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Sri Krishna Sharanashtakam 2 – श्री कृष्ण शरणाष्टकम् २ (श्रीहरिरायाचार्य कृतम्)

Sri Krishna Sharanashtakam 2 – श्री कृष्ण शरणाष्टकम् २ (श्रीहरिरायाचार्य कृतम्)
॥ श्री कृष्ण शरणाष्टकम् २ ॥ (श्रीहरिरायाचार्य विरचितम्) स्वामिनीचिन्तया चित्तखेदखिन्न मुखाम्बुजः । निमीलन्नेत्रयुगलः श्रीकृष्णश्शरणं मम ॥ १ ॥ मनोजभावभरितो भावयन्मनसा रतिम् । मीलनव्याकुलमनाः श्रीकृष्णश्शरणं मम ॥ २ ॥ निश्श्वासशुष्यद्वदनो मधुराधरपल्लवः । मुरलीनादनिरतः श्रीकृष्णश्शरणं मम ॥ ३ ॥ निकुञ्जमन्दिरान्तस्थ-स्सुमपल्लवतल्पकृत् । प्रतीक्षमाणस्स्वप्राप्तिं श्रीकृष्णश्शरणं मम ॥ ४ ॥ वियोगभावविहस-द्वदनाम्बुजसुन्दरः । आकर्णयन्नलिरुतं श्रीकृष्णश्शरणं मम ॥ ५ ॥ मुञ्चन्नश्रूणि विलुठन् गायन्मत्त इव क्वचित् । नृत्यन् रसासक्तमनाः श्रीकृष्णश्शरणं मम ॥ ६ ॥ शयान एकतस्तल्पे स्वप्नसम्बन्धसिद्धये । प्रबोधपश्चात्तप्तो यः श्रीकृष्णश्शरणं मम ॥ ७ ॥ रसात्मरसरीतिज्ञो रसलीलापरायणः । रसात्मगोपीरसिकः श्रीकृष्णश्शरणं मम ॥ ८ ॥ ॥ इति श्रीहरिरायाचार्यविरचितं श्रीकृष्णशरणाष्टकम् ॥

श्री कृष्ण शरणाष्टकम् २: परिचय एवं विरह भक्ति का स्वरूप (Introduction)

श्री कृष्ण शरणाष्टकम् २ (Sri Krishna Sharanashtakam 2) पुष्टिमार्गीय परंपरा के महान आचार्य और प्रकांड विद्वान श्रीहरिरायाचार्य जी (Shri Harirayacharya) द्वारा रचित एक अत्यंत मर्मस्पर्शी स्तोत्र है। श्रीहरिरायाचार्य जी महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के वंशज थे और उन्होंने भक्ति मार्ग में 'दैन्य' और 'विरह' भाव को चरमोत्कर्ष पर पहुँचाया। यह अष्टक अन्य शरणागति स्तोत्रों से भिन्न है क्योंकि इसमें भगवान श्रीकृष्ण के उस स्वरूप का वर्णन किया गया है जो अपनी आह्लादिनी शक्ति 'स्वामिनी' (श्री राधा रानी) की चिंता में निमग्न हैं।

इस अष्टक का मुख्य भाव 'विरह' (Separation) है। पुष्टिमार्ग में विरह को संयोग से भी श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि विरह में भक्त और भगवान एक-दूसरे का निरंतर स्मरण करते हैं। श्लोक १ में वर्णित "स्वामिनीचिन्तया चित्तखेदखिन्न मुखाम्बुजः" का अर्थ है—श्री राधा जी की चिंता में जिनका मुख-कमल व्याकुल है। यह स्तोत्र हमें यह सिखाता है कि जिस प्रकार भक्त भगवान के लिए तड़पते हैं, उसी प्रकार करुणासागर श्रीकृष्ण भी अपने अनन्य प्रेमियों के लिए व्याकुल रहते हैं।

श्रीहरिरायाचार्य जी ने इस रचना के माध्यम से यह प्रतिपादित किया है कि 'शरणागति' केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि हृदय का वह भाव है जहाँ साधक स्वयं को श्रीकृष्ण के उन चरणों में अर्पित कर देता है जो स्वयं प्रेम के अधीन हैं। ५०० से अधिक शब्दों के इस विस्तृत विवेचन में यह समझना अनिवार्य है कि 'श्रीकृष्णः शरणं मम' (श्रीकृष्ण मेरी शरण हैं) पुष्टिमार्ग का मूल मंत्र है। जब हम इस अष्टक का पाठ करते हैं, तो हम केवल भगवान की स्तुति नहीं कर रहे होते, बल्कि उनके उस मानवीय और प्रेम-विह्वल स्वरूप से जुड़ रहे होते हैं जो हमें अहंकार से मुक्त कर साक्षात् प्रेम रस की ओर ले जाता है।

इस अष्टक की विशिष्टता इसकी दार्शनिक गहराई में छिपी है। यह स्तोत्र भगवान को 'सर्वशक्तिमान' के स्थान पर 'सर्वरसात्मक' के रूप में चित्रित करता है। यहाँ श्रीकृष्ण वह 'रसिक' हैं जो अपनी स्वामिनी के बिना अधूरे हैं। यह दिव्य विरह साधक के हृदय को शुद्ध कर उसमें 'गोपी-भाव' जाग्रत करता है, जो भक्ति की सर्वोच्च अवस्था मानी गई है।

अष्टक का विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व (Significance)

श्री कृष्ण शरणाष्टकम् २ का महत्व इसकी 'माधुर्य' भक्ति में निहित है। श्लोक ३ में "मुरलीनादनिरतः श्रीकृष्णश्शरणं मम" के माध्यम से यह बताया गया है कि विरह की अवस्था में भी प्रभु की मुरली का नाद गूँजता है, जो भक्तों के लिए आशा और शांति की किरण है। श्रीहरिरायाचार्य जी ने श्रीकृष्ण के नेत्रों के बंद होने (निमीलन्नेत्रयुगलः) और उनके हृदय की व्याकुलता का जो चित्रण किया है, वह साधक के भीतर करुणा और अनुराग उत्पन्न करता है।

इस अष्टक का एक और महत्वपूर्ण पहलू 'निकुंज लीला' का वर्णन है। श्लोक ४ में भगवान को 'सुमपल्लवतल्पकृत्' (फूलों के पत्तों की शय्या तैयार करने वाले) कहा गया है। यह दर्शाता है कि भगवान स्वयं भक्त की प्रतीक्षा में तत्पर रहते हैं। यह भाव साधक के उस हीन-ग्रंथि (Inferiority Complex) को समाप्त कर देता है कि वह तुच्छ है; यह स्तोत्र उसे बताता है कि वह प्रभु के लिए कितना मूल्यवान है।

दार्शनिक रूप से, 'शरणं मम' की पुनरावृत्ति हमारे अवचेतन मन को यह दृढ़ विश्वास दिलाती है कि हम अकेले नहीं हैं। रसात्मक दृष्टि से, यह अष्टक 'रसरीतिज्ञ' श्रीकृष्ण की महिमा करता है जो समस्त रसों के ज्ञाता हैं। इस पाठ से साधक को न केवल शांति मिलती है, बल्कि उसे ब्रज की उन अलौकिक कुंजों का अनुभव होता है जहाँ प्रेम ही एकमात्र कानून है।

फलश्रुति: पाठ से प्राप्त होने वाले दिव्य लाभ (Benefits from Recitation)

श्रीहरिरायाचार्य जी के इस अष्टक का पाठ श्रद्धापूर्वक करने से निम्नलिखित आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं:

मानसिक संतापों का शमन: यह पाठ मानसिक अशांति और अवसाद (Depression) को दूर कर चित्त को शीतलता प्रदान करता है।
अनन्य शरणागति: निरंतर पाठ से 'कृष्णः शरणं मम' का भाव जाग्रत होता है, जिससे साधक संसार के भयों से मुक्त हो जाता है।
राधा-कृष्ण भक्ति की प्राप्ति: चूँकि इसमें स्वामिनी (राधा जी) का चिंतन समाहित है, यह पाठ साधक को युगल स्वरूप की भक्ति प्रदान करता है।
अहंकार का विसर्जन: प्रभु के विरह और दैन्य भाव का गान करने से साधक का मिथ्या अहंकार नष्ट होता है।
दिव्य आनंद की अनुभूति: 'सदानन्द' स्वरूप श्रीकृष्ण का स्मरण करने से साधक को लौकिक सुखों से परे अलौकिक आनंद मिलता है।

पाठ विधि एवं साधना के नियम (Ritual Method)

श्री कृष्ण शरणाष्टकम् २ का पाठ यदि नियमपूर्वक किया जाए, तो इसके परिणाम अत्यंत सुखद होते हैं। पुष्टिमार्गीय साधना के अनुसार इसके कुछ मुख्य निर्देश यहाँ दिए गए हैं:

साधना के चरण

  • समय: प्रातःकाल स्नान के पश्चात 'श्रृंगार' या 'मंगला' के समय पाठ करना सर्वोत्तम है। संध्या के समय भी एकाग्र मन से पाठ किया जा सकता है।
  • पवित्रता: शुद्ध और सात्विक होकर पीले या श्वेत वस्त्र धारण करें।
  • आसन: ऊनी या कुशा के आसन पर बैठकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करें।
  • पूजन: भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी के युगल विग्रह के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • भाव: पाठ करते समय यह विचार करें कि आप श्रीकृष्ण के सम्मुख खड़े हैं और वे आपकी पुकार सुन रहे हैं।

विशेष अवसर

  • जन्माष्टमी एवं राधाष्टमी: इन विशेष तिथियों पर ८ या १०८ बार पाठ करना विशेष फलदायी है।
  • कार्तिक मास: पूरे कार्तिक माह में नित्य पाठ करने से अक्षय पुण्य और प्रेम-भक्ति प्राप्त होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्री कृष्ण शरणाष्टकम् २ के रचयिता कौन हैं?

इस दिव्य अष्टक के रचयिता श्रीहरिरायाचार्य जी हैं। वे पुष्टिमार्ग के महान आचार्य और वल्लभाचार्य जी के वंशज थे।

2. 'स्वामिनीचिन्तया' शब्द का यहाँ क्या अर्थ है?

'स्वामिनी' पुष्टिमार्ग में श्री राधा रानी को कहा जाता है। 'स्वामिनीचिन्तया' का अर्थ है - श्री राधा जी के चिंतन में मग्न होना।

3. यह अष्टक अन्य कृष्ण स्तोत्रों से कैसे भिन्न है?

यह अष्टक भगवान श्रीकृष्ण के 'विरह' और उनके 'रसिक' स्वरूप पर केंद्रित है, जबकि अन्य स्तोत्र अक्सर उनके ऐश्वर्य या शक्ति का वर्णन करते हैं।

4. क्या इस पाठ को प्रतिदिन करना चाहिए?

हाँ, प्रतिदिन पाठ करने से भगवान के प्रति अनन्य शरणागति का भाव पुष्ट होता है और मानसिक कष्ट दूर होते हैं।

5. 'कृष्णः शरणं मम' का क्या महत्व है?

यह अष्टाक्षर मंत्र है जिसका अर्थ है "श्रीकृष्ण मेरी शरण हैं"। यह जीवात्मा के पूर्ण समर्पण का प्रतीक है।

6. क्या इस पाठ से कुंडली के दोष शांत होते हैं?

भक्ति ग्रंथों के अनुसार, साक्षात् परब्रह्म की शरण लेने से सभी ग्रहों और प्रारब्ध के प्रतिकूल प्रभाव क्षीण हो जाते हैं।

7. क्या स्त्रियों को यह पाठ करने की अनुमति है?

जी हाँ, भगवान की भक्ति में कोई भेदभाव नहीं है। शुद्ध हृदय से कोई भी श्रद्धालु इसका पाठ कर सकता है।

8. 'मुरलीनादनिरतः' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है "जो मुरली बजाने में निरंतर मग्न हैं"। श्रीकृष्ण की मुरली की ध्वनि ब्रह्मांड की परम शांति का संगीत है।

9. क्या इस पाठ को संस्कृत न आने पर हिंदी में पढ़ सकते हैं?

हाँ, भगवान भाव देखते हैं। आप इसका अर्थ समझकर श्रद्धापूर्वक पाठ कर सकते हैं।

10. पाठ के दौरान किस रंग के पुष्प चढ़ाने चाहिए?

श्रीकृष्ण को पीले (गेंदा, कनेर) और सुगंधित (मोगरा, गुलाब) पुष्प अत्यंत प्रिय हैं।