॥ मन्त्रपुष्पम् ॥
धाता पुरस्ताद्यमुदाजहार । शक्रः प्रविद्वान्प्रदिशश्चतस्रः ।
तमेवं विद्वानमृत इह भवति । नान्यः पन्था अयनाय विद्यते ।
ओं सहस्रशीर्षं देवं विश्वाक्षं विश्वशम्भुवम् ।
विश्वं नारायणं देवमक्षरं परमं पदम् ।
विश्वतः परमं नित्यं विश्वं नारायणं हरिम् ।
विश्वमेवेदं पुरुषस्तद्विश्वमुपजीवति ।
पतिं विश्वस्यात्मेश्वरं शाश्वतं शिवमच्युतम् ।
नारायणं महाज्ञेयं विश्वात्मानं परायणम् ।
नारायणः परो ज्योतिरात्मा नारायणः परः ।
नारायणः परं ब्रह्म तत्त्वं नारायणः परः ।
नारायणः परो ध्याता ध्यानं नारायणः परः ।
यच्च किञ्चिज्जगत्सर्वं दृश्यते श्रूयतेऽपि वा ॥
अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः ।
अनन्तमव्ययं कविं समुद्रेंतं विश्वशम्भुवम् ।
पद्मकोश प्रतीकाशं हृदयं चाप्यधोमुखम् ।
अधो निष्ट्या वितस्त्यान्ते नाभ्यामुपरि तिष्ठति ।
ज्वालमालाकुलं भाती विश्वस्यायतनं महत् ।
सन्ततं सिराभिस्तु लम्बत्याकोशसन्निभम् ।
तस्यान्ते सुषिरं सूक्ष्मं तस्मिन सर्वं प्रतिष्ठितम् ।
तस्य मध्ये महानग्निर्विश्वार्चिर्विश्वतोमुखः ।
सोऽग्रभुग्विभजन्तिष्ठन्नाहारमजरः कविः ।
तिर्यगूर्ध्वमधश्शायी रश्मयस्तस्य सन्तता ।
सन्तापयति स्वं देहमापादतलकः ।
तस्य मध्ये वह्निशिखा अणीयोर्ध्वा व्यवस्थिता ।
नीलतोयदमध्यस्था विद्युल्लेखेव भास्वरा ।
नीवारशूकवत्तन्वी पीता भास्वत्यणूपमा ।
तस्याः शिखाया मध्ये परमात्मा व्यवस्थितः ।
स ब्रह्म स शिवः स हरिः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट् ॥
॥ योपाम पुष्पम् ॥
योऽपां पुष्पं वेद । पुष्पवान प्रजावान पशुमान भवति ।
चन्द्रमा वा अपां पुष्पम् । पुष्पवान प्रजावान पशुमान भवति ।
य एवं वेद । योऽपामायतनं वेद । आयतनवान भवति ।
अग्निर्वा अपामायतनम् । आयतनवान भवति ।
योऽग्नेरायतनं वेद । आयतनवान भवति ।
आपो वा अग्नेरायतनम् । आयतनवान भवति ।
य एवं वेद । योऽपामायतनं वेद । आयतनवान भवति ।
वायुर्वा अपामायतनम् । आयतनवान भवति ।
यो वायोरायतनं वेद । आयतनवान भवति ।
आपो वै वायोरायतनम् । आयतनवान भवति ।
य एवं वेद । योऽपामायतनं वेद । आयतनवान भवति ।
असौ वै तपन्नपामायतनम् । आयतनवान भवति ।
योऽमुष्य तपतः आयतनं वेद । आयतनवान भवति ।
आपो वा अमुष्य तपतः आयतनम् ॥
आयतनवान भवति । य एवं वेद ।
योऽपामायतनं वेद । आयतनवान भवति ।
चन्द्रमा वा अपामायतनम् । आयतनवान भवति ।
यश्चन्द्रमस आयतनं वेद । आयतनवान भवति ।
आपो वै चन्द्रमस आयतनम् । आयतनवान भवति ।
य एवं वेद । योऽपामायतनं वेद । आयतनवान भवति ।
नक्षत्राणि वा अपामायतनम् । आयतनवान भवति ।
यो नक्षत्राणामायतनं वेद । आयतनवान भवति ।
आपो वै नक्षत्राणामायतनम् । आयतनवान भवति ।
य एवं वेद । योऽपामायतनं वेद । आयतनवान भवति ।
पर्जन्यो वा अपामायतनम् । आयतनवान भवति ।
यः पर्जन्यस्यायतनं वेद । आयतनवान भवति ।
आपो वै पर्जन्यस्यायतनम् । आयतनवान भवति ।
य एवं वेद । योऽपामायतनं वेद । आयतनवान भवति ।
संवत्सरो वा अपामायतनम् । आयतनवान भवति ।
यस्संवत्सरस्यायतनं वेद । आयतनवान भवति ।
आपो वै संवत्सरस्यायतनम् । आयतनवान भवति ।
य एवं वेद । योऽप्सु नावं प्रतिष्ठितां वेद । प्रत्येव तिष्ठति ॥
किं तद्विष्णोर्बलमाहुः का दीप्तिः किं परायणं
एको यद्धारयद्देवः रेजती रोदसी उभे
वाताद्विष्णोर्बलमाहुः अक्षराद्दीप्तिरुच्यते
त्रिपदाद्धारयद्देवः यद्विष्णोरेकमुत्तमम् ।
॥ राजाधिराजाय ॥
ओं राजाधिराजाय प्रसह्यसाहिने । नमो वयं वैश्रवणाय कुर्महे ।
स मे कामानकामकामाय मह्यम् । कामेश्वरो वैश्रवणो ददातु ।
कुबेराय वैश्रवणाय । महाराजाय नमः ॥
ओं तद्ब्रह्म ओं तद्वायुः ओं तदात्मा
ओं तत्सत्यं ओं तत्सर्वं ओं तत्पुरोर्नमः ।
अन्तश्चरति भूतेषु गुहायां विश्वमूर्तिषु ।
त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारस्त्वमिन्द्रस्त्वं रुद्रस्त्वं
विष्णुस्त्वं ब्रह्म त्वं प्रजापतिः ।
त्वं तदाप आपो ज्योती रसोऽमृतं
ब्रह्म भूर्भुवस्सुवरोम् ॥
ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणोऽधिपतिर्ब्रह्मा शिवो मे अस्तु सदाशिवोम् ॥
तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम् ।
तद्विप्रासो विपन्यवो जागृवांसस्मिन्धते । विष्णोर्यत्परमं पदम् ।
ऋतं सत्यं परं ब्रह्म पुरुषं कृष्णपिङ्गलम् ।
ऊर्ध्वरेतं विरूपाक्षं विश्वरूपाय वै नमो नमः ।
ओं नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि । तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ॥
महादेव्यै च विद्महे विष्णुपत्नी च धीमहि । तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ॥
आकाशात्पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम् ।
सर्वदेव नमस्कारः केशवं प्रतिगच्छति ॥
ओं शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
मन्त्रपुष्पम्: वेदों का अनमोल उपहार एवं परिचय (Introduction)
मन्त्रपुष्पम् (Mantra Pushpam) सनातन वैदिक परंपरा का एक अत्यंत गहन और प्रभावशाली मंत्र संग्रह है। यह मंत्र मुख्य रूप से यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा के 'तैत्तिरीय आरण्यक' (Taittiriya Aranyaka) से उद्धृत है। भारतीय संस्कृति में किसी भी पूजा, यज्ञ या अनुष्ठान के समापन पर जब 'पुष्पांजलि' अर्पित की जाती है, तब इन्हीं मंत्रों का सस्वर गान किया जाता है। 'मन्त्रपुष्पम्' का शाब्दिक अर्थ है—मंत्रों का पुष्प। जिस प्रकार एक खिला हुआ फूल अपनी सुगंध से वातावरण को भर देता है, उसी प्रकार ये मंत्र साधक के अंतर्मन को दैवीय सुगंध और शांति से भर देते हैं।
इस स्तोत्र की संरचना अत्यंत वैज्ञानिक और दार्शनिक है। इसमें ब्रह्मांड के मूल तत्वों—जल, अग्नि, वायु, सूर्य, चंद्रमा, नक्षत्र और संवत्सर (समय)—के बीच के अंतर्संबंधों को समझाया गया है। इन मंत्रों का मुख्य केंद्र 'आपः' (जल) है। वेदों में जल को जीवन का आधार और परमेश्वर की शक्ति का प्रतीक माना गया है। मन्त्रपुष्पम् हमें बताता है कि परमात्मा केवल एक मूर्ति या चित्र तक सीमित नहीं है, बल्कि वह इन पंचमहाभूतों के माध्यम से ही हमारे चारों ओर व्याप्त है।
मन्त्रपुष्पम् के साथ अक्सर 'नारायण सूक्तम्' का पाठ भी जुड़ा होता है, जो 'पुरुष सूक्तम्' का पूरक है। इसमें भगवान नारायण को ब्रह्मांड के प्रत्येक कण में व्याप्त 'हृदय कमल' में स्थित ज्योति के रूप में वर्णित किया गया है। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि जो ज्ञान वेदों के गहरे सागर में छिपा है, उसे श्रद्धा के साथ पुष्पों के माध्यम से परमात्मा को अर्पित कर हम जीवन की सार्थकता पा सकते हैं।
मन्त्रपुष्पम् का आध्यात्मिक रहस्य एवं महत्व (Significance)
मन्त्रपुष्पम् का आध्यात्मिक महत्व इसके 'आयतन' (Adhar/Base) के सिद्धांत में निहित है। मंत्रों में बार-बार प्रश्न और उत्तर के माध्यम से समझाया गया है कि प्रत्येक तत्व का आधार दूसरा तत्व है। उदाहरण के लिए, जल का आधार अग्नि है और अग्नि का आधार जल है। यह रहस्य आधुनिक विज्ञान के 'ऊर्जा चक्र' (Energy Cycle) के समान है। यह बोध कि प्रकृति का हर अंग दूसरे पर निर्भर है, मनुष्य के भीतर अहंकार का नाश करता है और प्रकृति के प्रति सम्मान पैदा करता है।
इसमें भगवान विष्णु (नारायण) को 'सहस्रशीर्षं' (हजारों सिरों वाले) और 'विश्वाक्षं' (सारे जगत को देखने वाले) कहा गया है। इसका दार्शनिक अर्थ यह है कि प्रत्येक प्राणी का सिर और उसकी आँखें साक्षात् नारायण की ही हैं। जब हम पुष्पांजलि अर्पित करते समय इन मंत्रों का गान करते हैं, तो हम स्वीकार करते हैं कि हम उस विराट पुरुष के एक नन्हे अंश हैं। यह स्तोत्र 'अद्वैत' का प्रत्यक्ष अनुभव कराने वाला है, जहाँ साधक और साध्य (ईश्वर) के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है।
पाठ के अमोघ लाभ: फलश्रुति (Benefits)
मन्त्रपुष्पम् का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से साधक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
- समृद्धि और संतति: "पुष्पवान प्रजावान पशुमान भवति" — वेदों के अनुसार, जो इस रहस्य को जानता है और पाठ करता है, उसे उत्तम संतान, वैभव और प्रचुरता की प्राप्ति होती है।
- मानसिक शांति और एकाग्रता: नारायण सूक्त के अंश हृदय कमल को जागृत करते हैं, जिससे तनाव और मानसिक अवसाद दूर होता है और ध्यान में गहराई आती है।
- प्रकृति के साथ सामंजस्य: यह पाठ घर और आसपास की नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट कर सात्विक तरंगों का संचार करता है, जिससे वातावरण शुद्ध होता है।
- पाप मुक्ति: "सर्वं हरतु मे पापं" — यह मंत्र साधक के ज्ञात-अज्ञात पापों का शमन कर उसे आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर करता है।
- भगवान की विशेष कृपा: अंत में कहा गया है— "सर्वदेव नमस्कारः केशवं प्रतिगच्छति"। अर्थात् सभी देवताओं को किया गया प्रणाम अंततः केशव (विष्णु) तक ही पहुँचता है। यह भगवान नारायण की अनन्य कृपा प्राप्त करने का सरलतम मार्ग है।
पाठ विधि एवं विशेष अवसर (Ritual Method)
मन्त्रपुष्पम् का पाठ अत्यंत पवित्र माना जाता है। पूर्ण फल प्राप्त करने हेतु निम्नलिखित विधि का पालन करें:
१. समय एवं शुद्धि:
पाठ के लिए ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व) या सांध्य काल सबसे उत्तम है। स्नान के उपरांत स्वच्छ वस्त्र (पीले या श्वेत) धारण करें। एकादशी, गुरुवार और पूर्णिमा के दिन इसका पाठ महापुण्यदायी है।
२. पुष्पांजलि विधान:
दोनों हाथों को जोड़कर उनमें सुगंधित पुष्प (विशेषकर कमल, गेंदा या तुलसी दल) लें। मंत्रों के उच्चारण के दौरान उन पुष्पों को अपनी आँखों के पास रखें और पाठ की समाप्ति पर प्रभु के चरणों में श्रद्धापूर्वक अर्पित करें।
३. दिशा एवं आसन:
पूजा स्थान पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा के सम्मुख घी का दीपक जलाएं।
४. ध्यान की गहराई:
पाठ करते समय 'नारायण' को अपने हृदय के सूक्ष्म छिद्र में स्थित 'विद्युत रेखा' के समान प्रकाशमान ज्योति के रूप में अनुभव करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. मन्त्रपुष्पम् किस वेद से लिया गया है?
यह मुख्य रूप से यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा के 'तैत्तिरीय आरण्यक' के अंतर्गत आता है। यह वेदों का एक अत्यंत प्राचीन और प्रामाणिक मंत्र है।
2. 'योपाम पुष्पम वेदा' का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है—'जो जल के पुष्प (चन्द्रमा) को जानता है'। यहाँ जल जीवन का प्रतीक है और पुष्प उसकी श्रेष्ठता का। यह मंत्र ब्रह्मांडीय ऊर्जा के रहस्यों को समझने का आह्वान है।
3. क्या इसे घर पर बिना किसी पुजारी के पढ़ा जा सकता है?
हाँ, कोई भी भक्त शुद्ध मन और भक्ति के साथ इसे घर पर पढ़ सकता है। बस उच्चारण की शुद्धता का ध्यान रखें। यदि संस्कृत कठिन लगे, तो भावपूर्वक अर्थ के साथ सुनने से भी फल मिलता है।
4. पुष्पांजलि के समय ही इसे क्यों गाया जाता है?
पुष्पांजलि पूजा का अंतिम भाग है। मन्त्रपुष्पम् के माध्यम से भक्त ब्रह्मांड के सभी तत्वों को प्रभु को समर्पित करता है और कृतज्ञता व्यक्त करता है। यह पूजा की पूर्णता का प्रतीक है।
5. 'नारायण सूक्त' और मन्त्रपुष्पम् में क्या संबंध है?
मन्त्रपुष्पम् के पाठ में अक्सर 'नारायण सूक्त' के मंत्रों (सहस्रशीर्षं...) को शामिल किया जाता है क्योंकि वे परमात्मा की व्यापकता को सिद्ध करते हैं, जो मन्त्रपुष्पम् का मूल आधार है।
6. क्या स्त्रियाँ मन्त्रपुष्पम् का पाठ कर सकती हैं?
निश्चित रूप से। भगवान की भक्ति में कोई भेदभाव नहीं है। स्त्रियाँ पूर्ण शुद्धि और श्रद्धा के साथ अपने परिवार की सुख-शांति हेतु इसका पाठ कर सकती हैं।
7. 'राजाधिराजाय' मंत्र का यहाँ क्या महत्व है?
यह मंत्र भगवान कुबेर (धन के देवता) और महाराज (नारायण) की स्तुति है। यह साधक को दरिद्रता से मुक्त कर आर्थिक समृद्धि प्रदान करने के लिए जोड़ा गया है।
8. पाठ के दौरान एकाग्रता कैसे बढ़ाएं?
पाठ करते समय 'नीलतोयदमध्यस्था' (नीले बादलों के बीच चमकती बिजली) के रूप में परमात्मा का ध्यान करें। इससे मन संसार से हटकर ईश्वर में केंद्रित होता है।
9. क्या इस पाठ से कुंडली के दोष शांत होते हैं?
जी हाँ, यह पंचमहाभूतों (सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र) का मंत्र है। इसके पाठ से ग्रहों की प्रतिकूलता शांत होती है और घर का वास्तु दोष भी दूर होता है।
10. क्या इसके पाठ के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है?
सामान्य भक्ति के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं है। कोई भी श्रद्धालु मर्यादा पुरुषोत्तम राम या नारायण को अपना गुरु मानकर इसका पाठ कर सकता है।
