विज्ञान भैरव तंत्र: ध्यान की 5 विधियाँ (ध्वनि और केंद्र) | भाग 2

विज्ञान भैरव तंत्र (Vigyan Bhairav Tantra) की हमारी यात्रा के पहले भाग में, हमने श्वास पर आधारित पहली पांच विधियों को समझा। भगवान शिव ने हमें दिखाया कि कैसे हमारी साधारण सी श्वास चेतना के द्वार खोलने की पहली और सबसे महत्वपूर्ण कुंजी है।
अब, इस दूसरे भाग में, शिव हमें ध्यान के और भी सूक्ष्म आयामों की ओर ले जाते हैं। वे श्वास की गति से हटकर हमारे शरीर के भीतर स्थित ऊर्जा के गुप्त केंद्रों और ब्रह्मांड में व्याप्त शाश्वत ध्वनि (नाद) पर ध्यान केंद्रित करने की विधियाँ बताते हैं।
यदि श्वास शरीर और चेतना के बीच का सेतु है, तो ऊर्जा केंद्र उस सेतु पर बने हुए द्वार हैं, और अनाहत ध्वनि उस पार से आने वाला दिव्य संगीत है।
इस लेख में हम विज्ञान भैरव तंत्र की विधियाँ 6 से 10 की गहन पड़ताल करेंगे। हम जानेंगे कि कैसे अपने शरीर के विभिन्न केंद्रों पर ध्यान लगाकर और बिना किसी वाद्य यंत्र के उत्पन्न होने वाली ब्रह्मांडीय ध्वनि को सुनकर हम चेतना की गहरी अवस्थाओं में उतर सकते हैं।
विधि 6: द्वादशांत - ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रवेश द्वार
"द्वादशान्ते मनः क्षिप्त्वा मारुतेन विवर्जिते। यत्र यत्र मनस्तत्र पवमानः स्थिरो भवेत्॥"
शिव कहते हैं: "श्वास-रहित होकर, मन को द्वादशांत में फेंको। जहाँ-जहाँ मन जाएगा, वहाँ-वहाँ पवन (प्राण) स्थिर हो जाएगा।"
विधि की सरल व्याख्या
यह एक अत्यंत शक्तिशाली विधि है जो सीधे ऊर्जा के सर्वोच्च केंद्र पर काम करती है। 'द्वादशांत' का अर्थ है 'बारह अंगुल ऊपर'। यह हमारे सिर के शीर्ष पर स्थित 'ब्रह्म रंध्र' (Brahma Randhra) से ठीक बारह अंगुल ऊपर आकाश में स्थित एक बिंदु है। योग और तंत्र में, इसे ब्रह्मांडीय ऊर्जा का शरीर में प्रवेश करने का द्वार माना जाता है।
शिव कहते हैं कि अपनी श्वास को भूल जाओ, उसे स्वाभाविक रूप से चलने दो ('मारुतेन विवर्जिते') और अपने मन को या अपनी पूरी चेतना को उस द्वादशांत बिंदु पर 'फेंक' दो। 'फेंकने' का अर्थ है, पूरे बल और एकाग्रता के साथ अपना ध्यान वहां केंद्रित कर देना।
कैसे करें यह ध्यान? (Step-by-Step)
- शांत होकर बैठें: किसी भी ध्यानात्मक आसन में बैठें और आँखें बंद कर लें।
- द्वादशांत को महसूस करें: अपने सिर के शीर्ष (जहाँ नवजात शिशु का तालू कोमल होता है) को महसूस करें। अब कल्पना करें कि उससे ठीक बारह अंगुल ऊपर आकाश में एक ऊर्जा का बिंदु है।
- मन को केंद्रित करें: अपनी पूरी सजगता, अपनी पूरी चेतना को उस बाहरी बिंदु पर ले जाएं। कल्पना करें कि आप उस बिंदु पर बैठे हैं और नीचे अपने शरीर को देख रहे हैं।
- श्वास को भूल जाएं: इस विधि में श्वास पर ध्यान नहीं देना है। बस अपना पूरा ध्यान उस एक बिंदु पर रखें। शिव कहते हैं कि जब आपका मन उस बिंदु पर स्थिर हो जाएगा, तो आपकी श्वास (पवन) अपने आप शांत और स्थिर हो जाएगी।
हमारा मन और हमारा प्राण (श्वास) एक साथ चलते हैं। जहाँ मन जाता है, वहीं प्राण ऊर्जा का प्रवाह होता है। सामान्यतः हमारा मन शरीर के भीतर या बाहर की वस्तुओं में भटकता रहता है, इसलिए हमारा प्राण भी बिखरा रहता है।
यह विधि इस प्रक्रिया को उलट देती है। शिव कहते हैं कि प्राण को साधने की कोशिश मत करो, सीधे 'मन' को साधो। जब आप अपने मन को शरीर की सीमाओं से बाहर, एक सर्वोच्च केंद्र (द्वादशांत) पर स्थिर कर देते हैं, तो शरीर में बहने वाली प्राण ऊर्जा भी स्वतः शांत और स्थिर हो जाती है। इस स्थिरता के क्षण में, मन विलीन हो जाता है और केवल शुद्ध चेतना का अनुभव होता है, जिसे 'भैरव' कहते हैं।
यह विधि 'आउट-ऑफ-बॉडी एक्सपीरियंस' (शरीर से बाहर होने का अनुभव) की एक ध्यान तकनीक है। आप शरीर में रहते हुए भी, शरीर से परे चेतना का अनुभव करते हैं।
विधि 7: जब शक्ति मध्य में स्थिर हो जाए
"तयापूर्याशु मूर्धान्तं भङ्क्त्वा भ्रूक्षेपहेतुना। मध्यमार्गगता शक्तिर्ब्रह्मरन्ध्रे प्रलीयते॥"
शिव कहते हैं: "उस शक्ति (कुंडलिनी) से मूर्धा (सिर के शीर्ष) तक को शीघ्रता से भर दो, भ्रू-क्षेप (भौंहों के इशारे) के कारण उसे तोड़कर। जब शक्ति मध्य-मार्ग (सुषुम्ना) में चली जाती है, तो वह ब्रह्मरंध्र में विलीन हो जाती है।"
विधि की सरल व्याख्या
यह एक बहुत ही गूढ़ और उन्नत तांत्रिक विधि है, जो सीधे कुंडलिनी शक्ति (Kundalini Shakti) के जागरण से संबंधित है। शिव यहाँ एक आंतरिक ऊर्जा प्रक्रिया का वर्णन कर रहे हैं।
"उस शक्ति से... भर दो": 'उस शक्ति' का अर्थ है कुंडलिनी, जो मूलाधार चक्र (रीढ़ के आधार) में सोई हुई है। इसे ध्यान और प्राण-ऊर्जा के माध्यम से ऊपर की ओर उठाना है।
"भ्रू-क्षेप हेतुना... तोड़कर": 'भ्रू-क्षेप' का अर्थ है भौंहों को ऊपर की ओर चढ़ाना या आज्ञा चक्र पर ध्यान केंद्रित करना। यह एक 'स्विच' की तरह काम करता है जो आज्ञा चक्र (तीसरे नेत्र) की ग्रंथि या 'गांठ' को 'तोड़ता' है, जिससे ऊर्जा को ऊपर सहस्रार की ओर जाने का मार्ग मिलता है।
"मध्य-मार्ग (सुषुम्ना)": जब आज्ञा चक्र की ग्रंथि टूटती है, तो प्राण ऊर्जा इड़ा और पिंगला से हटकर सीधे मध्य-मार्ग, यानी सुषुम्ना नाड़ी, में प्रवाहित होने लगती है।
"ब्रह्मरंध्र में विलीन": सुषुम्ना से होकर यह ऊर्जा जब सिर के शीर्ष, 'ब्रह्मरंध्र' या सहस्रार चक्र पर पहुँचती है, तो वह ब्रह्मांडीय चेतना में विलीन हो जाती है। यही समाधि या आत्म-साक्षात्कार की अवस्था है।
कैसे करें यह ध्यान? (सांकेतिक अभ्यास)
चेतावनी: यह एक शक्तिशाली क्रिया है और इसे बिना गुरु के मार्गदर्शन के हठपूर्वक नहीं करना चाहिए। यहाँ केवल एक सरल और सुरक्षित सांकेतिक अभ्यास दिया गया है:
- शांत होकर बैठें: आँखें बंद करके अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधा रखें।
- मूलाधार पर ध्यान: अपनी चेतना को अपनी रीढ़ के सबसे निचले सिरे (मूलाधार चक्र) पर ले जाएं। वहां एक सोई हुई ऊर्जा की कल्पना करें।
- ऊर्जा को ऊपर उठाएं: कल्पना करें कि श्वास के साथ यह ऊर्जा आपकी रीढ़ की हड्डी के मध्य से होकर ऊपर उठ रही है, एक चक्र से दूसरे चक्र तक।
- भ्रू-मध्य पर ध्यान केंद्रित करें: जब ऊर्जा आपकी भौंहों के बीच (आज्ञा चक्र) तक पहुंचे, तो अपना पूरा ध्यान वहां केंद्रित करें, जैसे आप उस ऊर्जा को ऊपर की ओर धकेल रहे हैं।
- ब्रह्मरंध्र में विलीन हों: कल्पना करें कि वह ऊर्जा आपके सिर के शीर्ष (ब्रह्मरंध्र) से बाहर निकलकर अनंत आकाश में विलीन हो रही है। उस विलीन होने के अनुभव में शांत हो जाएं।
यह विधि पूरी तरह से कुंडलिनी योग के विज्ञान पर आधारित है। 'भ्रू-क्षेप' या आज्ञा चक्र पर ध्यान केंद्रित करना पिट्यूटरी और पीनियल ग्रंथियों को सक्रिय करता है, जिन्हें योग में 'रुद्र ग्रंथि' का भेदन माना जाता है। जब यह ग्रंथि खुलती है, तो चेतना अपने सामान्य, सीमित अवस्था से मुक्त होकर उच्चतर आयामों का अनुभव करने लगती है। सुषुम्ना में प्राण का प्रवाह मन को पूरी तरह से शांत कर देता है, क्योंकि मन की चंचलता इड़ा और पिंगला के असंतुलन के कारण ही होती है।
विधि 8: इंद्रियों के द्वारों पर ध्यान
"पिण्डादिकेऽध्वनि परे वायवीये विचिन्तयेत्। तत्र या लयमाप्नोति चेतना भैरवोदयः॥"
शिव कहते हैं: "(शरीर के) छिद्रों आदि से परे, वायु के मार्ग पर ध्यान करो। जब चेतना वहां लय को प्राप्त होती है, तो भैरव का उदय होता है।"
विधि की सरल व्याख्या
यह एक बहुत ही सीधी और इंद्रियों पर आधारित विधि है। शिव कह रहे हैं कि अपनी चेतना को शरीर के विभिन्न 'छिद्रों' या 'द्वारों' पर केंद्रित करो, जहाँ से ऊर्जा या संवेदनाओं का आदान-प्रदान होता है। ये द्वार हैं हमारी पांच इंद्रियां:
- आंखें (देखना): जहाँ से प्रकाश अंदर आता है।
- कान (सुनना): जहाँ से ध्वनि अंदर आती है।
- नाक (सूंघना): जहाँ से गंध और श्वास अंदर आती है।
- मुंह (स्वाद लेना): जहाँ से स्वाद का अनुभव होता है।
- त्वचा (स्पर्श): जो पूरे शरीर में फैली है और स्पर्श को महसूस करती है।
शिव कहते हैं कि इनमें से किसी भी एक इंद्री के 'द्वार' पर अपनी पूरी चेतना को ले जाओ और बस वहीं रहो। जब आपकी चेतना वहां 'लय' को प्राप्त हो जाती है, यानी पूरी तरह से उस एक संवेदना में डूब जाती है, तो मन खो जाता है और भैरव (शुद्ध चेतना) का उदय होता है।
कैसे करें यह ध्यान? (Step-by-Step with Sound)
आइए, हम इसे 'सुनने' की इंद्री के साथ प्रयोग करके देखें:
- शांत स्थान चुनें: किसी ऐसे स्थान पर बैठें जहाँ हल्की, निरंतर ध्वनि हो, जैसे पंखे की आवाज, बारिश की बूंदें, या 'ॐ' का धीमा संगीत।
- आंखें बंद करें: आराम से बैठें और अपनी आँखें बंद कर लें।
- सुनने पर ध्यान दें: अपना पूरा ध्यान केवल 'सुनने' की क्रिया पर ले आएं। अपने कानों के 'द्वार' के प्रति सजग हो जाएं, जहां से ध्वनि आपके भीतर प्रवेश कर रही है।
- विश्लेषण न करें: ध्वनि का विश्लेषण न करें कि यह 'अच्छी' है या 'बुरी', यह कहाँ से आ रही है। बस 'ध्वनि' को सुनें, जैसे आप एक माइक्रोफोन बन गए हैं जो केवल रिकॉर्ड कर रहा है।
- ध्वनि में डूब जाएं: धीरे-धीरे आप पाएंगे कि 'आप' (सुनने वाले) और 'ध्वनि' (सुनी जाने वाली वस्तु) के बीच की दूरी कम हो रही है। एक क्षण ऐसा आएगा जब केवल 'सुनना' ही बचेगा। उस एकीभाव में, मन विलीन हो जाता है।
हमारा मन हमेशा एक इंद्री से दूसरी इंद्री पर कूदता रहता है। हम देखते भी हैं, सुनते भी हैं, और सोचते भी हैं - सब एक साथ। इस बिखराव के कारण हमारी ऊर्जा नष्ट होती है।
यह विधि 'एक-बिंदु-ध्यान' (One-Pointed Concentration) का सिद्धांत लागू करती है। जब आप अपनी पूरी चेतना को केवल एक इंद्री के द्वार पर केंद्रित कर देते हैं, तो मन का भटकना बंद हो जाता है। जब चेतना पूरी तरह से एक संवेदना में डूब जाती है, तो 'कर्ता' का भाव (मैं सुन रहा हूँ) समाप्त हो जाता है। इस 'अकर्ता' भाव में ही समाधि का अनुभव होता है, क्योंकि मन की अनुपस्थिति ही भैरव की उपस्थिति है।
विधि 9: अनाहत नाद - हृदय की अनछुई ध्वनि
"हृद्यन्तरस्थाने लीने मनसि निश्चले। मारुताघातयोगेन नादः समुदियात्स्फुटम्॥"
शिव कहते हैं: "जब मन निश्चल होकर हृदय के भीतर के स्थान में लीन हो जाता है, तो वायु के आघात के योग से एक स्पष्ट नाद (ध्वनि) प्रकट होता है।"
विधि की सरल व्याख्या
यह विधि हमें बाहर की ध्वनियों से हटाकर हमारे भीतर बज रहे एक शाश्वत संगीत, 'अनाहत नाद' (Anahata Nada), की ओर ले जाती है। 'अनाहत' का अर्थ है 'बिना किसी आघात के उत्पन्न हुई ध्वनि'। यह कोई भौतिक ध्वनि नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांड की मूल कंपन (Cosmic Vibration) है, जो हमारे हृदय केंद्र (अनाहत चक्र) में निरंतर बज रही है।
शिव कहते हैं कि जब मन पूरी तरह से शांत और निश्चल हो जाता है और हृदय पर केंद्रित होता है, तो हमें प्राण-वायु के सूक्ष्म कंपन से उत्पन्न होने वाली यह आंतरिक ध्वनि सुनाई देने लगती है। यह ध्वनि शुरुआत में झींगुर की आवाज, बांसुरी, या घंटियों जैसी लग सकती है, और अंत में यह 'ॐ' की ध्वनि में विलीन हो जाती है।
कैसे करें यह ध्यान? (Step-by-Step)
- कानों को बंद करें: किसी शांत स्थान पर आराम से बैठ जाएं। अब अपनी उंगलियों से अपने दोनों कानों को धीरे से बंद कर लें ताकि बाहर की आवाजें आना बंद हो जाएं।
- हृदय पर ध्यान दें: अपनी आँखें बंद रखें और अपना पूरा ध्यान अपने हृदय के केंद्र पर, छाती के बीच में, ले आएं।
- आंतरिक ध्वनि को सुनें: अब, बस सुनें। किसी ध्वनि की अपेक्षा न करें। बस अपने भीतर के मौन को सुनें। शुरुआत में आपको अपने रक्त प्रवाह या दिल की धड़कन की आवाज सुनाई दे सकती है। उसे भी सुनते रहें।
- सूक्ष्म ध्वनि को पकड़ें: जैसे-जैसे आपका ध्यान गहरा होगा, आपको इन स्थूल ध्वनियों के पीछे एक बहुत ही सूक्ष्म, निरंतर बजने वाली ध्वनि सुनाई देने लगेगी। यह झींगुर की भनभनाहट, एक दूर की बांसुरी, या बादलों की गड़गड़ाहट जैसी हो सकती है।
- ध्वनि में विलीन हो जाएं: उस ध्वनि को पकड़ें और उसी में अपनी चेतना को डुबो दें। उस ध्वनि का पीछा करते हुए उसके स्रोत तक पहुंचने की कोशिश करें। अंततः, सुनने वाला और ध्वनि एक हो जाते हैं, और केवल नाद ही शेष रहता है।
आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि पूरा ब्रह्मांड कंपन (Vibration) है। 'अनाहत नाद' उसी मूल ब्रह्मांडीय कंपन का अनुभव है। जब हमारा मन बाहरी दुनिया के शोर से पूरी तरह हट जाता है, तभी हम इस आंतरिक ध्वनि के प्रति संवेदनशील हो पाते हैं।
कानों को बंद करना एक मनोवैज्ञानिक तरकीब है जो हमें बाहरी दुनिया से अलग (sensory deprivation) कर देती है, जिससे हमारा ध्यान आसानी से अंतर्मुखी हो जाता है। यह ध्वनि, जिसे 'शब्द ब्रह्म' भी कहा जाता है, मन को सम्मोहित (hypnotize) करने की क्षमता रखती है। जैसे ही मन इस ध्वनि में लीन होता है, विचार स्वतः समाप्त हो जाते हैं और व्यक्ति ध्यान की गहरी अवस्था में उतर जाता है।
विधि 10: किसी भी क्रिया के आरंभ और अंत में ध्यान
"प्रणवादिसमुच्चारात् प्लुतान्ते शून्यभावतः। शून्यया परया शक्त्या शून्यतामेति भैरवि॥"
शिव कहते हैं: "हे भैरवी! प्रणव (ॐ) आदि के लंबे उच्चारण के अंत में शून्य भाव से, उस शून्य परम शक्ति के द्वारा, साधक शून्यता को ही प्राप्त हो जाता है।"
विधि की सरल व्याख्या
यह विधि नौवीं विधि का ही एक सुंदर विस्तार है, लेकिन इसे किसी भी क्रिया या अनुभव पर लागू किया जा सकता है। शिव कहते हैं कि प्रत्येक अनुभव, प्रत्येक क्रिया एक शुरुआत और एक अंत रखती है। उन शुरुआत और अंत के क्षणों में एक सूक्ष्म 'शून्यता' छिपी होती है।
उदाहरण के लिए, जब आप 'ॐ' का लंबा उच्चारण करते हैं, तो ध्वनि उठती है, अपने शिखर पर पहुँचती है, और फिर धीरे-धीरे मौन में विलीन हो जाती है। शिव कहते हैं, उस अंतिम क्षण पर ध्यान दो, जहाँ ध्वनि 'मौन' में खो रही है। वह विलीन होने का क्षण ही शून्य का द्वार है।
इसी तरह, किसी भी क्रिया के शुरू होने से ठीक पहले भी एक शांति का क्षण होता है।
कैसे करें यह ध्यान? (Step-by-Step with 'OM')
- शांत होकर बैठें: आराम से बैठ जाएं और आँखें बंद कर लें।
- 'ॐ' का लंबा उच्चारण करें: एक गहरी श्वास लें और धीरे-धीरे 'ओ...' ध्वनि का उच्चारण करें, और फिर उसे '...म्म्म' की ध्वनि में विलीन होने दें।
- अंत पर ध्यान दें: अपना पूरा ध्यान 'म्म्म' की अंतिम कंपन पर ले आएं। ध्यान दें कि कैसे यह कंपन धीरे-धीरे कम होता है और अंत में एक गहरे मौन में खो जाता है।
- मौन में ठहरें: जैसे ही ध्वनि समाप्त हो, उस उत्पन्न हुए मौन में ठहर जाएं। उस शून्य और शांति को महसूस करें। कुछ क्षणों के लिए बस उस मौन में रहें।
- प्रक्रिया को दोहराएं: फिर से श्वास लें और 'ॐ' का उच्चारण करें। हर बार, ध्वनि से अधिक महत्वपूर्ण वह 'मौन' है जो ध्वनि के बाद आता है। उसी मौन में उतरते जाएं।
हमारा मन हमेशा 'क्रिया' (action) में उलझा रहता है। हम या तो कुछ कर रहे होते हैं या कुछ करने के बारे में सोच रहे होते हैं। हम कभी भी क्रिया के 'शुरू' होने से पहले या 'समाप्त' होने के बाद के शांतिपूर्ण अंतराल पर ध्यान नहीं देते।
यह विधि हमें 'क्रिया' से हटाकर 'अक्रिया' (non-action) की ओर ले जाती है। 'ॐ' का उच्चारण मन को एकाग्र करने का एक उपकरण है। जब ध्वनि समाप्त होती है, तो मन भी एक क्षण के लिए रुक जाता है, क्योंकि उसके पास पकड़ने के लिए कुछ नहीं होता। उस क्षणिक 'शून्य' में, चेतना अपने स्रोत में वापस लौट आती है। इस तकनीक को किसी भी अनुभव पर लागू किया जा सकता है - छींक आने के बाद की शांति, क्रोध के शांत होने के बाद का मौन, या संगीत के समाप्त होने के बाद का सन्नाटा।
निष्कर्ष: चेतना के नए द्वार
विज्ञान भैरव तंत्र (Vigyan Bhairav Tantra) की इन पांच विधियों (6-10) के माध्यम से, भगवान शिव हमें श्वास से परे चेतना के और भी गहरे आयामों में ले जाते हैं। वे हमें सिखाते हैं कि कैसे हमारा अपना शरीर ही एक दिव्य यंत्र है, जिसके ऊर्जा केंद्र (द्वादशांत) और आंतरिक ध्वनियाँ (अनाहत नाद) हमें परम सत्य से जोड़ सकती हैं।
ये विधियाँ हमें बाहरी दुनिया से अंतर्मुखी होने का मार्ग दिखाती हैं। वे हमें बताती हैं कि ध्यान केवल एक क्रिया नहीं, बल्कि एक गहरी 'सुनने' और 'अनुभव' करने की अवस्था है।
यह यात्रा का अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है। विज्ञान भैरव तंत्र में अभी भी 102 और द्वार हैं जो खुलने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। अपनी प्रकृति के अनुसार किसी एक विधि को चुनें और प्रयोग शुरू करें।