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Sri Gayatri Tattva Mala Mantram – श्री गायत्री तत्त्वमालामन्त्रम्

Sri Gayatri Tattva Mala Mantram – श्री गायत्री तत्त्वमालामन्त्रम्
॥ श्री गायत्री तत्त्वमालामन्त्रम् ॥
(वेदसारः - विश्वामित्र ऋषि प्रोक्तम्)
अस्य श्रीगायत्रीतत्त्वमालामन्त्रस्य विश्वामित्र ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः परमात्मा देवता हलो बीजानि स्वराः शक्तयः अव्यक्तं कीलकं मम समस्तपापक्षयार्थे श्रीगायत्री मालामन्त्र जपे विनियोगः । (जल छोड़ें)
चतुर्विंशति तत्त्वानां यदेकं तत्त्वमुत्तमम् । अनुपाधि परं ब्रह्म तत्परं ज्योतिरोमिति ॥ १ ॥ यो वेदादौ स्वरः प्रोक्तो वेदान्ते च प्रतिष्ठितः । तस्य प्रकृतिलीनस्य तत्परं ज्योतिरोमिति ॥ २ ॥ तदित्यादिपदैर्वाच्यं परमं पदमव्ययम् । अभेदत्वं पदार्थस्य तत्परं ज्योतिरोमिति ॥ ३ ॥ यस्य मायांशभागेन जगदुत्पद्यतेऽखिलम् । तस्य सर्वोत्तमं रूपमरूपस्याभिधीमहि ॥ ४ ॥ यं न पश्यन्ति परमं पश्यन्तोऽपि दिवौकसः । तं भूताखिलदेवं तु सुपर्णमुपधावताम् ॥ ५ ॥ यदंशः प्रेरितो जन्तुः कर्मपाशनियन्त्रितः । आजन्मकृतपापानामपहन्ता द्विजन्मनाम् ॥ ६ ॥ इदं महामुनिप्रोक्तं गायत्रीतत्त्वमुत्तमम् । यः पठेत्परया भक्त्या स याति परमां गतिम् ॥ ७ ॥ सर्ववेदपुराणेषु साङ्गोपाङ्गेषु यत्फलम् । सकृदस्य जपादेव तत्फलं प्राप्नुयान्नरः ॥ ८ ॥ ॥ फलश्रुति ॥अभक्ष्यभक्षणात्पूतो भवति । अगम्यागमनात्पूतो भवति । सर्वपापेभ्यः पूतो भवति । प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति । सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति । मध्यं दिनमुपयुञ्जानोऽसत् प्रतिग्रहादिभ्यो मुक्तो भवति । अनुपप्लवं पुरुषार्थमभिवदन्ति । यं यं काममभिध्यायति तत्तदेवाप्नोति पुत्रपौत्रान् कीर्तिसौभाग्यांश्चोपलभते । सर्वभूतात्ममित्रो देहान्ते तद्विशिष्टो गायत्र्या परमं पदमवाप्नोति ॥
॥ इति श्रीवेदसारे श्री गायत्री तत्त्वमालामन्त्रम् सम्पूर्णम् ॥

श्री गायत्री तत्त्वमालामन्त्रम् - विस्तृत आध्यात्मिक परिचय

श्री गायत्री तत्त्वमालामन्त्रम् (Sri Gayatri Tattva Mala Mantram) भारतीय सनातन परम्परा और वेदान्त दर्शन का वह सूक्ष्म निचोड़ है, जिसे 'वेदसार' की संज्ञा दी गई है। यह मालामन्त्र मात्र शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि यह वह तान्त्रिक 'ग्रन्थि' है जो गायत्री मन्त्र के २४ अक्षरों को ब्रह्मांड के २४ तत्त्वों के साथ जोड़ती है। महर्षि विश्वामित्र द्वारा उपदिष्ट यह मन्त्र साधक को मन्त्र के बाह्य स्वरूप से उठाकर उसके 'परमतत्त्व' (Ultimate Essence) तक ले जाता है।
सांख्य दर्शन के अनुसार यह सम्पूर्ण सृष्टि २४ तत्त्वों—प्रकृति, महत, अहंकार, पंच-तन्मात्राएं, पंच-ज्ञानेन्द्रियां, पंच-कर्मेन्द्रियां और मन—से बनी है। यह मालामन्त्र स्पष्ट करता है कि माँ गायत्री इन २४ तत्त्वों की न केवल जननी हैं, बल्कि वे स्वयं वह '२५वाँ तत्त्व' हैं जिन्हें वेदान्त में 'अनुपाधि परब्रह्म' कहा गया है। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि जिस 'सविता' (सूर्य) के प्रकाश की हम मन्त्र में कामना करते हैं, वह प्रकाश वास्तव में हमारे अपने भीतर की 'परम ज्योति' ही है।
इस मन्त्र की संरचना में "तत्परं ज्योतिरोमिति" का बार-बार दोहराया जाना एक विशेष मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक प्रभाव उत्पन्न करता है। यह साधक के अवचेतन मन में यह दृढ़ कर देता है कि सृष्टि का आरम्भ और अन्त साक्षात् ॐकार ही है। यह मन्त्र विशेष रूप से उन साधकों के लिए है जो ज्ञान मार्ग (Jnana Marga) के पथिक हैं और मन्त्र की तार्किक एवं दार्शनिक गहराई में उतरना चाहते हैं।
वर्तमान समय के कोलाहल में, जहाँ मनुष्य स्वयं को केवल शरीर और अहंकार तक सीमित मान बैठा है, गायत्री तत्त्वमालामन्त्र का पाठ उसे उसकी अनन्त शक्तियों का बोध कराता है। यह मन्त्र एक 'मन्त्र-कवच' की तरह साधक की मानसिक और आध्यात्मिक सीमाओं को सुरक्षित करता है और उसे साक्षात् शिव-शक्ति के संगम की ओर ले जाता है।

तात्विक महत्व और 'तत्परञ्ज्योति' का रहस्य

गायत्री तत्त्वमालामन्त्र का महत्व इसके गूढ़ दार्शनिक सिद्धान्तों में निहित है, जो वेदों और उपनिषदों के सार को एक सूत्र में पिरोते हैं:
  • माया और अरूप का सम्बन्ध: श्लोक ४ के अनुसार, माँ गायत्री का एक सूक्ष्म 'माया-अंश' ही इस विराट ब्रह्मांड का सृजन करता है। वे स्वयं 'अरूप' (Formless) हैं, परन्तु समस्त रूपों की आधारशिला हैं।
  • प्रणव (ॐ) की महिमा: श्लोक २ स्पष्ट करता है कि वेदों के आदि और वेदान्त के अन्त में जो दिव्य स्वर गूँज रहा है, वह साक्षात् गायत्री का 'परम ज्योति' स्वरूप ही है। यह नाद-ब्रह्म की सर्वोच्च अवस्था है।
  • कर्म-पाश से मुक्ति: मनुष्य अपने संचित कर्मों और वासनाओं के कारण 'कर्म-पाश' में बंधा हुआ है। यह मालामन्त्र उस बन्धन को काटने वाली दिव्य कैंची के समान कार्य करता है और साधक को 'अव्यय पद' तक पहुँचाता है।
  • अभेद तत्त्व: श्लोक ३ में 'अभेदत्वं पदार्थस्य' की बात कही गई है। इसका अर्थ है कि दृश्य जगत और अदृश्य परमात्मा में कोई भेद नहीं है—सब कुछ वही एक 'परम ज्योति' है, जिसे हम गायत्री कहते हैं।

फलश्रुति लाभ: पाप प्रक्षालन और ऐश्वर्य सिद्धि

मालामन्त्र के अंतिम भाग (फलश्रुति) में इसके पाठ से मिलने वाले चमत्कारी और व्यावहारिक लाभों का वर्णन है:
१. समस्त पापों का समूल नाश
फलश्रुति के अनुसार, यह मन्त्र तत्काल शुद्धि प्रदान करने वाला है। 'अभक्ष्य-भक्षण' (अनुचित आहार) और 'अगम्या-गमन' जैसे घोर पापों के दोषों से भी साधक इस पाठ के माध्यम से पवित्र हो जाता है।
२. त्रिकाल सन्ध्या का फल
प्रातः काल पाठ करने से रात्रि के पाप, सायंकाल पाठ से दिन के पाप और मध्याह्न पाठ से 'असत्-प्रतिग्रह' (गलत धन या दान ग्रहण करना) के कुप्रभाव नष्ट हो जाते हैं।
३. वंश वृद्धि और भौतिक समृद्धि
जो साधक निष्काम भाव से इसका पाठ करता है, उसे पुत्र, पौत्र, कीर्ति और अपार सौभाग्य की प्राप्ति होती है। वह संसार में मान-सम्मान के साथ अपना जीवन व्यतीत करता है।
४. गायत्री परमं पद (मोक्ष)
इसका सर्वोच्च फल 'गायत्री परमं पदम्' की प्राप्ति है। साधक देहान्त के पश्चात् साक्षात् ब्रह्मलोक में स्थान पाता है और जन्म-मरण के चक्र से सदा के लिए मुक्त हो जाता है।

पाठ विधि और तान्त्रिक अनुशासन (Ritual Guide)

गायत्री तत्त्वमालामन्त्र का पूर्ण लाभ लेने के लिए निम्नलिखित अनुशासित विधि अपनानी चाहिए:
  • समय (Time): प्रातः काल (सूर्योदय), मध्याह्न (दोपहर १२ बजे) और सायंकाल (सूर्यास्त)। विशेष शुद्धि हेतु ब्रह्म-मुहूर्त का समय सर्वश्रेष्ठ है।
  • शुद्धि और वस्त्र: स्नान के उपरान्त सफ़ेद या पीले सूती वस्त्र धारण करें। गायत्री साधना में पीला रंग 'स्थिरता' का और सफ़ेद रंग 'सत्य' का प्रतीक है।
  • आसन और दिशा: कुशा या ऊनी आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। रीढ़ की हड्डी को सीधा रखें।
  • न्यास और ध्यान: विनियोग मन्त्र पढ़ते समय जल भूमि पर छोड़ें। तत्पश्चात् आँखें बंद कर भ्रूमध्य (Agya Chakra) में एक प्रकाशमान ॐ की ज्योति का ध्यान करते हुए पाठ करें।
  • पूर्णता: मालामन्त्र के पाठ के बाद कम से कम १०८ बार मूल गायत्री मन्त्र का जप करना सोने पर सुहागा जैसा फल देता है।
नोट: पाठ के दौरान 'तत्परं ज्योतिरोमिति' पद पर विशेष मानसिक एकाग्रता रखें, क्योंकि यही इस मन्त्र की प्राण-शक्ति है।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. 'मालामन्त्र' और सामान्य स्तोत्र में क्या अन्तर है?

सामान्य स्तोत्र गुणगान करते हैं, जबकि मालामन्त्र अक्षरों की वह श्रृंखला है जो शरीर के चारों ओर एक मन्त्र-कवच निर्मित करती है। यह अधिक ऊर्जावान और क्रियाशील होता है।

2. क्या इस मन्त्र के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है?

भक्ति मार्ग के पाठ के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं है, परन्तु यदि आप इसे 'मन्त्र' के रूप में सिद्ध करना चाहते हैं, तो गुरु का आशीर्वाद फल को त्वरित और सुरक्षित करता है।

3. 'अव्यक्तां कीलकम्' का विनियोग में क्या अर्थ है?

कीलक वह शक्ति है जो मन्त्र को साधक के लिए सुरक्षित रखती है। 'अव्यक्त' का अर्थ है कि इसकी शक्ति साधक के भीतर छिपी है, जो नियमित अभ्यास से प्रकट होती है।

4. क्या स्त्रियाँ इस मालामन्त्र का पाठ कर सकती हैं?

हाँ, माँ गायत्री वेदों की माता हैं और उनकी तत्त्व-साधना का अधिकार हर उस जीवात्मा को है जो सत्य और ज्ञान की पिपासा रखता है।

5. 'अभक्ष्य-भक्षण' से शुद्धि का क्या अर्थ है?

गलत खान-पान से मन और प्राण अशुद्ध होते हैं। यह मन्त्र उन सूक्ष्म अशुद्धियों को जलाकर साधक की चेतना को पुनः सात्त्विक और निर्मल बनाता है।

6. सांख्य दर्शन के २४ तत्त्वों का यहाँ क्या महत्व है?

यह मन्त्र सिद्ध करता है कि हम जिस भौतिक जगत (२४ तत्त्वों) को देखते हैं, माँ गायत्री उस सबके मूल में २५वें तत्त्व (ईश्वर) के रूप में विद्यमान हैं।

7. क्या यह मन्त्र नौकरी या व्यवसाय में सफलता देता है?

हाँ, 'कीर्ति-सौभाग्यानि' के फल के अनुसार यह साधक के व्यक्तित्व में निखार लाता है और उसे कार्यक्षेत्र में सफलता व सम्मान प्रदान करता है।

8. पाठ के लिए कौन सी माला श्रेष्ठ है?

जप के लिए सफ़ेद चन्दन, स्फटिक या तुलसी की माला सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। अर्चन के लिए सफ़ेद पुष्पों का प्रयोग करें।

9. क्या केवल १ बार पाठ करने से फल मिलता है?

श्लोक ८ के अनुसार 'सकृदस्य जपादेव' अर्थात् केवल एक बार भी पूरी श्रद्धा से जपने पर समस्त वेदों और पुराणों के पाठ का फल मिलता है।

10. गायत्री को 'सर्वभूतात्ममित्र' क्यों कहा गया है?

क्योंकि जो गायत्री तत्त्व को जान लेता है, वह हर जीव में उसी परमात्मा को देखता है और स्वयं सबका निस्वार्थ मित्र बन जाता है।