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Sri Laghu Varahi Mantra Japa – श्री लघु वाराही मन्त्र जप

Sri Laghu Varahi Mantra Japa – श्री लघु वाराही मन्त्र जप
॥ श्री गणेशाय नमः ॥ ॥ श्री लघु वाराही मन्त्र जप प्रयोगः ॥ १. विनियोगः अस्य श्री उन्मत्त भैरवी मन्त्रस्य । उन्मत्त भैरव ऋषिः । जगती छन्दः । श्री उन्मत्त भैरवी देवता । ॡँ बीजं । स्वाहा शक्तिः । मम अभीष्ट सिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ॥ २. ऋष्यादि न्यासः श्री उन्मत्त भैरव ऋषये नमः शिरसि । जगती छन्दसे नमः मुखे । श्री उन्मत्त भैरवी देवतायै नमः हृदि । ॡँ बीजाय नमः गुह्ये । स्वाहा शक्तये नमः पादयोः । विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ॥ ३. कर न्यासः ॐ ऌँ अंगुष्ठाभ्यां नमः । ॐ वाराहि तर्जनीभ्यां नमः । ॐ ॡँ मध्यमाभ्यां नमः । ॐ उन्मत्त अनामिकाभ्यां नमः । ॐ भैरवी कनिष्ठाभ्यां नमः । ॐ पदुकाभ्यां नमः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ॥ ४. षडङ्ग न्यासः ॐ ऌँ हृदयाय नमः । ॐ वाराहि शिरसे स्वाहा । ॐ ॡँ शिखायै वषट् । ॐ उन्मत्त कवचाय हुम् । ॐ भैरवी नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ पदुकाभ्यां नमः अस्त्राय फट् । भूर्भुवस्सुवरोमिति दिग्बन्धः ॥ ५. ध्यानम् उद्धर्तुं या मेदनीं मानरुपं कोलाकारं बिभ्रती सादरेण । उन्मत्ताङ्कस्थां तुङ्गतुङ्गास्तनी सा पायाद्देवोन्मत्तभैरव्यशेषम् ॥ (अर्थ: मैं उन देवी उन्मत्त भैरवी (लघु वाराही) की प्रार्थना करता हूँ, जिन्होंने पृथ्वी को गहरे सागर से अपनी दाढ़ों पर उठाकर बचाया। वे आध्यात्मिक रूप से उन्मत्त भैरव की गोद में विराजमान हैं। वे हमारी रक्षा करें और हमारे सभी शत्रुओं का नाश करें।) ६. पञ्चपूजा लँ - पृथिव्यात्मिकायै गन्धं समर्पयामि। हँ - आकाशात्मिकायै पुष्पैः पूजयामि। यँ - वाय्वात्मिकायै धूपमाघ्रापयामि। रँ - अग्न्यात्मिकायै दीपं दर्शयामि। वँ - अमृतात्मिकायै अमृतं महानैवेद्यं निवेदयामि। सँ - सर्वात्मिकायै सर्वोपचार पूजाम् समर्पयामि॥ ७. जपमाला मन्त्रं (माला पूजन) ॐ मां माले महामाये सर्वमन्त्र स्वरूपिणि। चतुर्वर्ग स्त्वयिन्यस्त स्तस्मान्ये सिद्धिदा भव॥ ८. गुरु मन्त्र ॐ ह्रीं सिद्धगुरो प्रसीद ह्रीं ॐ ॥ ९. मूल मन्त्र (१७ अक्षरी) ॥ ॡँ वाराही ऌँ उन्मत्त भैरवी पदुकाभ्यां नमः ॥ १०. समर्पणम् गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मात्कृतं जपम्। सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादान्मयि स्तिरा॥ (जल छोड़े) ११. जपानंतरं मालामन्त्रं ॐ त्वं माले सर्वदेवानां प्रीतिदा शुभदा भव। शुभं कुरुष्य मे भद्रे यशो वीर्यं च देहिमे॥ ॐ ह्रीं सिद्ध्यै नमः॥ १२. पुरश्चरण विधि जप संख्या: १,००,००० (एक लाख)। दशांश: होम, तर्पण, मार्जन, ब्राह्मण भोजन।

श्री लघु वाराही: परिचय और महत्व (Introduction & Significance)

श्री विद्या परम्परा में माँ वाराही के अनेक रूप हैं, जिनमें 'लघु वाराही' (Laghu Varahi) एक विशिष्ट स्थान रखती हैं। इन्हें 'उन्मत्त भैरवी' (Unmatta Bhairavi) भी कहा जाता है। 'लघु' का अर्थ है 'छोटा' या 'सुगम', और 'उन्मत्त' का अर्थ है 'आध्यात्मिक आनंद में मग्न'।
यह स्वरूप भगवान शिव के 'उन्मत्त भैरव' अवतार की शक्ति है। जहाँ अन्य वाराही रूप (जैसे धूम्र या किरात) अत्यधिक उग्र हैं और शत्रुओं के नाश पर केंद्रित हैं, वहीं लघु वाराही साधक को आंतरिक शत्रुओं (Dualities) से मुक्त कर परमानंद की स्थिति में लाती हैं।
इनका ध्यान अत्यंत विलक्षण है - ये अपनी दाढ़ों (Tusks) पर पृथ्वी को धारण किए हुए हैं, जो इस बात का प्रतीक है कि ये साधक को 'संसार सागर' (Ocean of Samsara) से बाहर निकालती हैं। ये विपत्तियों में डूबे हुए भक्तों के लिए तारणहार हैं।

साधना के लाभ (Benefits of Sadhana)

  • आत्म-ज्ञान (Self-Realization): यह साधना मूलाधार चक्र को जागृत कर कुण्डलिनी शक्ति को ऊपर उठाती है।
  • बाधा निवारण (Obstacle Removal): जीवन में आने वाली अचानक विपत्तियों और दुर्घटनाओं से रक्षा होती है।
  • भूमि लाभ (Land & Property): वाराही 'भू-देवी' हैं, अतः इनकी उपासना से भूमि विवाद सुलझते हैं और संपत्ति का लाभ होता है।
  • शत्रु भय मुक्ति: यद्यपि यह सौम्य है, फिर भी इसमें शत्रुओं को हतोत्साहित करने की पूर्ण क्षमता है।

विस्तृत प्रश्नोत्तरी (Detailed FAQs)

1. श्री लघु वाराही कौन हैं?

लघु वाराही, माँ वाराही का एक सौम्य और शीघ्र प्रसन्न होने वाला स्वरूप है। इन्हें 'उन्मत्त भैरवी' भी कहा जाता है क्योंकि ये भगवान उन्मत्त भैरव की शक्ति हैं। यह स्वरूप भौतिक बाधाओं को दूर करने के साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नति भी प्रदान करता है।

2. लघु वाराही और उन्मत्त वाराही में क्या समानता है?

दोनों प्रायः एक ही स्वरूप माने जाते हैं। 'उन्मत्त' शब्द देवी की उस अवस्था को दर्शाता है जहाँ वे ब्रह्मांडीय चेतना (Cosmic Consciousness) के आनंद में मग्न हैं। यह साधना साधक को भी उसी उच्च अवस्था की ओर ले जाती है।

3. 17 अक्षरी मंत्र का क्या महत्व है?

यह 17 अक्षरी मंत्र (ॡँ वाराही ऌँ...) अत्यंत दुर्लभ और शक्तिशाली है। इसमें 'ॡँ' (Lreem) बीज मंत्र का प्रयोग है जो पृथ्वी तत्व और स्थिरता का प्रतीक है। यह मंत्र जीवन में स्थिरता और आध्यात्मिक शक्ति दोनों लाता है।

4. इस साधना के मुख्य लाभ क्या हैं?

१. आत्म-ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति।\n२. आंतरिक विकार (काम, क्रोध, लोभ) का नाश।\n३. वाणी में प्रभाव (वाक सिद्धि)।\n४. गुप्त शत्रुओं से रक्षा।

5. क्या यह साधना धन प्राप्ति के लिए भी है?

प्रत्यक्ष रूप से यह आध्यात्मिक और रक्षण साधना है, किन्तु माँ वाराही 'वार्ताली' (पृथ्वी की स्वामिनी) भी हैं, इसलिए इनकी साधना से भूमि, भवन और संपत्ति सम्बन्धी बाधाएं भी दूर होती हैं।

6. ध्यान में देवी का स्वरूप कैसा है?

ध्यान मंत्र के अनुसार, देवी ने अपनी दाढ़ों (Tusks) से पृथ्वी को सागर से बाहर निकाला है। वे उन्मत्त भैरव की गोद में विराजमान हैं और अत्यंत प्रसन्न मुद्रा में हैं। यह स्वरूप जगत के उद्धार का प्रतीक है।

7. साधना के लिए कौन सी माला प्रयोग करें?

लाल चंदन (रक्त चन्दन) या करंज की माला सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। यदि यह उपलब्ध न हो, तो रुद्राक्ष की माला का प्रयोग किया जा सकता है।

8. क्या गुरु दीक्षा आवश्यक है?

श्री विद्या की सभी साधनाओं में गुरु दीक्षा अनिवार्य मानी जाती है। तथापि, लघु वाराही मंत्र अपेक्षाकृत सौम्य है, इसलिए श्रद्धापूर्वक मानसिक जप किया जा सकता है, परन्तु पूर्ण अनुष्ठान के लिए गुरु का मार्गदर्शन लें।

9. नियम और परहेज क्या हैं?

साधना काल में ब्रह्मचर्य का पालन करें। सात्विक भोजन ग्रहण करें। वाराही साधना में 'रात्रि' का विशेष महत्व है, इसलिए सूर्यास्त के बाद साधना करना अधिक फलदायी होता है।

10. मंत्र उच्चारण में 'ॡँ' का उच्चारण कैसे करें?

'ॡँ' का उच्चारण 'लृम' (Lreem) या 'ल्रीम' जैसा होता है, जिसमें 'ल' और 'ऋ' का स्वर मिश्रित होता है। यह एक क्लिष्ट बीज मंत्र है, इसलिए इसे सुनकर सीखना बेहतर है।