Logoपवित्र ग्रंथ

Shivaproktam Tripura Kavacham (Kalika Purana) – शिवप्रोक्तं त्रिपुराकवचम्

Shivaproktam Tripura Kavacham (Kalika Purana) – शिवप्रोक्तं त्रिपुराकवचम्
॥ शिवप्रोक्तं त्रिपुराकवचम् ॥ कवचं त्रिपुरायास्तु श‍ृणु वेताल भैरव । यज्ज्ञात्वा मन्त्रवित् सम्यक् फलमाप्नोति पूजने ॥ ५०॥ उपचाराः पुरा प्रोक्ता येन एवात्र पूजने । प्रतिपत्तिस्तु सैवात्र कीर्तिता नित्यपूजने ॥ ५१॥ कवचस्य च माहात्म्यमहं ब्रह्मा न केशवः । वक्तुं क्षमस्त्वनन्तोऽपि बहुजिह्वः कदाचन ॥ ५२॥ क्रव्यादाद्भयं न लभते तथा तोयपरिप्लवे । कवचस्मरणादेव सर्वं कल्याणमाप्नुयात् ॥ ५३॥ अथ कवचं - ॐ त्रिपुराकवचस्यास्य ऋषिर्दक्षिण उच्यते । छन्दश्चित्राह्वयं प्रोक्तं देवी त्रिपुरभैरवी । धर्मार्थकाममोक्षाणां विनियोगस्तु साधने ॥ ५४॥ यथाद्यात्रिपुराख्याया बीजानि क्रमतः सुत । नामतो वाग्भवादीनि कीर्तितानि मया पुरा ॥ ५५॥ तथा त्रिपुरभैरव्या बीजानामपि नामतः । वाग्भवः कामराजश्च तथा त्रैलोक्यमोहनः ॥ ५६॥ अवतु सकलशीर्षं वाग्भवे वाचमुग्रां निखिलरचितकामान् कामराजोऽवतान्मे । सकलकरणवर्गमीश्वरः पातु नित्यं तनुगतबहुतेजो वर्धयन् बुद्धिहेतुः ॥ ५७॥ कूटैस्तु पञ्चभिरिदं गदितं हि यन्त्रं मन्त्रं ततोऽनु सततं मम तेज उग्रम् । तेजोमयं महति नित्यपरायणस्थं तन्त्रो हृदि प्रविततां तनुतां सुबुद्धिम् ॥ ५८॥ आधारे वाग्भवः पातु कामराजस्तथा हृदि । भ्रुवोर्मध्ये च शीर्षे च पातु त्रैलोक्यमोहनः ॥ ५९॥ विततकुलकलाज्ञा कामिनी भैरवी या त्रिपुरपुरदहाख्या सर्वलोकस्य माता । वितरतु मम नित्यं नाभिपद्मे सकुक्षौ गणपतिवनिता मां रोगहानिं सुखं च ॥ ६०॥ योगैर्जगन्ति परिमोहयतीव नित्यं जागर्ति या त्रिपुरभैरवभामिनीति । सायं च भावकलिता मम पञ्चभागे नासाक्षिकर्णरसनात्वचि पातु नित्यम् ॥ ६१॥ आद्या तु त्रिपुरेयं या मध्या या कामदायिनी । त्रिधा तु ह्यवतां नित्यं देवी त्रिपुरभैरवी ॥ ६२॥ उदयदिशि सदा मां पातु बाला तु माता यमदिशि मम मध्याभद्रमुग्रं विदध्यात् । वरुणपवनकाष्ठामध्यतो भैरवी मा- मवतु सकलरक्षां कुर्वती सुन्दरी मे ॥ ६३॥ महामाया महायोनिर्विश्वयोनिः सदैव तु । सा पातु त्रिपुरा नित्यं सुन्दरी भैरवी च या ॥ ६४॥ ललाटे सुभगा देवी पूर्वस्यां दिशि कामदा । नित्यं तिष्ठतु रक्षन्ती सदा त्रिपुरसुन्दरी ॥ ६५॥ भ्रुवोर्मध्ये तथाग्नेय्यां दिशि मां त्रिपुरा च या । वर्धयन्ती भगगणान् पातु त्रिपुरभैरवी ॥ ६६॥ वदने दक्षिणस्यां च दिशि मां भगसर्पिणी । त्रिपुरा यमदूतादीन् वारयन्ती सदाऽवतु ॥ ६७॥ कर्णयोः पश्चिमायां च दिशि मां भगमालिनी । अयोनिजा जगद्योनिर्बाला मां त्रिपुराऽवतु ॥ ६८॥ अनङ्गकुसुमा कण्ठे प्रतीच्यां दिशि सुन्दरी । त्रिपुराभैरवी माता नित्यं पातु महेश्वरी ॥ ६९॥ हृदि मारुतकाष्ठायां देवी चानङ्गमेखला । नाभावुदीच्यां दिशि मां मातङ्गी त्रिपुरापरा ॥ ७०॥ अनङ्गमदना देवी पातु त्रिपुरभैरवी । ऐशान्यां दिशि लिङ्गे च मदविभ्रममन्थरा ॥ ७१॥ वाग्वादिनी रक्षतु मां सदा त्रिपुरभैरवी । गुदमेढ्रान्तरे पातु रतिस्त्रिपुरभैरवी ॥ ७२॥ हृदयाभ्यन्तरे प्रीतिः पातु त्रिपुरभैरवी । भ्रूनासयोर्मध्यदेशे नित्यं पातु मनोभवः ॥ ७३॥ द्रावणी मां ग्रहात् पातु वाणी मां दुर्गमूर्धनि । क्षोभणा मां सदा पातु क्रव्याद्भ्योऽनिष्टभीतितः ॥ ७४॥ वशीकरणवाणी मामग्नितः पातु राजतः । आकर्षणाह्वया वाणी मां पातु शस्त्रघाततः ॥ ७५॥ मोहनः सर्वभूतेभ्यः पिशाचेभ्यो जलात्तथा । नित्यं पातु महाबाणस्तन्वानः काममुत्तमम् ॥ ७६॥ माला मां शास्त्रबोधाय शास्त्रवादे सदाऽवतु । पुस्तकं पातु मनसि सङ्कल्पं वर्धयन् मम ॥ ७७॥ वरः पातु सदा धाम्नि धामतेजो विवर्धयन् । अभयं ह्यभयं धत्तां सर्वेभ्यो भूतिभावनम् ॥ ७८॥ ऊर्ध्वाधोभावभूतस्थिततरकरणै रक्तकीर्णा सुचक्रा कालाग्निप्रख्यरोचिः सकलसुरगणैरर्चिता मुण्डमाला । ज्ञानध्यानैकतानप्रबलबलकरं तत्त्वभूतप्रतिष्ठं पातादूर्ध्वं तथाधः सकलभयभृतो भोगभीरोस्तु विद्या ॥ ७९॥ हः पातु हृदि मां नित्यं सः शीर्षे पातु नित्यशः । रः पातु गुह्यदेशे मां सौः पातु कण्ठपार्श्वयोः ॥ ८०॥ रकारो मम नाडीषु शिरः सौः पातु सर्वदा । शक्रः पातु सदाकाशे ब्रह्मा रक्षतु सर्वतः ॥ ८१॥ विद्या विद्याभाविनी कामरूपा स्थूला सूक्ष्मा मायया याऽऽदिमाया । ब्रह्मेन्द्राद्यैरर्चिता भूतिदात्री रक्षां कुर्यात् सर्वतो भैरवी माम् ॥ ८२॥ आद्या मध्या भाविनी नीतियुक्ता सम्यग्ज्ञानज्ञेयरूपापरा या । आदावन्ते मध्यभागे च तारा पायाद्देवी त्रैपुरी भैरवी या ॥ ८३॥ यन्मन्त्रभागतन्त्राणां यन्त्राणामपि केशवः । ब्रह्मा रुद्रश्च जानाति तत्त्वं नान्यो नमोऽस्तु तान् ॥ ८४॥ त्वं ब्रह्माणि भवानि विश्वभवितुर्लक्ष्मीरतिर्योगिनी त्वं वाग्मी सुभगा भवायुतयुतं मन्त्राक्षरं निष्कलम् । वर्णास्ते निखिला स्तनावचलितस्त्वं कामिनीकामदा त्वं देवि त्रिपुरे कवित्वममलं सौभाग्यमुच्चैः कुरु ॥ ८५॥ इदं तु कवचं देव्या यो जानाति स मन्त्रवित् । नाधयो व्याधयस्तस्य न भयं च सदा क्वचित् ॥ ८६॥ इति ते परमं गुह्यमाख्यातं कवचं परम् । तद्भजस्व महाभाग ततः सिद्धिमवाप्स्यसि ॥ ८७॥ इदं पवित्रं परमं पुण्यं कीर्तिविवर्धनम् । त्रिपुरायास्त्रिमूर्तेस्तु कवचं मयकोदितम् ॥ ८८॥ यः पठेत् प्रातरुत्थाय स प्राप्नोति मनोगतम् । लिखितं कवचं यस्तु कण्ठे गृह्वाति मन्त्रवित् ॥ ८९॥ न तस्य गात्रं कृन्तन्ति रणे शस्त्राणि भैरव । सङ्ग्रामे शास्त्रवादे च विजयस्तस्य जायते ॥ ९०॥ इदं कवचमज्ञात्वा यो जपेत् त्रिपुरां नरः । स शस्त्रघातमाप्नोति भैरवीं सुन्दरीमपि ॥ ९१॥ बीजमुच्चारयेत् स्वस्थो गतवाग्दोषनिश्चितः । संयोगबोधः प्रत्येकभेद-श्रवणगोचरः ॥ ९२॥ ॥ इति कालिकापुराणे पञ्चसप्ततितमाध्यायान्तर्गतं शिवप्रोक्तं त्रिपुराकवचं सम्पूर्णम् ॥

शिवप्रोक्तं त्रिपुराकवचम् का परिचय (Introduction)

'कवच' (Kavacham) का शाब्दिक अर्थ है 'दिव्य शरीर-रक्षा' या 'आध्यात्मिक कवच'। सनातन परम्परा में, कवच वे विशेष स्तोत्र होते हैं जिनके मंत्राक्षरों द्वारा साधक के शरीर के विभिन्न अंगों (अंग-न्यास) और उसके चारों ओर की दिशाओं (दिग्-बन्ध) को अभेद्य रूप से सुरक्षित किया जाता है। शिवप्रोक्तं त्रिपुराकवचम् (Shivaproktam Tripura Kavacham) एक ऐसा ही अत्यंत प्रामाणिक, शक्तिशाली और गोपनीय कवच है, जो अष्टादश महापुराणों में से एक, 'कालिकापुराण' (Kalika Purana) के ७५वें अध्याय से उद्धृत है।

'शिवप्रोक्तम्' का अर्थ है 'स्वयं भगवान शिव द्वारा कहा गया'। इस कवच का उपदेश भगवान शिव ने अपने भैरव स्वरूप को दिया था। भगवान शिव इसके आरंभ में ही (श्लोक ५२) कहते हैं— "कवचस्य च माहात्म्यमहं ब्रह्मा न केशवः । वक्तुं क्षमस्त्वनन्तोऽपि..." अर्थात् 'इस कवच की महिमा का वर्णन करने में न मैं, न ब्रह्मा, न केशव और न ही सहस्र जिह्वा वाले अनंत (शेषनाग) ही कभी सक्षम हो सकते हैं।' यह एक पंक्ति ही इस कवच की असीम और अकल्पनीय शक्ति को सिद्ध कर देती है।

यह कवच त्रिपुरसुन्दरी के 'त्रिपुरभैरवी' (Tripura Bhairavi) स्वरूप को समर्पित है, जो दशमहाविद्याओं में छठी महाविद्या हैं। त्रिपुरसुन्दरी जहाँ सौंदर्य और सृजन की सौम्य पराकाष्ठा हैं, वहीं त्रिपुरभैरवी प्रलय की अग्नि, तप और विध्वंसक शक्ति का उग्र रूप हैं। यही कारण है कि यह कवच अत्यंत तीव्र और तत्काल फलदायी माना जाता है। इस कवच की संरचना श्री विद्या के तीन प्रमुख बीजाक्षरों पर आधारित है, जिन्हें श्लोक ५६ में स्पष्ट किया गया है: वाग्भव (Vagbhava), कामराज (Kamaraja), और त्रैलोक्यमोहन (Trailokyamohana)। ये तीन बीज क्रमशः ज्ञान (सरस्वती), इच्छा (लक्ष्मी), और क्रिया (काली/भैरवी) शक्तियों के प्रतीक हैं।

इस कवच में अंग-न्यास, दिग्-बन्ध, और विविध तांत्रिक देवियों (जैसे भगसर्पिणी, भगमालिनी, अनङ्गकुसुमा) द्वारा रक्षा की प्रार्थना की गई है, जो इसे एक साधारण स्तोत्र से उठाकर एक पूर्ण तांत्रिक अनुष्ठान का रूप दे देती है। इसका सबसे महत्वपूर्ण श्लोक ९१ है, जिसमें एक कठोर चेतावनी दी गई है— "इदं कवचमज्ञात्वा यो जपेत् त्रिपुरां नरः । स शस्त्रघातमाप्नोति..." अर्थात् जो व्यक्ति इस कवच को जाने बिना त्रिपुरभैरवी या सुन्दरी का जप करता है, उसे सिद्धि के स्थान पर शस्त्र से आघात प्राप्त होता है। यह बात इस कवच की अनिवार्यता और इसकी शक्ति को दर्शाती है।

कवच का तांत्रिक महत्व और बीजाक्षर रहस्य (Significance)

यह कवच केवल रक्षा ही नहीं करता, बल्कि साधक के शरीर को एक 'यंत्र' में परिवर्तित कर देता है। यह श्री विद्या के मूल बीजाक्षरों को शरीर के चक्रों में स्थापित करता है।

श्लोक ५९ में इसका स्पष्ट न्यास-विधान है: "आधारे वाग्भवः पातु कामराजस्तथा हृदि । भ्रुवोर्मध्ये च शीर्षे च पातु त्रैलोक्यमोहनः ॥"

  • वाग्भव बीज (ऐं): आधार (मूलाधार चक्र) में स्थापित होकर ज्ञान और स्थायित्व की रक्षा करता है।
  • कामराज बीज (क्लीं): हृदय (अनाहत चक्र) में स्थापित होकर इच्छाओं, भावनाओं और प्राणों की रक्षा करता है।
  • त्रैलोक्यमोहन बीज (सौः): भ्रूमध्य (आज्ञा चक्र) और शीर्ष (सहस्रार चक्र) में स्थापित होकर बुद्धि, चेतना और आकर्षण शक्ति की रक्षा करता है।

इसके अतिरिक्त, श्लोक ८० में एक और अत्यंत गुह्य बीज-न्यास है: "हः पातु हृदि मां नित्यं सः शीर्षे पातु नित्यशः । रः पातु गुह्यदेशे मां सौः पातु कण्ठपार्श्वयोः ॥"। यह श्री विद्या की परा विद्या के बीजाक्षरों का न्यास है जो साधक के सूक्ष्म शरीर को अभिमंत्रित करता है। इस कवच में वर्णित देवियाँ (अनङ्गकुसुमा, अनङ्गमेखला, अनङ्गमदना आदि) श्रीचक्र की १५ नित्या देवियों के अंश हैं, जो काल और चक्रों पर नियंत्रण रखती हैं।

फलश्रुति और कवच के लाभ (Benefits from Phalasruti)

इस कवच की फलश्रुति कालिकापुराण में स्वयं भगवान शिव ने बताई है, जो इसे अचूक और असंदिग्ध बनाती है:

  • सर्व-भय से मुक्ति: श्लोक ८६ में कहा गया है— "नाधयो व्याधयस्तस्य न भयं च सदा क्वचित्" अर्थात् इसका पाठ करने वाले को कभी भी मानसिक चिंता (आधि), शारीरिक रोग (व्याधि) और किसी भी प्रकार का भय नहीं सताता।
  • शत्रुओं और शस्त्रों से रक्षा: श्लोक ९० में स्पष्ट वचन है— "न तस्य गात्रं कृन्तन्ति रणे शस्त्राणि भैरव" अर्थात् हे भैरव! युद्ध में किसी भी प्रकार का शस्त्र उसके शरीर को काट नहीं सकता।
  • वाद-विवाद और युद्ध में विजय: "सङ्ग्रामे शास्त्रवादे च विजयस्तस्य जायते" (श्लोक ९०)। यह कवच पाठ करने वाले को शास्त्रार्थ (Debate), न्यायालय (Court Case) और वास्तविक युद्धभूमि में निश्चित विजय दिलाता है।
  • अमोघ आकर्षण और वशीकरण: श्लोक ७५-७६ में आकर्षण और मोहन बाणों का उल्लेख है। यह कवच साधक के भीतर एक दिव्य आकर्षण शक्ति उत्पन्न करता है, जिससे सभी जीव-जंतु, मनुष्य और विरोधी भी उसके अनुकूल हो जाते हैं।
  • मनोकामनाओं की पूर्ति: "यः पठेत् प्रातरुत्थाय स प्राप्नोति मनोगतम्" (श्लोक ८९)। जो साधक प्रातःकाल उठकर इसका पाठ करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
  • ताबीज के रूप में धारण: "लिखितं कवचं यस्तु कण्ठे गृह्वाति" (श्लोक ८९)। यदि भोजपत्र पर अष्टगंध से लिखकर इस कवच को ताबीज में धारण किया जाए, तो यह एक अभेद्य रक्षा-कवच का कार्य करता है।

पाठ विधि और नियम (Ritual Method for Chanting)

यह एक अत्यंत उग्र और शक्तिशाली कवच है। इसका पाठ पूरी श्रद्धा, शुद्धि और नियमों के साथ करना चाहिए। विशेषकर श्लोक ९१ की चेतावनी को सदैव ध्यान में रखें।

  • पाठ से पूर्व: त्रिपुरभैरवी के मूल मंत्र का जप करने से पहले इस कवच का पाठ अनिवार्य रूप से करना चाहिए।
  • समय और दिशा: प्रातःकाल या रात्रि का समय इसके पाठ के लिए सर्वोत्तम है। पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके लाल आसन पर बैठें।
  • विनियोग: पाठ आरंभ करने से पहले हाथ में जल लेकर इसका विनियोग (ॐ त्रिपुराकवचस्यास्य...) अवश्य पढ़ें और जल भूमि पर छोड़ दें।
  • ध्यान: त्रिपुरभैरवी के उग्र स्वरूप (उगते सूर्य के समान कांति, गले में मुंडमाला, त्रिनेत्र, और अभय-वर मुद्रा) का ध्यान करें।
  • पाठ की संख्या: सामान्य सुरक्षा के लिए प्रतिदिन १ पाठ पर्याप्त है। घोर संकट, शत्रु बाधा या मुकदमों की स्थिति में इसके ३, ७ या ११ पाठ करने चाहिए।
  • गोपनीयता: भगवान शिव ने इसे 'परमं गुह्यम्' (अत्यंत गोपनीय) कहा है। अतः इसकी महिमा और अनुभव हर किसी के सामने प्रकट नहीं करने चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. शिवप्रोक्तं त्रिपुराकवचम् किस ग्रंथ से लिया गया है?

यह कवच प्रामाणिक ग्रंथ 'कालिकापुराण' के ७५वें अध्याय से लिया गया है और इसका उपदेश स्वयं भगवान शिव ने भैरव को दिया था।

2. 'त्रिपुरसुन्दरी' और 'त्रिपुरभैरवी' में क्या अंतर है?

त्रिपुरसुन्दरी (ललिता) दशमहाविद्या की सौम्य, सौंदर्य और सृजन स्वरूपा शक्ति हैं। त्रिपुरभैरवी उन्हीं का उग्र, प्रचंड और संहारक स्वरूप हैं, जो तप और प्रलय की अधिष्ठात्री हैं। यह कवच त्रिपुरभैरवी को समर्पित है।

3. इस कवच में वर्णित वाग्भव, कामराज और त्रैलोक्यमोहन बीज क्या हैं?

ये श्री विद्या के तीन प्रमुख बीजाक्षर हैं। वाग्भव (ऐं) ज्ञान, कामराज (क्लीं) इच्छा, और त्रैलोक्यमोहन (सौः) क्रिया और मोक्ष का प्रतीक है।

4. श्लोक 91 में दी गई चेतावनी का क्या अर्थ है?

श्लोक 91 में स्पष्ट चेतावनी है कि जो व्यक्ति इस कवच को जाने बिना त्रिपुरभैरवी का जप करता है, उसे रक्षा के स्थान पर हानि (शस्त्रघात) होती है। यह दर्शाता है कि देवी के उग्र मंत्रों का जप करने से पहले इस कवच से स्वयं को सुरक्षित करना अनिवार्य है।

5. क्या मैं इस कवच को गले में ताबीज के रूप में पहन सकता हूँ?

जी हाँ। श्लोक 89 के अनुसार, यदि इस कवच को भोजपत्र पर अष्टगंध की स्याही से लिखकर एक ताबीज में डालकर गले या दाहिनी भुजा में धारण किया जाए, तो यह एक शक्तिशाली शारीरिक रक्षा कवच का काम करता है।

6. क्या यह कवच मुकदमे (Court Case) में विजय दिला सकता है?

निश्चित रूप से। श्लोक 90 में कहा गया है— "सङ्ग्रामे शास्त्रवादे च विजयस्तस्य जायते" अर्थात् संग्राम (युद्ध) और शास्त्रवाद (तर्क/मुकदमा) में साधक की विजय होती है।

7. कवच के ऋषि, छंद और देवता कौन हैं?

विनियोग (श्लोक 54) के अनुसार, इस कवच के ऋषि 'दक्षिण' (भगवान दक्षिणामूर्ति शिव), छंद 'चित्रा' और देवता 'त्रिपुरभैरवी' हैं।

8. 'अनङ्गकुसुमा', 'अनङ्गमेखला' आदि कौन हैं?

ये श्रीचक्र के भीतरी आवरणों में स्थित १५ नित्या देवियों के नाम हैं। यह कवच उन सभी शक्तियों का आह्वान कर साधक को काल (समय) के चक्र से भी सुरक्षा प्रदान करता है।

9. क्या इस कवच के पाठ के लिए गुरु दीक्षा आवश्यक है?

चूँकि यह एक अत्यंत उग्र और गोपनीय तांत्रिक कवच है और इसमें बीजाक्षरों का स्पष्ट विधान है, इसलिए इसे किसी योग्य गुरु के मार्गदर्शन में प्राप्त करना और पाठ करना सबसे सुरक्षित और फलदायी होता है।

10. प्रातःकाल पाठ करने का क्या विशेष फल है?

श्लोक 89 के अनुसार, जो व्यक्ति प्रातःकाल उठकर इसका पाठ करता है, उसकी दिन की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और उसका पूरा दिन एक दिव्य सुरक्षा घेरे में बीतता है।