॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री किरात वाराही मन्त्र जप प्रयोगः ॥
१. विनियोगः
अस्य श्री किरात वाराही महामन्त्रस्य । दुर्वासा ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः ।
श्री किरात वाराही देवता ।
खं बीजं । स्वाहा शक्तिः । फट् कीलकं ।
मम शत्रु क्षयार्थे जपे विनियोगः ॥
२. ऋष्यादि न्यासः
श्री दुर्वासा ऋषये नमः शिरसि ।
अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे ।
श्री किरात वाराही देवतायै नमः हृदि ।
खं बीजाय नमः गुह्ये ।
स्वाहा शक्तये नमः पादयोः ।
फट् कीलकाय नमः नाभौ ।
विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ॥
३. कर न्यासः
ॐ खेँ खेँ खँ घ्र सीँ अघोर मृत्युरूपे अंगुष्ठाभ्यां नमः ।
ॐ खेँ खेँ खँ घ्र सूँ कालमृत्युरूपे तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ खेँ खेँ खँ घ्र सौः रँ रँ किरातवाराहि हुँ फट् स्वाहा मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ खेँ खेँ खँ घ्र सीँ अघोर मृत्युरूपे अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ खेँ खेँ खँ घ्र सूँ कालमृत्युरूपे कनिष्ठाभ्यां नमः ।
ॐ खेँ खेँ खँ घ्र सौः रँ रँ किरातवाराहि हुँ फट् स्वाहा करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।
४. षडङ्ग न्यासः
ॐ खेँ खेँ खँ घ्र सीँ अघोर मृत्युरूपे हृदयाय नमः ।
ॐ खेँ खेँ खँ घ्र सूँ कालमृत्युरूपे शिरसे स्वाहा ।
ॐ खेँ खेँ खँ घ्र सौः रँ रँ किरातवाराहि हुँ फट् स्वाहा शिखायै वषट् ।
ॐ खेँ खेँ खँ घ्र सीँ अघोर मृत्युरूपे कवचाय हुम् ।
ॐ खेँ खेँ खँ घ्र सूँ कालमृत्युरूपे नेत्रत्रयाय वौषट् ।
ॐ खेँ खेँ खँ घ्र सौः रँ रँ किरातवाराहि हुँ फट् स्वाहा अस्त्राय फट् ।
भूर्भुवस्सुवरोमिति दिग्बन्धः ॥
५. ध्यानम्
घ्रोणी घर्घर निस्वनाञ्चितमुखां कौटिल्य चिन्ताम्परां ।
उग्रां कालिमकालमेघपटलच्चन्नोरु तेजस्विनीं ।
क्रूरं दीर्घविनील रोमपटलामश्रूयतामीश्वरीं ।
ध्यायेत् क्रोडमुखीं त्रिलोकजननीमुग्रासि दण्डान्वितां ॥
उग्ररूपपथरां देवीं वैरिमारण तत्परां ।
शत्रुपत्नी कण्ठसूत्र छेद क्षुरिकरूपिणीं ॥
देवीं जगत्त्रये क्षोभकारक क्रोध संयुतां ।
अतिक्रूरां दीर्घदंष्ट्रां वाराहीं चिन्तयेत्पराम् ॥
(अर्थ: मैं उन वाराही देवी का ध्यान करता हूँ, जिनका मुख वराह का है और जिनसे 'घर-घर' ध्वनि निकल रही है। वे काले मेघों के समान गहरे वर्ण वाली और अत्यंत तेजस्वी हैं। वे उग्र हैं, उनके शरीर पर नीले रोएं हैं, और वे हाथों में दंड और शत्रुओं के नाश के लिए हथियार धारण किए हुए हैं। वे शत्रुओं का संहार करने के लिए तत्पर हैं।)
६. पञ्चपूजा
लँ - पृथिव्यात्मिकायै गन्धं समर्पयामि।
हँ - आकाशात्मिकायै पुष्पैः पूजयामि।
यँ - वाय्वात्मिकायै धूपमाघ्रापयामि।
रँ - अग्न्यात्मिकायै दीपं दर्शयामि।
वँ - अमृतात्मिकायै अमृतं महानैवेद्यं निवेदयामि।
सँ - सर्वात्मिकायै सर्वोपचार पूजाम् समर्पयामि॥
७. जपमाला मन्त्रं
(माला पूजन)
ॐ मां माले महामाये सर्वमन्त्र स्वरूपिणि।
चतुर्वर्ग स्त्वयिन्यस्त स्तस्मान्ये सिद्धिदा भव॥
८. गुरु मन्त्र
ॐ ह्रीं सिद्धगुरो प्रसीद ह्रीं ॐ ॥
९. मूल मन्त्र (४० अक्षरी)
ॐ खेँ खेँ खँ घ्रसीँ अघोर मृत्युरूपे खेँ खेँ खँ घ्रसूँ कालमृत्युरूपे खेँ खेँ खँ घ्रसौः रँ रँ किरातवाराहि हुँ फट् स्वाहा ॥
१०. समर्पणम्
गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मात्कृतं जपम्।
सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादान्मयि स्तिरा॥
(जल छोड़े)
११. जपानंतरं मालामन्त्रं
ॐ त्वं माले सर्वदेवानां प्रीतिदा शुभदा भव।
शुभं कुरुष्य मे भद्रे यशो वीर्यं च देहिमे॥
ॐ ह्रीं सिद्ध्यै नमः॥
१२. पुरश्चरण विधि
जप संख्या: १,००,००० (एक लाख)। दशांश: होम, तर्पण, मार्जन, ब्राह्मण भोजन।
श्री किरात वाराही देवी: परिचय और महत्व (Introduction & Significance)
श्री विद्या साधना में माँ वाराही के अनेक रूप हैं, जिनमें 'किरात वाराही' (Kirata Varahi) उनका सबसे उग्र और आक्रामक स्वरूप माना जाता है। 'किरात' का अर्थ होता है - 'व्याध' या 'शिकारी'। जिस प्रकार एक शिकारी घने जंगल में अपने शिकार का पीछा करता है और उसे ढूंढकर मार गिराता है, उसी प्रकार किरात वाराही देवी अपने भक्तों के छिपे हुए शत्रुओं (चाहे वे बाहरी हों या आंतरिक विकार) को ढूंढकर नष्ट करती हैं।
इस स्वरूप में देवी के हाथ में धनुष-बाण, तलवार और अन्य घातक शस्त्र होते हैं। उनका वर्ण गहरे बादलों (Dark Clouds) के समान काला है और उनका मुख वराह (Boar) का है, जिससे भयंकर 'घुर-घुर' (Gharghara) ध्वनि निकलती है जो शत्रुओं के हृदय में भय उत्पन्न करती है।
यह साधना विशेष रूप से उन लोगों के लिए है जो प्रबल शत्रुओं, कोर्ट-कचहरी के विवादों, या तान्त्रिक अभिचार (Black Magic) से पीड़ित हैं। किरात वाराही न केवल रक्षा करती हैं, बल्कि शत्रु की वार करने की क्षमता को भी 'स्तम्भित' (Paralyze) कर देती हैं।
साधना के लाभ (Benefits of Sadhana)
- अमोघ शत्रु नाश: देवी का यह 'शिकारी' रूप शत्रुओं को बचने का कोई अवसर नहीं देता। शत्रु परास्त होकर समर्पण करने को विवश हो जाते हैं।
- स्तम्भन शक्ति: मंत्र में 'अघोर मृत्युरूपे' और 'कालमृत्युरूपे' जैसे बीज मंत्र शत्रु की बुद्धि और वाणी को जड़ (Freeze) कर देते हैं।
- विजय प्राप्ति: मुकदमे, प्रतियोगिता, या किसी भी संघर्ष में निश्चित विजय के लिए यह मंत्र अत्यंत प्रभावशाली है।
- आंतरिक शुद्धि: यह देवी काम, क्रोध, लोभ और अहंकार रूपी आंतरिक पशुओं का शिकार कर साधक को आत्म-ज्ञान की ओर ले जाती हैं।
- भय मुक्ति: देवी का उग्र रूप साधक के मन से मृत्यु और असफलता के भय को सदा के लिए निकाल देता है।
विस्तृत प्रश्नोत्तरी (Detailed FAQs)
1. श्री किरात वाराही कौन हैं?
'किरात' का अर्थ है 'शिकारी'। किरात वाराही देवी का वह स्वरूप है जो वन में विचरने वाले शिकारी की भांति उग्र और लक्ष्य-भेदी है। वे ललिता त्रिपुरा सुंदरी की सेना में शत्रुओं को ढूंढ-ढूंढ कर नष्ट करने वाली 'दण्डनाथा' शक्ति का एक विशिष्ट रूप हैं।
2. किरात वाराही साधना का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इस साधना का मुख्य उद्देश्य 'शत्रु नाश' और 'बाधा निवारण' है। चाहे शत्रु बाहरी हों (प्रतिद्वंद्वी, ईर्ष्यालु लोग) या आंतरिक (काम, क्रोध, अहंकार), यह देवी उन सभी का शिकार कर साधक को मुक्त करती हैं।
3. 40 अक्षरी मंत्र का विशेष महत्व क्या है?
यह मंत्र 40 अक्षरों (वर्णात्मक बीजों) का एक शक्तिशाली संयोजन है। इसमें 'खें', 'घ्र', 'सूं' जैसे उग्र बीज मंत्र हैं जो ब्रह्मांडीय अग्नि और मृत्यु शक्ति का आवाहन करते हैं। यह मंत्र शत्रुओं की वाणी, बुद्धि और गति को स्तंभित (रोकने) करने में सक्षम है।
4. क्या यह साधना सामान्य गृहस्थ कर सकते हैं?
चूंकि यह अत्यंत उग्र साधना है, सामान्यतः इसे बिना गुरु दीक्षा के नहीं करना चाहिए। गृहस्थों को सौम्य वाराही मंत्रों का जप करना चाहिए। यदि संकट अत्यधिक हो, तो किसी योग्य गुरु के निर्देशन में ही यह साधना करें।
5. साधना का सही समय कौन सा है?
रात्रि का समय (सूर्यास्त के बाद) या ब्रह्म मुहूर्त (सूर्यदय से पूर्व) सर्वश्रेष्ठ है। अष्टमी, अमावस्या या ग्रहण काल में किया गया जप शीघ्र फलित होता है।
6. देवी के इस रूप का ध्यान कैसा है?
ध्यान मंत्र के अनुसार, उनका वर्ण गहरे बादलों जैसा काला है। उनका मुख वराह (सुअर) का है जिससे भयंकर 'घुर-घुर' ध्वनि निकलती है। वे क्रोधित हैं और शत्रुओं के विनाश के लिए तत्पर हैं। यह रौद्र रूप शत्रुओं के लिए भय और भक्तों के लिए अभय प्रदान करता है।
7. शत्रु नाशक अन्य रूपों से यह कैसे अलग है?
धूम्र वाराही शत्रुओं को 'धुएं' से अंधा करती हैं, जबकि किरात वाराही उन पर 'सीधा प्रहार' करती हैं। यह 'Active Combat' (प्रत्यक्ष युद्ध) का स्वरूप है, जहाँ देवी स्वयं शिकारी बनकर बुराइयों का अंत करती हैं।
8. नैवेद्य में क्या प्रिय है?
उन्हें तामसिक और राजसिक भोग प्रिय हैं जैसे उरद दाल के व्यंजन, मदिरा (तान्त्रिक विधि में), मांस (प्रतीकात्मक रूप से नींबू/कद्दू बली), और तीखे मसालेदार भोजन। सात्विक पूजा में गुड़-अद्रक और फल अर्पित किए जा सकते हैं।
9. क्या इस मंत्र से कोर्ट केस में लाभ मिलता है?
जी हाँ, किरात वाराही 'अन्याय' के विरुद्ध न्याय की देवी हैं। यदि आप सत्य पर हैं और व्यर्थ परेशान किए जा रहे हैं, तो यह साधना कोर्ट केस और विवादों में निश्चित विजय दिलाती है।
10. क्या महिलाएं यह साधना कर सकती हैं?
स्त्रियां यह साधना कर सकती हैं, लेकिन रजस्वला (मासिक धर्म) के समय पूर्णतः वर्जित है। गर्भवती महिलाओं को इस उग्र मंत्र के जप से बचना चाहिए।
