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उमाष्टकम् (स्वामी स्वयमानन्दजी कृत)

उमाष्टकम् (स्वामी स्वयमानन्दजी कृत)
उमाष्टकम्
चामरं दक्षिणे हस्ते कमलं चोत्तरे तथा ।
रक्ताम्बरा दयामूर्तिः प्रसन्नोमास्तु सर्वदा ॥ १॥

सुवर्णसदृशीं गौरीं भुजद्वय-समन्विताम् ।
नीलपद्म हि वामेन पाणिना बिभ्रतीं सदा ॥ २॥

दिवाकर-शतद्युतिं जननीं भुक्तिमुक्तिदाम ।
सुमुखीं वरदां देवी सिंहस्थां परिपूजयेत् ॥ ३॥

भक्ताय शिवरामाय स्नुषा ब्राहस्य सन्निधौ ।
स्वप्ने स्वं दर्शयामास रूपं वैराग्यदं शुभम् ॥ ४॥

काकरूपा ततो देवी भक्तानुग्रहकाम्यया
ओङ्काररूपसंभूता पञ्चधाऽभयदायिनी ॥ ५॥

प्रादुर्भूता नदीरूपा भक्तानां फलदायिनी ।
ओङ्काररूपसदृशी पञ्चधा दिव्य-कुण्डजा ॥ ६॥

भक्तः प्रभावयुक्तायाः स्वयमानन्दनामकः ।
देव्या भवनं निर्मातुं शिलान्यासं चकार सः ॥ ७॥

ओङ्काररूपेण विराजमाना सा पूजकानां वरदायिनी च ।
रक्ताम्बरा दिव्यवपुः उमाख्या सा ब्रह्मरूपा विजयस्य दात्री ॥ ८॥

इति उमाष्टकं सम्पूर्णम् ।

इस अष्टकम् का विशिष्ट महत्व

यह उमाष्टकम् (Uma Ashtakam) एक विशेष और अर्वाचीन रचना है, जो किसी पौराणिक ग्रंथ से न होकर, साक्षात् देवी की प्रेरणा से प्रकट हुई है। स्तोत्र के भीतर ही इसका संदर्भ मिलता है, जहाँ बताया गया है कि माँ उमा (Goddess Uma) ने अपने भक्त शिवराम को स्वप्न में दर्शन दिए। इस अष्टकम् की रचना स्वामी स्वयमानन्दजी (Swami Swayamanandaji) ने की थी, जिन्होंने देवी के इस दिव्य स्वरूप और लीला का वर्णन किया है। इसकी विशिष्टता इस बात में है कि यह देवी के एक प्रकट स्वरूप का वर्णन करता है, जो भक्तों पर कृपा करने के लिए कौवे (काकरूपा), नदी (नदीरूपा) और ओंकार (Omkar) के रूप में प्रकट हुईं। यह स्तोत्र देवी के भक्त-वात्सल्य (love for devotees) और उनकी सहज कृपा का जीवंत प्रमाण है।

अष्टकम् के प्रमुख भाव और लाभ

इस दिव्य अष्टकम् का पाठ करने से साधक को माँ उमा की विशेष कृपा प्राप्त होती है:

  • दिव्य दर्शन की प्राप्ति (Attainment of Divine Vision): चूँकि यह स्तोत्र स्वयं एक दिव्य स्वप्न-दर्शन पर आधारित है, इसका भक्तिपूर्वक पाठ करने से साधक को भी देवी के कृपापूर्ण स्वरूप के दर्शन की योग्यता प्राप्त होती है। यह देवी के उस रूप का ध्यान करने में मदद करता है जो भक्तों के लिए सुलभ है।

  • सर्व-अभय की प्राप्ति (Receiving Fearlessness): स्तोत्र में देवी को "पञ्चधाऽभयदायिनी" कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वे पाँच प्रकार के भयों से अभय प्रदान करती हैं। इसका पाठ करने से सभी प्रकार के सांसारिक, मानसिक और आध्यात्मिक भय (fear) दूर होते हैं।

  • भोग और मोक्ष की प्रदाता (Giver of Worldly Pleasures and Liberation): माँ को "भुक्तिमुक्तिदाम्" कहा गया है। इसका अर्थ है कि वे अपने भक्तों को न केवल सांसारिक सुख-सुविधाएं (भुक्ति) प्रदान करती हैं, बल्कि अंत में मोक्ष (liberation) का मार्ग भी प्रशस्त करती हैं।

  • कार्यों में विजय (Victory in Endeavors): अंतिम श्लोक में देवी को "विजयस्य दात्री" अर्थात् विजय प्रदान करने वाली कहा गया है। किसी भी शुभ कार्य को आरम्भ करने से पूर्व इस स्तोत्र का पाठ करने से उस कार्य में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और सफलता (success) प्राप्त होती है।

पाठ करने की विधि और विशेष अवसर

  • इस स्तोत्र का पाठ करने के लिए शुक्रवार का दिन सबसे उत्तम माना जाता है।

  • नवरात्रि (Navaratri), पूर्णिमा, या किसी भी शुभ दिन पर इसका पाठ करना विशेष फलदायी होता है।

  • प्रातःकाल स्नान के बाद, माँ पार्वती या दुर्गा के चित्र के सामने लाल पुष्प और घी का दीपक जलाकर इस स्तोत्र का पाठ करें।

  • चूंकि यह स्तोत्र एक मंदिर की स्थापना से भी जुड़ा है (देव्या भवनं निर्मातुं शिलान्यासं), इसलिए किसी नए घर, दुकान या किसी भी शुभ निर्माण कार्य को शुरू करने से पहले इसका पाठ करना बहुत शुभ माना जाता है।