Sri Parankusa Ashtakam – श्री पराङ्कुशाष्टकम् (श्रीपराशरभट्ट कृतम्)

श्री पराङ्कुशाष्टकम्: परिचय एवं नम्माल्वार की महिमा (Introduction)
श्री पराङ्कुशाष्टकम् (Sri Parankusa Ashtakam) श्री वैष्णव संप्रदाय के सबसे पूजनीय संत नम्माल्वार (Nammalvar) की दिव्य स्तुति है। इस अष्टक की रचना महान आचार्य श्रीपराशरभट्ट (Parasara Bhattar) द्वारा की गई है। 'पराङ्कुश' नम्माल्वार का ही एक नाम है, जिसका अर्थ है - "वह जो दूसरों के लिए अंकुश (नियंत्रक) के समान प्रभावशाली है"। नम्माल्वार को श्री वैष्णव संप्रदाय में 'प्रपन्न जन कूटस्थ' माना जाता है, जिसका अर्थ है "शरणागति के मार्ग पर चलने वाले सभी भक्तों के मूल पुरुष"।
नम्माल्वार ने साक्षात् भगवान विष्णु के दर्शन प्राप्त किए थे और उन्होंने तमिल भाषा में 'तिरुवायमौली' (Thiruvaimozhi) जैसे दिव्य प्रबंधों की रचना की, जिन्हें 'द्राविड़ वेद' कहा जाता है। श्रीपराशरभट्ट ने इस अष्टक में नम्माल्वार के चरणों की महिमा का गान किया है। श्लोक १ में वे कहते हैं कि नम्माल्वार के चरण 'त्रैविद्य' (तीनों वेदों के ज्ञाता) विद्वानों के मस्तक का आभूषण हैं और सात्विक भक्तों के लिए नित्य संपत्ति हैं। यह अष्टक केवल एक संत की स्तुति नहीं है, बल्कि भगवान की शरणागति (Prapatti) के उस द्वार की वंदना है जिसे नम्माल्वार ने खोला था।
आध्यात्मिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से, श्री पराङ्कुशाष्टकम् अज्ञान के अंधकार को मिटाने वाली एक ज्योति है। श्लोक ४ में नम्माल्वार को 'वकुलभूषण भास्कर' कहा गया है, अर्थात् वे वकुल फूलों के आभूषण धारण करने वाले ऐसे सूर्य हैं जो मनुष्यों के अज्ञान रूपी अंधकार को नष्ट कर देते हैं। इस अष्टक का गान करने से साधक को न केवल नम्माल्वार की कृपा मिलती है, बल्कि साक्षात् लक्ष्मीपति नारायण के चरणों में अनन्य भक्ति का उदय होता है। ५०० से अधिक शब्दों के इस विस्तृत परिचय में हमें यह समझना चाहिए कि पराङ्कुशाष्टकम् श्री वैष्णव संप्रदाय की आधारशिला है।
इस अष्टक की रचना का उद्देश्य भक्तों को यह समझाना है कि ईश्वर तक पहुँचने का सबसे सुगम मार्ग उनके महान भक्तों का आश्रय लेना है। श्रीपराशरभट्ट ने नम्माल्वार के लिए 'शठकोप' नाम का भी प्रयोग किया है, जिसका अर्थ है—"वह जिसने 'शठ' नामक वायु (अहंकार और अज्ञान) को पराजित कर दिया"। यह अष्टक साधक के हृदय में उसी दिव्य प्रेम और वैराग्य का संचार करता है जो नम्माल्वार के हृदय में भगवान विष्णु के प्रति था।
स्तोत्र का विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व एवं दार्शनिक पक्ष (Significance)
श्री पराङ्कुशाष्टकम् का दार्शनिक पक्ष 'द्राविडीं ब्रह्मसंहिताम्' (श्लोक ३) के विचार पर टिका है। श्रीपराशरभट्ट नम्माल्वार को एक ऋषि के रूप में देखते हैं जिन्होंने वेदों की हजारों शाखाओं को तमिल भाषा (द्राविडी) में सरल बनाकर जन-साधारण के लिए सुलभ कर दिया। यह अष्टक हमें बताता है कि भक्ति भाषा की मोहताज नहीं है; हृदय की पुकार किसी भी भाषा में हो, वह ईश्वर तक पहुँचती है। नम्माल्वार की कविताएं संस्कृत वेदों का ही रसात्मक रूप हैं।
इस अष्टक का एक और विशिष्ट पहलू नम्माल्वार का 'इमली के वृक्ष' (तिन्त्रिणीमूल) के नीचे निवास करना है (श्लोक ६)। मान्यता है कि नम्माल्वार ने कई वर्षों तक एक इमली के वृक्ष के नीचे मौन समाधि में बैठकर भगवान का ध्यान किया था। श्रीपराशरभट्ट ने उनके इस त्याग और ज्ञान की अवस्था को नमन किया है। नम्माल्वार का 'वकुलभूषण' नाम भी अत्यंत महत्वपूर्ण है; वे वकुल (मौलश्री) के फूलों की माला पहनते थे, जो उनके सात्विक और शांत स्वरूप का प्रतीक है।
श्लोक ८ में प्रयुक्त रूपक अत्यंत प्रभावशाली हैं। यहाँ नम्माल्वार की हस्तमुद्रा (ज्ञान मुद्रा) को एक चंद्रमा के समान बताया गया है जो प्रपन्न भक्तों के हृदय में शांति प्रदान करती है। उनकी भक्ति को एक तूलिका (Brush) के समान बताया गया है जो भक्त के चित्त रूपी दीवार पर भगवान के दिव्य चित्र अंकित कर देती है। यह अष्टक हमें यह शिक्षा देता है कि गुरु का आश्रय ही भवसागर से पार होने का 'नरेन्द्र मंत्र' (अमोघ मंत्र) है।
अष्टक पाठ के दिव्य लाभ एवं फलश्रुति (Benefits)
श्री वैष्णव संप्रदाय के आचार्यों और भक्तों के अनुसार, इस अष्टक के नित्य पाठ से निम्नलिखित फल प्राप्त होते हैं:
पाठ विधि एवं साधना के नियम (Ritual Method)
श्री पराङ्कुशाष्टकम् का पाठ अत्यंत पवित्र भाव से किया जाना चाहिए। श्री वैष्णव संप्रदाय के अनुसार इसकी साधना के कुछ नियम यहाँ दिए गए हैं:
दैनिक साधना निर्देश
- समय: प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) पाठ के लिए सर्वोत्तम है। नम्माल्वार का ध्यान करते हुए प्रातः काल इसका गान करना अज्ञान का नाश करता है।
- शुद्धि: स्नान के पश्चात श्वेत वस्त्र या सात्विक वस्त्र धारण करें। माथे पर 'ऊर्ध्व पुण्ड्र' (तिलक) धारण करना विशेष शुभ है।
- आसन: ऊनी या कुशा के आसन पर बैठकर दक्षिण दिशा की ओर मुख (नम्माल्वार का स्थान 'आल्वारतिरुनागरी' दक्षिण में है) या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
- ध्यान: नम्माल्वार की उस छवि का ध्यान करें जिसमें वे इमली के वृक्ष के नीचे ज्ञान मुद्रा में विराजमान हैं।
- अर्पण: भगवान विष्णु के चरणों में तुलसी दल अर्पित करें और नम्माल्वार के चरणों का मानसिक पूजन करें।
विशेष साधना अवसर
- वैशाख विशाखा: नम्माल्वार के जन्म नक्षत्र (विशाखा) के दिन इस अष्टक का १०८ बार पाठ करना अत्यंत पुण्यकारी है।
- मार्गशीर्ष (धनुर्मास): धनुर्मास के दौरान भगवान विष्णु की आराधना के साथ नम्माल्वार की स्तुति करना मोक्ष प्रदायक है।
- एकादशी: आध्यात्मिक शुद्धि के लिए एकादशी के दिन इसका सस्वर पाठ करें।
श्री पराङ्कुशाष्टकम् संबंधी अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)