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विज्ञान भैरव तंत्र: विधियाँ 66-70 - इंद्रिय निरोध और 'अ' की शक्ति | भाग 14

इंद्रियों के द्वार बंद करने पर ही भीतर का द्वार खुलता है। विज्ञान भैरव तंत्र के इस चौदहवें भाग में, भगवान शिव हमें प्रत्याहार (Blocking Senses), अ-कार (Primal Sound) और शून्य (Void) के माध्यम से आंतरिक जागरण की कला सिखाते हैं।
विज्ञान भैरव तंत्र: विधियाँ 66-70 - इंद्रिय निरोध और 'अ' की शक्ति | भाग 14
विज्ञान भैरव तंत्र: इंद्रिय निरोध

विज्ञान भैरव तंत्र (Vigyan Bhairav Tantra) के इस 14वें भाग में, हम विधियों 66 से 70 का पता लगाएंगे। ये विधियाँ हमारे ध्यान को बाहर से हटाकर भीतर की ओर मोड़ने (Inward Turning) के लिए डिज़ाइन की गई हैं।

हम अपनी इंद्रियों (आंख, कान, नाक) के माध्यम से लगातार बाहरी दुनिया से जुड़े रहते हैं। शिव (Shiva) यहाँ हमें सिखाते हैं कि कैसे इन दरवाजों को बंद करके, या ध्वनि (Sound) की सूक्ष्म तरंगों पर सवार होकर, हम उस स्रोत तक पहुँच सकते हैं जहाँ से चेतना (Consciousness) पैदा होती है।

"जब बाहर का शोर बंद होता है, तभी भीतर का संगीत सुनाई देता है।"

विधि 66: इंद्रिय अवरोध (Pratyahara - Blocking the Senses)

"यस्य कस्येन्द्रियस्यापि व्याघाताच्च निरोधतः। प्रविश्य अद्वयं शून्यं तत्रैवात्मा प्रकाशते॥ ८९॥"

अर्थ: किसी भी इंद्रिय (जैसे कान या आँख) को अचानक रोकने या दबाने (Blocking/Stopping) से, साधक अद्वैत शून्य (Non-dual Void) में प्रवेश कर जाता है। उस अवरोध के क्षण में ही आत्मा का वास्तविक स्वरूप प्रकाशित हो उठता है।

विधि की विस्तृत व्याख्या

पतंजलि के योग सूत्रों में इसे 'प्रत्याहार' (Pratyahara) कहा गया है, जिसका अर्थ है 'इंद्रियों का भोजन वापस लेना'। हमारी ऊर्जा लगातार इंद्रियों के माध्यम से बाहर बह रही है, जैसे एक छेद वाली बाल्टी से पानी। शिव कहते हैं: उस छेद को अचानक बंद कर दो।

जब आप कानों में उंगलियां डालकर आवाज को पूरी तरह रोक देते हैं, तो जो ऊर्जा बाहर जा रही थी, वह अचानक पीछे हटती है (Recoils)। चूंकि उसे बाहर जाने का रास्ता नहीं मिलता, वह भीतर केंद्र की ओर मुड़ जाती है। यह 'टक्कर' (Impact) आपको तुरंत अपने भीतर फेंक देती है।

प्रयोग कैसे करें:

अपनी तर्जनी उंगलियों से दोनों कानों को जोर से बंद करें ताकि बाहर की कोई आवाज न आए। अपनी आंखें और मुंह भी बंद रखें। अब आप केवल अपनी आंतरिक ध्वनियों (जैसे दिल की धड़कन या रक्त प्रवाह) को सुनेंगे। कुछ समय बाद, वह भी शांत हो जाएगा और आप एक गहरे सन्नाटे (Deep Silence) में गिर जाएंगे।

विज्ञान और मनोविज्ञान (Science & Psychology)

Sensory Deprivation & Neural Plasticity: जब मस्तिष्क को संवेदी इनपुट (Sensory Input) नहीं मिलता, तो वह अपनी गतिविधि को बदल देता है। इसे 'Sensory Deprivation' कहते हैं। यह अवस्था मस्तिष्क को Theta Waves में ले जाती है, जो गहरी समाधि और उपचार के लिए जिम्मेदार हैं। यह 'Reticular Activating System' (RAS) को आराम देता है, जो हमें सतर्क रखता है, जिससे हम तुरंत 'Fight or Flight' मोड से बाहर आ जाते हैं।

विधि 67: अ-कार का जप (The Primal Sound 'A')

"अबिन्दुमविसर्गं च अकारं जपतो महान्। उदेति देवि सहसा ज्ञानौघः परमेश्वरः॥ ९०॥"

अर्थ: हे देवी! जो साधक बिना बिन्दु (नकारात्मक अनुनासिक 'ं') और बिना विसर्ग (हवा छोड़ने वाली ध्वनि 'ः') के, केवल शुद्ध 'अ' (A) अक्षर का जप करता है, उसके भीतर अचानक ज्ञान का महान प्रवाह (Great Flood of Knowledge) और परमेश्वर का उदय होता है।

विधि की विस्तृत व्याख्या

हम मंत्रों में अक्सर 'ॐ' या 'ह्रीं' का उपयोग करते हैं, जिनमें अंत में 'म' या विसर्ग होता है। लेकिन शिव यहाँ सबसे बुनियादी ध्वनि, 'अ' (Aaa) की बात कर रहे हैं।

'अ' सभी अक्षरों की जननी है। जब आप मुंह खोलते हैं और आवाज निकालते हैं, तो सबसे पहले 'अ' निकलता है। इसमें जीभ या होंठों का कोई प्रयास नहीं लगता। यह अस्तित्व की पहली पुकार है।

प्रयोग कैसे करें:

आराम से बैठें। मुंह थोड़ा खोलें और 'अ' (Aaaa...) की ध्वनि करें। इसे नथुनों से (Nasal) न निकालें, न ही अंत में झटका दें। बस एक निरंतर, शुद्ध प्रवाह। महसूस करें कि यह ध्वनि आपकी नाभि (Navel) से उठ रही है और पूरे शरीर में गूंज रही है। यह आपको शब्दों से पहले की दुनिया में ले जाएगा।

विज्ञान और मनोविज्ञान (Science & Psychology)

Vagus Nerve Stimulation: 'अ', 'ओ', 'म' जैसे स्वरों (Vowels) का उच्चारण करने से स्वर रज्जु (Vocal Cords) में कंपन होता है, जो सीधे Vagus Nerve को उत्तेजित करता है। यह तंत्रिका हमारे शरीर को 'विश्राम और पचओ' (Rest and Digest) मोड में लाती है। मनोविज्ञान में इसे 'Vocal Toning' थेरेपी कहा जाता है, जो दमित भावनाओं (Repressed Emotions) को बाहर निकालने और नर्वस सिस्टम को रेगुलेट करने का अचूक उपाय है।

विधि 68: विसर्ग का अंत (End of the Breath-Sound)

"वर्णस्य सविसर्गस्य विसर्गान्तं चितिं कुरु। निराधारेण चित्तेन स्पृशेद्ब्रह्म सनातनम्॥ ९१॥"

अर्थ: किसी मंत्र या वर्ण के अंत में जो विसर्ग (हवा निकलने की ध्वनि जैसे 'हः') होता है, उसके अंतिम बिंदु पर अपनी चेतना (Awareness) को एकाग्र करो। जब वह ध्वनि शांत हो जाती है, और मन निराधार (Supportless) हो जाता है, तब साधक सनातन ब्रह्म (Eternal Absolute) को स्पर्श करता है।

विधि की विस्तृत व्याख्या

यह विधि ध्वनि से 'शून्य' में कूदने की कला है। विसर्ग का अर्थ है 'छोड़ना' (Letting go)। जब हम सांस छोड़ते हैं तो स्वाभाविक रूप से 'ह' की ध्वनि होती है।

शब्दों और मंत्रों की अपनी शक्ति होती है, लेकिन असली शक्ति उस 'अंतराल' (Gap) में है जहाँ ध्वनि समाप्त होती है और चुप्पी शुरू होती है। शिव कहते हैं: ध्वनि का पीछा करो, और देखो कि वह कहाँ गायब हो जाती है। ठीक उसी बिंदु पर, जहाँ ध्वनि मरती है, ब्रह्म प्रकट होता है।

प्रयोग कैसे करें:

'आह' (Ah) या 'नमः' (Namah) जैसा कोई शब्द बोलें। अंत में जो 'ह' (h) की ध्वनि बचती है, उस पर पूरा ध्यान दें। वह धीरे-धीरे कम होती जाएगी... और कम... और फिर सन्नाटा। उस सन्नाटे को पकड़ें। वह केवल ध्वनि का अभाव नहीं है, वह पूर्णता (Fullness) है।

विज्ञान और मनोविज्ञान (Science & Psychology)

Auditory Fading & Attention: जब हम किसी ध्वनि के 'फेड' (Fade out) होने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो हमारा मस्तिष्क अत्यधिक सतर्क (Alert) हो जाता है। इसे 'Sustained Attention' कहते हैं। जैसे-जैसे ध्वनि सूक्ष्म होती है, मस्तिष्क की तरंगें Beta (सक्रिय) से Alpha और फिर Theta (गहन ध्यान) की ओर शिफ्ट होती हैं। यह प्रक्रिया विचारों के निरंतर प्रवाह (Stream of Consciousness) को तोड़ने के लिए बहुत प्रभावी है।

विधि 69: आकाश सा अनंत (Boundless as Sky)

"व्योमाकारं स्वमात्मानम् ध्यायेद्दिग्भिरनावृतम्। निराश्रया चितिः शक्तिः स्वरूपं दर्शयेत्तदा॥ ९२॥"

अर्थ: साधक को अपने आत्मा (Self) का ध्यान इस प्रकार करना चाहिए जैसे कि वह आकाश (Sky) के समान है—सभी दिशाओं में अनावृत (Unlimited/Uncovered)। जब मन का कोई भी आधार (Support) नहीं रहता, तब चेतना शक्ति (Shakti) अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट कर देती है।

विधि की विस्तृत व्याख्या

हम अपने आप को एक छोटे से शरीर, एक नाम, और एक पते में कैद करके रखते हैं। यह 'सीमा' ही हमारे दुख का कारण है। आकाश की कोई दीवार नहीं होती, कोई छत नहीं होती।

शिव कहते हैं: अपनी सीमाओं को तोड़ दो। कल्पना करो कि तुम शरीर नहीं, बल्कि अंतहीन आकाश हो। उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम—कहीं कोई रुकावट नहीं है। जब मन के पास टिकने के लिए कोई 'दीवार' (Thought or Object) नहीं बचती, तो वह गिर जाता है। और जो बचता है, वह तुम हो।

प्रयोग कैसे करें:

किसी खुली जगह या छत पर लेट जाएं। नीले आकाश को देखें। फिर आँखें बंद करें और महसूस करें कि वही विस्तार आपके भीतर है। आपका कोई आकार नहीं है। आप हर जगह फैले हुए हैं। इस 'निराश्रय' (Supportless) अवस्था में डरें नहीं, बल्कि तैरें।

विज्ञान और मनोविज्ञान (Science & Psychology)

Spatial Disorientation (Parietal Lobe): पिछले भाग की तरह, यह विधि भी मस्तिष्क के Parietal Lobe को शांत करती है। जब हम 'दिशाओं' (Directions) और 'सीमाओं' (Boundaries) की कल्पना करना छोड़ देते हैं, तो मस्तिष्क का वह हिस्सा जो हमें 'Space' में लोकेट करता है, निष्क्रिय हो जाता है। परिणाम? 'Self-Transcendence' या अहम् का विसर्जन। यह वही अनुभव है जो अंतरिक्ष यात्री (Astronauts) अंतरिक्ष में पृथ्वी को देखकर महसूस करते हैं—जिसे 'Overview Effect' कहा जाता है।

विधि 70: दर्द का द्वार (Piercing the Limb - Gateway of Pain)

"किञ्चिदङ्गं विभिद्यादौ तीक्ष्णसूच्यादिना ततः। तत्रैव चेतसा युक्त्वा भैरवे निर्मला गतिः॥ ९३॥"

अर्थ: किसी अंग को तीक्ष्ण सुई (Sharp Needle) आदि से छेदे जाने पर, उस (दर्द के) स्थान पर ही अपनी पूरी चेतना (Awareness) को एकाग्र (Unite) कर देने से, भैरव (शुद्ध चेतना) में निर्मल गति (Pure Access) प्राप्त होती है।

विधि की विस्तृत व्याख्या

यह एक बहुत ही क्रांतिकारी और शायद चौंकाने वाली विधि है। हम दर्द (Pain) से हमेशा भागते हैं। हम पेनकिलर खाते हैं, विचलित (Distract) होते हैं। लेकिन शिव कहते हैं: दर्द ध्यान का सबसे बड़ा द्वार हो सकता है।

क्यों? क्योंकि दर्द में एक तीव्रता (Intensity) होती है। जब आपको कहीं तेज दर्द होता है (जैसे सुई चुभने पर), तो आपका पूरा मन, सारी ऊर्जा, तुरंत उस एक बिंदु पर सिमट जाती है। दुनिया गायब हो जाती है, विचार गायब हो जाते हैं। केवल वह 'बिंदु' बचता है। अगर आप उस समय 'हाय-हाय' न करें, बल्कि उस दर्द को 'शुद्ध संवेदना' (Pure Sensation) की तरह देखें, तो वह आपको समाधि में ले जा सकता है।

प्रयोग कैसे करें:

यह जरूरी नहीं कि आप खुद को घायल करें। जब भी जीवन में कोई शारीरिक दर्द हो (सिरदर्द, चोट), तो उससे लड़ने के बजाय, अपनी पूरी चेतना को उस दर्द के केंद्र में ले जाएं। उसे 'दर्द' लेबल न दें, बस उसे एक तीव्र ऊर्जा की तरह देखें। आप पाएंगे कि एक बिंदु पर दर्द अलग हो गया है, और आप अलग। आप उसके साक्षी बन गए हैं।

विज्ञान और मनोविज्ञान (Science & Psychology)

Gate Control Theory & Focused Attention: आधुनिक विज्ञान मानता है कि ध्यान (Focus) दर्द की धारणा (Perception) को बदल सकता है। जब हम दर्द पर 'Non-judgmental Awareness' (निर्णय-रहित जागरूकता) के साथ ध्यान देते हैं, तो मस्तिष्क के Anterior Cingulate Cortex (जो दर्द के भावनात्मक पहलू को संभालता है) की गतिविधि कम हो जाती है। दर्द 'दुख' (Suffering) नहीं रहता, वह केवल एक 'तीव्र संवेदना' (Intense Sensation) बन जाता है। इसे 'Mindfulness-Based Pain Management' (MBPM) में भी उपयोग किया जाता है।

निष्कर्ष: एकाग्रता ही कुंजी है

ये 5 विधियाँ (66-70) हमें दिखाती हैं कि समाधि के लिए जंगल जाने की जरूरत नहीं है। आपके कान, आपकी वाणी, आपका शरीर, और यहाँ तक कि आपका दर्द भी—ये सब दरवाजे हैं।

चाहे आप 'अ' का जप करें या दर्द के बिंदु पर ध्यान दें, रहस्य एक ही है: अपनी बिखरी हुई ऊर्जा को समेटना और उसे एक बिंदु (Laser-like focus) पर लाना। जहाँ एकाग्रता पूर्ण होती है, वहीं ईश्वर प्रकट होता है।

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