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Sri Dhumra Varahi Mantra Japa – श्री धूम्र वाराही मन्त्र जप

Sri Dhumra Varahi Mantra Japa – श्री धूम्र वाराही मन्त्र जप
॥ श्री गणेशाय नमः ॥ ॥ श्री धूम्र वाराही मन्त्र जप प्रयोगः ॥ १. विनियोगः अस्य श्री धूम्र वाराही महामन्त्रस्य । दुर्वासा ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । श्री धूम्र वाराही देवता । धूं बीजं । स्वाहा शक्तिः । फट् कीलकं । मम शत्रु क्षयार्थे जपे विनियोगः ॥ २. ऋष्यादि न्यासः श्री दुर्वासा ऋषये नमः शिरसि । अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे । श्री धूम्र वाराही देवतायै नमः हृदि । धूं बीजाय नमः गुह्ये । स्वाहा शक्तये नमः पादयोः । फट् कीलकाय नमः नाभौ । विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ॥ ३. कर न्यासः ॐ धूं अंगुष्ठाभ्यां नमः । ॐ धूं तर्जनीभ्यां नमः । ॐ मृत्युधूमे मध्यमाभ्यां नमः । ॐ धूं अनामिकाभ्यां नमः । ॐ धूं कनिष्ठाभ्यां नमः । ॐ कालधूमे करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । ४. षडङ्ग न्यासः ॐ धूं हृदयाय नमः । ॐ धूं शिरसे स्वाहा । ॐ मृत्युधूमे शिखायै वषट् । ॐ धूं कवचाय हुम् । ॐ धूं नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ कालधूमे अस्त्राय फट् । भूर्भुवस्सुवरोमिति दिग्बन्धः ॥ ५. ध्यानम् नमस्ते धूम्रवाराहि वैरिप्राणापहारिणि । गोकण्ठमिव शार्धूलो गजकण्ठं यथाहरिः ॥ पिब रक्तं च देवेशि आशलमाम्सं च भक्षय । पशून् ददामि ते शत्रून्वन्दे त्वां शत्रुरूपिणि ॥ (अर्थ: हे धूम्र वाराही! मैं आपको नमन करता हूँ। आप शत्रुओं के प्राणों का हरण करने वाली हैं। जैसे शेर गाय की गर्दन पर और भगवान विष्णु गजासुर की गर्दन पर प्रहार करते हैं, वैसे ही आप शत्रुओं का नाश करें। हे देवेशि! आप उनका रक्त पिएं और मांस भक्षण करें (प्रतीकात्मक: शत्रुता का नाश करें)। मैं अपने पशु-तुल्य शत्रुओं को आपको समर्पित करता हूँ।) ६. पञ्चपूजा लँ - पृथिव्यात्मिकायै गन्धं समर्पयामि। हँ - आकाशात्मिकायै पुष्पैः पूजयामि। यँ - वाय्वात्मिकायै धूपमाघ्रापयामि। रँ - अग्न्यात्मिकायै दीपं दर्शयामि। वँ - अमृतात्मिकायै अमृतं महानैवेद्यं निवेदयामि। सँ - सर्वात्मिकायै सर्वोपचार पूजाम् समर्पयामि॥ ७. जपमाला मन्त्रं (माला पूजन) ॐ मां माले महामाये सर्वमन्त्र स्वरूपिणि। चतुर्वर्ग स्त्वयिन्यस्त स्तस्मान्ये सिद्धिदा भव॥ ८. गुरु मन्त्र ॐ ह्रीं सिद्धगुरो प्रसीद ह्रीं ॐ ॥ ९. मूल मन्त्र (१७ अक्षरों वाला महामंत्र) ॐ धूं धूं मृत्युधूमे धूं धूं कालधूमे धूं धूं धूम्रवाराही हुं फट् स्वाहा ॥ १०. समर्पणम् गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मात्कृतं जपम्। सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादान्मयि स्तिरा॥ (जल छोड़े) ११. जपानंतरं मालामन्त्रं ॐ त्वं माले सर्वदेवानां प्रीतिदा शुभदा भव। शुभं कुरुष्य मे भद्रे यशो वीर्यं च देहिमे॥ ॐ ह्रीं सिद्ध्यै नमः॥ १२. पुरश्चरण विधि जप संख्या: १,००,००० (एक लाख)। दशांश: होम, तर्पण, मार्जन, ब्राह्मण भोजन।

श्री धूम्र वाराही देवी: परिचय और रहस्य (Introduction & Significance)

हिंदू तंत्र शास्त्र में माँ वाराही के अनेक रूप हैं, जिनमें से श्री धूम्र वाराही (Sri Dhumra Varahi) अत्यंत उग्र, रहस्यमयी और शत्रुओं के लिए प्रलयंकारी मानी जाती हैं। 'धूम्र' (Dhumra) का अर्थ है 'धुआं' या 'धुंधला'। जिस प्रकार धुआं सब कुछ ढँक देता है और सांस लेना कठिन कर देता है, उसी प्रकार धूम्र वाराही शत्रुओं की शक्तियों को आच्छादित (Cover/Obscure) कर उनका दम घोंट देती हैं।
यह स्वरूप विशेष रूप से 'शत्रु मारण' (Enemy Destruction) और 'विद्वेषण' (Creating Conflict among Enemies) के लिए जाना जाता है। उनके ध्यान मंत्र में स्पष्ट कहा गया है कि वे शत्रुओं के प्राणों का हरण करती हैं, जैसे शेर गाय का शिकार करता है। यह उपमा उनकी तीव्रता और अमोघ शक्ति को दर्शाती है।
धूम्र वाराही, यद्यपि उग्र हैं, वे अपने भक्तों के लिए 'अरिष्ट-नाशक' (Destroyer of Misfortune) हैं। वे केवल बाहरी शत्रुओं का ही नहीं, बल्कि काम, क्रोध, लोभ और अहंकार रूपी आंतरिक 'पशुओं' का भी संहार करती हैं। उनकी साधना से साधक को निर्भयता और अजेय शक्ति प्राप्त होती है।

साधना के लाभ (Benefits of Sadhana)

  • शत्रु निवारण (Enemy Destruction): यह मंत्र शत्रुओं के षड्यंत्रों को पूरी तरह नष्ट कर देता है। शत्रु स्वयं अपने जाल में फंस जाते हैं।
  • अकाल मृत्यु से रक्षा: मंत्र में 'मृत्युधूमे' और 'कालधूमे' शब्द का प्रयोग है, जो अकाल मृत्यु और काल (समय) के प्रकोप से रक्षा करता है।
  • तान्त्रिक बाधा मुक्ति: यदि किसी ने श्मशान क्रिया या मारण प्रयोग किया हो, तो धूम्र वाराही उसे भस्म कर देती हैं।
  • गुप्त शत्रुओं का नाश: जो शत्रु सामने नहीं आते लेकिन पीछे से वार करते हैं, वे इस देवी के प्रभाव से बेनकाब और नष्ट हो जाते हैं।
  • रोग निवारण: असाध्य रोग जो तान्त्रिक कारणों से उत्पन्न हुए हों, वे इस मंत्र से ठीक हो जाते हैं।

विस्तृत प्रश्नोत्तरी (Detailed FAQs)

1. श्री धूम्र वाराही कौन हैं?

धूम्र वाराही, माँ वाराही का एक विशिष्ट तांत्रिक स्वरूप हैं। 'धूम्र' का अर्थ है 'धुआं'। वे शत्रुओं के लिए अंधकार और मृत्यु के समान हैं, किन्तु अपने भक्तों के लिए वे सभी बाधाओं को भस्म करने वाली शक्तिशाली माता हैं।

2. धूम्र वाराही और धूमावती महाविद्या में क्या अंतर है?

यद्यपि दोनों 'धूम्र' (धुएं) और 'ज्येष्ठा/अलक्ष्मी' तत्त्व से जुड़ी हैं, धूम्र वाराही भगवान विष्णु के वराह अवतार की शक्ति (वाराही) का रूप हैं और श्री विद्या कुल की हैं। धूमावती दस महाविद्याओं में से एक हैं और वे विधवा स्वरूप में शिव-विहीन शक्ति हैं। धूम्र वाराही 'सेनापति' हैं जो रक्षा करती हैं, जबकि धूमावती 'अभाव' और 'रिक्तता' की देवी हैं।

3. इस मंत्र का मुख्य लाभ क्या है?

इस मंत्र का सबसे बड़ा लाभ 'शत्रु नाश' है। मंत्र में कहा गया है कि देवी शत्रुओं के प्राणों का हरण करती हैं। यह साधना गंभीर कानूनी विवादों, प्राणघातक हमलों, और प्रबल तांत्रिक बाधाओं से रक्षा करती है।

4. क्या यह साधना घर पर की जा सकती है?

यह एक उग्र साधना है। इसे घर के पूजा कक्ष के बजाय एकांत स्थान या मंदिर में करना बेहतर है। यदि घर पर करें, तो दक्षिण दिशा की ओर मुख करके और पूर्ण गोपनीयता के साथ करें।

5. 17 अक्षरी मंत्र का अर्थ क्या है?

मंत्र का भाव है: 'हे धूम्र वाराही! आप मृत्यु और काल (समय) के धुएं के समान हैं। आप मेरे शत्रुओं और बाधाओं को भस्म करें।' 'धूं' बीज मंत्र शत्रुओं को धुएं में उड़ाने और भ्रमित करने का कार्य करता है।

6. साधना का उत्तम समय क्या है?

मध्यरात्रि (11 PM - 1 AM) इस साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ है। कृष्ण पक्ष की अष्टमी, चतुर्दशी या अमावस्या तिथियां विशेष फलदायी हैं।

7. पूजन में किस रंग का प्रयोग करें?

इस साधना में काले या गहरे नीले रंग (Dark Blue/Black) के वस्त्र और आसन का प्रयोग किया जाता है, जो देवी के 'धूम्र' वर्ण का प्रतीक है।

8. नैवेद्य (भोग) में क्या अर्पित करें?

उरद दाल के वड़े, काली मिर्च, गुड़, और भैंस का दूध या दही प्रिय है। कुछ साधक बलि (नींबू या कद्दू) भी अर्पित करते हैं।

9. क्या महिलाएं यह साधना कर सकती हैं?

हाँ, किन्तु मासिक धर्म के समय पूर्णतः वर्जित है। उग्र साधना होने के कारण गर्भवती महिलाओं को इससे बचना चाहिए।

10. पुरश्चरण (सिद्धि) के लिए कितनी संख्या में जप करना चाहिए?

मंत्र सिद्धि के लिए १ लाख (1,00,000) जप का विधान है। इसके बाद उसका दशांश (10,000) हवन, तर्पण और मार्जन करना अनिवार्य है।