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विज्ञान भैरव तंत्र: विधियाँ 81-85 - सर्वशक्तिमान और अद्वैत | भाग 17

आप सीमित व्यक्ति नहीं, बल्कि असीमित शक्ति का विस्तार हैं। विज्ञान भैरव तंत्र के इस सत्रहवें भाग में, भगवान शिव हमें सर्वव्यापकता (Omnipresence), अद्वैत (Non-duality) और शून्य (Void) के माध्यम से अपनी असली पहचान का अनुभव कराते हैं।
विज्ञान भैरव तंत्र: विधियाँ 81-85 - सर्वशक्तिमान और अद्वैत | भाग 17
विज्ञान भैरव तंत्र: अद्वैत और एकता

विज्ञान भैरव तंत्र (Vigyan Bhairav Tantra) के इस 17वें भाग (विधियाँ 81-85) में, भगवान शिव (Lord Shiva) हमें हमारी असली पहचान याद दिलाते हैं। हम बचपन से सुनते आए हैं कि हम 'कमजोर' हैं, 'सीमित' हैं। हमारा नाम, हमारा शरीर और हमारी सामाजिक पहचान ही हम मान लेते हैं।

ये विधियाँ हमें 'व्यक्तिगत सीमाओं' और अहंकार को तोड़ने की कला सिखाती हैं। भैरव (Bhairav) कहते हैं: अपने आप को छोटा मत समझो। तुम सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान हो। यह कोई अहंकार की बात नहीं है, बल्कि यह जानना है कि हमारे भीतर की चेतना (Consciousness) और इस ब्रह्मांड की चेतना एक ही है। जैसे एक बूँद समुद्र से अलग नहीं है, वैसे ही तुम शिव से अलग नहीं हो।

"समुद्र की लहर कितनी भी छोटी क्यों न हो, वह पानी ही है। वैसे ही तुम कितने भी छोटे क्यों न लगो, तुम शिव (Shiva) ही हो।"

विधि 81: मैं सर्वव्यापी हूँ

"दृढेन मनसा दृष्ट्या नान्येक्षिण्या सुखी भवेत् ॥ (श्लोक १०४)"

अर्थ: अपने शरीर के प्रति आसक्ति का त्याग करके, दृढ़ मन से यह भावना करें: "मैं सब जगह हूँ"। जब दृष्टि किसी और (सीमित वस्तु) को नहीं देखती, केवल उस सर्वव्यापकता को देखती है, तब परम सुख की प्राप्ति होती है।

विधि की सरल व्याख्या

हम हमेशा खुद को अपने शरीर तक सीमित मानते हैं। "यह मेरा हाथ है, यह मेरा पैर है, यहाँ मैं खत्म होता हूँ।" तंत्र (Tantra) कहता है, इस सोच को छोड़ो।

आँखें बंद करें और महसूस करें कि आप केवल इस शरीर में नहीं हैं। आप उस कुर्सी में हैं जिस पर आप बैठे हैं, आप उस हवा में हैं जो आप साँस ले रहे हैं, आप दीवारों में हैं, आप आकाश में हैं। जैसे सुगन्ध फूल से निकलकर हवा में फैल जाती है, वैसे ही अपनी चेतना (Consciousness) को फैलाएं।

प्रयोग कैसे करें:

जब आप यह दृढ़ता से मानते हैं कि "मैं सर्वत्र हूँ", तो आपके जीवन से भय और चिंता अपने आप गायब हो जाती है। क्योंकि भय हमेशा 'दूसरे' से होता है। जब 'दूसरा' कोई है ही नहीं, सब 'मैं' ही हूँ, तो डर कैसा?

विज्ञान और मनोविज्ञान (Science & Psychology)

Spatial Awareness: यह विधि हमारे मस्तिष्क की स्थान संबंधी जागरूकता (Spatial Awareness) को बदलती है। सामान्यतः हमारा मस्तिष्क हमारे शरीर को ही 'स्वयं' मानता है। लेकिन गहरे ध्यान (Meditation) में, मस्तिष्क के उस हिस्से की सक्रियता कम हो जाती है जो शरीर और वातावरण में भेद करता है। इसे मनोविज्ञान में "अहंकार का विस्तार" या "ब्रह्मांडीय चेतना" (Cosmic Consciousness) कहा जा सकता है। इससे अवसाद और अकेलेपन की भावना में भारी कमी आती है।

विधि 82: इच्छा भी सर्वव्यापी है

"घटादौ यच्च विज्ञानमिच्छाद्यं वा ममान्तरे। नैव सर्वगतं जातं भावयन्निति सर्वगः ॥ (श्लोक १०५)"

अर्थ: घड़े आदि वस्तुओं का ज्ञान या इच्छा आदि की अनुभूति, केवल मेरे भीतर ही नहीं, बल्कि सर्वत्र अन्य प्राणियों में भी व्याप्त है—ऐसा चिंतन करते हुए, योगी सर्वव्यापी हो जाता है।

विधि की सरल व्याख्या

हम सोचते हैं, "मुझे भूख लगी है", "मुझे यह चाहिए"। हम अपनी इच्छाओं और ज्ञान को 'निजी' मानते हैं। शिव (Shiva) कहते हैं, यह निजी नहीं है, सार्वभौमिक है।

जब आपको प्यास लगे, तो सोचें—यह प्यास सिर्फ 'मेरी' नहीं है। यह प्यास हर उस प्राणी की है जिसे पानी चाहिए। जब आप ज्ञान प्राप्त करते हैं, तो समझें कि यह ज्ञान ब्रह्मांड का ज्ञान है जो आपके माध्यम से प्रकट हो रहा है।

प्रयोग कैसे करें:

अपनी अनुभूतियों को व्यक्तिगत मानने के बजाय, उन्हें अस्तित्व की सामान्य घटना मानें। इससे आपके मन का बोझ हल्का हो जाएगा। आप अपनी समस्याओं को इतना व्यक्तिगत लेना बंद कर देंगे।

विज्ञान और मनोविज्ञान (Science & Psychology)

Shared Humanity: यह दृष्टिकोण हमें (Collective Unconscious) यानी सामूहिक अवचेतन के करीब ले जाता है। आधुनिक मनोविज्ञान भी मानता है कि हमारी कई भावनाएं और प्रवृत्तियां व्यक्तिगत नहीं, बल्कि विकासवादी और साझा होती हैं। इसे समझने से व्यक्ति अपने दुखों में अकेला महसूस नहीं करता, जिससे मानसिक स्वास्थ्य बेहतर रहता है। इसे हम "साझा मानवता" (Shared Humanity) का भाव भी कह सकते हैं।

विधि 83: द्रष्टा और दृश्य का संबंध

"ग्राह्यग्राहकसम्वित्तिः सामान्या सर्वदेहिनाम्। योगिनां तु विशेषोऽस्ति सम्बन्धे सावधानता ॥ (श्लोक १०६)"

अर्थ: विषय (जिससे देखा जाए) और विषयी (देखने वाला) की चेतना सभी प्राणियों में समान है। लेकिन योगियों में विशेष बात यह है कि वे इन दोनों के 'संबंध' के प्रति हमेशा सावधान (जागरूक) रहते हैं।

विधि की सरल व्याख्या

आम इंसान किसी सुंदर वस्तु को देखता है और उसमें खो जाता है। वह वस्तु (दृश्य) महत्वपूर्ण हो जाती है। योगी भी उसी वस्तु को देखता है, लेकिन वह उस "देखने की प्रक्रिया" पर ध्यान देता है।

भैरव (Bhairav) कह रहे हैं कि महत्वपूर्ण न तो 'मैं' (देखने वाला) हूँ और न ही 'वस्तु' (जिसे देखा जा रहा है)। महत्वपूर्ण है वह 'चेतना' जो दोनों को जोड़ रही है।

प्रयोग कैसे करें:

अगली बार जब आप किसी फूल को देखें, तो फूल पर ध्यान न दें, न ही खुद पर। उस अदृश्य कड़ी पर ध्यान दें जो आपकी आँखों और फूल के बीच बनी है। वही संबंध वास्तविक योग (Yoga) है।

विज्ञान और मनोविज्ञान (Science & Psychology)

Observer Effect: क्वांटम भौतिकी (Quantum Physics) में इसे 'प्रेक्षक प्रभाव' (Observer Effect) के रूप में समझा जा सकता है। देखने वाला और दृश्य अलग नहीं हैं; देखने की क्रिया ही दृश्य को प्रभावित करती है। जब हम इस संबंध के प्रति जागरूक होते हैं, तो हम (Mindfulness) की गहन अवस्था में होते हैं, जहाँ द्वैत (Duality) टूटने लगता है।

विधि 84: दूसरों में अपनी चेतना देखना

"स्ववदन्यशरीरेऽपि सम्वित्तिं अनुभावयेत्। अपेक्षां स्वशरीरस्य त्यक्त्वा व्यापी दिनैर् भवेत् ॥ (श्लोक १०७)"

अर्थ: जैसे अपने शरीर में चेतना का अनुभव होता है, वैसे ही दूसरों के शरीरों में भी उसी चेतना का अनुभव करें। अपने शरीर की आसक्ति छोड़कर, योगी इस अभ्यास से सर्वव्यापी हो जाता है।

विधि की सरल व्याख्या

यह करुणा (Compassion) की सर्वोच्च विधि है। जब आप किसी से मिलें—चाहे मित्र हो या शत्रु—तो यह सोचें: "इसके अंदर भी वही 'मैं' है जो मेरे अंदर है।"

जैसे बिजली एक ही होती है, भले ही वह अलग-अलग बल्बों में जल रही हो। वैसे ही आत्मा (Soul) एक ही है, भले ही शरीर अलग-अलग हों।

प्रयोग कैसे करें:

जब आप अभ्यास करते हैं कि "दूसरे का शरीर भी मेरा ही विस्तार है", तो ईर्ष्या, घृणा और हिंसा असंभव हो जाती है। आप किसी और को चोट कैसे पहुँचा सकते हैं अगर वह आप ही का हिस्सा है?

विज्ञान और मनोविज्ञान (Science & Psychology)

Mirror Neurons: यह विधि (Mirror Neurons) की कार्यप्रणाली पर आधारित है। हमारे मस्तिष्क में ऐसे सेल होते हैं जो दूसरों के दर्द या खुशी को महसूस करते हैं। जितना हम इस एकता का अभ्यास करते हैं, हमारी 'सहानुभूति' (Empathy) उतनी ही बढ़ती है, जो भावनात्मक बुद्धिमत्ता (Emotional Intelligence) का आधार है।

विधि 85: निराधार मन (भैरव अवस्था)

"निराधारं मनः कृत्वा विकल्पान्न विकल्पयेत्। तदात्मपरमात्मत्वे भैरवो मृगलोचने ॥ (श्लोक १०८)"

अर्थ: हे मृगनयनी! मन को सभी आधारों से मुक्त करके (निराधार करके), किसी भी विचार या विकल्प को मन में न आने दें। तब जीवात्मा परमात्मा होकर स्वयं 'भैरव' (Bhairav) हो जाता है।

विधि की सरल व्याख्या

हमारा मन हमेशा किसी न किसी 'सहारे' (Support) पर टिका होता है—कोई विचार, कोई याद, कोई योजना, या कोई बाहरी वस्तु। शिव (Shiva) कहते हैं: मन के सारे सहारे खींच लो।

कुछ मत सोचो। किसी चीज़ पर ध्यान मत लगाओ। बस खाली हो जाओ। शून्य में लटक जाओ। जब मन के पास टिकने के लिए कोई जगह नहीं बचती, तो वह गिर जाता है, नष्ट हो जाता है।

प्रयोग कैसे करें:

और जो शेष बचता है, वह शुद्ध चेतना (Consciousness) है, वह भैरव (Bhairav) है। यह स्थिति डरावनी लग सकती है क्योंकि हमें 'पकड़' कर रखने की आदत है, लेकिन यही सच्ची मुक्ति है।

विज्ञान और मनोविज्ञान (Science & Psychology)

Default Mode Network (DMN): मस्तिष्क विज्ञान में इसे (Default Mode Network - DMN) का शांत होना कहते हैं। जब हम कुछ नहीं कर रहे होते, तब भी हमारा मन विचारों की जुगाली करता रहता है। ध्यान (Meditation) की इस गहन अवस्था में यह 'बकबक' बंद हो जाती है, जिससे परम विश्रांति और स्पष्टता प्राप्त होती है। इसे 'शून्य अवस्था' (Zero State) भी कहा जा सकता है।

निष्कर्ष: तुम ही वो हो (Tat Tvam Asi)

ये 5 विधियाँ (81-85) विज्ञान भैरव तंत्र (Vigyan Bhairav Tantra) का सार हैं। शिव (Shiva) हमें भिखारी से राजा बनाना चाहते हैं। वह कहते हैं: अपनी शक्तियों को पहचानो। तुम कोई छोटे-मोटे जीव नहीं हो, तुम साक्षात शिव (Shiva) स्वरूप हो। इस विश्वास के साथ जीना ही 'साधना' है।

जब आप इन विधियों का अभ्यास करेंगे, तो धीरे-धीरे आप पाएंगे कि दुनिया नहीं बदली है, लेकिन दुनिया को देखने वाली आपकी आँखें बदल गई हैं। और जब दृष्टि बदलती है, तो सृष्टि बदल जाती है।

"शिव (Shiva) को बाहर मत ढूँढो। आईने में देखो, वही शिव (Shiva) है।"

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