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Sri Dakshinamurthy Kavacham (Rudrayamala) – श्री दक्षिणामूर्ति कवचम् (रुद्रयामले)

Sri Dakshinamurthy Kavacham (Rudrayamala) – श्री दक्षिणामूर्ति कवचम् (रुद्रयामले)
पार्वत्युवाच । नमस्तेऽस्तु त्रयीनाथ परमानन्दकारक । कवचं दक्षिणामूर्तेः कृपया वद मे प्रभो ॥ १ ॥ ईश्वर उवाच । वक्ष्येऽहं देवदेवेशि दक्षिणामूर्तिरव्ययम् । कवचं सर्वपापघ्नं वेदान्तज्ञानगोचरम् ॥ २ ॥ अणिमादि महासिद्धिविधानचतुरं शुभम् । वेदशास्त्रपुराणानि कविता तर्क एव च ॥ ३ ॥ बहुधा देवि जायन्ते कवचस्य प्रभावतः । ऋषिर्ब्रह्मा समुद्दिष्टश्छन्दोऽनुष्टुबुदाहृतम् ॥ ४ ॥ देवता दक्षिणामूर्तिः परमात्मा सदाशिवः । बीजं वेदादिकं चैव स्वाहा शक्तिरुदाहृता । सर्वज्ञत्वेऽपि देवेशि विनियोगं प्रचक्षते ॥ ५ ॥ ध्यानम् – अद्वन्द्वनेत्रममलेन्दुकलावतंसं हंसावलम्बित समान जटाकलापम् । आनीलकण्ठमुपकण्ठमुनिप्रवीरान् अध्यापयन्तमवलोकय लोकनाथम् ॥ कवचम् – ओम् । शिरो मे दक्षिणामूर्तिरव्यात् फालं महेश्वरः । दृशौ पातु महादेवः श्रवणे चन्द्रशेखरः ॥ १ ॥ कपोलौ पातु मे रुद्रो नासां पातु जगद्गुरुः । मुखं गौरीपतिः पातु रसनां वेदरूपधृत् ॥ २ ॥ दशनां त्रिपुरध्वंसी चोष्ठं पन्नगभूषणः । अधरं पातु विश्वात्मा हनू पातु जगन्मयः ॥ ३ ॥ चुबुकं देवदेवस्तु पातु कण्ठं जटाधरः । स्कन्धौ मे पातु शुद्धात्मा करौ पातु यमान्तकः ॥ ४ ॥ कुचाग्रं करमध्यं च नखरान् शङ्करः स्वयम् । हृन्मे पशुपतिः पातु पार्श्वे परमपूरुषः ॥ ५ ॥ मध्यमं पातु शर्वो मे नाभिं नारायणप्रियः । कटिं पातु जगद्भर्ता सक्थिनी क्ष्च मृडः स्वयम् ॥ ६ ॥ कृत्तिवासाः स्वयं गुह्यामूरू पातु पिनाकधृत् । जानुनी त्र्यम्बकः पातु जङ्घे पातु सदाशिवः ॥ ७ ॥ स्मरारिः पातु मे पादौ पातु सर्वाङ्गमीश्वरः । इतीदं कवचं देवि परमानन्ददायकम् ॥ ८ ॥ ज्ञानवागर्थदं वीर्यमणिमादिविभूतिदम् । आयुरारोग्यमैश्वर्यमपमृत्युभयापहम् ॥ ९ ॥ प्रातः काले शुचिर्भूत्वा त्रिवारं सर्वदा जपेत् । नित्यं पूजासमायुक्तः संवत्सरमतन्द्रितः ॥ १० ॥ जपेत् त्रिसन्ध्यं यो विद्वान् वेदशास्त्रार्थपारगः । गद्यपद्यैस्तथा चापि नाटकाः स्वयमेव हि । निर्गच्छन्ति मुखाम्भोजात्सत्यमेतन्न संशयः ॥ ११ ॥ इति रुद्रयामले उमामहेश्वरसंवादे श्री दक्षिणामूर्ति कवचम् ॥ इतर पश्यतु ।

श्री दक्षिणामूर्ति कवचम् (रुद्रयामले) - परिचय

श्री दक्षिणामूर्ति कवचम् (रुद्रयामले) भगवान शिव की महिमा का गुणगान है। शिव जी, जो संहार और सृजन के देवता हैं, अपने भक्तों पर शीघ्र प्रसन्न होते हैं।

पाठ के लाभ (Benefits)

  • आत्म-ज्ञान: शिव जी की कृपा से अज्ञान का नाश होकर आत्म-ज्ञान प्राप्त होता है।
  • भय मुक्ति: मृत्यु और संसार के भय से मुक्ति मिलती है।
  • शांति: मन को परम शांति और स्थिरता प्राप्त होती है।
  • मोक्ष: निरंतर पाठ से शिव लोक की प्राप्ति सुलभ होती है।

पाठ विधि (Recitation Method)

  • समय: सोमवार, प्रदोष काल और शिवरात्रि का दिन पाठ के लिए उत्तम है।
  • आसन: ऊनी या कुशा के आसन पर उत्तर मुख होकर बैठें।
  • पूजन: शिवलिंग पर जल/दूध अभिषेक और बिल्वपत्र अर्पण करें।
  • मंत्र: 'ॐ नमः शिवाय' का जाप पाठ से पूर्व और पश्चात करें।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. दक्षिणामूर्ति स्वरूप क्या है?

भगवान शिव का वह स्वरूप जो आदि-गुरु के रूप में ऋषियों को मौन व्याख्यान द्वारा आत्म-ज्ञान प्रदान करता है, दक्षिणामूर्ति कहलाता है।

2. नटराज रूप का क्या महत्व है?

नटराज रूप सृष्टि के सृजन, पालन और संहार के ब्रह्मांडीय नृत्य का प्रतीक है।