Logoपवित्र ग्रंथ

Sri Krishna Sharana Ashtakam 3 – श्री कृष्ण शरणाष्टकम् (श्रीरघुनाथप्रभु कृतम्)

Sri Krishna Sharana Ashtakam 3 – श्री कृष्ण शरणाष्टकम् (श्रीरघुनाथप्रभु कृतम्)
॥ श्री कृष्ण शरणाष्टकम् ३ ॥ (श्रीरघुनाथप्रभु कृतम्) द्विदलीकृतदृक्स्वास्यः पन्नगीकृतपन्नगः । कृशीकृतकृशानुश्च श्रीकृष्णः शरणं मम ॥ १ ॥ फलीकृतफलार्थी च कुत्सितीकृतकौरवः । निर्वातीकृतवातारिः श्रीकृष्णः शरणं मम ॥ २ ॥ कृतार्थीकृतकुन्तीजः प्रपूतीकृतपूतनः । कलङ्कीकृतकंसादिः श्रीकृष्णः शरणं मम ॥ ३ ॥ सुखीकृतसुदामा च शङ्करीकृतशङ्करः । सितीकृतसरिन्नाथः श्रीकृष्णः शरणं मम ॥ ४ ॥ छलीकृतबलिद्यौर्यो निधनीकृतधेनुकः । कन्दर्पीकृतकुब्जादिः श्रीकृष्ण शरणं मम ॥ ५ ॥ महेन्द्रीकृतमाहेयः शिथिलीकृतमैथिलः । आनन्दीकृतनन्दाद्यः श्रीकृष्णः शरणं मम ॥ ६ ॥ वराकीकृतराकेशो विपक्षीकृतराक्षसः । सन्तोषीकृतसद्भक्तः श्रीकृष्णः शरणं मम ॥ ७ ॥ जरीकृतजरासन्धः कमलीकृतकार्मुकः । प्रभ्रष्टीकृतभीष्मादिः श्रीकृष्णः शरणं मम ॥ ८ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ श्रीकृष्णः शरणं ममाष्टकमिदं प्रोत्थाय यः सम्पठेत् स श्रीगोकुलनायकस्य पदवीं सम्याति भूमीतले । पश्यत्येव निरन्तरं तरणिजातीरस्थकेलिं प्रभोः सम्प्राप्नोति तदीयतां प्रतिदिनं गोपीशतैरावृताम् ॥ ९ ॥ ॥ इति श्रीरघुनाथप्रभु कृतं श्री कृष्ण शरणाष्टकम् ॥

श्री कृष्ण शरणाष्टकम् ३: परिचय एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि (Introduction)

श्री कृष्ण शरणाष्टकम् (Sri Krishna Sharana Ashtakam) वैष्णव भक्ति परंपरा का एक अनमोल रत्न है। इस विशिष्ट अष्टक की रचना श्रीरघुनाथप्रभु (जो महाप्रभु वल्लभाचार्य के वंशज और पुष्टिमार्ग के महान आचार्य थे) द्वारा की गई है। 'शरणाष्टकम्' का शाब्दिक अर्थ है - 'वह आठ श्लोकों का समूह जो भगवान की शरण में जाने का मार्ग प्रशस्त करता है'। पुष्टिमार्गीय भक्ति में, जहाँ 'कृष्णः शरणं मम' (श्रीकृष्ण मेरी शरण हैं) को मूल मंत्र माना जाता है, यह स्तोत्र साधक के हृदय में अटूट विश्वास जगाता है।

इस स्तोत्र की अद्वितीयता इसकी काव्य शैली में निहित है। प्रत्येक श्लोक में 'श्रीकृष्णः शरणं मम' की पुनरावृत्ति न केवल एक लयबद्ध सुंदरता प्रदान करती है, बल्कि यह निरंतर स्मरण (Constant Remembrance) की एक विधि भी है। इसमें भगवान की उन लीलाओं का वर्णन किया गया है जहाँ उन्होंने अहंकारियों का दमन किया और दीन-दुखियों को अपनी शरण में लेकर कृतार्थ किया। श्लोक १ में वर्णित "द्विदलीकृतदृक्स्वास्यः" से लेकर श्लोक ८ तक, यह पाठ भगवान के विराट और दयालु स्वरूप का चित्रण करता है।

साधना की दृष्टि से, यह अष्टक केवल शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि एक 'शरणागति मंत्र' है। जब भक्त संसार की आपाधापी और मानसिक अशांति से थक जाता है, तब वह इन आठ श्लोकों के माध्यम से स्वयं को पूर्णतः श्रीगोकुलनाथ के चरणों में समर्पित कर देता है। श्रीरघुनाथप्रभु ने इस रचना में इस सत्य को प्रतिपादित किया है कि श्रीकृष्ण ही एकमात्र ऐसे तत्व हैं जो काल, मृत्यु और दुखों से रक्षा करने में समर्थ हैं।

स्तोत्र का विशिष्ट महत्व (Significance of the Verses)

इस अष्टक के प्रत्येक श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण की किसी न किसी ऐतिहासिक या पौराणिक विजय का उल्लेख है, जो उनकी 'शरणदाता' शक्ति को प्रमाणित करता है। उदाहरण के लिए, तृतीय श्लोक में "प्रपूतीकृतपूतनः" का उल्लेख है, जो दर्शाता है कि भगवान ने पूतना जैसी राक्षसी का भी संहार कर उसे अपनी कृपा से पवित्र कर दिया। यह भक्त को यह आश्वासन देता है कि भगवान का आश्रय लेने पर बड़े से बड़ा पाप भी नष्ट हो जाता है।

चौथे श्लोक में "सुखीकृतसुदामा" के माध्यम से भगवान की मैत्री और दीन-वत्सलता को दर्शाया गया है। यह बताता है कि भगवान के लिए न कोई अमीर है न गरीब, वे केवल शुद्ध प्रेम और शरणागति देखते हैं। स्तोत्र का पांचवां श्लोक बलि के गर्व को चूर करने और कुब्जा को सौंदर्य प्रदान करने की बात करता है, जो भगवान की उस सामर्थ्य का प्रतीक है जो हमारे शारीरिक और मानसिक विकारों को दूर कर सकती है।

इस स्तोत्र का दार्शनिक पक्ष यह है कि यह हमें 'अहंकार' से 'समर्पण' की ओर ले जाता है। श्लोक ७ में राक्षसों का विरोध (विपक्षीकृतराक्षसः) और भक्तों का संतोष (सन्तोषीकृतसद्भक्तः) एक साथ वर्णित है, जो न्याय और दया के संतुलन को प्रदर्शित करता है। अंतिम फलश्रुति में यह स्पष्ट किया गया है कि जो व्यक्ति प्रातः उठकर इसका पाठ करता है, वह इस धराधाम पर रहते हुए भी भगवान की नित्य लीलाओं का अनुभव करने लगता है।

फलश्रुति एवं आध्यात्मिक लाभ (Benefits of Recitation)

फलश्रुति (श्लोक ९) के अनुसार, इस पाठ के लाभ केवल भौतिक नहीं, बल्कि परा-लौकिक भी हैं:

श्रीगोकुलनाथ पदवी की प्राप्ति: स्तोत्र के अनुसार, पाठ करने वाला भक्त श्री गोकुल के नायक भगवान कृष्ण की उस दिव्य अवस्था को प्राप्त करता है, जो केवल सिद्ध योगियों को सुलभ है।
नित्य लीला दर्शन: भक्त निरंतर यमुना तट (तरणिजातीर) पर होने वाली भगवान की दिव्य केलि और रास का दर्शन अपनी अंतर्दृष्टि से करने में सक्षम हो जाता है।
गोपी-भाव की प्राप्ति: "सम्प्राप्नोति तदीयतां... गोपीशतैरावृताम्" — यह पाठ साधक के भीतर उस अनन्य भक्ति भाव को जागृत करता है जो गोपियों का भगवान के प्रति था।
मानसिक शांति और निर्भयता: जब हम 'कृष्णः शरणं मम' कहते हैं, तो यह जीवन के सभी भयों (जैसे मृत्यु, रोग, शत्रु) को समाप्त कर परम निर्भयता प्रदान करता है।
अहंकार का नाश: भगवान की लीलाओं का स्मरण करने से व्यक्ति के भीतर का अहंकार शिथिल होता है और विनम्रता का उदय होता है।

पाठ विधि एवं विशेष अवसर (Ritual Method)

श्रीरघुनाथप्रभु ने फलश्रुति में स्पष्ट रूप से निर्देश दिया है — "प्रोत्थाय यः सम्पठेत्" अर्थात् जो व्यक्ति प्रातःकाल उठकर इसका पाठ करता है, उसे ही पूर्ण फल प्राप्त होता है।

साधना के मुख्य नियम

  • समय: ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः ४ से ६ बजे के बीच) सर्वोत्तम है। यदि संभव न हो, तो स्नान के पश्चात नित्य पूजा के समय करें।
  • शुद्धि: पाठ से पूर्व स्नान करें और स्वच्छ, संभव हो तो सफेद या पीले सूती वस्त्र धारण करें।
  • आसन: ऊनी या कुश के आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें।
  • दीपक: भगवान के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • भाव: पाठ करते समय यह दृढ़ निश्चय रखें कि 'मेरे पास अपना कुछ नहीं है, मैं सब कुछ भगवान को समर्पित कर चुका हूँ'।

विशेष अवसर

  • जन्माष्टमी: इस दिन ११ या १०८ बार पाठ करना विशेष सिद्धिदायक माना जाता है।
  • कार्तिक मास: पूरे कार्तिक मास में प्रतिदिन पाठ करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
  • संकट काल: जब जीवन में अत्यधिक निराशा या विपत्ति हो, तब श्रद्धापूर्वक इसका आश्रय लें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्री कृष्ण शरणाष्टकम् ३ के रचयिता कौन हैं?

इस अष्टक के रचयिता श्रीरघुनाथप्रभु हैं। वे पुष्टिमार्ग के महान आचार्य थे और उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की माधुर्य और ऐश्वर्य लीलाओं का बहुत सुंदर वर्णन किया है।

2. 'कृष्णः शरणं मम' मंत्र का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है "श्रीकृष्ण मेरी शरण हैं" या "मैं श्रीकृष्ण की शरण में हूँ"। यह केवल शब्द नहीं, बल्कि पुष्टिमार्ग का अष्टाक्षर मंत्र भी है जो भक्त के पूर्ण समर्पण को दर्शाता है।

3. क्या इस पाठ को संध्या काल में किया जा सकता है?

यद्यपि फलश्रुति में प्रातःकाल का महत्व है, लेकिन भक्ति ग्रंथों के अनुसार भगवान का नाम किसी भी समय लिया जा सकता है। संध्या वंदन के समय भी इसका पाठ मानसिक शांति के लिए फलदायी है।

4. 'प्रपूतीकृतपूतनः' शब्द का क्या तात्पर्य है?

इसका अर्थ है - 'वह जिन्होंने पूतना राक्षसी को भी पवित्र (मुक्त) कर दिया'। यह नाम भगवान की उस असीम दया को प्रकट करता है जो शत्रुओं को भी सद्गति प्रदान करती है।

5. क्या यह पाठ विद्यार्थियों के लिए उपयोगी है?

हाँ, श्लोक ४ में 'सुखीकृतसुदामा' का उल्लेख है। जिस प्रकार भगवान ने सुदामा की दरिद्रता दूर की, उसी प्रकार वे साधक की बौद्धिक जड़ता को दूर कर एकाग्रता और सुख प्रदान करते हैं।

6. क्या स्त्रियाँ यह पाठ कर सकती हैं?

बिल्कुल। भगवान कृष्ण के प्रति भक्ति में लिंग, जाति या वर्ण का कोई भेद नहीं है। गोपियाँ स्वयं नारी शक्ति और अनन्य भक्ति की सर्वोच्च प्रतीक हैं।

7. इस पाठ को कितनी बार करना चाहिए?

नियमित रूप से एक बार पाठ करना पर्याप्त है, लेकिन विशेष कामना के लिए ८ बार या एकादश (११) बार पाठ करना उत्तम माना जाता है।

8. 'तरणिजातीर' का क्या अर्थ है?

'तरणिजा' सूर्य की पुत्री यमुना को कहा जाता है और 'तीर' का अर्थ किनारा है। अर्थात् यमुना जी के किनारे होने वाली भगवान की नित्य क्रीड़ा।

9. क्या पाठ के लिए किसी गुरु से दीक्षा लेना अनिवार्य है?

साधारण पाठ और स्तुति के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं है। प्रेम और श्रद्धा ही इसकी मुख्य योग्यता है। हालांकि, पुष्टिमार्ग में 'ब्रह्मसंबंध' दीक्षा का विशेष महत्व है।

10. 'गोकुलनायक पदवी' का फल क्या है?

इसका फल यह है कि साधक का जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है और उसे गोलोक धाम में नित्य निवास प्राप्त होता है।