मकर संक्रांति: क्यों मनाते हैं? शुभ मुहूर्त, महत्व और वैज्ञानिक कारण | Makar Sankranti History & Significance

मकर संक्रांति: प्रकृति और संस्कृति का महापर्व
विज्ञान, परंपरा और आस्था का संगम
भारत त्योहारों का देश है, जहाँ हर ऋतु और खगोलीय घटना का स्वागत उत्सव के साथ किया जाता है। इन्हीं उत्सवों में 'मकर संक्रांति' का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। यह केवल एक धार्मिक त्योहार नहीं, बल्कि यह प्रकृति के परिवर्तन, फसल की कटाई, और सूर्य की दिशा बदलने का एक खगोलीय उत्सव है।
जब कड़कड़ाती ठंड में सूर्यदेव की सुनहरी किरणें पृथ्वी पर नई ऊर्जा लेकर आती हैं, तब कश्मीर से कन्याकुमारी तक पूरा भारत एक नई उमंग में डूब जाता है। आइए, इस लेख में हम मकर संक्रांति के हर पहलू—वैज्ञानिक, पौराणिक और सांस्कृतिक—को गहराई से समझते हैं।
मकर संक्रांति क्या है? (What is Makar Sankranti?)
भारतीय संस्कृति में मकर संक्रांति का स्थान अद्वितीय है। यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि विज्ञान, खगोल शास्त्र (Astronomy) और आस्था का एक अद्भुत संगम है। सरल शब्दों में कहें तो यह 'अंधकार से प्रकाश' की ओर जाने का पर्व है। आइए, इसके अर्थ और मनाने के कारणों को विस्तार से समझते हैं।
1. मकर संक्रांति की परिभाषा (Definition)
'मकर संक्रांति' शब्द दो शब्दों के मेल से बना है— 'मकर' और 'संक्रांति'।
संक्रांति (Sankranti): संस्कृत भाषा में 'संक्रांति' का अर्थ होता है—'सम्यक क्रांति' यानी एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना या प्रवेश करना। ज्योतिष शास्त्र में, जब सूर्य एक राशि (Zodiac Sign) को छोड़कर दूसरी राशि में प्रवेश करता है, तो उस विस्थापन की प्रक्रिया को 'संक्रांति' कहते हैं। साल में कुल 12 संक्रांतियां होती हैं।
मकर (Makar): यह राशि चक्र की दसवीं राशि है, जिसे अंग्रेजी में 'Capricorn' कहा जाता है।
अतः, परिभाषा के रूप में: "वह पावन दिन जब सूर्यदेव धनु राशि (Sagittarius) से अपनी यात्रा समाप्त कर मकर राशि (Capricorn) में प्रवेश करते हैं, उसे मकर संक्रांति कहा जाता है।"
सूर्यस्य संक्रमणं मकरराशौ इति मकरसंक्रांतिः
सूर्य का मकर राशि में संक्रमण ही मकर संक्रांति है।
2. सूर्य का मकर राशि में प्रवेश (Entry of Sun into Capricorn)
यह एक महत्वपूर्ण खगोलीय घटना (Astronomical Event) है। पृथ्वी के सापेक्ष देखने पर सूर्य लगातार अपनी स्थिति बदलता रहता है।
- उत्तरायण का आरम्भ: मकर संक्रांति के दिन, सूर्य अपनी दक्षिण दिशा की यात्रा (दक्षिणायन) समाप्त करके उत्तर दिशा की ओर बढ़ना शुरू करता है। खगोलीय भाषा में, सूर्य इस दिन 'मकर रेखा' (Tropic of Capricorn) पर होता है और अब वह कर्क रेखा (Tropic of Cancer) यानी भारत की ओर लौटना शुरू करता है।
- देवताओं का दिन: इसी वजह से इस घटना को 'उत्तरायण' (Uttarayan) भी कहा जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि दक्षिणायन देवताओं की रात्रि है और उत्तरायण देवताओं का दिन है। इसलिए यह समय सकारात्मक ऊर्जा के संचार का समय माना जाता है।
3. एक सौर पर्व (A Solar Festival)
भारत के अधिकांश त्योहार (जैसे- होली, दिवाली, रक्षाबंधन) चंद्र कैलेंडर (Lunar Calendar) पर आधारित होते हैं, इसीलिए उनकी तारीखें हर साल बदलती रहती हैं।
मकर संक्रांति उन गिने-चुने त्योहारों में से एक है जो सौर कैलेंडर (Solar Calendar) पर आधारित है। चूँकि यह सूर्य की गति पर निर्भर करता है, इसलिए ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार इसकी तारीख लगभग निश्चित रहती है— 14 जनवरी। हालांकि, पृथ्वी की धुरी (Axis) में सूक्ष्म परिवर्तनों के कारण, कभी-कभी यह 15 जनवरी को भी मनाया जाता है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि हमारा जीवन सूर्य की ऊर्जा पर कितना निर्भर है।
4. हम मकर संक्रांति क्यों मनाते हैं? (Why do we celebrate it?)
इस पर्व को मनाने के पीछे कई वैज्ञानिक, सामाजिक और पौराणिक कारण हैं:
प्रमुख 4 कारण
- ऋतु परिवर्तन का स्वागत: मकर संक्रांति कड़कड़ाती ठंड के जाने और सुहाने मौसम (वसंत) के आने का सूचक है। इस दिन के बाद से रातें छोटी होने लगती हैं और दिन बड़े होने लगते हैं। सूर्य का प्रकाश धरती पर अधिक समय तक रहता है, जिससे जीवन में नई ऊर्जा आती है।
- कृषि और किसान का उत्सव: भारत एक कृषि प्रधान देश है। इस समय खेतों में रबी की फसल (जैसे- गेहूं, सरसों, चना) लहलहा रही होती है या पकने की कगार पर होती है। किसान इस उम्मीद में यह त्योहार मनाते हैं कि आने वाली फसल अच्छी हो। यह प्रकृति के प्रति 'कृतज्ञता' (Gratitude) व्यक्त करने का तरीका है।
- स्वास्थ्य का विज्ञान: सर्दी के मौसम में शरीर में कफ और जकड़न बढ़ जाती है। मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ खाने की परंपरा है। तिल में तेल और गुड़ में गर्मी होती है, जो शरीर को अंदर से गर्म रखते हैं। साथ ही, पतंग उड़ाने के बहाने लोग धूप में समय बिताते हैं, जिससे शरीर को प्राकृतिक रूप से विटामिन-डी मिलता है और रोगाणु नष्ट होते हैं।
- धार्मिक महत्व: पुराणों के अनुसार, इस दिन सूर्यदेव अपने पुत्र शनि (जो मकर राशि के स्वामी हैं) के घर मिलने जाते हैं। सूर्य और शनि में पिता-पुत्र होने के बावजूद वैचारिक मतभेद माने जाते हैं, लेकिन इस दिन सूर्य सब कुछ भुलाकर पुत्र के घर जाते हैं। इसलिए यह त्योहार रिश्तों में मिठास और प्रेम का प्रतीक भी है।
मकर संक्रांति का इतिहास और पौराणिक कथा-आधार (History and Mythology)
मकर संक्रांति का इतिहास वेदों और पुराणों जितना ही प्राचीन है। यह पर्व केवल फसलों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार महाभारत काल और देवताओं के युग से जुड़े हुए हैं। हमारे धर्मग्रंथों में इस दिन को 'देव-पर्व' कहा गया है। आइए, उन प्रमुख पौराणिक कथाओं को जानते हैं जो मकर संक्रांति को भारतीय संस्कृति का सबसे पवित्र दिन बनाती हैं।
1. भीष्म पितामह और इच्छा मृत्यु (The Legend of Bhishma Pitamah)
महाभारत की यह कथा मकर संक्रांति के महत्व को सबसे सशक्त रूप में स्थापित करती है। कुरुक्षेत्र के युद्ध में कौरवों के सेनापति भीष्म पितामह को अर्जुन के बाणों ने छलनी कर दिया था। वे 'बाणों की शैया' (Shat-shayya) पर लेटे हुए थे। उन्हें अपने पिता शांतनु से 'इच्छा मृत्यु' का वरदान प्राप्त था, जिसका अर्थ है कि वे अपनी मर्जी से ही प्राण त्याग सकते थे।
शास्त्र मत: भीष्म पितामह युद्ध के दौरान घायल तो हो गए थे, लेकिन उस समय सूर्य 'दक्षिणायन' में था। शास्त्रों के अनुसार, दक्षिणायन (देवताओं की रात्रि) में देह त्यागने पर आत्मा को बार-बार जन्म-मरण के चक्र में फंसना पड़ता है, जबकि 'उत्तरायण' (देवताओं का दिन) में शरीर त्यागने पर आत्मा को सीधा 'मोक्ष' (मुक्ति) प्राप्त होता है।
इसीलिए, भीष्म पितामह ने असहनीय पीड़ा सहते हुए भी लगभग 58 दिनों तक सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की। जैसे ही मकर संक्रांति के दिन सूर्य ने मकर राशि में प्रवेश किया और उत्तरायण शुरू हुआ, उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया।
उत्तरायणे म्रियमाणः न पुनरावर्तते योगी
उत्तरायण में प्राण त्यागने वाले योगी का पुनर्जन्म नहीं होता, वह मोक्ष को प्राप्त करता है।
भीष्म पितामह और उत्तरायण की कथा
"मृत्यु की शैया पर 58 दिन क्यों लेटे रहे भीष्म? जानें पूरा रहस्य"
2. भगवान सूर्य और शनि देव का मिलन (Story of Sun and Saturn)
ज्योतिष और पुराणों के अनुसार, मकर संक्रांति पिता और पुत्र के अनोखे मिलन का पर्व है। सूर्य देव के पुत्र हैं—शनि देव (Shani Dev)। पौराणिक कथाओं में सूर्य और शनि के बीच वैचारिक मतभेद और कड़वाहट का वर्णन मिलता है। शनि देव 'मकर' और 'कुंभ' राशि के स्वामी हैं।
ऐसी मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि के प्रति सारा क्रोध त्यागकर, उनसे मिलने उनके घर (मकर राशि) में प्रवेश करते हैं। सूर्य वहां एक महीने तक रहते हैं। शनि देव तिल और तेल के स्वामी माने जाते हैं, इसलिए सूर्य देव के स्वागत में काले तिल से उनकी पूजा की जाती है।
यह कथा हमें सिखाती है कि चाहे कितने भी मतभेद क्यों न हों, बड़ों को छोटों के प्रति क्षमा भाव रखना चाहिए और परिवार में प्रेम बना रहना चाहिए।
3. भगवान विष्णु और असुरों का अंत (Lord Vishnu’s Victory)
एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन ही भगवान विष्णु ने पृथ्वी लोक से असुरों (दैत्यों) के आतंक को समाप्त किया था।
कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने इस दिन असुरों का संहार करके उनके सिरों को मंदराचल पर्वत के नीचे दबा दिया था। इस प्रकार, यह दिन बुराई पर अच्छाई की जीत और नकारात्मकता के अंत का प्रतीक है। इस जीत की खुशी में देवताओं ने मकर संक्रांति का पर्व मनाया था। इसलिए इस दिन को 'बुराई के खात्मे' का दिन भी माना जाता है।
4. राजा भगीरथ और गंगा अवतरण (Descent of Ganga)
मकर संक्रांति का संबंध पतित-पावनी मां गंगा से भी है। पौराणिक कथा के अनुसार, राजा भगीरथ अपने पूर्वजों (राजा सगर के 60,000 पुत्रों) को कपिल मुनि के श्राप से मुक्त कराने के लिए कठोर तपस्या करके मां गंगा को पृथ्वी पर लाए थे। मकर संक्रांति के दिन ही मां गंगा, भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई अंत में सागर (समुद्र) में मिली थीं।
जिस जगह गंगा जी सागर में मिलीं, उसे आज 'गंगासागर' कहा जाता है। चूंकि इस दिन गंगा जल से राजा सगर के पुत्रों को मोक्ष मिला था, इसलिए आज भी लाखों श्रद्धालु मोक्ष की कामना लेकर मकर संक्रांति पर गंगासागर और अन्य नदियों में डुबकी लगाते हैं।
5. माता यशोदा का व्रत
श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, मकर संक्रांति के व्रत का संबंध भगवान श्री कृष्ण से भी है। मान्यता है कि जब श्री कृष्ण बाल रूप में थे, तब माता यशोदा ने श्री कृष्ण की प्राप्ति और उनकी रक्षा के लिए मकर संक्रांति के दिन ही व्रत रखा था। तब से पुत्र की लंबी आयु और संतान प्राप्ति के लिए महिलाएं इस दिन विशेष पूजा और उपवास करती हैं।
इन सभी कथाओं का सार यही है कि मकर संक्रांति केवल ऋतु बदलने का दिन नहीं है। यह भीष्म पितामह के त्याग, सूर्य-शनि के मिलन, विष्णु जी की विजय और मां गंगा के आशीर्वाद का महापर्व है। यह दिन हमें धैर्य, प्रेम, पवित्रता और मोक्ष का मार्ग दिखाता है।
मकर संक्रांति का ज्योतिषीय आधार: संक्रांति का वास्तविक अर्थ और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का परिवर्तन
मकर संक्रांति केवल एक लोक पर्व नहीं है, बल्कि यह वैदिक ज्योतिष (Vedic Astrology) और खगोल विज्ञान की एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना है। इसे समझने के लिए हमें ब्रह्मांड की गतिविधियों, सूर्य की चाल और राशियों के स्वभाव को गहराई से समझना होगा। ज्योतिष शास्त्र में मकर संक्रांति को 'काल-पुरुष' की आत्मा का नया अध्याय माना जाता है।
आइए, इसके ज्योतिषीय आधार को चार प्रमुख स्तंभों में विस्तार से समझते हैं:
1. 'संक्रांति' शब्द का वास्तविक ज्योतिषीय अर्थ
सामान्य भाषा में संक्रांति का अर्थ 'बदलाव' है, लेकिन ज्योतिष शास्त्र में इसका अर्थ बहुत व्यापक है।
व्युत्पत्ति: 'संक्रांति' शब्द संस्कृत की 'सं' (सम्यक/भली प्रकार) और 'क्रांति' (परिवर्तन/गति) धातु से बना है। इसका शाब्दिक अर्थ है— "एक विशेष और शुभ परिवर्तन।"
- सौर मास का आरंभ: भारतीय ज्योतिष में दो तरह के कैलेंडर होते हैं—चंद्र मास और सौर मास। सूर्य को एक राशि (30 डिग्री) पार करने में लगभग एक महीने का समय लगता है। जब सूर्य एक राशि से निकलकर दूसरी में प्रवेश करता है, तो उसे 'संक्रांति' कहते हैं।
- 12 संक्रांतियां: वर्ष में कुल 12 राशियां (मेष से मीन) होती हैं, इसलिए वर्ष में 12 संक्रांतियां होती हैं। लेकिन इनमें 'मकर संक्रांति' (जब सूर्य मकर में जाता है) और 'कर्क संक्रांति' (जब सूर्य कर्क में जाता है) सबसे प्रमुख हैं, क्योंकि यहीं से सूर्य की दिशा (अयन) बदलती है।
2. सूर्य का संक्रमण और धनु से मकर की यात्रा (The Great Transit)
मकर संक्रांति का सबसे बड़ा ज्योतिषीय घटनाक्रम है—सूर्य का धनु राशि (Sagittarius) को छोड़कर मकर राशि (Capricorn) में प्रवेश करना।
- धनु राशि (अग्नि तत्व): संक्रांति से पहले सूर्य धनु राशि में होता है, जिसके स्वामी 'बृहस्पति' (Guru) हैं। धनु राशि स्वभाव से आध्यात्मिक और ज्ञान की राशि है।
- मकर राशि (पृथ्वी तत्व): मकर राशि के स्वामी 'शनि देव' (Shani) हैं। यह पृथ्वी तत्व की राशि है, जो कर्म, यथार्थ और परिश्रम का प्रतीक है।
- खरमास की समाप्ति: ज्योतिष के अनुसार, जब सूर्य धनु राशि (बृहस्पति के घर) में रहता है, तो उसका तेज कम हो जाता है। इस अवधि को 'खरमास' या 'मलमास' कहते हैं, जिसमें सभी शुभ कार्य (विवाह, गृह प्रवेश) वर्जित होते हैं। जैसे ही सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, खरमास समाप्त हो जाता है और मांगलिक कार्यों के लिए ब्रह्मांड के द्वार फिर से खुल जाते हैं।
- पिता और पुत्र का मिलन: ज्योतिष में सूर्य को 'आत्मा' और 'पिता' माना गया है, जबकि शनि को 'कर्म' और 'पुत्र' माना गया है। मकर संक्रांति के दिन, तेजस्वी सूर्य अपने पुत्र शनि के घर (मकर राशि) में आते हैं। ज्योतिषीय दृष्टि से, यह आत्मा (Soul) का कर्म (Duty) के साथ मिलन है। यह समय हमें सिखाता है कि केवल ज्ञान (धनु) होना काफी नहीं है, उसे कर्म (मकर) में बदलना जरूरी है।
3. उत्तरायण: दिशा और दशा का परिवर्तन (The Northward Journey)
मकर संक्रांति का सबसे गहरा रहस्य 'अयन' में छिपा है। 'अयन' का अर्थ है—गमन या चलना।
- दक्षिणायन से उत्तरायण: पिछले 6 महीनों (जुलाई से दिसंबर) तक सूर्य पृथ्वी के दक्षिणी गोलार्ध (Southern Hemisphere) की ओर झुका हुआ था, जिसे 'दक्षिणायन' कहते हैं। यह समय नकारात्मकता और अंधकार का प्रतीक माना जाता है।
- उत्तरायण का आरंभ: मकर संक्रांति के दिन सूर्य अपनी दिशा बदलकर उत्तर (North) की ओर बढ़ना शुरू करता है। ज्योतिष में 'उत्तर दिशा' को देवताओं और सकारात्मकता की दिशा माना गया है।
- देवताओं का दिन: वैदिक काल गणना के अनुसार, मनुष्यों का एक साल देवताओं के एक दिन-रात के बराबर होता है। उत्तरायण देवताओं का 'दिन' है और दक्षिणायन उनकी 'रात' है। इसीलिए मकर संक्रांति को देवताओं की सुबह (Morning of the Gods) कहा जाता है। यही कारण है कि इस समय किए गए जप, तप और दान का फल हजारों गुना बढ़ जाता है, क्योंकि अब "ब्रह्मांड की शक्तियां जागृत अवस्था में हैं।"
4. ऊर्जा-परिवर्तन और तत्वों का संतुलन (The Shift of Cosmic Energy)
ब्रह्मांड पंचतत्वों (अग्नि, पृथ्वी, जल, वायु, आकाश) से बना है। मकर संक्रांति पर इन तत्वों में एक बड़ा बदलाव आता है।
- तमस से सत्व की ओर: शीतकाल (Winter) में प्रकृति में 'तमस गुण' (आलस्य, भारीपन, अंधकार) बढ़ा रहता है। उत्तरायण के सूर्य की किरणें सीधे पृथ्वी पर पड़ने से वातावरण में 'सत्व गुण' (प्रकाश, पवित्रता, ऊर्जा) और 'रजस गुण' (क्रियाशीलता) का संचार होने लगता है।
- अग्नि और पृथ्वी का संयोग: सूर्य 'अग्नि तत्व' का कारक है और मकर राशि 'पृथ्वी तत्व' की। जब अग्नि पृथ्वी के संपर्क में आती है, तो 'सृजन' (Creation) होता है। जिस तरह धूप मिलने पर बीज धरती से अंकुरित होता है, उसी तरह मकर संक्रांति के बाद से मनुष्य की सोई हुई चेतना और भाग्य भी अंकुरित होने लगते हैं।
- शरीर विज्ञान (Body Astrology): ज्योतिष के अनुसार, मानव शरीर में रीढ़ की हड्डी (Spine) को 'मेरुदंड' माना गया है। मकर संक्रांति के समय सूर्य की बदली हुई चुंबकीय शक्ति (Magnetic force) हमारी रीढ़ की हड्डी और 'सुषुम्ना नाड़ी' को प्रभावित करती है, जिससे आध्यात्मिक ऊर्जा (कुंडलिनी) को जागृत करना आसान हो जाता है।
5. निरयन और सायन गणना (एक सूक्ष्म भेद)
हजारों साल पहले, मकर संक्रांति 21-22 दिसंबर को हुआ करती थी (जब सबसे बड़ा दिन होता है)। लेकिन पृथ्वी अपनी धुरी पर लट्टू की तरह घूमते हुए धीरे-धीरे खिसकती है (Precession of Equinoxes)।
भारतीय वैदिक ज्योतिष 'निरयन पद्धति' (Sidereal Zodiac) का पालन करता है, जो तारों की वास्तविक स्थिति पर आधारित है। जबकि पश्चिमी ज्योतिष 'सायन पद्धति' (Tropical Zodiac) मानता है। इसी खगोलीय अंतर (Ayanamsa) के कारण, वर्तमान में सूर्य वास्तव में 14 या 15 जनवरी को मकर तारामंडल में प्रवेश करता है।
संक्षेप में, मकर संक्रांति केवल तारीख बदलना नहीं है। यह ब्रह्मांडीय घड़ी (Cosmic Clock) का 'रीसेट' (Reset) बटन है। यह वह समय है जब ब्रह्मांड हमें संदेश देता है कि— "अंधकार और आलस्य को छोड़ो, अब कर्म करने और ऊपर उठने (उत्तरायण) का समय आ गया है।"
मकर संक्रांति का वैज्ञानिक महत्व: परंपरा के पीछे छिपा गहरा विज्ञान (Scientific Significance)
भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ धर्म और विज्ञान एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। हमारे ऋषियों ने हजारों साल पहले जिन परंपराओं को 'धर्म' और 'त्योहार' का नाम दिया, आधुनिक विज्ञान आज उनकी उपयोगिता को सिद्ध कर रहा है। मकर संक्रांति केवल पूजा-पाठ का दिन नहीं है, बल्कि यह खगोल भौतिकी (Astrophysics), कृषि विज्ञान (Agriculture) और मानव शरीर क्रिया विज्ञान (Human Physiology) के संतुलन का महापर्व है।
आइए, मकर संक्रांति के वैज्ञानिक पहलुओं को विस्तार से समझते हैं:
1. पृथ्वी का झुकाव और सूर्य की ज्यामिति (Earth’s Tilt and Geometry)
मकर संक्रांति का मूल कारण पृथ्वी और सूर्य के बीच का ज्यामितीय संबंध है।
- 23.5 डिग्री का झुकाव: पृथ्वी अपनी धुरी (Axis) पर 23.5 डिग्री झुकी हुई है। इसी झुकाव के कारण मौसम बदलते हैं। मकर संक्रांति से पहले, पृथ्वी का दक्षिणी गोलार्ध (Southern Hemisphere) सूर्य की ओर झुका होता है, जिससे भारत (उत्तरी गोलार्ध) में सर्दी होती है और सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं।
- उत्तरायण का विज्ञान: 14 जनवरी के आसपास, पृथ्वी अपनी कक्षा (Orbit) में उस स्थिति पर पहुँच जाती है जहाँ से उत्तरी गोलार्ध सूर्य की ओर झुकना शुरू करता है।
- सीधी किरणें (Vertical Rays): मकर संक्रांति के बाद से सूर्य की किरणें कर्क रेखा (भारत के ऊपर) की ओर सीधी पड़ने लगती हैं। विज्ञान के अनुसार, सीधी किरणों में तिरछी किरणों की तुलना में अधिक ऊष्मा (Heat) और ऊर्जा (Energy) होती है। यही ऊर्जा पृथ्वी पर जीवन चक्र को फिर से सक्रिय (Reactivate) करती है।
2. मौसमी मनोविज्ञान (Seasonal Psychology & Mental Health)
यह मकर संक्रांति का सबसे कम चर्चित लेकिन सबसे महत्वपूर्ण वैज्ञानिक पहलू है। पश्चिम में इसे SAD (Seasonal Affective Disorder) के संदर्भ में समझा जाता है।
विंटर ब्लूज (Winter Blues) का अंत: कड़कड़ाती ठंड, कोहरा और धूप की कमी के कारण सर्दियों में मानव मस्तिष्क में 'सेरोटोनिन' (Serotonin) नामक हार्मोन का स्तर गिर जाता है। यह हार्मोन हमारी खुशी और मूड के लिए जिम्मेदार होता है। साथ ही, अंधेरे के कारण 'मेलाटोनिन' (Melatonin) बढ़ जाता है, जिससे सुस्ती और डिप्रेशन महसूस होता है।
- प्रकाश चिकित्सा (Light Therapy): मकर संक्रांति पर हम सूर्य का स्वागत करते हैं। जैसे ही दिन बड़े होने लगते हैं और हम धूप में निकलते हैं (पतंग उड़ाने या स्नान के लिए), सूर्य की रोशनी हमारे ऑप्टिक नर्व (Optic Nerve) के जरिए मस्तिष्क के पीनियल ग्लैंड (Pineal Gland) को संकेत भेजती है। इससे सेरोटोनिन का स्तर बढ़ता है और डिप्रेशन खत्म होता है। मकर संक्रांति मनोवैज्ञानिक रूप से 'उम्मीद' (Hope) और 'सकारात्मकता' की वापसी का दिन है।
मकर संक्रांति के 6 वैज्ञानिक कारण
"जानें क्यों यह पर्व खगोल विज्ञान और सेहत का अद्भुत संगम है"
3. शरीर-ऊर्जा और आहार विज्ञान (Body-Energy and Diet Science)
क्या आपने कभी सोचा है कि इस दिन केवल तिल और गुड़ ही क्यों खाए जाते हैं? यह कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि 'मौसमी आहार विज्ञान' (Seasonal Dietetics) है।
संक्रांति सुपरफूड्स (Superfoods)
- थर्मल रेगुलेशन (तापमान संतुलन): मकर संक्रांति के समय बाहर ठंड होती है, लेकिन शरीर को आने वाले वसंत के लिए तैयार होना होता है।
- तिल (Sesame): तिल में भरपूर मात्रा में तेल (Fat) और प्रोटीन होता है। यह शरीर को अंदर से गर्म रखता है और मांसपेशियों को मजबूती देता है।
- गुड़ (Jaggery): गुड़ में आयरन और सुक्रोज होता है, जो तुरंत ऊर्जा (Instant Energy) देता है और सर्दियों में धीमी पड़ी पाचन क्रिया को तेज करता है।
- खिचड़ी और डिटॉक्स (Detox): इस दिन खिचड़ी खाने का रिवाज है। सर्दियों में हम अक्सर गरिष्ठ (भारी) भोजन खाते हैं। संक्रांति पर मौसम बदलता है, जिससे पाचन तंत्र संवेदनशील हो जाता है। चावल, मूंग दाल, हल्दी और घी से बनी खिचड़ी एक संपूर्ण आहार है जो पेट को हल्का रखती है और शरीर को विषमुक्त (Detoxify) करती है ताकि हम नई ऋतु के लिए तैयार हो सकें।
4. कृषि विज्ञान और प्रकाश संश्लेषण (Agriculture and Photosynthesis)
भारत की पूरी कृषि व्यवस्था सूर्य के चक्र (Solar Cycle) पर आधारित है।
- प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) में वृद्धि: पौधों को भोजन बनाने के लिए सूर्य के प्रकाश की आवश्यकता होती है। मकर संक्रांति के बाद दिन बड़े होने लगते हैं, जिससे सूर्य की रोशनी अधिक समय तक उपलब्ध रहती है। इससे खेतों में खड़ी रबी की फसल (गेहूं, जौ, चना) में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया तेज हो जाती है, जिससे अनाज के दाने पकने और भरने लगते हैं।
- नदी और जल चक्र: हिमालय की बर्फ पिघलने का चक्र भी सूर्य की गर्मी पर निर्भर करता है। उत्तरायण के बाद गर्मी बढ़ने से बर्फ पिघलकर नदियों में आती है, जिससे मैदानी इलाकों में सिंचाई के लिए जल स्तर सुधरता है।
5. सूर्य चिकित्सा और पतंगबाजी (Heliotherapy and Kite Flying)
पतंग उड़ाना केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि स्वास्थ्य लाभ लेने का एक चतुर तरीका है।
- विटामिन-डी की प्राप्ति: प्राचीन काल में ऋषि-मुनियों ने पतंग उड़ाने की परंपरा इसलिए शुरू की ताकि लोग सुबह की ठंडक में रजाई से बाहर निकलें और घंटों धूप में रहें। जब हम पतंग उड़ाते समय ऊपर देखते हैं और धूप हमारी त्वचा पर पड़ती है, तो शरीर में विटामिन-डी का निर्माण होता है। यह हड्डियों के दर्द और सर्दियों में होने वाले त्वचा रोगों (Skin Infections) को ठीक करता है।
- नेत्र ज्योति: पतंग को आसमान में दूर तक देखने और उसकी डोर को संभालने से आंखों की मांसपेशियों की कसरत होती है, जो 'ऑक्यूलर हेल्थ' (Ocular Health) के लिए अच्छा है।
6. संक्रमण काल और बैक्टीरियल सुरक्षा (Transition Period and Hygiene)
'संक्रांति' का अर्थ है संधिकाल (Junction Period)। जब भी मौसम सर्दी से गर्मी या गर्मी से सर्दी की ओर बदलता है, तो वातावरण में बैक्टीरिया और वायरस सक्रिय हो जाते हैं (जैसे फ्लू का मौसम)।
- नदी स्नान का तर्क: मकर संक्रांति पर पवित्र नदियों में स्नान करने या घर पर ताजे जल से नहाने का नियम है। यह शरीर की स्वच्छता बनाए रखने और किसी भी प्रकार के संक्रमण को रोकने का वैज्ञानिक तरीका था।
- हवन और कपूर: पूजा में जलाया जाने वाला कपूर और हवन सामग्री वातावरण के बैक्टीरिया को नष्ट करती है, जिससे हवा शुद्ध होती है।
अतः, मकर संक्रांति हमें सिखाती है कि हम प्रकृति से अलग नहीं हैं। पृथ्वी का हर घूर्णन, सूर्य की हर किरण और मौसम का हर बदलाव हमारे शरीर (Body), मन (Mind) और भोजन (Food) को प्रभावित करता है। यह त्योहार उसी प्राकृतिक लय (Bio-rhythm) के साथ तालमेल बिठाने का एक वैज्ञानिक उत्सव है।
भारत में मकर संक्रांति के विविध रूप: कश्मीर से कन्याकुमारी तक, एक पर्व के अनेक नाम और एक भावना
जनवरी का महीना, हल्की-हल्की ठंड, कोहरे की चादर और इन सबके बीच सूरज की वो पहली सुनहरी किरण जो उम्मीद लेकर आती है। भारतीय संस्कृति में मकर संक्रांति केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति के बदलाव और नई शुरुआत का जश्न है। जब सूर्य देव धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तो पूरा भारतवर्ष एक नई ऊर्जा से भर उठता है। मजेदार बात यह है कि इस त्योहार की तारीख लगभग एक ही होती है (14 या 15 जनवरी), लेकिन इसे मनाने का तरीका हर 100 किलोमीटर पर बदल जाता है। कहीं आसमान में पतंगें उड़ रही हैं, तो कहीं खेतों में अलाव जल रहे हैं। कहीं गुड़-तिल की मिठास है, तो कहीं नए चावल की खुशबू।
आइये, भारत की इस सांस्कृतिक यात्रा पर चलते हैं और जानते हैं कि अलग-अलग राज्यों में मकर संक्रांति को किन-किन खूबसूरत रूपों में मनाया जाता है।
1. उत्तर भारत की शान: लोहड़ी, खिचड़ी और घुघुतिया
उत्तर भारत में यह पर्व कड़ाके की ठंड की विदाई और बसंत की आहट का प्रतीक है।
पंजाब और हरियाणा: लोहड़ी (Lohri)
मकर संक्रांति की पूर्व संध्या पर (यानी एक रात पहले) पंजाब और हरियाणा में लोहड़ी की धूम होती है। यह सिर्फ आग जलाने का रस्म नहीं है, बल्कि यह नई फसल के घर आने की खुशी है।
- माहौल: शाम होते ही हर गली-मोहल्ले में अलाव जलाए जाते हैं। ढोल की थाप पर भांगड़ा और गिद्दा डाला जाता है।
- प्रसाद: अग्नि देव को 'तिल, गुड़, गजक, रेवड़ी और मूंगफली' अर्पित की जाती है। माना जाता है कि अग्नि में डाली गई आहुति सीधे सूर्य देव तक पहुंचती है।
भावना: "ईशर आ, दलिदर जा" (खुशहाली आए और दरिद्रता जाए) गाते हुए लोग एक-दूसरे के सुखमय जीवन की कामना करते हैं।
उत्तर प्रदेश और बिहार: खिचड़ी पर्व (Khichdi Parv)
यहाँ मकर संक्रांति को आम बोलचाल में 'सक्रात' या 'खिचड़ी' कहा जाता है। यह पर्व दान और स्नान के लिए सबसे पवित्र माना जाता है।
- प्रयागराज का संगम: इस दिन गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम (प्रयागराज) में डुबकी लगाने के लिए दुनिया भर से श्रद्धालु आते हैं। इसे माघ मेले की प्रमुख शुरुआत माना जाता है।
- स्वाद: इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलता, बल्कि चावल, उड़द दाल और ढ़ेर सारी सब्जियों को मिलाकर 'खिचड़ी' बनाई जाती है। साथ में घी, पापड़, अचार और दही का आनंद लिया जाता है। ब्राह्मणों को कच्चा सीधा (चावल, दाल, नमक, हल्दी) दान देने की परंपरा है।
उत्तराखंड: घुघुतिया (Ghughutia)
पहाड़ों में इस त्योहार का एक बहुत ही प्यारा रूप देखने को मिलता है जिसे 'घुघुतिया' या 'काले कौवा' त्योहार कहते हैं।
- अनोखी परंपरा: यहाँ आटे और गुड़ से 'घुघुते' (एक प्रकार का पकवान) बनाए जाते हैं। बच्चे इन पकवानों की माला पहनते हैं और सुबह-सुबह कौवों को बुलाते हैं—
"काले कौवा काले, घुघुती माला खा ले..."।
यह मनुष्यों और पक्षियों के बीच के प्रेम को दर्शाता है।
2. पश्चिम भारत का रंग: पतंगबाजी और तिल-गुड़
पश्चिम भारत में यह त्योहार आसमान में रंगों और रिश्तों में मिठास घोलने का काम करता है।
गुजरात: उत्तरायण (Uttarayan)
गुजरात में मकर संक्रांति का मतलब है— काइट फेस्टिवल। यहाँ इसे 'उत्तरायण' कहा जाता है।
- आसमान का नजारा: सूरत से लेकर अहमदाबाद तक, सुबह से शाम तक आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से ढक जाता है। छतों पर डीजे बजते हैं और "काई पो छे" (वो काटा) का शोर गूंजता है।
- खान-पान: पतंगबाजी के साथ-साथ गुजराती लोग 'उंधियू' (मौसमी सब्जियों का मिश्रण) और जलेबी का लुत्फ उठाते हैं। यह दिन दोस्तों और परिवार के साथ समय बिताने का होता है।
महाराष्ट्र: मकर संक्रांत (Makar Sankranti)
महाराष्ट्र में यह पर्व सामाजिक मेल-जोल और पुरानी कड़वाहट मिटाने का दिन है।
- तिल-गुड़ का संदेश: यहाँ लोग एक-दूसरे को तिल और गुड़ से बनी सफेद मिठाइयां देते हैं और एक ही वाक्य कहते हैं—
"तिल-गुड़ घ्या, गोड़-गोड़ बोला"
(तिल-गुड़ लीजिए और मीठा-मीठा बोलिए)
यह वाक्य सिखाता है कि बीती बातों को भूलकर नए सिरे से रिश्तों को संवारा जाए।
- हल्दी-कुंकू: सुहागिन महिलाएं एक-दूसरे को घर बुलाती हैं और हल्दी-कुंकू लगाकर उपहार भेंट करती हैं।
राजस्थान: संक्रांत
वीरों की भूमि राजस्थान में भी पतंगबाजी का जोर रहता है, लेकिन यहाँ सुहागिन महिलाएं विशेष रूप से अपनी सास को या घर की बुजुर्ग महिलाओं को उपहार (सुहाग का सामान) देकर उनका आशीर्वाद लेती हैं। घेवर और फीणी जैसी मिठाइयां इस दिन का मुख्य आकर्षण होती हैं।
3. दक्षिण भारत का उत्सव: पोंगल और संक्रांति
दक्षिण भारत में यह त्योहार पूरी तरह से कृषि और पशुधन के प्रति कृतज्ञता जताने का पर्व है।
तमिलनाडु: पोंगल (Pongal)
तमिलनाडु में मकर संक्रांति को पोंगल के रूप में मनाया जाता है और यह चार दिनों तक चलता है। यह असल में किसानों का नया साल है।
- भोगी पोंगल: घर की साफ-सफाई और पुरानी चीजों को जलाना।
- सूर्य पोंगल: नए चावल और गुड़ को मिट्टी के बर्तन में पकाया जाता है। जब दूध उफन कर बर्तन से बाहर गिरता है, तो लोग खुशी से चिल्लाते हैं— "पोंगालो पोंगल" (खुशियाँ उफन रही हैं)।
- मट्टू पोंगल: यह दिन मवेशियों (गायों और बैलों) को समर्पित है। उन्हें नहलाकर, सजाकर उनकी पूजा की जाती है क्योंकि खेती में उनका बड़ा योगदान होता है।
- कानुम पोंगल: यह परिवार के मिलन और घूमने-फिरने का दिन है।
कर्नाटक और आंध्र प्रदेश: संक्रांति (Sankranthi)
यहाँ इसे 'संक्रांति' या 'पेड्डा पांडुगा' (बड़ा त्योहार) कहते हैं।
- सजावट: घरों के आंगन को गोबर से लीपा जाता है और चावल के आटे से सुंदर 'मुग्गु' (रंगोली) बनाई जाती है। इन रंगोलियों को गेंदे के फूलों से सजाया जाता है।
- एल्लु बेल्ला: कर्नाटक में एक खास मिश्रण 'एल्लु बेल्ला' (तिल, गुड़, सूखा नारियल, मूंगफली) तैयार किया जाता है और पड़ोसियों में बांटा जाता है।
- केरल: मकर विलक्कु (Makaravilakku): केरल में सबरीमाला मंदिर में यह दिन बहुत खास होता है। यहाँ मकर संक्रांति के दिन क्षितिज पर एक दिव्य ज्योति (मकर विलक्कु) दिखाई देती है, जिसके दर्शन के लिए लाखों भक्त जमा होते हैं।
4. पूर्व और पूर्वोत्तर भारत: पीठा और बिहू का आनंद
भारत के पूर्वी हिस्से में यह त्योहार पारंपरिक व्यंजनों और सामुदायिक भोज का प्रतीक है।
पश्चिम बंगाल: पौष संक्रांति (Paush Sankranti)
बंगाल में यह त्योहार खजूर के गुड़ (नलेन गुड़) की खुशबू लेकर आता है।
- गंगासागर मेला: कुंभ के बाद भारत का दूसरा सबसे बड़ा मेला 'गंगासागर' यहीं लगता है। कहा जाता है— "सारे तीरथ बार-बार, गंगासागर एक बार।"
- पीठा-पुली: बंगाल के हर घर में चावल के आटे और गुड़ से 'पीठा' (एक प्रकार का पैनकेक या मिठाई) बनाया जाता है। यह सिर्फ खाना नहीं, बल्कि एक कला है जिसे दादी-नानियां अगली पीढ़ी को सिखाती हैं।
असम: माघ बिहू (Magh Bihu)
असम में इसे माघ बिहू या भोगाली बिहू कहते हैं। 'भोग' का अर्थ है आनंद और भोजन।
- मेजी और भेलाघर: युवा लोग खेतों में बांस और सूखी पत्तियों से अस्थायी झोपड़ियाँ (भेलाघर) बनाते हैं। रात भर वहाँ सामूहिक भोज (Community Feast) होता है। अगली सुबह नहा-धोकर इन झोपड़ियों (मेजी) को जला दिया जाता है और अग्नि देव से प्रार्थना की जाती है।
- व्यंजन: तिल पीठा, लारू (नारियल लड्डू) और मछली के बिना यह त्योहार अधूरा है।
ओडिशा: मकर चौला
ओडिशा में इस दिन भगवान जगन्नाथ को विशेष भोग लगाया जाता है जिसे 'मकर चौला' कहते हैं। यह नए चावल, केला, नारियल, गुड़, रसगुल्ला और काली मिर्च का मिश्रण होता है। लोग इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं और 'मकर बसिबा' (मित्रता की रस्म) निभाते हैं।
चाहे आप पंजाब में 'सुंदर मुंदरिये' गाएं, गुजरात में 'काई पो छे' चिल्लाएं, या तमिलनाडु में 'पोंगालो पोंगल' कहें—मकर संक्रांति की आत्मा एक ही है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि हम प्रकृति से जुड़े हुए हैं। सूर्य हमें रोशनी देता है, नदियां हमें जीवन देती हैं, और धरती हमें अन्न देती है।
भारत की विविधता में एकता का इससे सुंदर उदाहरण और क्या हो सकता है कि भाषाएं बदल जाती हैं, पकवान बदल जाते हैं, लेकिन "उम्मीद और कृतज्ञता" (Hope and Gratitude) की भावना पूरे देश में एक समान रहती है।
मकर संक्रांति की प्रमुख परंपराएँ और अनुष्ठान: पतंगबाजी से लेकर पवित्र स्नान तक का महत्व
मकर संक्रांति केवल ऋतु परिवर्तन का पर्व नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति की उस गहरी समझ का प्रतीक है जहाँ हर रीति-रिवाज के पीछे एक बड़ा वैज्ञानिक और सामाजिक कारण छिपा होता है। जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, तो अंधकार कम होने लगता है और प्रकाश बढ़ने लगता है। इसी प्रकाश के स्वागत में भारत के हर घर में कुछ विशेष परंपराएँ निभाई जाती हैं। चाहे वह आसमान में पेंच लड़ाना हो, कड़कड़ाती ठंड में नदी में डुबकी लगाना हो, या फिर थाली भरकर दही-चूड़ा खाना हो—हर अनुष्ठान का अपना एक अलग मजा और महत्व है। आइए जानते हैं मकर संक्रांति की उन प्रमुख परंपराओं के बारे में जो इसे इतना खास बनाती हैं।
1. पवित्र स्नान: आस्था की डुबकी (Holy Bath)
मकर संक्रांति की शुरुआत ही जल और आस्था के मिलन से होती है। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन सूर्य देव अपने पुत्र शनि के घर जाते हैं और गंगा नदी भी इसी दिन पृथ्वी पर भागीरथ के पीछे-पीछे कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में मिली थीं।
- धार्मिक महत्व: माना जाता है कि इस संक्रांति काल में गंगा, यमुना या किसी भी पवित्र नदी में स्नान करने से पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। प्रयागराज के संगम और पश्चिम बंगाल के गंगासागर में इस दिन लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।
- वैज्ञानिक पक्ष: कड़कड़ाती ठंड में सुबह-सुबह नदी स्नान शरीर के आलस्य को खत्म करता है और मन को एकाग्र करता है। यह एक तरह की जल चिकित्सा (Hydrotherapy) है जो नई ऋतु के लिए शरीर को तैयार करती है।
2. तिल और गुड़ का सेवन: सेहत की मिठास (Sesame and Jaggery)
मकर संक्रांति पर "तिल-गुड़" के बिना उत्सव अधूरा लगता है। लड्डू, चिक्की, गजक और रेवड़ी—ये सब इसी दिन का मुख्य प्रसाद हैं।
- इसके पीछे का विज्ञान: मकर संक्रांति सर्दियों का चरम समय होता है। तिल (Sesame) और गुड़ (Jaggery) दोनों की तासीर गर्म होती है। तिल में तेल और गुड़ में आयरन भरपूर होता है, जो शरीर को अंदर से गर्म रखते हैं और सर्दियों में होने वाली बीमारियों से बचाते हैं।
- सामाजिक संदेश: तिल के दाने अलग-अलग होते हैं, लेकिन गुड़ उन्हें एक साथ चिपका कर लड्डू का रूप देता है। यह इस बात का प्रतीक है कि हम सब अलग हैं, लेकिन प्रेम और भाईचारे की मिठास हमें एक समाज के रूप में बांधे रखती है।
3. पतंगबाजी: आसमान में उम्मीदों की उड़ान (Kite Flying)
गुजरात और राजस्थान में तो मकर संक्रांति का पर्याय ही 'पतंगबाजी' है, लेकिन अब यह पूरे उत्तर भारत में लोकप्रिय है।
- परंपरा: छतों पर "वो काटा!" और "काई पो छे!" का शोर, रंग-बिरंगी पतंगें और दोस्तों की टोली—यह दृश्य अद्भुत होता है। यह केवल खेल नहीं, बल्कि खुशी जाहिर करने का तरीका है।
- सेहत का राज: पुराने समय में पतंग उड़ाने का उद्देश्य लोगों को घर से बाहर निकालना और धूप में समय बिताने के लिए प्रेरित करना था। सुबह की धूप से शरीर को भरपूर विटामिन-डी मिलता है, जो सर्दियों में हुई त्वचा और हड्डियों की समस्याओं को दूर करता है। पतंग के बहाने लोग घंटों धूप में रहते हैं, जो सेहत के लिए फायदेमंद है।
4. दही-चूड़ा और खिचड़ी भोज (Dahi-Chura & Khichdi)
भारत में कोई भी त्योहार भोजन के बिना पूरा नहीं होता। मकर संक्रांति पर "चावल" का विशेष महत्व है क्योंकि यह खरीफ की नई फसल के कटने का समय होता है।
- बिहार और पूर्वी यूपी (दही-चूड़ा): यहाँ मकर संक्रांति को "ठंडा पर्व" भी कहते हैं, यानी इस दिन सुबह आग नहीं जलाई जाती। लोग नाश्ते में 'दही-चूड़ा' (पोहा और दही) और गुड़ खाते हैं। यह पेट के लिए हल्का और सुपाच्य होता है।
- खिचड़ी: दोपहर या रात के भोजन में उड़द दाल और चावल की 'खिचड़ी' बनाई जाती है। इसमें घी और मौसमी सब्जियां (गोभी, मटर, आलू) डाली जाती हैं। इसे आरोग्य का भोजन माना जाता है। इसीलिए इस पर्व को कई जगहों पर 'खिचड़ी पर्व' भी कहा जाता है।
5. गौ-पूजन: प्रकृति के प्रति कृतज्ञता (Cow Worship)
भारत एक कृषि प्रधान देश है और मकर संक्रांति नई फसल का त्योहार है। खेती में बैलों और दूध के लिए गायों का योगदान अमूल्य है, इसलिए इस दिन पशुधन की पूजा की जाती है।
- अनुष्ठान: विशेष रूप से दक्षिण भारत (मट्टू पोंगल) और ग्रामीण उत्तर भारत में, गायों और बैलों को नहलाया जाता है। उनके सींगों को रंगा जाता है, गले में घंटियाँ बांधी जाती हैं और उन्हें गुड़ व हरा चारा खिलाया जाता है। यह परंपरा हमें सिखाती है कि हमें उन बेजुबान जीवों का सम्मान करना चाहिए जो हमारे जीवन का आधार हैं।
6. दान-पुण्य: परोपकार की भावना (Charity/Donation)
मकर संक्रांति को दान का महापर्व माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन किया गया दान सौ गुना होकर वापस मिलता है।
- क्या दान करें: इस दिन मुख्य रूप से तिल, गुड़, खिचड़ी (कच्चा चावल और दाल), ऊनी कपड़े और कंबल का दान गरीबों और जरूरतमंदों को किया जाता है।
- उद्देश्य: यह परंपरा समाज में संतुलन बनाने का प्रयास है। जिनके पास संसाधन हैं, वे अपनी खुशियाँ वंचितों के साथ बांटते हैं।
मकर संक्रांति की ये परंपराएँ—चाहे वह स्नान हो, पतंगबाजी हो, या गाय पूजन—सिर्फ रस्में नहीं हैं। ये हमें प्रकृति, सेहत, समाज और अध्यात्म से जोड़ती हैं। तिल-गुड़ की मिठास और पतंग की ऊँचाई की तरह, यह त्योहार हमें जीवन में ऊँचा उठने और एक-दूसरे के साथ मधुर संबंध बनाए रखने की प्रेरणा देता है।
मकर संक्रांति पूजा-विधि: सूर्य उपासना और दान का महापर्व (Puja Vidhi)
मकर संक्रांति सूर्य देव की उपासना का महापर्व है। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन की गई पूजा और दान का फल अन्य दिनों की तुलना में सौ गुना अधिक मिलता है। यदि आप सही विधि और श्रद्धा से पूजा करते हैं, तो इससे जीवन में आरोग्य, सम्मान और समृद्धि की प्राप्ति होती है। नीचे घर और मंदिर दोनों के लिए सरल और शास्त्रोक्त पूजा विधि दी गई है।
1. आवश्यक पूजा सामग्री (Puja Samagri List)
पूजा शुरू करने से पहले यह सारी सामग्री एकत्रित कर लें:
पूजा सामग्री
- मुख्य सामग्री: सूर्य देव का चित्र या मूर्ति, तांबे का लोटा (कलश)।
- अर्घ्य के लिए: जल, गंगाजल, लाल चंदन (रोली), लाल फूल (गुलाब या गुड़हल), अक्षत (साबुत चावल), काले तिल, थोड़ा सा गुड़।
- भोग (नैवेद्य): तिल और गुड़ के लड्डू, घेवर (क्षेत्रीयता अनुसार), खिचड़ी (कच्ची या पकी हुई)।
- अन्य: दीपक (घी का), धूप-बत्ती, कपूर, कलावा (मौली), आम के पत्ते, दान की सामग्री (चावल, दाल, कंबल आदि)।
2. घर पर पूजा कैसे करें? (Home Puja Vidhi)
यदि आप घर पर ही पूजा कर रहे हैं, तो इन चरणों का पालन करें:
चरण 1: तैयारी और स्नान (Preparation)
- ब्रह्म मुहूर्त: कोशिश करें कि सूर्योदय से पहले उठ जाएं (सुबह 5:00 से 7:00 बजे के बीच)।
- स्नान: नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल और कुछ दाने काले तिल के डाल लें। तिल के पानी से स्नान करना इस दिन बहुत शुभ माना जाता है।
- वस्त्र: स्नान के बाद साफ-सुथरे कपड़े पहनें। यदि संभव हो तो लाल, पीले या केसरिया रंग के वस्त्र पहनें, जो सूर्य के प्रिय रंग हैं।
चरण 2: संकल्प (Sankalp)
अपने घर के मंदिर के सामने आसन बिछाकर पूर्व दिशा (East) की ओर मुख करके बैठें। दाहिने हाथ में थोड़ा सा जल, अक्षत, फूल और तिल लें।
संकल्प: "हे सूर्य देव! मैं (अपना नाम) आज मकर संक्रांति के पावन अवसर पर, अपने परिवार के कल्याण, आरोग्य और सुख-समृद्धि के लिए आपकी पूजा और दान का संकल्प लेता/लेती हूँ।"
संकल्प का जल जमीन पर छोड़ दें।
चरण 3: सूर्य को अर्घ्य देना (Offering Water to Sun)
यह मकर संक्रांति की सबसे मुख्य विधि है।
- तांबे के लोटे में शुद्ध जल भरें।
- उसमें रोली, लाल फूल, काले तिल, अक्षत और गुड़ का छोटा टुकड़ा डालें।
- घर की छत या बालकनी में जाएं जहाँ से सूर्य दिखाई दे (यदि बादल हों, तो पूर्व दिशा की ओर मुख करें)।
- दोनों हाथों से लोटे को अपने सिर से ऊपर उठाएं और धीरे-धीरे जल की धार गिराएं। दृष्टि जल की धार पर रखें ताकि सूर्य की किरणें जल से छनकर आपकी आँखों पर पड़ें।
जल चढ़ाते समय इस मंत्र का उच्च स्वर में उच्चारण करें:
"ॐ घृणि सूर्याय नमः"
(Om Ghrini Suryay Namah)
या
"ॐ आदित्याय नमः"
चरण 4: मुख्य पूजा और भोग (Main Rituals)
- वापस घर के मंदिर में आएं।
- सूर्य देव या विष्णु भगवान की मूर्ति/तस्वीर को गंगाजल से पवित्र करें।
- रोली और अक्षत से तिलक करें।
- घी का दीपक और धूप जलाएं।
- भोग: भगवान को तिल-गुड़ के लड्डू और खिचड़ी (या जो भी पकवान बना हो) का भोग लगाएं।
- आरती: अंत में कपूर जलाकर सूर्य देव की आरती करें। (आप "जय कश्यप नन्दन, ॐ जय अदिति नन्दन" आरती गा सकते हैं)।
चरण 5: बायना निकालना और दान (Donation Ritual)
पूजा के बाद, एक थाली में 14 जगह या 5 जगह थोड़ा-थोड़ा 'सीधा' (चावल, दाल, नमक, हल्दी, तिल के लड्डू, कुछ पैसे) रखें। थाली के चारों ओर तीन बार जल घुमाकर (मिनस कर) इसे किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को दान दें। घर के बड़े-बुजुर्गों के पैर छूकर आशीर्वाद लें।
3. मंदिर में पूजा विधि (Temple Puja Vidhi)
यदि आप मंदिर जाकर पूजा करना चाहते हैं:
- घर से ही अर्घ्य देने के लिए लोटा तैयार करके ले जाएं या मंदिर में जल भर लें।
- सबसे पहले मंदिर के बाहर या खुले प्रांगण में सूर्य देव को अर्घ्य दें।
- शिव मंदिर या विष्णु मंदिर में प्रवेश करें।
- शिवलिंग पर जल, बेलपत्र और काले तिल विशेष रूप से अर्पित करें (शनि दोष निवारण के लिए)।
- भगवान विष्णु/कृष्ण को तिल के लड्डू और तुलसी दल चढ़ाएं।
- मंदिर के पुजारी को 'सीधा' (अन्न और वस्त्र) दान करें और दक्षिणा दें।
4. विशेष मंत्र (Specific Mantras for Puja)
पूजा के दौरान आप इन मंत्रों का जाप कर सकते हैं:
- सूर्य बीज मंत्र: ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः।
- गायत्री मंत्र: ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
- शनि मंत्र (दोष शांति के लिए): ॐ शं शनैश्चराय नमः।
श्री आदित्य हृदय स्तोत्र
"सूर्य देव को प्रसन्न करने और शत्रु नाश के लिए सबसे शक्तिशाली स्तोत्र"
याद रखें: मकर संक्रांति पर पूजा से ज्यादा 'भाव' और 'दान' का महत्व है। जितनी श्रद्धा से आप अर्घ्य देंगे और दान करेंगे, सूर्य देव उतना ही तेज और ओज आपको प्रदान करेंगे।
मकर संक्रांति पर दान का महत्व: क्या देना है श्रेष्ठ और क्या हैं दान के नियम?
भारतीय संस्कृति में मकर संक्रांति को केवल एक पर्व नहीं, बल्कि 'महादान' का दिन माना गया है। शास्त्रों में कहा गया है कि आम दिनों में किए गए दान का फल जहाँ एक गुना मिलता है, वहीं मकर संक्रांति के दिन किया गया दान 'सौ गुना' होकर वापस लौटता है। जब सूर्य देव अपने पुत्र शनि के घर (मकर राशि) में प्रवेश करते हैं, तो यह पिता-पुत्र के मिलन का समय होता है।
इस दिन दान करने से न केवल पुण्य की प्राप्ति होती है, बल्कि कुंडली के ग्रह दोष (विशेषकर शनि और सूर्य) भी शांत होते हैं। लेकिन दान का फल तभी मिलता है जब वह सही वस्तु का, सही विधि से और सही व्यक्ति को दिया जाए। आइए जानते हैं मकर संक्रांति पर दान से जुड़ी हर छोटी-बड़ी जानकारी।
मकर संक्रांति पर क्या देना श्रेष्ठ माना गया है? (Best Items to Donate)
इस पर्व पर कुछ विशेष वस्तुओं के दान का बहुत गहरा ज्योतिषीय और वैज्ञानिक महत्व है। यहाँ उन 5 प्रमुख वस्तुओं की सूची है जिनका दान श्रेष्ठ माना जाता है:
1. तिल और गुड़ (Sesame and Jaggery)
मकर संक्रांति को 'तिल संक्रांति' भी कहा जाता है।
- महत्व: ज्योतिष के अनुसार, 'तिल' का संबंध शनि देव से है और 'गुड़' का संबंध सूर्य देव से है। जब आप तिल-गुड़ का दान करते हैं, तो आप अनजाने में ही सूर्य और शनि दोनों को प्रसन्न कर रहे होते हैं।
- फल: इससे आपसी रिश्तों में मिठास आती है और समाज में मान-सम्मान बढ़ता है।
2. खिचड़ी (चावल और उड़द दाल)
इस दिन कच्ची खिचड़ी (चावल, काली उड़द की दाल, नमक, हल्दी और घी) का दान करना सबसे बड़ा पुण्य माना जाता है।
- महत्व: चावल (चंद्रमा), उड़द दाल (शनि), हल्दी (गुरु), और घी (सूर्य) का प्रतीक हैं।
- फल: खिचड़ी दान करने से कुंडली के लगभग सभी प्रमुख ग्रह शांत होते हैं और जीवन में स्थिरता आती है।
3. ऊनी वस्त्र और कंबल (Warm Clothes & Blankets)
चूँकि यह पर्व कड़कड़ाती ठंड में आता है, इसलिए जरूरतमंदों को ठंड से बचाना सबसे बड़ी मानवता है।
- महत्व: काले रंग के कंबल या ऊनी कपड़े दान करने से 'राहु' और 'शनि' के दोष दूर होते हैं।
- फल: किसी ठिठुरते हुए व्यक्ति को गर्माहट देने से जो मानसिक शांति मिलती है, वह ईश्वर की पूजा के बराबर है।
4. घी और धातु (Ghee and Metal)
गाय के शुद्ध घी का दान करना मोक्षकारक माना जाता है। इसके अलावा, तांबे के बर्तन (सूर्य के लिए) या लोहे की कढ़ाई (शनि के लिए) का दान भी शुभ होता है।
5. गुप्त दान (Secret Donation)
सबसे श्रेष्ठ दान वह है जो "दाएं हाथ से दिया जाए तो बाएं हाथ को भी पता न चले।" बिना किसी दिखावे या सोशल मीडिया पर फोटो डाले, किसी जरूरतमंद की मदद करना ही असली मकर संक्रांति है।
दान के नियम: कैसे करें दान? (Rules of Donation)
दान देते समय मन का भाव (Intention) वस्तु की कीमत से ज्यादा मायने रखता है। शास्त्रों के अनुसार दान के कुछ नियम हैं:
- आदर और विनम्रता: दान कभी भी फेंककर या अपमानित करके नहीं देना चाहिए। दान लेने वाले को सम्मान के साथ दें, क्योंकि वह आपका दान स्वीकार करके आप पर उपकार कर रहा है।
- वस्तु की गुणवत्ता: कभी भी फटा-पुराना कपड़ा, बासी भोजन या टूटी-फूटी चीजें दान न करें। जो चीज आप खुद इस्तेमाल नहीं कर सकते, उसे दान देना पाप का भागीदार बनाता है।
- समय: मकर संक्रांति पर दान पुण्य काल (सुबह स्नान के बाद) में करना सबसे उत्तम होता है।
- संकल्प: दान देने से पहले हाथ में थोड़ा जल और चावल लेकर मन में संकल्प करें और फिर दान सामग्री छुएं।
अक्सर हम दान देने की बात करते हैं, लेकिन शास्त्रों में "दान लेने" के भी कड़े नियम हैं।
1. दान किसे नहीं लेना चाहिए? (Who should NOT accept?)
- समर्थ व्यक्ति: जो व्यक्ति शारीरिक रूप से स्वस्थ है और कमाने में सक्षम है, उसे दान नहीं लेना चाहिए। बिना आवश्यकता के दान लेने से व्यक्ति पर "धार्मिक ऋण" चढ़ता है और उसके अपने पुण्य क्षीण हो जाते हैं।
- पापी या भ्रष्ट व्यक्ति से: शास्त्रों के अनुसार, जो व्यक्ति गलत कार्यों (चोरी, हिंसा, धोखा) से धन कमाता है, उससे दान कभी नहीं लेना चाहिए। ऐसे व्यक्ति का अन्न या धन लेने से आपकी बुद्धि भ्रष्ट हो सकती है और उसके पापों का अंश आप में आ सकता है।
2. दान किसे नहीं देना चाहिए? ऐसे व्यक्ति को दान न दें जो उस पैसे का उपयोग नशा, जुआ या गलत कार्यों में करे। ऐसा करने पर दान देने वाला भी उस पाप का भागीदार बन जाता है। इसलिए कहा गया है— "सुपात्र को ही दान दें" (Give only to the worthy).
मकर संक्रांति पर दान करना केवल एक रस्म नहीं, बल्कि अपनी कमाई का एक हिस्सा समाज को वापस लौटाने का तरीका है। इस साल, प्रयास करें कि आपका दान किसी की वास्तविक जरूरत पूरी करे। चाहे वह किसी गरीब छात्र की फीस हो, किसी भूखे को भोजन हो, या किसी बुजुर्ग को कंबल।
याद रखें, "दिया हुआ कभी व्यर्थ नहीं जाता, वह किसी न किसी रूप में लौटकर वापस जरूर आता है।"
मकर संक्रांति: राशि अनुसार क्या दान करें?
"अपनी राशि के अनुसार दान करके पाएँ धन, सुख और समृद्धि"
मकर संक्रांति पर भूलकर भी न करें ये गलतियाँ: भ्रांतियाँ और सावधानियाँ जो जानना जरूरी है
मकर संक्रांति सूर्य की उपासना और पुण्य कमाने का दिन है। शास्त्रों के अनुसार, जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तो ब्रह्मांड में दैवीय ऊर्जा का प्रवाह बढ़ जाता है। ऐसे पावन अवसर पर हमारी एक छोटी सी गलती हमारे किए-कराए पुण्य को खत्म कर सकती है। अक्सर हम उत्साह में कुछ ऐसी चीजें कर बैठते हैं जो शास्त्रों या स्वास्थ्य के लिहाज से ठीक नहीं होतीं। आइए जानते हैं कि इस मकर संक्रांति पर आपको किन चीजों से परहेज करना चाहिए और किन सावधानियों का ध्यान रखना चाहिए।
मकर संक्रांति पर क्या नहीं करना चाहिए? (Strict Don'ts)
शास्त्रों और लोक परंपराओं के अनुसार, इस दिन कुछ कार्य पूर्णतः वर्जित माने गए हैं:
1. तामसिक भोजन का सेवन (Avoid Non-Veg & Alcohol)
मकर संक्रांति एक सात्विक पर्व है।
- निषेध: इस दिन मांस, मदिरा, अंडा, प्याज और लहसुन का सेवन भूलकर भी नहीं करना चाहिए।
- क्यों: इस दिन सूर्य की ऊर्जा बहुत प्रबल होती है। तामसिक भोजन आपके मन और शरीर में सुस्ती और नकारात्मकता लाता है, जो इस पर्व की मूल भावना के खिलाफ है। खिचड़ी और सात्विक आहार ही ग्रहण करें।
2. बिना स्नान किए भोजन करना
- नियम: मकर संक्रांति के दिन गंगा स्नान या घर पर पानी में गंगाजल मिलाकर नहाना अनिवार्य माना गया है।
- निषेध: बिना नहाए चाय पीना या कुछ भी खाना इस दिन पाप माना जाता है। पहले स्नान, फिर दान और अंत में भोजन—यही सही क्रम है।
3. कड़वे वचन और गुस्सा (Avoid Anger)
- परंपरा: महाराष्ट्र में कहा जाता है— "तिल-गुड़ घ्या, गोड़-गोड़ बोला" (मीठा खाइए और मीठा बोलिए)।
- निषेध: इस दिन घर में कलह, झगड़ा या किसी को अपशब्द कहने से बचें। यह दिन रिश्तों में मिठास घोलने का है। अगर आप दान दे रहे हैं और मन में गुस्सा है, तो वह दान व्यर्थ है।
4. पेड़-पौधों की कटाई
मकर संक्रांति प्रकृति का त्योहार है। इस दिन फसल काटी जाती है, लेकिन हरे पेड़-पौधों को नुकसान पहुँचाना या काटना अशुभ माना जाता है।
पतंगबाजी के दौरान सावधानियाँ (Safety during Kite Flying)
पतंग उड़ाना इस त्योहार की शान है, लेकिन जरा सी लापरवाही इसे मातम में बदल सकती है।
1. चायनीज मांझा (Chinese Manjha) का प्रयोग न करें
यह सबसे महत्वपूर्ण सावधानी है।
- खतरा: प्लास्टिक या कांच की परत चढ़ा हुआ मांझा (धागा) न केवल पक्षियों के पंख काट देता है, बल्कि राह चलते बाइक सवारों और बच्चों के गले के लिए भी जानलेवा साबित होता है।
- जिम्मेदारी: केवल सूती धागे (Saddi) का प्रयोग करें। मजे के लिए किसी की जान जोखिम में न डालें।
2. छत की मुंडेर (Boundaries) का ध्यान रखें
अक्सर बच्चे और बड़े पतंग लूटने या उड़ाने की धुन में छत के किनारे तक पहुँच जाते हैं, जिससे गंभीर हादसे होते हैं। बच्चों को कभी भी बिना निगरानी के छत पर अकेला न छोड़ें।
3. धूप का चश्मा और सनस्क्रीन
चूँकि आप घंटों धूप में आसमान की ओर देखते हैं, इसलिए आँखों की सुरक्षा के लिए चश्मा (Sunglasses) जरूर पहनें और त्वचा को धूप से बचाने का इंतजाम करें।
मकर संक्रांति से जुड़ी भ्रांतियाँ (Myths vs Facts)
समाज में इस पर्व को लेकर कुछ गलतफहमियां भी हैं, जिन्हें दूर करना जरूरी है।
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भ्रांति 1: मकर संक्रांति हमेशा 14 जनवरी को ही होती है।
- सच्चाई: यह एक खगोलीय घटना है जो सूर्य के राशि परिवर्तन पर निर्भर करती है। पिछले कुछ वर्षों में ग्रहों की चाल बदलने के कारण अब यह अक्सर 15 जनवरी को भी मनाई जाती है। इसलिए पंचांग देखकर ही पर्व मनाएं।
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भ्रांति 2: यह केवल हिंदुओं का त्योहार है।
- सच्चाई: हालांकि यह एक वैदिक पर्व है, लेकिन इसका संबंध "प्रकृति और कृषि" से है। सूर्य सबको रोशनी देता है और फसल हर किसान के घर आती है। इसलिए यह पर्व धर्म से ऊपर उठकर प्रकृति के उत्सव का प्रतीक है।
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भ्रांति 3: तिल-गुड़ कितना भी खा सकते हैं।
- सच्चाई: अक्सर लोग स्वाद-स्वाद में बहुत ज्यादा तिल और गुड़ खा लेते हैं। चूँकि इनकी तासीर बहुत गर्म होती है, इसलिए इनका अत्यधिक सेवन पेट की गड़बड़ी या नाक से खून (Nose bleeding) आने का कारण बन सकता है। इसे औषधि और प्रसाद की तरह ही खाएं।
पवित्रता ही कुंजी है
मकर संक्रांति का सार है— शुद्धता। चाहे वह शरीर की हो (स्नान से), मन की हो (मीठी वाणी से), या समाज की हो (सुरक्षित पतंगबाजी से)। इस वर्ष संकल्प लें कि हम न केवल परंपराओं का पालन करेंगे, बल्कि पर्यावरण और दूसरों की सुरक्षा का भी पूरा ध्यान रखेंगे।
सावधान रहें, सुरक्षित रहें और मकर संक्रांति का आनंद लें!
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मकर संक्रांति से जुड़े आपके सवालों के जवाब
मकर संक्रांति कब है, 14 या 15 जनवरी?
उत्तर: हिंदू पंचांग और ग्रहों की गणना के अनुसार, सूर्य जब मकर राशि में प्रवेश करेंगे, तभी पर्व मनाया जाएगा। मकर संक्रांति 14 या 15 जनवरी को मनाई जाती है, हालांकि पुण्य काल के सटीक समय के लिए पंचांग देखना उचित होगा।
मकर संक्रांति पर काले कपड़े क्यों पहने जाते हैं?
उत्तर: आमतौर पर शुभ कार्यों में काला रंग वर्जित होता है, लेकिन मकर संक्रांति पर काले कपड़े पहनना शुभ माना जाता है। वैज्ञानिक कारण यह है कि यह सर्दी का सबसे ठंडा दिन होता है और काला रंग सूर्य की गर्मी को सोखकर (Absorb करके) शरीर को गर्म रखता है। महाराष्ट्र में यह एक परंपरा है।
मकर संक्रांति पर पतंग क्यों उड़ाई जाती है?
उत्तर: इसका मुख्य उद्देश्य सेहत से जुड़ा है। पतंग उड़ाने के बहाने लोग सुबह की धूप में समय बिताते हैं, जिससे शरीर को विटामिन-डी मिलता है और सर्दियों में होने वाले त्वचा रोगों व सर्दी-जुकाम से बचाव होता है।
मकर संक्रांति को 'खिचड़ी पर्व' क्यों कहते हैं?
उत्तर: इस दिन चावल और उड़द दाल की खिचड़ी खाने का विशेष महत्व है। ज्योतिष के अनुसार, खिचड़ी में चावल (चंद्रमा), उड़द दाल (शनि), हल्दी (गुरु) और घी (सूर्य) का मिश्रण होता है, जो सभी ग्रहों को शांत करता है और आरोग्य देता है।
मकर संक्रांति और लोहड़ी में क्या अंतर है?
उत्तर: लोहड़ी मकर संक्रांति से एक रात पहले (मुख्य रूप से पंजाब में) फसल कटाई की खुशी में मनाई जाती है, जिसमें अग्नि पूजा होती है। जबकि मकर संक्रांति अगले दिन सूर्य के राशि परिवर्तन के उपलक्ष्य में मनाई जाती है, जिसमें स्नान और दान का महत्व है।
क्या मकर संक्रांति पर बाल धोना चाहिए?
उत्तर: जी हाँ, मकर संक्रांति पर पवित्र नदी में स्नान करना या घर पर सिर से स्नान करना (बाल धोना) बेहद शुभ माना जाता है। यह शरीर और मन की शुद्धि के लिए जरूरी है।
मकर संक्रांति पर सूर्य देव को अर्घ्य कैसे दें?
उत्तर: तांबे के लोटे में जल लें, उसमें लाल फूल, रोली, थोड़ा सा गुड़ और काले तिल मिलाएं। फिर "ॐ घृणि सूर्याय नमः" मंत्र का जाप करते हुए पूर्व दिशा की ओर मुख करके सूर्य को जल चढ़ाएं।
मकर संक्रांति पर किस चीज का दान सबसे बड़ा माना जाता है?
उत्तर: इस दिन तिल, गुड़, खिचड़ी (कच्चा अन्न) और कंबल का दान सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इसे 'महादान' कहा गया है जो सौ गुना फल देता है।
दक्षिण भारत में मकर संक्रांति को क्या कहते हैं?
उत्तर: तमिलनाडु में इसे पोंगल कहा जाता है, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में संक्रांति, और केरल में मकर विलक्कु के रूप में मनाया जाता है।
मकर संक्रांति के दिन क्या नहीं खाना चाहिए?
उत्तर: इस दिन मांस, मदिरा, प्याज और लहसुन (तामसिक भोजन) का सेवन पूरी तरह वर्जित है। सात्विक भोजन और खिचड़ी ही खानी चाहिए।
क्या मकर संक्रांति से दिन बड़े होने लगते हैं?
उत्तर: जी हाँ, मकर संक्रांति के बाद सूर्य उत्तरायण (Uttarayan) हो जाते हैं, जिससे उत्तरी गोलार्ध में दिन बड़े और रातें छोटी होनी शुरू हो जाती हैं। सर्दी कम होने लगती है।
नवविवाहित जोड़े के लिए मकर संक्रांति क्यों खास है?
उत्तर: पहली मकर संक्रांति पर नई बहू को सुहाग का सामान और 'हलवा' (मिठाई) बांटने की रस्म (हल्दी-कुंकू) होती है। इसे वैवाहिक जीवन में मिठास और बड़ों का आशीर्वाद लेने का शुभ अवसर माना जाता है।
निष्कर्ष: मकर संक्रांति — केवल एक पर्व नहीं, बल्कि अंधकार से प्रकाश की ओर एक यात्रा
मकर संक्रांति केवल पंचांग की एक तारीख नहीं है, और न ही यह सिर्फ तिल-गुड़ की मिठास या पतंगबाजी के शोर तक सीमित है। अगर हम गहराई से देखें, तो यह पर्व भारतीय संस्कृति के मूल मंत्र 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' (हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो) का सबसे जीवंत उदाहरण है।
जब सूर्य उत्तरायण होते हैं, तो यह संकेत है कि लंबी रातों (मुश्किलों और अंधकार) का समय अब खत्म हो रहा है और दिन (उम्मीद और प्रकाश) बड़े होने वाले हैं। यह पर्व हमें सिखाता है कि जीवन में परिवर्तन ही एकमात्र सत्य है। कड़कड़ाती ठंड के बाद बसंत का आना तय है, ठीक वैसे ही जैसे संघर्ष के बाद सफलता का आना।
चाहे आप इसे पंजाब में लोहड़ी की अग्नि के साथ मनाएं, गुजरात में पतंगों के जरिए आसमान छुएं, या तमिलनाडु में पोंगल के जरिए प्रकृति का आभार जताएं—हर रूप में हम एक ही संदेश दे रहे हैं: कृतज्ञता (Gratitude) और एकजुटता।
तो आइए, इस वर्ष संकल्प लें कि हम:
- सिर्फ आसमान में पतंगें ही ऊँची नहीं उड़ाएंगे, बल्कि अपने विचारों और कर्मों को भी ऊँचा उठाएंगे।
- तिल और गुड़ की तरह बिखरने के बजाय, समाज में एक-दूसरे से जुड़े रहेंगे और रिश्तों में मिठास घोलेंगे।
- और सबसे जरूरी, अपनी क्षमता अनुसार दान करके किसी के जीवन के अंधेरे को कम करने का प्रयास करेंगे।
सूर्य देव की यह नई ऊर्जा आपके जीवन में आरोग्य, सुख और समृद्धि लेकर आए। इन्हीं शुभकामनाओं के साथ...
आप सभी को मकर संक्रांति की अनंत शुभकामनाएं!
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