयामि।
हँ - आकाशात्मिकायै पुष्पैः पूजयामि।
यँ - वाय्वात्मिकायै धूपमाघ्रापयामि।
रँ - अग्न्यात्मिकायै दीपं दर्शयामि।
वँ - अमृतात्मिकायै अमृतं महानैवेद्यं निवेदयामि।
सँ - सर्वात्मिकायै सर्वोपचार पूजाम् समर्पयामि॥
७. मूल मन्त्र
(३७ अक्षरों वाला महामंत्र)
ॐ ऐं नमो भगवति महामाये सकल पशुजन मनश् चक्षुस्तिरस्करणं कुरु कुरु हुं फट् स्वाहा ॥
८. समर्पणम्
गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मात्कृतं जपम्।
सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादान्मयि स्तिरा॥
(जल छोड़े)
९. पुरश्चरण विधि
जप संख्या: १,००,००० (एक लाख)। दशांश: होम, तर्पण, मार्जन, ब्राह्मण भोजन।
श्री तिरस्करिणी वाराही देवी: परिचय और रहस्य (Introduction & Significance)
श्री विद्या की गूढ़ साधनाओं में, भगवान श्री ललिता त्रिपुरा सुंदरी की सेना की मुख्य सेनानायिकाओं में से एक हैं - श्री तिरस्करिणी वाराही (Sri Tiraskarini Varahi)। वाराही देवी के अनेक रूप हैं, जिनमें 'स्वप्न वाराही', 'किरात वाराही', और 'अश्वारूढा' प्रमुख हैं, किन्तु 'तिरस्करिणी' स्वरूप अत्यंत रहस्यमयी और विशिष्ट कार्यों के लिए पूजा जाता है।
'तिरस्करिणी' (Tiraskarini) शब्द का अर्थ है - 'वह जो पर्दा डाल दे' या 'वह जो अदृश्य कर दे'। युद्ध के मैदान में या जीवन के संघर्ष में, जब शत्रु (चाहे वे बाहरी हों या काम-क्रोधादि आंतरिक शत्रु) हम पर हावी होने लगते हैं, तब तिरस्करिणी देवी अपनी माया का पर्दा डालकर उन्हें भ्रमित कर देती हैं। वे शत्रुओं की 'बुद्धि' और 'दृष्टि' (Mind and Vision) को स्तम्भित (Paralyze/Block) कर देती हैं, जिससे शत्रु न तो हमें देख पाते हैं और न ही हमारे विरुद्ध कोई षड्यंत्र रच पाते हैं।
उनका रथ 'तमोल्लिप्ता' (Tamolipta) कहलाता है, जिसका अर्थ है 'अंधकार से पुता हुआ'। यह प्रतीक है कि वे शत्रुओं के लिए अंधकार (अज्ञान/भ्रम) समान हैं और भक्तों के लिए प्रकाश। वे 'अंधास्त्र' (Andhastra - Blinding Weapon) की स्वामिनी हैं। जब भी साधक पर कोई तांत्रिक प्रयोग (Black Magic), बुरी नजर (Evil Eye) या प्रबल शत्रु बादा आती है, तो तिरस्करिणी मंत्र का जप एक अभेद्य कवच का कार्य करता है।
साधना के लाभ (Benefits of Sadhana)
- शत्रु स्तम्भन (Enemy Paralysis): यह मंत्र शत्रुओं की वाणी और बुद्धि को बांध देता है। वे आपके खिलाफ कुछ भी बुरा नहीं कर पाते।
- तंत्र बाधा निवारण: यदि किसी ने तान्त्रिक प्रयोग (Black Magic) किया हो, तो यह मंत्र उसे तत्काल नष्ट कर उलट देता है।
- बुरी नजर से रक्षा: व्यापार, घर या बच्चों को लगी बुरी नजर को उतारने के लिए यह साधना अचूक है।
- मुकदमे में विजय: कोर्ट-कचहरी और वाद-विवाद में विजय प्राप्ति के लिए इस मंत्र का अनुष्ठान किया जाता है।
- आंतरिक शुद्धि: यह 'पशुजन' (पाशविक वृत्तियों) का भी तिरस्कार करती है, यानी मन की गंदगियों को हटाकर साधक को शुद्ध करती है।
विस्तृत प्रश्नोत्तरी (Detailed FAQs)
1. श्री तिरस्करिणी वाराही कौन हैं और उनका क्या महत्व है?
तिरस्करिणी वाराही, श्री ललिता देवी की शक्ति सेना की एक गोपनीय शक्ति हैं। वे 'प्रधानिका' रहस्य का हिस्सा हैं। उनका मुख्य कार्य साधक को 'अदृश्य' सुरक्षा प्रदान करना है। वे माया (Illusion) की अधिष्ठात्री हैं जो शत्रुओं को भ्रम में डाल देती हैं।
2. किरात वाराही और तिरस्करिणी वाराही में क्या अंतर है?
किरात वाराही 'संहारक' शक्ति हैं - वे शत्रुओं का भौतिक रूप से नाश करती हैं (Direct Attack)। वहीं, तिरस्करिणी वाराही 'स्तम्भक' शक्ति हैं - वे शत्रुओं को मानसिक रूप से भ्रमित और अंधा (Confuse & Blind) कर देती हैं ताकि वे हमला ही न कर सकें।
3. क्या इस मंत्र का जप बिना दीक्षा के किया जा सकता है?
चूँकि यह एक उग्र मंत्र है और इसमें 'फट्' और 'हुं' जैसे बीज हैं, इसलिए गुरु दीक्षा (Initiation) अत्यंत अनुशंसित है। बिना दीक्षा के आप केवल 'ओम वाराह्यै नमः' का नाम जप कर सकते हैं या देवी के कवच/स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं।
4. जप के लिए शुभ समय और मुहूर्त कौन सा है?
वाराही देवी 'रात्रि बली' हैं, इसलिए सूर्यास्त के बाद या मध्यरात्रि (11 PM - 1 AM) का समय सर्वश्रेष्ठ है। गुप्त नवरात्र, कृष्ण पक्ष की अष्टमी, या अमावस्या तिथि साधना आरम्भ करने के लिए उत्तम है।
5. मंत्र में 'पशुजन' शब्द का क्या अर्थ है?
'पशुजन' का अर्थ केवल जानवर नहीं है। तंत्र में, जो व्यक्ति अज्ञान, अहंकार, और द्वैत भाव से ग्रसित है, और जो साधक के मार्ग में बाधा बनता है, उसे 'पशु' (पाश में बंधा हुआ) कहा गया है। यह मंत्र उन सभी अज्ञानी शत्रुओं का नियंत्रण करता है।
6. पूजन में देवी को क्या भोग लगाना चाहिए?
माँ वाराही को तामसिक और राजसिक भोग प्रिय हैं, किन्तु सात्विक साधना में उन्हें उरद की दाल के वड़े, गुड़ मिला हुआ अदरक, शहद, मीठा पोंगल, और अनार का भोग लगाया जाता है। भैंस का दूध या दही भी अर्पित किया जा सकता है।
7. क्या यह मंत्र रोगों को दूर कर सकता है?
हाँ। यदि कोई बीमारी ऊपरी बाधा, नजर दोष, या अनजानी नकारात्मक ऊर्जा के कारण है, तो तिरस्करिणी मंत्र का जल अभिमंत्रित करके पीने से लाभ होता है।
8. जप के लिए कौन सी माला और दिशा उपयुक्त है?
माला: लाल चंदन (Red Sandalwood), मूंगा (Red Coral), या काले हकीक (Black Agate) की माला।
दिशा: दक्षिण (South) दिशा वाराही देवी की प्रिय दिशा है, शत्रु नाश के लिए दक्षिण मुख होकर जप करें।
दिशा: दक्षिण (South) दिशा वाराही देवी की प्रिय दिशा है, शत्रु नाश के लिए दक्षिण मुख होकर जप करें।
9. क्या महिलाएं मासिक धर्म के दौरान यह जप कर सकती हैं?
नहीं। तांत्रिक और उग्र साधनाओं में शारीरिक और मानसिक शुचि अनिवार्य है। मासिक धर्म के दौरान जप स्थगित रखें और मानसिक रूप से केवल नाम स्मरण करें।
10. पुरश्चरण पूरा होने पर क्या करना चाहिए?
1 लाख जप पूर्ण होने पर दशांश (10,000) हवन करना चाहिए। हवन सामग्री में तिल, घी, और सरझव (सरसों) का प्रयोग शत्रु बाधा निवारण के लिए किया जाता है। अंत में ब्राह्मणों या कन्याओं को भोजन कराएं।
