Logoपवित्र ग्रंथ

विज्ञान भैरव तंत्र: ध्यान की 5 विधियाँ (शून्यता और धारणा) | भाग 8

शून्यता में ही पूर्णता का अनुभव छिपा है। विज्ञान भैरव तंत्र के इस आठवें भाग में, भगवान शिव हमें शून्यता (Void) और धारणा (Concentration) के रहस्यों से परिचित कराते हैं।
विज्ञान भैरव तंत्र: ध्यान की 5 विधियाँ (शून्यता और धारणा) | भाग 8
विज्ञान भैरव तंत्र: शून्यता और धारणा

विज्ञान भैरव तंत्र (Vigyan Bhairav Tantra) की हमारी यात्रा में, हम अब तक श्वास, ऊर्जा केंद्र, इंद्रियों, मन, साक्षी भाव और प्राण-ऊर्जा के रहस्यों को समझ चुके हैं। हमने देखा है कि कैसे जीवन का हर अनुभव एक द्वार बन सकता है।

अब, इस आठवें भाग में, भगवान शिव हमें शून्यता (Emptiness/Void) के सबसे क्रांतिकारी प्रयोगों की ओर ले जाते हैं। सामान्यतः हम 'खालीपन' को अभाव मानते हैं, लेकिन तंत्र में खालीपन ही वह स्थान है जहाँ परमात्मा निवास करता है। ये विधियाँ हमें सिखाती हैं कि कैसे बाहरी और भीतरी खाली स्थान (Empty Space) का उपयोग करके हम अपनी चेतना को असीम बना सकते हैं।

जब आप किसी वस्तु को देखते हैं, तो आप वस्तु को देखते हैं, खाली जगह को नहीं। शिव कहते हैं - वस्तु को छोड़ो, और उस खाली जगह पर ध्यान दो जो वस्तुओं को धारण किए हुए है। वही खाली जगह 'भैरव' है।

इस लेख में हम विज्ञान भैरव तंत्र की विधियाँ 36 से 40 की गहन पड़ताल करेंगे। हम जानेंगे कि कैसे 'खाली जगह' पर ध्यान केंद्रित करके, दीवारों के पार देखकर, और यहाँ तक कि अपनी आँखों को हल्का सा दबाकर भी हम परम सत्य का अनुभव कर सकते हैं।

विधि 36: हाथों या बर्तनों के खाली स्थान पर ध्यान

"कररुद्धदृगस्त्रेण भ्रूभेदाद् द्वाररोधनात्। दृष्टेर्बिन्दौ क्रमाल्लीने तन्मध्ये परमा स्थितिः॥"

शिव कहते हैं: "जब साधक अपने हाथों (के बीच की खाली जगह) या किसी पात्र (बर्तन) के भीतर के आकाश (खाली स्थान) पर एकाग्र होता है, और मन को उसी में लीन कर देता है, तो वह उस शून्यता के माध्यम से भैरव-स्वरूप हो जाता है।"

(नोट: यह श्लोक कुछ प्रतियों में भिन्न हो सकता है, लेकिन विधि 'शून्य' पर केंद्रित है)

विधि की सरल व्याख्या

हम आमतौर पर 'पदार्थ' (matter) पर ध्यान देते हैं। अगर हमारे हाथ में एक कप है, तो हम 'कप' को देखते हैं, उसके अंदर के 'खाली स्थान' को नहीं। लेकिन तंत्र कहता है कि कप तो सिर्फ मिट्टी है, उसका असली उपयोग तो वह 'खाली जगह' है जिसमें चाय डाली जा सकती है।

शिव कहते हैं कि अपनी दृष्टि को बदलो (Gestalt Switch)। वस्तु को मत देखो, उस 'खालीपन' को देखो जो वस्तु के कारण बना है। चाहे वह दो हाथों के बीच की जगह हो, या घड़े के अंदर का आकाश। जब आप खालीपन पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो आपका मन भी खाली हो जाता है, क्योंकि मन को टिकने के लिए कोई 'वस्तु' नहीं मिलती।

कैसे करें यह ध्यान? (Step-by-Step)

  1. आराम से बैठें: किसी शांत जगह पर बैठ जाएं।
  2. हाथों की मुद्रा बनाएं: अपने दोनों हाथों को अपने सामने लाएं और उन्हें एक कटोरे के आकार में जोड़ें, जैसे आप पानी पीने वाले हों।
  3. खाली जगह को देखें: अब अपनी हथेलियों को नहीं, बल्कि उनके बीच में जो 'खाली जगह' (hollow space) बनी है, उसे देखें।
  4. सीमाओं को भूलें: धीरे-धीरे हाथों की सीमाओं को भूल जाएं और केवल उस 'शून्य' पर ध्यान केंद्रित करें। महसूस करें कि वह शून्य आपके हाथों के बाहर के अनंत आकाश से जुड़ा हुआ है।
  5. विलीन हो जाएं: जब आप उस छोटे से शून्य में अपनी चेतना को एकाग्र कर लेते हैं, तो अचानक आप पाएंगे कि आप भी शून्य हो गए हैं। विचार बंद हो जाएंगे और केवल शांति बचेगी।
विधि के पीछे का विज्ञान और मनोविज्ञान

मनोविज्ञान में इसे 'नेगेटिव स्पेस' (Negative Space) पर ध्यान देना कहते हैं। हमारा मस्तिष्क वस्तुओं (Positive Space) को पहचानने के लिए प्रोग्राम्ड है। जब हम जानबूझकर खाली जगह पर ध्यान देते हैं, तो हम अपने मस्तिष्क के सामान्य पैटर्न को तोड़ देते हैं।

इस 'पैटर्न ब्रेक' के कारण मन को रुकना पड़ता है। शून्यता का कोई आकार, रंग या रूप नहीं होता, इसलिए मन उस पर कोई कहानी नहीं बना सकता। परिणामतः, मन शांत हो जाता है और हम शुद्ध चेतना में उतर जाते हैं।

विधि 37: वस्तुओं की सीमाओं पर ध्यान

"वस्तुषू किञ्चिद्देशेषु भावयेत् किञ्चिदन्यतः। भावे विभावयन् शीघ्रं लभते तन्मना भवः॥"

शिव कहते हैं: "वस्तुओं के किसी देश (स्थान) में दृष्टि को जमाओ और फिर उसे किसी दूसरी वस्तु पर ले जाओ। उन दोनों के बीच के अंतराल (खाली स्थान) में शीघ्रता से भावना करने पर, वह (साधक) तन्मय होकर भैरव को प्राप्त होता है।"

विधि की सरल व्याख्या

यह विधि हमारी दृष्टि की आदत को बदलने के लिए है। जब हम एक वस्तु को देखते हैं और फिर दूसरी वस्तु को देखते हैं, तो हमारी नज़र बीच के खाली स्थान को 'अनदेखा' (skip) कर देती है। हम केवल 'वस्तुओं' की एक श्रृंखला देखते हैं।

शिव कहते हैं कि वस्तुओं को भूल जाओ। जब तुम्हारी नज़र एक वस्तु से दूसरी वस्तु की ओर जा रही हो, तो उस बीच के अंतराल पर ध्यान दो। वह जो 'खाली जगह' है जहाँ कोई वस्तु नहीं है, वही महत्वपूर्ण है। जब आप उस अंतराल को पकड़ लेते हैं, तो मन अचानक शून्य में गिर जाता है।

कैसे करें यह ध्यान? (Step-by-Step)

  1. दो वस्तुएं चुनें: अपने कमरे में दो वस्तुओं को चुनें जो थोड़ी दूरी पर हों, जैसे एक फूलदान और एक घड़ी।
  2. पहली वस्तु को देखें: पहले फूलदान को ध्यान से देखें।
  3. दूसरी की ओर बढ़ें: अब अपनी नज़र को धीरे-धीरे घड़ी की ओर ले जाएं।
  4. अंतराल को पकड़ें: जैसे ही आपकी नज़र फूलदान को छोड़े और घड़ी तक पहुंचे, उस बीच के रास्ते पर पूरी सजगता ले आएं। वहां क्या है? न फूलदान, न घड़ी। वहां केवल खाली स्थान है।
  5. रुक जाएं: उस बीच के खाली स्थान में अपनी दृष्टि को रोक दें। किसी वस्तु को न देखें, केवल उस अंतराल को देखें। उसी क्षण आप पाएंगे कि विचार रुक गए हैं।
विधि के पीछे का विज्ञान और मनोविज्ञान

हमारा मन एक बंदर की तरह है जो एक डाली (वस्तु) से दूसरी डाली पर कूदता है। वह कभी भी हवा (अंतराल) में नहीं रुकता। उसे हमेशा कोई आधार चाहिए।

यह विधि मन के इस आधार को छीन लेती है। जब आप जानबूझकर दो वस्तुओं के बीच के 'खालीपन' पर ध्यान देते हैं, तो मन भ्रमित हो जाता है क्योंकि वहां पकड़ने के लिए कुछ नहीं है।

इस भ्रम की स्थिति में, मन की निरंतरता (continuity) टूट जाती है और चेतना अपने शुद्ध स्वरूप में प्रकट हो जाती है।

विधि 38: आँखों को हल्का सा दबाना

"अनाहते पात्रकर्णे अभग्नशब्दसारिते। विचित्रं भावयेद् देहं सर्वं वेदं परं कुलम्॥"

शिव कहते हैं: "जब आँखों को उंगलियों से हल्का सा दबाया जाता है, तो एक आंतरिक प्रकाश प्रकट होता है। उस प्रकाश के बिंदु पर ध्यान करने से परम स्थिति प्राप्त होती है।"

(नोट: कुछ संस्करणों में यहाँ आँखों को दबाने और प्रकाश देखने का वर्णन है, जिसे हम यहाँ समझा रहे हैं)

विधि की सरल व्याख्या

यह विधि शरीर क्रिया विज्ञान (Physiology) का उपयोग करती है। जब हम अपनी बंद आँखों को उंगलियों से बहुत हल्का सा दबाते हैं, तो रेटिना (Retina) की तंत्रिकाओं के उत्तेजित होने के कारण हमें अंदर कुछ प्रकाश के बिंदु या रंग दिखाई देने लगते हैं। इसे विज्ञान में 'फॉस्फीन' (Phosphene) कहते हैं।

शिव कहते हैं कि इस प्रकाश को साधारण मत समझो। यह तुम्हारे भीतर की ऊर्जा का ही एक रूप है। उस प्रकाश के बिंदु पर अपना ध्यान एकाग्र करो। उसे देखो, उसमें डूब जाओ। जैसे-जैसे तुम उसमें गहरे उतरोगे, वह बिंदु एक द्वार बन जाएगा और तुम बाहरी दुनिया को भूलकर आंतरिक आकाश में प्रवेश कर जाओगे।

कैसे करें यह ध्यान? (Step-by-Step)

  1. आराम से बैठें: किसी भी सुविधाजनक आसन में बैठ जाएं और आँखें बंद कर लें।
  2. हल्का दबाव डालें: अपनी तर्जनी (Index fingers) या अंगूठों से अपनी दोनों आँखों की पलकों को बहुत धीरे से दबाएं। ध्यान रहे, दबाव इतना ही हो कि दर्द न हो, बस हल्का सा स्पर्श महसूस हो।
  3. प्रकाश को देखें: जैसे ही आप दबाएंगे, आपको अंधेरे में कुछ चमकते हुए बिंदु, छल्ले या रंग दिखाई देंगे।
  4. एकाग्र हो जाएं: किसी एक बिंदु या रंग को चुनें और उस पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित कर दें। उसे हिलते हुए, बदलते हुए देखें।
  5. अंदर उतरें: कल्पना करें कि वह प्रकाश का बिंदु एक सुरंग का मुहाना है। अपनी चेतना को उस बिंदु के भीतर प्रवेश करने दें। आप पाएंगे कि आप एक अनंत आंतरिक प्रकाश के सागर में तैर रहे हैं।
विधि के पीछे का विज्ञान और मनोविज्ञान

जब हम आँखों को दबाते हैं, तो हम मस्तिष्क के दृश्य-केंद्र (Visual Cortex) को कृत्रिम रूप से उत्तेजित करते हैं। यह मस्तिष्क को बाहरी दुनिया से हटाकर आंतरिक अनुभूतियों पर ला देता है।

आध्यात्मिक रूप से, यह प्रकाश 'तीसरे नेत्र' की सक्रियता का प्रारंभिक अनुभव हो सकता है। यह विधि मन को तुरंत एकाग्र करने के लिए बहुत प्रभावी है क्योंकि वह प्रकाश निरंतर बदलता रहता है और मन को बांधे रखता है। यह 'त्राटक' का ही एक आंतरिक रूप है।

विधि 39: 'ॐ' की सूक्ष्म ध्वनि का अनुभव

"प्रणवादिसमुच्चारात् प्लुतान्ते शून्यभावतः। शून्यया परया शक्त्या शून्यतामेति भैरवि॥"

शिव कहते हैं: "जैसे-जैसे 'ॐ' की ध्वनि सूक्ष्म होती जाती है, वैसे-वैसे मन भी सूक्ष्म होता जाता है। अंत में, जब ध्वनि केवल एक विचार मात्र रह जाती है, तब परम शून्यता का अनुभव होता है।"

(यह विधि 10वीं विधि के समान है, लेकिन यहाँ जोर 'ह्रस्व' ध्वनि पर है)

विधि की सरल व्याख्या

इस विधि में शिव 'ॐ' (Om) के उच्चारण को स्थूल (Gross) से सूक्ष्म (Subtle) की ओर ले जाने की कला सिखा रहे हैं। हम आमतौर पर जोर से 'ॐ' का जाप करते हैं। यह 'वैखरी' (बोली जाने वाली) वाणी है।

शिव कहते हैं कि धीरे-धीरे इस ध्वनि को धीमा करते जाओ। पहले होठों से बोलो, फिर गले से, फिर मन में। और अंत में, मन में भी बोलना बंद कर दो, बस उस ध्वनि को 'महसूस' करो। जब ध्वनि इतनी सूक्ष्म हो जाती है कि वह केवल एक 'भाव' या 'स्पंदन' मात्र रह जाती है, तो मन उस सूक्ष्मता के साथ एकाकार हो जाता है और शून्य में प्रवेश कर जाता है।

कैसे करें यह ध्यान? (Step-by-Step)

  1. जोर से जपें: शुरुआत में 'ॐ' का उच्चारण जोर से करें। ध्वनि को अपने पूरे शरीर में गूंजने दें।
  2. फुसफुसाहट: कुछ समय बाद, आवाज को कम करें और केवल फुसफुसाहट (Whisper) में 'ॐ' बोलें।
  3. मानसिक जप: अब होंठ बंद कर लें। केवल मन के भीतर 'ॐ' का उच्चारण करें। बाहर कोई आवाज नहीं, केवल भीतर गूंज।
  4. केवल भावना: अब मानसिक उच्चारण भी बंद कर दें। बस 'ॐ' के होने का 'भाव' रखें। जैसे ध्वनि अभी-अभी समाप्त हुई हो और उसकी गूंज बची हो।
  5. शून्य में प्रवेश: उस अंतिम, सूक्ष्म गूंज को पकड़ें और उसके साथ गहरे मौन में उतर जाएं। जहाँ वह गूंज भी समाप्त हो जाती है, वहां परमात्मा है।
विधि के पीछे का विज्ञान और दर्शन

यह विधि ध्वनि की चार अवस्थाओं - वैखरी (बोली गई), मध्यमा (गले में), पश्यन्ती (मन में), और परा (नाभि/मूल में) - की यात्रा है। हम वैखरी से शुरू करते हैं और 'परा' तक जाते हैं।

जब हम किसी चीज़ को सूक्ष्म करते जाते हैं, तो उसे पकड़ने के लिए हमारी चेतना को भी उतना ही सूक्ष्म और एकाग्र होना पड़ता है। यह प्रक्रिया हमारे मन को मोटा और भारी होने से बचाती है और उसे सुई की नोक जैसा तीक्ष्ण और हल्का बना देती है।

विधि 40: वर्णमाला के आदि और अंत का ध्यान

"यस्य कस्यापि वर्णस्य पूर्वान्तावनुभावयेत्। शून्यया शून्यभूतोऽसौ शून्याकारः पुमान्भवेत्॥"

शिव कहते हैं: "किसी भी वर्ण (अक्षर) के पूर्व (शुरुआत) और अंत (समाप्ति) का अनुभव करो। उस शून्यता से शून्य-भूत होकर, वह पुरुष (साधक) शून्य-आकार (परमेश्वर) हो जाता है।"

विधि की सरल व्याख्या

यह विधि पिछली विधियों का ही एक और प्रयोग है, लेकिन इसे किसी भी शब्द या अक्षर पर लागू किया जा सकता है। शिव कहते हैं कि कोई भी शब्द, जैसे 'राम' या 'अ', शून्य से उठता है और शून्य में ही विलीन होता है।

हमारा ध्यान हमेशा 'शब्द' पर होता है। शिव कहते हैं, शब्द को छोड़ो। उस क्षण पर ध्यान दो जब शब्द अभी ओंठों से निकला नहीं है (पूर्व), और उस क्षण पर जब शब्द समाप्त हो चुका है (अंत)। उन दोनों कोनों पर असीम शांति है। जब आप उस शांति पर ध्यान देते हैं, तो बीच का शब्द भी महत्वहीन हो जाता है और आप पूर्ण शून्यता में प्रवेश कर जाते हैं।

कैसे करें यह ध्यान? (Step-by-Step)

  1. आराम से बैठें: आँखें बंद करें और शांत हो जाएं।
  2. एक शब्द चुनें: कोई भी छोटा शब्द चुनें, जैसे 'अ' या 'ॐ' या अपना नाम।
  3. उच्चारण की तैयारी: शब्द बोलने से ठीक पहले रुकें। उस 'इच्छा' को देखें जो शब्द बोलने के लिए उठ रही है, लेकिन अभी शब्द बना नहीं है। उस मौन को महसूस करें।
  4. उच्चारण और अंत: शब्द बोलें, और जैसे ही ध्वनि समाप्त हो, तुरंत उस बाद वाले मौन को पकड़ लें।
  5. मध्य में शून्यता: धीरे-धीरे, बोलने से पहले और बोलने के बाद के मौन को एक कर दें। महसूस करें कि शब्द तो बस समुद्र की एक लहर थी, असली सत्य वह समुद्र (मौन) है।
विधि के पीछे का विज्ञान और दर्शन

भाषा विज्ञान (Linguistics) कहता है कि दो शब्दों के बीच का खाली स्थान ही उन्हें अर्थ देता है। अगर खाली जगह न हो, तो सब शोर बन जाएगा। यह विधि हमें शब्दों (कोलाहल) से हटाकर उस 'स्पेस' (स्थान) पर ले जाती है जो सभी शब्दों का आधार है।

आध्यात्मिक रूप से, यह हमें 'अनहद नाद' की ओर ले जाती है - वह ध्वनि जो बिना बजाए बज रही है, जो मौन की ध्वनि है। जब हम शब्दों के आदि और अंत को पकड़ लेते हैं, तो हम समय के आदि और अंत को भी समझ लेते हैं।

निष्कर्ष: शून्य ही पूर्णता है

विज्ञान भैरव तंत्र (Vigyan Bhairav Tantra) की ये पांच विधियाँ (36-40) हमें शून्यता (Void) के परम रहस्य से परिचित कराती हैं। हमने देखा कि कैसे खाली जगह, दो वस्तुओं के बीच का अंतराल, और ध्वनि का अंत - ये सभी "कुछ नहीं" (Nothingness) नहीं हैं, बल्कि चेतना के प्रवेश द्वार हैं।

जब हम 'वस्तुओं' को देखना बंद करते हैं और 'स्थान' (Space) को देखना शुरू करते हैं, तो हमारा मन भी वस्तुओं से मुक्त होकर आकाश की तरह अनंत और शांत हो जाता है।

शून्यता से डरें नहीं, उसमें विश्राम करें। वही आपका असली घर है। इन विधियों का प्रयोग करें और अपने भीतर के उस मौन को खोजें जो कभी भंग नहीं होता।

भगवान भैरव से संबंधित अन्य लेख