श्री जीण माता चालीसा - Shree Jeen Mata Chalisa
Shree Jeen Mata Chalisa

॥ दोहा ॥
श्री गुरु पद सुमरण करूं, गौरी नंदन ध्याय।
वरणो माता जीण यश, चरणों शीश नवाय॥
झाँकी की अदभुद छवि, शोभा वर्णी न जाय।
जो नित सुमरे माय को, कष्ट दुर हो जाय॥
॥ चौपाई ॥
जय श्री जीणभक्त सुखकारी।
नमो नमो भक्तन हितकारी॥
दुर्गा की तुम हो अवतारा।
सकल कष्ट तु मेट हमारा॥
महाभयंकर तेज तुम्हारा।
महिषासुर सा दुष्ट संहारा॥
कंचन छत्र शिष पर सोहे।
देखत रूप चराचर मोहे॥
तुम क्षत्रीधर तनधर लिन्हां।
भक्तों के सब कारज किन्हां॥
महाशक्ति तुम सुन्दर बाला।
डरपत भूत प्रेत जम काला॥
ब्रहमा विष्णु शंकर ध्यावे।
ऋषि मुनि कोई पार न पावे॥
तुम गौरी तुम शारदा काली।
रमा लक्ष्मी तुम कपपाली॥
जगदम्बा भवरों की रानी।
मैया मात तू महाभवानी॥
सत पर तजे जीण तुम गेहा।
त्यागा सब से क्षण में नेहा॥
महातपस्या करनी ठानी।
हरष खास था भाई ज्ञानी॥
पिछे से आकर समझाई।
घर वापिस चल माँ की जाई॥
बहुत कही पर एक ना मानी।
तब हरसा यूँ उचरी बानी॥
मैं भी बाई घर नहीं जाऊँ।
तेरे साथ राम गुण गाऊँ॥
अलग अलग तप स्थल किन्हां।
रैन दिवस तप मैं चितदीन्हा॥
तुम तप कर दुर्गात्व पाया।
हरषनाथ भैरू बन छाया॥
वाहन सिंह खडक कर चमके।
महातेज बिजली सा दमके॥
चक्र गदा त्रिशूल विराजे।
भागे दुष्ट जब दुर्गा जागे॥
मुगल बादशाह चढकर आया।
सेना बहुत सजाकर लाया॥
भैरव का मंदिर तुड़वाया।
फिर वो इस मंदिर पर धाया॥
यह देख पुजारी घबराये।
करी स्तुति मात जगाये॥
तब माता तु भौरें छोडे।
सेना सहित भागे घोड़े॥
बल का तेज देख घबराया।
जा चरणों में शीश नवाया॥
क्षमा याचना किन्हीं भारी।
काट जीण मेरी सब बेमारी॥
सोने का वो छत्र चढ़ाया।
तेल सवामन और बंधाया॥
चमक रही कलयुग में माई।
तीन लोक में महिमा छाई॥
जो कोई तेरे मंदिर आवे।
सच्चे मन से भोग लगावे॥
रोली वस्त्र कपूर चढ़ावे।
मनवांछित पूर्ण फल पावे॥
करे आरती भजन सुनावे।
सो नर शोभा जग में पावे॥
शेखा वाटी धाम तुम्हारा।
सुन्दर शोभा नहीं सुम्हारा॥
अश्विन मास नौराता माही।
कई यात्री आवे जाही॥
देश-देश से आवे रेला।
चैत मास में लागे मेला॥
आवे ऊँट कार बस लारी।
भीड़ लगे मेला में भारी॥
साज-बाज से करते गाना।
कई मर्द और कई जनाना॥
जात झडुला चढे अपारा।
सवामणी का पाऊ न पारा॥
मदिरा में रहती मतवाली।
जय जगदम्बा जय महाकाली॥
जो कोई तुम्हरे दर्शन पावे।
मौज करे जुग-जुग सुख पावे॥
तुम्ही हमारी पितु और माता।
भक्ति शक्ति दो हे दाता॥
जीण चालीसा जो कोई गावे।
सो सत पाठ करे करवावे॥
मैया नैया पार लगावे।
सेवक चरणों में चित् लावे॥
॥ दोहा ॥
जय दुर्गा जय अंबिका जग जननी गिरी राय।
दया करो हे चंडिका विनऊ शीश नवाय॥
श्री गुरु पद सुमरण करूं, गौरी नंदन ध्याय।
वरणो माता जीण यश, चरणों शीश नवाय॥
झाँकी की अदभुद छवि, शोभा वर्णी न जाय।
जो नित सुमरे माय को, कष्ट दुर हो जाय॥
॥ चौपाई ॥
जय श्री जीणभक्त सुखकारी।
नमो नमो भक्तन हितकारी॥
दुर्गा की तुम हो अवतारा।
सकल कष्ट तु मेट हमारा॥
महाभयंकर तेज तुम्हारा।
महिषासुर सा दुष्ट संहारा॥
कंचन छत्र शिष पर सोहे।
देखत रूप चराचर मोहे॥
तुम क्षत्रीधर तनधर लिन्हां।
भक्तों के सब कारज किन्हां॥
महाशक्ति तुम सुन्दर बाला।
डरपत भूत प्रेत जम काला॥
ब्रहमा विष्णु शंकर ध्यावे।
ऋषि मुनि कोई पार न पावे॥
तुम गौरी तुम शारदा काली।
रमा लक्ष्मी तुम कपपाली॥
जगदम्बा भवरों की रानी।
मैया मात तू महाभवानी॥
सत पर तजे जीण तुम गेहा।
त्यागा सब से क्षण में नेहा॥
महातपस्या करनी ठानी।
हरष खास था भाई ज्ञानी॥
पिछे से आकर समझाई।
घर वापिस चल माँ की जाई॥
बहुत कही पर एक ना मानी।
तब हरसा यूँ उचरी बानी॥
मैं भी बाई घर नहीं जाऊँ।
तेरे साथ राम गुण गाऊँ॥
अलग अलग तप स्थल किन्हां।
रैन दिवस तप मैं चितदीन्हा॥
तुम तप कर दुर्गात्व पाया।
हरषनाथ भैरू बन छाया॥
वाहन सिंह खडक कर चमके।
महातेज बिजली सा दमके॥
चक्र गदा त्रिशूल विराजे।
भागे दुष्ट जब दुर्गा जागे॥
मुगल बादशाह चढकर आया।
सेना बहुत सजाकर लाया॥
भैरव का मंदिर तुड़वाया।
फिर वो इस मंदिर पर धाया॥
यह देख पुजारी घबराये।
करी स्तुति मात जगाये॥
तब माता तु भौरें छोडे।
सेना सहित भागे घोड़े॥
बल का तेज देख घबराया।
जा चरणों में शीश नवाया॥
क्षमा याचना किन्हीं भारी।
काट जीण मेरी सब बेमारी॥
सोने का वो छत्र चढ़ाया।
तेल सवामन और बंधाया॥
चमक रही कलयुग में माई।
तीन लोक में महिमा छाई॥
जो कोई तेरे मंदिर आवे।
सच्चे मन से भोग लगावे॥
रोली वस्त्र कपूर चढ़ावे।
मनवांछित पूर्ण फल पावे॥
करे आरती भजन सुनावे।
सो नर शोभा जग में पावे॥
शेखा वाटी धाम तुम्हारा।
सुन्दर शोभा नहीं सुम्हारा॥
अश्विन मास नौराता माही।
कई यात्री आवे जाही॥
देश-देश से आवे रेला।
चैत मास में लागे मेला॥
आवे ऊँट कार बस लारी।
भीड़ लगे मेला में भारी॥
साज-बाज से करते गाना।
कई मर्द और कई जनाना॥
जात झडुला चढे अपारा।
सवामणी का पाऊ न पारा॥
मदिरा में रहती मतवाली।
जय जगदम्बा जय महाकाली॥
जो कोई तुम्हरे दर्शन पावे।
मौज करे जुग-जुग सुख पावे॥
तुम्ही हमारी पितु और माता।
भक्ति शक्ति दो हे दाता॥
जीण चालीसा जो कोई गावे।
सो सत पाठ करे करवावे॥
मैया नैया पार लगावे।
सेवक चरणों में चित् लावे॥
॥ दोहा ॥
जय दुर्गा जय अंबिका जग जननी गिरी राय।
दया करो हे चंडिका विनऊ शीश नवाय॥
संबंधित ग्रंथ पढ़ें
श्री जीण माता चालीसा का परिचय एवं महत्व
श्री जीण माता चालीसा, राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र की पूज्य देवी,
श्री जीण माता को समर्पित है। उन्हें माँ दुर्गा का अवतार
माना जाता है। लोक कथाओं के अनुसार, वे धांधू (चुरू) के एक चौहान राजा
की पुत्री थीं और उनके भाई का नाम हर्ष था। अपनी भाभी के साथ हुए एक मनमुटाव
के कारण वे घर त्याग कर अरावली की पहाड़ियों में तपस्या करने चली गईं।
उनके भाई हर्ष ने उन्हें मनाने का बहुत प्रयास किया, लेकिन जब वे नहीं
मानीं, तो वे भी पास की पहाड़ी पर भैरव के रूप में तपस्या करने लगे। माँ
जीण की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर देवी दुर्गा ने उन्हें अपनी शक्ति
प्रदान की। यह चालीसा माँ के इसी शक्तिशाली और चमत्कारी स्वरूप का गुणगान
करती है।
जीण माता चालीसा पाठ के विस्तृत लाभ
इस चालीसा का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से माँ जीण की असीम कृपा प्राप्त
होती है, जिसके अनेक लाभ हैं:
- शत्रुओं और संकटों से रक्षा (Protection from Enemies and Dangers): चालीसा में वर्णित है कि कैसे माँ ने मुगल बादशाह औरंगजेब की सेना पर भंवरों (मधुमक्खियों) का झुंड छोड़कर अपने मंदिर की रक्षा की थी। इसी कारण उन्हें 'भंवरों की रानी' भी कहा जाता है। उनका पाठ भक्तों को सभी प्रकार के शत्रुओं और संकटों से बचाता है।
- मनोकामनाओं की पूर्ति (Fulfillment of Wishes): "जो कोई तेरे मंदिर आवे। सच्चे मन से भोग लगावे॥ ... मनवांछित पूर्ण फल पावे।" जो भी भक्त सच्चे मन से उनके दरबार में आता है और पूजा-अर्चना करता है, माँ उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं।
- सुख और सौभाग्य की प्राप्ति (Attainment of Happiness and Good Fortune): "जो कोई तुम्हरे दर्शन पावे। मौज करे जुग-जुग सुख पावे॥" माँ के दर्शन और इस चालीसा का पाठ करने से जीवन में सुख और सौभाग्य की वृद्धि होती है।
- भक्ति और शक्ति का वरदान (Blessings of Devotion and Strength): भक्त माँ से प्रार्थना करता है, "भक्ति शक्ति दो हे दाता"। माँ अपने उपासकों को आंतरिक शक्ति और भक्ति का अनमोल वरदान प्रदान करती हैं।
पाठ करने की विधि
- माँ जीण की पूजा के लिए नवरात्रि के दिन विशेष रूप से शुभ होते हैं, जैसा कि चालीसा में उल्लेख है: "अश्विन मास नौराता माही... चैत मास में लागे मेला"।
- प्रातःकाल स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर पूजा स्थल पर माँ जीण की तस्वीर स्थापित करें।
- उनके समक्ष घी का दीपक जलाएं और उन्हें लाल चुनरी व पुष्प अर्पित करें।
- भोग के रूप में उन्हें मीठे पकवान और विशेषकर मदिरा के कुछ बूंदें चढ़ाने की भी परंपरा है ("मदिरा में रहती मतवाली")।
- पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ चालीसा का पाठ करें और अंत में माँ की आरती करें।