विज्ञान भैरव तंत्र: ध्यान की 5 विधियाँ (शरीर और श्वास का लय) | भाग 10

विज्ञान भैरव तंत्र (Vigyan Bhairav Tantra) की हमारी यात्रा में, हमने अब तक श्वास, ऊर्जा केंद्र, इंद्रियों, शून्यता, मन, साक्षी भाव, सूक्ष्म प्राण और नाद (भाग 9) पर आधारित 45 अद्भुत विधियों को जाना।
अब, इस दसवें भाग में, भगवान शिव हमें एक और कदम आगे ले जाते हैं - लय (Dissolution) की ओर। सामान्यतः हम 'होने' (Being) या 'बनने' (Becoming) पर ध्यान केंद्रित करते हैं, लेकिन तंत्र 'मिटने' या 'विलीन होने' का विज्ञान भी सिखाता है। ये विधियाँ हमें सिखाती हैं कि कैसे शरीर और श्वास की ऊर्जा को विसर्जित करके हम उस परम तत्व में घुल सकते हैं।
जैसे एक बूंद समुद्र में गिरकर अपना अस्तित्व खो देती है और समुद्र बन जाती है, वैसे ही साधक अपनी सीमित ऊर्जा को असीम में विलीन करके भैरव-स्वरूप हो जाता है।
इस लेख में हम विज्ञान भैरव तंत्र की विधियाँ 46 से 50 की पड़ताल करेंगे। हम जानेंगे कि कैसे रेचक (Exhalation), कुंभक (Retention), और शरीर की ऊर्जा को 'लीन' करने की विधियों के माध्यम से हम अद्वैत का अनुभव कर सकते हैं।
विधि 46: श्वास के लय में चित्त का लय
"कुम्भकादिर्विरेच्यैव विरम्य स्वयमेव हि। चित्तं निराश्रयं कुर्यात् लयात् तत्पदमश्नुते॥"
शिव कहते हैं: "कुंभक आदि (प्राणायाम) के बिना, केवल रेचक (श्वास छोड़ने) के द्वारा ही स्वयं विराम लेकर, चित्त को निराश्रय (बिना सहारे के) कर दे। इस लय से वह उस (परम) पद को प्राप्त करता है।"
विधि की सरल व्याख्या
कई बार प्राणायाम या कुंभक (सांस रोकना) करना कठिन या तनावपूर्ण हो सकता है। यह विधि उन लोगों के लिए है जो सहजता पसंद करते हैं। शिव कहते हैं कि सांस को जबरदस्ती मत रोको। बस एक गहरी सांस छोड़ो (रेचक)।
जब सांस पूरी तरह बाहर निकल जाए, तो स्वाभाविक रूप से एक क्षण का विराम आता है, इससे पहले कि शरीर दोबारा सांस ले। उस छोटे से विराम में, अपने चित्त (मन) को ढीला छोड़ दो। उसे किसी विचार, मंत्र या वस्तु का सहारा मत दो। जैसे श्वास बाहर जाकर विलीन हो गई, वैसे ही मन को भी विलीन हो जाने दो।
कैसे करें यह ध्यान? (Step-by-Step)
- आराम से बैठें: किसी भी सुविधाजनक आसन में बैठ जाएं। रीढ़ सीधी रहे।
- श्वास छोड़ें: एक गहरी सांस लें और फिर धीरे-धीरे, पूरी तरह से सांस को बाहर निकाल दें।
- विराम का आनंद लें: जब फेफड़े खाली हो जाएं, तो तुरंत सांस लेने की जल्दी न करें। उस प्राकृतिक विराम (Pause) में कुछ क्षण ठहरें जो सांस छोड़ने के बाद आता है।
- मन को छोड़ दें: उस खालीपन के क्षण में, अपने मन को भी कोई काम न दें। बस उस शून्यता में गिर जाएं। महसूस करें कि आपके पास कोई आधार नहीं है, आप बस शून्य में तैर रहे हैं।
- सहज रहें: जब शरीर दोबारा सांस मांगें, तो सहजता से सांस लें। इस प्रक्रिया को बिना किसी तनाव के दोहराएं।
श्वास छोड़ना (Exhalation) 'विश्राम' और 'मृत्यु' (छोटे रूप में) का प्रतीक है। जब हम सांस छोड़ते हैं, तो हमारा पैरासिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम (Parasympathetic Nervous System) सक्रिय होता है, जो शरीर को रिलैक्स करता है।
जब हम सांस छोड़ने के बाद के खालीपन में ठहरते हैं, तो हम मनोवैज्ञानिक रूप से 'छोड़ने' (Letting go) का अभ्यास कर रहे होते हैं। यह तनाव, चिंता और विचारों के बोझ को उतार फेंकने की सबसे कारगर विधि है। जब श्वास बाहर होती है, तो 'अहं' भी कमजोर पड़ जाता है, जिससे समाधि में प्रवेश करना आसान हो जाता है।
विधि 47: पूरक के अंत में ध्यान
"तन्मयेनैव वा भावेन रेचकाद्यानमीहते। यत्र तत्र मनः कृत्वा तत्सिद्धौ लभते लयम्॥"
शिव कहते हैं: "या फिर, रेचक (सांस छोड़ने) के स्थान से शुरू करके उस भाव में तन्मय हो जाओ। जहां कहीं भी मन जाए, वहां ध्यान करने से, साधक उस सिद्धि (लय) को प्राप्त करता है।"
(नोट: यह श्लोक सामान्यतः श्वास की गति के साथ मन की तन्मयता पर बल देता है।)
विधि की सरल व्याख्या
पिछली विधि 'रेचक' (छोड़ने) के अंत पर केंद्रित थी, यह विधि श्वास की यात्रा को 'पूरक' (लेने) के अंत तक ले जाती है। शिव कहते हैं कि अपनी पूरी चेतना को श्वास के साथ अंदर लाओ।
श्वास अंदर आती है और फेफड़े भर जाते हैं। उस क्षणिक ठहराव पर ध्यान केंद्रित करो जब श्वास 'पूर्ण' हो जाती है और बाहर जाने को होती है। वह 'पूर्णता' (Fullness) ही चेतना का द्वार है। उस पूर्णता के भाव में 'तन्मय' (लीन) हो जाओ। जब श्वास के साथ-साथ मन भी भर जाता है, तो मन भी विलीन हो जाता है, क्योंकि उसके पास अब कोई खाली जगह नहीं बचती जिसमें वह भटक सके।
कैसे करें यह ध्यान? (Step-by-Step)
- सीधे बैठें: रीढ़ सीधी रखें और आँखें बंद कर लें।
- श्वास अंदर लें: धीरे-धीरे, पूरी गहराई से सांस को अंदर लें (पूरक)। महसूस करें कि न केवल फेफड़े, बल्कि आपका पूरा शरीर ऊर्जा से भर रहा है।
- पूर्णता को पकड़ें: जब आप श्वास लेना बंद करते हैं, तो उस प्राकृतिक विराम (Pause) में कुछ क्षण ठहरें। उस क्षणिक 'पूर्णता' (Fullness) पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित करें।
- तन्मय हो जाएं: उस 'पूर्ण' होने के भाव में, उस ऊर्जा में पूरी तरह से डूब जाएं। महसूस करें कि आपके भीतर और बाहर केवल पूर्णता और ऊर्जा ही शेष है।
- साक्षी भाव: जब शरीर दोबारा सांस छोड़ने लगे, तो सहजता से छोड़ दें। इस प्रक्रिया को बिना किसी तनाव के दोहराएं।
श्वास लेना (Inhalation) 'जीवन' और 'ऊर्जा ग्रहण' का प्रतीक है। जब हम सांस अंदर लेते हैं, तो हमारा सिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम (Sympathetic Nervous System) हल्का सा सक्रिय होता है, जो शरीर को 'सतर्क' और 'जागरूक' बनाता है।
जब हम श्वास अंदर भरकर रुकते हैं, तो शरीर और मन 'पूर्ण' (Complete) महसूस करते हैं। मन का स्वभाव है खाली जगह को भरना। जब आप पूरी तरह से भरे हुए होते हैं, तो मन को भागने या कुछ चाहने की कोई जगह नहीं मिलती। यह 'तृप्ति' का अनुभव ही मन को शून्य कर देता है और साधक को परम संतुष्टि की ओर ले जाता है।
विधि 48: श्वास की गति के साथ मन का विसर्जन
"तन्मध्ये बिन्दुं चिन्तयित्वा मारुतं शनकैर्नयेत्। यदा चित्तं परिक्षीणं तदा मोक्षमवाप्नुयात्॥"
शिव कहते हैं: "श्वास के मध्य में बिंदु का चिंतवन करके, पवन को धीरे-धीरे ले जाए। जब चित्त पूरी तरह क्षीण (कमजोर/विलीन) हो जाता है, तब साधक मोक्ष को प्राप्त करता है।"
विधि की सरल व्याख्या
यह विधि श्वास की गति और मन की एकाग्रता को एक साथ जोड़ती है। पिछली विधियों में हम श्वास के 'रुकने' या 'अंतराल' पर ध्यान दे रहे थे। इस विधि में, शिव हमें श्वास के 'चलते रहने' के दौरान ही ध्यान में प्रवेश करने का मार्ग बता रहे हैं।
शिव कहते हैं कि अपनी श्वास को धीरे-धीरे, बहुत आराम से अंदर लाओ और बाहर ले जाओ ('मारुतं शनकैर्नयेत्')। अब इस चलती हुई श्वास के मध्य में एक 'बिंदु' (Dot) की कल्पना करो। यह बिंदु श्वास की गति का प्रतीक है। जब आप श्वास पर इतना धीमा और गहरा ध्यान देते हैं कि श्वास स्वयं एक 'बिंदु' में सिमट जाए, तब मन की भाग-दौड़ भी धीमी पड़ जाती है। जब मन पूरी तरह से शांत होकर 'परिक्षीण' (exhausted of its thoughts) हो जाता है, तब 'मोक्ष' घटित होता है।
कैसे करें यह ध्यान? (Step-by-Step)
- आराम से बैठें: सीधे बैठें और आँखें बंद कर लें।
- श्वास को धीमा करें: श्वास को जबरदस्ती नियंत्रित न करें, बस उसे धीरे-धीरे, बहुत ही आराम से अंदर लें और बाहर निकालें। श्वास को धीमी, लंबी और गहरी होने दें।
- बिंदु की कल्पना: अब कल्पना करें कि यह धीमी श्वास एक सीधी रेखा है, और आप इस रेखा के मध्य में एक चमकते हुए 'बिंदु' (Dot of Light) पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।
- एकाग्रता बनाए रखें: अपनी एकाग्रता को उस बिंदु पर पूरी तरह से बनाए रखें, चाहे श्वास अंदर जा रही हो या बाहर आ रही हो। बिंदु के अलावा कुछ और न देखें, न सोचें।
- मन को क्षीण होने दें: आप पाएंगे कि विचारों का प्रवाह धीमा पड़ गया है। जब मन का कोई विचार शेष नहीं रहता (चित्तं परिक्षीणं), तो मन स्वयं ही चेतना के केंद्र में मोक्ष को प्राप्त कर लेता है।
यह विधि 'बिंदु ध्यान' (Bindu Dhyana) का उपयोग करती है। बिंदु चेतना के उस अविभाज्य केंद्र का प्रतीक है जहाँ ऊर्जा केंद्रित होती है।
जब हम श्वास को धीमा करते हैं, तो विचारों के लिए समय अंतराल बढ़ जाता है। मन की एकाग्रता को 'बिंदु' पर टिकाने से, मन को यह अहसास होता है कि उसका काम खत्म हो गया है, क्योंकि वह उस बिंदु को भेद नहीं सकता। जब मन 'परिक्षीण' (exhausted) हो जाता है, तो वह आत्मा को मोक्ष का मार्ग दे देता है।
विधि 49: शरीर को सूक्ष्म ऊर्जा में विलीन करना
"सर्वं सूक्ष्मं चिन्तयित्वा सर्वत्राखण्डितं। मनसः संविदं दृष्ट्वा लयादानन्दभाजनम्॥"
शिव कहते हैं: "सब कुछ सूक्ष्म है, ऐसा चिंतवन करके, और सब ओर अखंडित (अविभाजित) है। मन की संविदा (सजगता) को देखने से, साधक लय (विसर्जन) के द्वारा आनंद का पात्र बन जाता है।"
विधि की सरल व्याख्या
यह विधि इस बात पर केंद्रित है कि हम हर चीज को 'ऊर्जा' (Energy) के रूप में देखें, न कि ठोस पदार्थ (Solid Matter) के रूप में। भौतिकी भी यही कहती है कि यह पूरा ब्रह्मांड ऊर्जा के कंपन (Vibrations) के अलावा और कुछ नहीं है।
शिव कहते हैं कि अपनी धारणा को बदलो। अपने शरीर को, आसपास की वस्तुओं को, और पूरे जगत को 'सूक्ष्म' (Subtle) ऊर्जा के रूप में देखो। यह भी महसूस करो कि यह ऊर्जा अविभाजित ('अखण्डित') है। मेरा शरीर, दीवार और आकाश - सब एक ही ऊर्जा से बने हैं। जब मन इस 'अखंडित' ऊर्जा की सजगता (संविदा) को देखता है, तो द्वैत मिट जाता है, और मन स्वयं आनंद में विलीन हो जाता है।
कैसे करें यह ध्यान? (Step-by-Step)
- आराम से बैठें: आँखें बंद करें और अपने पूरे शरीर को भीतर से महसूस करें।
- सूक्ष्म कंपन देखें: कल्पना करें कि आपका शरीर ठोस नहीं है, बल्कि लाखों छोटे, तेज़ी से कंपायमान (Vibrating) कणों से बना है, जो प्रकाश की तरह चमक रहे हैं।
- अखंडितता महसूस करें: अब अपने आसपास की वस्तुओं को भी देखें। महसूस करें कि आपके शरीर के कण और दीवार के कण एक ही ऊर्जा के महासागर से जुड़े हुए हैं। कोई विभाजन नहीं है।
- सजगता को देखें: अब अपनी 'सजगता' या 'होश' (Consciousness) को भी एक ऊर्जा के रूप में देखें। यह सजगता ही वह शक्ति है जो इस 'लय' को देख रही है।
- आनंद में डूब जाएं: जब सब कुछ - आपका शरीर, आपकी सजगता, और दुनिया - एक ही ऊर्जा के रूप में विलीन हो जाते हैं, तो उस अखंडित आनंद में डूब जाएं।
यह विधि 'तन्मात्रा योग' और आधुनिक विज्ञान के सिद्धांतों पर आधारित है। हर वस्तु को उसके सूक्ष्म स्वरूप (तन्मात्रा) में देखने से, उसका 'स्थूल' रूप (जिससे हम आसक्त होते हैं) महत्वहीन हो जाता है।
जब हम सब कुछ 'अखंडित' (unbroken) ऊर्जा के रूप में देखते हैं, तो हमारे मन से 'मेरा' और 'तुम्हारा' का भाव समाप्त हो जाता है। यह एकता का भाव ही परम आनंद (अखंड आनंद) है।
विधि 50: विस्मरण में परम विश्राम
"कपालकुहरे न्यस्य जिह्वां तालुगतां भवेत्। शान्तिं यात्यमलां देवि सर्वाकारविवर्जितः॥"
शिव कहते हैं: "जीभ को तालु से लगाकर, कपाल के भीतर न्यस्त (केंद्रित) करो। इससे हे देवी! साधक सभी आकारों से रहित, परम शांति को प्राप्त होता है।"
विधि की सरल व्याख्या
यह विधि 'खेचरी मुद्रा' (Khechari Mudra) का एक प्रारंभिक रूप है, जो जीभ और मस्तिष्क के बीच के गहरे संबंध का उपयोग करती है। यह विधि हमें 'विस्मरण' (Forgetfulness) या 'स्मृति-लोप' की ओर ले जाती है।
जीभ का तालु से स्पर्श करना 'मूलबंध' और 'जालंधर बंध' के साथ मिलकर ऊर्जा को ऊपर की ओर मोड़ता है। 'कपालकुहर' (कपाल का खाली स्थान) पर ध्यान केंद्रित करने से मन का बाहरी दुनिया से संपर्क टूट जाता है। जब आप सभी बाहरी और भीतरी आकारों (विचारों, छवियों) को छोड़ देते हैं, तो एक ऐसी परम शांति मिलती है जो किसी भी क्रिया पर निर्भर नहीं करती।
कैसे करें यह ध्यान? (Step-by-Step)
- आसन और मुद्रा: किसी शांत जगह पर बैठें। अपनी रीढ़ सीधी करें। अपनी जीभ को मोड़कर तालु पर, जहाँ तक संभव हो, पीछे की ओर स्पर्श कराएं।
- कपाल पर ध्यान: आँखें बंद करें और अपना ध्यान अपने सिर के ऊपरी, आंतरिक खाली स्थान (कपालकुहर) पर ले जाएं।
- आकारों को त्यागें: अब मानसिक रूप से अपने सभी विचारों, कल्पनाओं और आकारों (जैसे शरीर का आकार) को विसर्जित कर दें।
- केवल शांति: कुछ देर बाद, आपको एक गहरी शांति का अनुभव होगा, जहाँ कोई विचार नहीं, कोई रूप नहीं, कोई स्मृति नहीं है। यही 'सर्वाकारविवर्जितः' की अवस्था है।
- आनंद में ठहरें: उस विश्राम और शांति में ठहर जाएं।
खेचरी मुद्रा (या जीभ का तालु से स्पर्श) योग में प्राण को नियंत्रित करने के लिए महत्वपूर्ण है। जीभ का तालु से संपर्क हमारी नर्वस सिस्टम को शांत करता है और मस्तिष्क में एक शांत, विश्रामदायक रासायनिक प्रक्रिया शुरू करता है।
'सर्वाकारविवर्जितः' होने का अर्थ है - 'मैं कौन हूँ?' इस प्रश्न का उत्तर देने वाली सभी पहचानों को छोड़ देना। जब आपकी पहचान (नाम, काम, शरीर, विचार) मिट जाती है, तो आप उस शुद्ध अस्तित्व में स्थित हो जाते हैं जो सभी आकारों से परे है।
निष्कर्ष: लय और विसर्जन की कला
विज्ञान भैरव तंत्र (Vigyan Bhairav Tantra) की ये पांच विधियाँ (46-50) हमें अंतिम सत्य की ओर ले जाती हैं: मुक्ति केवल 'विसर्जन' में है। हमने सीखा कि कैसे श्वास को बाहर फेंककर शून्य को प्राप्त करना है, शरीर को सूक्ष्म कणों में विलीन करना है, और अंत में सभी आकारों को त्यागकर परम शांति में विश्राम करना है।
ये विधियाँ हमारे मन को सिखाती हैं कि 'अखंडित आनंद' तभी प्राप्त होता है जब हम अपने छोटे, सीमित अस्तित्व की सीमाओं को स्वेच्छा से छोड़ देते हैं।
अब तक हमने 50 विधियाँ पूरी कर ली हैं। ये सभी विधियाँ हमें एक ही स्थान की ओर इशारा करती हैं: हमारे भीतर स्थित मौन, जो सभी ध्वनियों, विचारों और आकारों का स्रोत है। अपनी साधना जारी रखें।