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Durga Saptashati Siddha Samput Mantra – ३०+ सिद्ध सम्पुट मन्त्र (Complete Guide)

Durga Saptashati Siddha Samput Mantra – ३०+ सिद्ध सम्पुट मन्त्र (Complete Guide)
॥ दुर्गा सप्तशती सिद्ध सम्पुट मन्त्र ॥ १. सामूहिक कल्याण के लिये देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूत्र्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥ २. विश्व के अशुभ तथा भय का विनाश करने के लिये यस्याः प्रभावमतुलं भगवाननन्तो ब्रह्मा हरश्च न हि वक्तुमलं बलं च। सा चण्डिकाखिलजगत्परिपालनाय नाशाय चाशुभभयस्य मतिं करोतु॥ ३. विश्व की रक्षा के लिये या श्रीः स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मीः पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धिः। श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा तां त्वां नताः स्म परिपालय देवि विश्वम्॥ ४. विश्व के अभ्युदय के लिये विश्वेश्वरि त्वं परिपासि विश्वं विश्वात्मिका धारयसीति विश्वम्। विश्वेशवन्द्या भवती भवन्ति विश्वाश्रया ये त्वयि भक्तिनम्राः॥ ५. विश्वव्यापी विपत्तियों के नाश के लिये देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य। प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य॥ ६. विश्व के पाप-ताप-निवारण के लिये देवि प्रसीद परिपालय नोऽरिभीते- र्नित्यं यथासुरवधादधुनैव सद्यः। पापानि सर्वजगतां प्रशमं नयाशु उत्पातपाकजनितांश्च महोपसर्गान्॥ ७. विपत्ति-नाश के लिये शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे। सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥ ८. विपत्तिनाश और शुभ की प्राप्ति के लिये करोतु सा नः शुभहेतुरीश्वरी शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः। ९. भय-नाश के लिये (क) सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते। भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥ (ख) एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रयभूषितम्। पातु नः सर्वभीतिभ्यः कात्यायनि नमोऽस्तु ते॥ (ग) ज्वालाकरालमत्युग्रमशेषासुरसूदनम्। त्रिशूलं पातु नो भीतेर्भद्रकालि नमोऽस्तु ते॥ १०. पाप-नाश के लिये हिनस्ति दैत्यतेजांसि स्वनेनापूर्य या जगत्। सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्योऽनः सुतानिव॥ ११. रोग-नाश के लिये रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्। त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति॥ १२. महामारी-नाश के लिये जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥ १३. आरोग्य और सौभाग्य की प्राप्ति के लिये देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ १४. सुलक्षणा पत्नी की प्राप्ति के लिये पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्। तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्॥ १५. बाधा-शान्ति के लिये सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि। एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्॥ १६. सर्वविध अभ्युदय के लिये ते सम्मता जनपदेषु धनानि तेषां तेषां यशांसि न च सीदति धर्मवर्गः। धन्यास्त एव निभृतात्मजभृत्यदारा येषां सदाभ्युदयदा भवती प्रसन्ना॥ १७. दारिद्र्यदुःखादिनाश के लिये दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि। दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदाऽऽर्द्रचित्ता॥ १८. रक्षा पाने के लिये शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके। घण्टास्वनेन नः पाहि चापज्यानिःस्वनेन च॥ १९. समस्त विद्याओं की और समस्त स्त्रियों में मातृभाव की प्राप्ति के लिये विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु। त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् का ते स्तुतिः स्तव्यपरा परोक्तिः॥ २०. सब प्रकार के कल्याण के लिये सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥ २१. शक्ति-प्राप्ति के लिये सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि। गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तु ते॥ २२. प्रसन्नता की प्राप्ति के लिये प्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्वार्तिहारिणि। त्रैलोक्यवासिनामीड्ये लोकानां वरदा भव॥ २३. विविध उपद्रवों से बचने के लिये रक्षांसि यत्रोग्रविषाश्च नागा यत्रारयो दस्युबलानि यत्र। दावानलो यत्र तथाब्धिमध्ये तत्र स्थिता त्वं परिपासि विश्वम्॥ २४. बाधामुक्त होकर धन-पुत्रादि की प्राप्ति के लिये सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वितः। मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः॥ २५. भुक्ति-मुक्ति की प्राप्ति के लिये विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम्। रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ २६. पापनाश तथा भक्ति की प्राप्ति के लिये नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे। रुपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥ २७. स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति के लिये सर्वभूता यदा देवी स्वर्गमुक्तिप्रदायिनी। त्वं स्तुता स्तुतये का वा भवन्तु परमोक्तयः॥ २८. स्वर्ग और मुक्ति के लिये सर्वस्य बुद्धिरुपेण जनस्य हृदि संस्थिते। स्वर्गापवर्गदे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥ २९. मोक्ष की प्राप्ति के लिये त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या विश्वस्य बीजं परमासि माया। सम्मोहितं देवि समस्तमेतत् त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः॥ ३०. स्वप्न में सिद्धि-असिद्धि जानने के लिये दुर्गे देवि नमस्तुभ्यं सर्वकामार्थसाधिके। मम सिद्धिमसिद्धिं वा स्वप्ने सर्वं प्रदर्शय॥

सिद्ध सम्पुट मन्त्र: दुर्गा सप्तशती का गोपनीय विज्ञान (Introduction)

सिद्ध सम्पुट मन्त्र (Siddha Samput Mantra) श्री दुर्गा सप्तशती का वह प्राण तत्व है, जो सामान्य पाठ को "अमोघ अनुष्ठान" में बदल देता है। 'सम्पुट' शब्द का अर्थ है—"एक बंद संदूक" या "वह पात्र जो दो हिस्सों से मिलकर बना हो"। तंत्र शास्त्र के अनुसार, जब हम किसी मूल मंत्र या पाठ के आगे और पीछे एक विशिष्ट प्रभावशाली मंत्र का योग करते हैं, तो वह 'सम्पुट' कहलाता है। यह प्रक्रिया मंत्र की ऊर्जा को केंद्रबिंदु पर बांध देती है और उसे बिखरने नहीं देती।

मार्कण्डेय पुराण के अंतर्गत वर्णित देवी माहात्म्य (चंडी पाठ) के ७०० श्लोक स्वयं में महामंत्र हैं, लेकिन उनमें से कुछ श्लोक ऐसे हैं जिन्हें ऋषियों ने "सिद्ध सम्पुट" के रूप में चिह्नित किया है। ये मंत्र परमाणु की तरह सूक्ष्म हैं लेकिन इनका प्रभाव ब्रह्मांडीय है। यदि आपके पास पूरी सप्तशती के १३ अध्यायों को पढ़ने का समय नहीं है, तो अपनी विशिष्ट समस्या के अनुसार इनमें से किसी एक मंत्र का १०८ बार जाप करना भी उतना ही फलदायी माना गया है।

सम्पुट पाठ का वैज्ञानिक पक्ष: ध्वनि विज्ञान (Cymatics) के अनुसार, जब हम सम्पुट लगाकर पाठ करते हैं, तो एक विशिष्ट "फ्रीक्वेंसी" निर्मित होती है। उदाहरण के लिए, यदि हम 'सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो...' मंत्र का सम्पुट लगाते हैं, तो हम सप्तशती के हर श्लोक की शक्ति को "बाधा निवारण" के संकल्प से जोड़ देते हैं। यह वैसा ही है जैसे एक सफेद रोशनी को किसी रंगीन फिल्टर से गुजारना—सम्पुट वह फिल्टर है जो सप्तशती की अनंत शक्ति को आपकी विशेष इच्छा (विवाह, धन, आरोग्य) की ओर मोड़ देता है।

पौराणिक कथाओं में राजा सुरथ और समाधि वैश्य ने इन्ही सिद्ध विधानों से अपना खोया हुआ राज्य और आत्मज्ञान प्राप्त किया था। "सिद्ध सम्पुट" का प्रयोग केवल भौतिक लाभ के लिए ही नहीं, बल्कि चित्त की शुद्धि और मोक्ष के लिए भी किया जाता है। ये मंत्र कलयुग के साधकों के लिए माँ जगदम्बा का अनमोल उपहार हैं, क्योंकि ये बहुत कम समय में "प्रचंड ऊर्जा" उत्पन्न करते हैं। इन मन्त्रों का संचयन तांत्रिक विद्वानों और गीता प्रेस जैसे प्रतिष्ठित आध्यात्मिक संस्थानों द्वारा प्रामाणिक रूप से किया गया है, ताकि भक्त बिना किसी संशय के अपनी साधना पूर्ण कर सकें।

मन्त्रों का विशिष्ट महत्व एवं दार्शनिक आधार (Significance)

सिद्ध सम्पुट मन्त्रों का महत्व उनकी "निशकीलन" (Unlocking) क्षमता में है। भगवान शिव ने सप्तशती को कीलित किया है, लेकिन ये मंत्र उस ताले की चाबी के समान हैं:

  • ब्रह्मास्त्र के समान अचूक: ये मंत्र "परा", "पश्यंती", "मध्यमा" और "वैखरी" चारों वाणियों को शुद्ध कर साधक की संकल्प शक्ति को बल देते हैं।
  • चतुर्वर्ग फल: ये मन्त्र धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों की सिद्धि में सहायक हैं।
  • विशिष्ट लक्ष्य भेदन: जहाँ साधारण पाठ सामान्य कल्याण के लिए है, वहीं सम्पुट पाठ "लेजर बीम" की तरह विशिष्ट लक्ष्य (जैसे कोर्ट केस जीतना या भयानक बीमारी से मुक्ति) पर वार करता है।
  • आत्म-रक्षा कवच: "शूलेन पाहि नो देवि..." जैसे मन्त्र साधक के चारों ओर एक अभेद्य सुरक्षा घेरा बना देते हैं।

सिद्ध मन्त्रों के चमत्कारी लाभ (Benefits)

इन ३०+ मन्त्रों के समूह में हर व्यक्ति की जरूरत के लिए समाधान है:
  • शीघ्र विवाह (Early Marriage): मंत्र १४ "पत्नीं मनोरमां देहि..." पुरुषों के लिए और कन्याओं के लिए "कात्यायनी महामाये..." (सूची में समाहित) विवाह बाधा को तत्काल काटता है।
  • रोग मुक्ति (Healing): मंत्र ११ "रोगानशेषानपहंसि..." का १०८ पाठ असाध्य रोगों में चमत्कारिक परिणाम देता है।
  • आर्थिक समृद्धि (Wealth): मंत्र १७ "दुर्गे स्मृता हरसि भीति..." दरिद्रता के भय का नाश कर ऐश्वर्य के द्वार खोलता है।
  • शत्रु और बाधा शांति: मंत्र १५ और २४ "सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो..." मुकदमों, कलह और गुप्त शत्रुओं से रक्षा करते हैं।
  • भक्ति और मोक्ष: मंत्र २९ माँ की प्रसन्नता और अंततः जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति सुनिश्चित करता है।

मन्त्र जप एवं सम्पुट पाठ विधि (Ritual Method)

इन मन्त्रों का उपयोग दो प्रकार से किया जा सकता है—स्वतंत्र जप या पाठ के साथ सम्पुट:

१.

स्वतंत्र जप विधि: अपनी समस्या से संबंधित मंत्र चुनें। संकल्प लें और लाल चंदन या रुद्राक्ष की माला से प्रतिदिन १०८ बार जप करें। ४१ या १०८ दिनों का अनुष्ठान सर्वोत्तम है।

२.

सम्पुट पाठ विधि (गहन): सप्तशती का पाठ करते समय, हर श्लोक से पहले और बाद में अपना चुना हुआ मंत्र बोलें। (उदाहरण: सम्पुट मंत्र + अध्याय का श्लोक + सम्पुट मंत्र)। यह विधि अत्यंत शक्तिशाली है और इसे गुरु मार्गदर्शन में करना बेहतर है।

३.

विशेष सामग्री: मन्त्र जप के दौरान देवी को लाल पुष्प (गुड़हल या गुलाब) अर्पित करें। मंगलवार और शुक्रवार को देवी की विशेष आरती करें।

४.

ब्रह्मचर्य और शुद्धि: अनुष्ठान के दौरान सात्विक भोजन करें, भूमि शयन करें और पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. क्या इन मन्त्रों का जाप बिना दीक्षा के कर सकते हैं?

हाँ, जन-कल्याण के लिए ये मन्त्र दुर्गा सप्तशती के ही अंग हैं। शुद्ध भाव और सात्विकता के साथ कोई भी श्रद्धालु इनका जाप कर सकता है।

2. सम्पुट पाठ करने में कितना समय लगता है?

सम्पुट पाठ में साधारण पाठ की तुलना में ३ से ४ गुना अधिक समय लगता है, क्योंकि हर श्लोक के साथ सम्पुट मंत्र दो बार बोला जाता है।

3. असाध्य रोगों के लिए कौन सा मन्त्र श्रेष्ठ है?

मन्त्र ११ "रोगानशेषानपहंसि..." असाध्य रोगों और शारीरिक कष्टों के लिए अचूक माना गया है। इसे १०८ बार नित्य जपें।

4. क्या स्त्रियाँ "पत्नीं मनोरमां देहि" मन्त्र का जाप कर सकती हैं?

नहीं, यह मन्त्र पुरुषों के लिए है। कन्याओं को सुयोग्य पति के लिए "कात्यायनी महामाये..." मन्त्र का जप करना चाहिए।

5. 'सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो' मन्त्र के क्या लाभ हैं?

यह मन्त्र (मन्त्र २४) धन, पुत्र, आरोग्य और हर प्रकार की सांसारिक बाधाओं को दूर करने के लिए सबसे अधिक प्रचलित और शक्तिशाली है।

6. क्या जप के लिए माला जरूरी है?

माला (रुद्राक्ष या लाल चंदन) संख्या गिनने और एकाग्रता के लिए सहायक है। यदि माला न हो तो कर-माला (उँगलियों) पर भी गिना जा सकता है।

7. 'स्वप्न में सिद्धि' जानने वाले मन्त्र का उपयोग कैसे करें?

मन्त्र ३० का सोने से पहले १०८ बार जाप करके देवी से प्रार्थना करें। यदि साधना शुद्ध है, तो देवी स्वप्न में मार्गदर्शन प्रदान करती हैं।

8. क्या एक साथ कई मन्त्रों का जाप कर सकते हैं?

बेहतर होगा कि एक बार में एक ही लक्ष्य चुनें और उससे संबंधित मन्त्र का अनुष्ठान करें। इससे ऊर्जा का केंद्रण सही रहता है।

9. 'सर्वमङ्गल मङ्गल्ये' मन्त्र का क्या महत्व है?

यह (मन्त्र २०) सप्तशती का सबसे प्रसिद्ध मन्त्र है। यह हर प्रकार के मंगल कार्य की शुरुआत और जीवन में सौभाग्य लाने के लिए अचूक है।

10. क्या पाठ के दौरान मूर्ति होना आवश्यक है?

मूर्ति या माँ का चित्र (नवदुर्गा या चामुण्डा रूप) होना एकाग्रता में सहायक है। यदि न हो, तो केवल ज्योति (दीपक) को माँ का स्वरूप मानकर पाठ कर सकते हैं।