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Sri Krishna Sharana Ashtakam 1 – श्री कृष्ण शरणाष्टकम् (श्रीहरिरायाचार्य विरचितम्)

Sri Krishna Sharana Ashtakam 1 – श्री कृष्ण शरणाष्टकम् (श्रीहरिरायाचार्य विरचितम्)
॥ श्री कृष्ण शरणाष्टकम् १ ॥ (श्रीहरिरायाचार्य विरचितम्) सर्वसाधनहीनस्य पराधीनस्य सर्वतः । पापपीनस्य दीनस्य श्रीकृष्णः शरणं मम ॥ १ ॥ संसारसुखसम्प्राप्तिसन्मुखस्य विशेषतः । बहिर्मुखस्य सततं श्रीकृष्णः शरणं मम ॥ २ ॥ सदा विषयकामस्य देहारामस्य सर्वथा । दुष्टस्वभाववामस्य श्रीकृष्णः शरणं मम ॥ ३ ॥ संसारसर्पदष्टस्य धर्मभ्रष्टस्य दुर्मतेः । लौकिकप्राप्तिकष्टस्य श्रीकृष्णः शरणं मम ॥ ४ ॥ विस्मृतस्वीयधर्मस्य कर्ममोहितचेतसः । स्वरूपज्ञानशून्यस्य श्रीकृष्णः शरणं मम ॥ ५ ॥ संसारसिन्धुमग्नस्य भग्नभावस्य दुष्कृतेः । दुर्भावलग्नमनसः श्रीकृष्णः शरणं मम ॥ ६ ॥ विवेकधैर्यभक्त्यादिरहितस्य निरन्तरम् । विरुद्धकरणासक्तेः श्रीकृष्णः शरणं मम ॥ ७ ॥ विषयाक्रान्तदेहस्य वैमुख्यहृतसन्मतेः । इन्द्रियान्वगृहीतस्य श्रीकृष्णः शरणं मम ॥ ८ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ एतदष्टकपाठेन ह्येतदुक्तार्थभावनात् । निजाचार्यपदाम्भोजसेवकोऽदैन्यमाप्नुयात् ॥ ९ ॥ ॥ इति श्रीहरिरायाचार्य विरचितं श्री कृष्ण शरणाष्टकम् सम्पूर्णम् ॥

श्री कृष्ण शरणाष्टकम् १: परिचय एवं 'दैन्य' भक्ति (Introduction)

श्री कृष्ण शरणाष्टकम् १ (Sri Krishna Sharana Ashtakam 1) भक्ति साहित्य की एक अत्यंत मर्मस्पर्शी रचना है, जिसके रचयिता पुष्टिमार्ग के महान आचार्य श्रीहरिरायाचार्य जी (Shri Harirayacharya) हैं। श्रीहरिरायाचार्य जी महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के वंशज थे और उन्होंने भक्ति मार्ग में 'दैन्य भाव' (Humility) को सर्वोच्च स्थान दिया है। यह अष्टक उस जीव की आर्त पुकार है जो संसार की आपाधापी, अपने दोषों और आध्यात्मिक शून्यता को स्वीकार करते हुए भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में पूर्ण शरणागति की याचना करता है।

इस अष्टक की अद्वितीयता इसकी स्पष्टवादिता में है। जहाँ अधिकांश स्तोत्र भगवान की महिमा से प्रारंभ होते हैं, वहीं यह अष्टक जीव की अपनी कमियों को स्वीकार करने से शुरू होता है। प्रथम श्लोक में ही प्रयुक्त "सर्वसाधनहीनस्य" (सभी साधनों से रहित) शब्द यह स्पष्ट करता है कि जब जीव के पास जप, तप या योग जैसा कोई साधन नहीं बचता, तब केवल 'शरणागति' ही एकमात्र मार्ग रह जाता है। प्रत्येक श्लोक का अंतिम चरण "श्रीकृष्णः शरणं मम" (श्रीकृष्ण ही मेरी शरण हैं) जीव के अटूट विश्वास का प्रतीक है।

परिचय के ५०० से अधिक शब्दों के इस गहन विश्लेषण में यह समझना अनिवार्य है कि श्रीहरिरायाचार्य जी ने कलियुग के जीव की वास्तविक मानसिक स्थिति का चित्रण किया है। हम सभी किसी न किसी रूप में विषयों के प्रति आसक्त हैं और अपनी वास्तविक आध्यात्मिक पहचान को विस्मृत कर चुके हैं। यह अष्टक हमें आईना दिखाता है कि हम 'पापपीन' (पापों से पुष्ट) और 'दीन' (असहाय) हैं, किंतु साथ ही यह आश्वासन भी देता है कि हमारे लिए 'श्रीकृष्ण' का आश्रय सदा खुला है। यह पाठ साधक के अहंकार को गलाकर उसे कोमल बनाता है, ताकि वह भगवत्कृपा को प्राप्त करने के योग्य बन सके।

वैष्णव परंपरा में, विशेषकर पुष्टिमार्ग में, 'शरणागति' के छह अंग बताए गए हैं, जिनमें से 'दैन्य' सबसे प्रमुख है। यह अष्टक जीव को उसकी तुच्छता का अनुभव कराकर उसे परम तत्व से जोड़ता है। यह केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक चिकित्सा (Spiritual Therapy) है जो अशांत मन को भगवान के चरणों में विश्राम प्रदान करती है।

स्तोत्र का विशिष्ट आध्यात्मिक एवं दार्शनिक महत्व (Significance)

श्री कृष्ण शरणाष्टकम् १ का दार्शनिक आधार 'पूर्ण शरणागति' है। श्लोक ४ में प्रयुक्त 'संसारसर्पदष्टस्य' (संसार रूपी सर्प द्वारा डसा हुआ) रूपक अत्यंत प्रभावशाली है। जिस प्रकार सर्प के विष से व्याकुल व्यक्ति को केवल अमोघ औषधि ही बचा सकती है, उसी प्रकार संसार के दुखों और विकारों से ग्रसित जीव के लिए 'कृष्ण' नाम ही अमृत के समान है। यह अष्टक हमें बोध कराता है कि हम 'स्वरूपज्ञानशून्य' (अपनी वास्तविकता से अनजान) हैं और केवल विषयों के 'देहाराम' (शरीर के सुखों) में ही आनंद खोज रहे हैं।

श्लोक ५ और ६ में 'विस्मृतस्वीयधर्मस्य' और 'संसारसिन्धुमग्नस्य' कहकर यह बताया गया है कि जीव अपनी मूल प्रकृति (ईश्वर की सेवा) को भूलकर कर्मों के बंधन में फंस गया है। श्रीहरिरायाचार्य जी ने यहाँ मनोवैज्ञानिक विश्लेषण भी किया है कि कैसे हमारे मन में 'दुर्भाव' (बुरी भावनाएं) लग जाती हैं। यह अष्टक इन सभी मानसिक व्याधियों का समाधान केवल एक ही मंत्र में देता है— 'श्रीकृष्णः शरणं मम'।

विशिष्ट रूप से, यह अष्टक उन लोगों के लिए रामबाण है जो स्वयं को आध्यात्मिक मार्ग पर असफल महसूस करते हैं। श्लोक ७ में 'विवेकधैर्यभक्त्यादिरहितस्य' कहकर लेखक उन साधकों को ढांढस बंधाते हैं जिनके पास न विवेक है, न धैर्य और न ही परा-भक्ति। यह स्तोत्र सिद्ध करता है कि भगवान की शरण में आने के लिए किसी योग्यता की नहीं, बल्कि केवल 'पुकार' की आवश्यकता है।

फलश्रुति: पाठ से प्राप्त होने वाले दिव्य लाभ (Benefits)

अष्टक के ९वें श्लोक में इसकी महिमा और फल का स्पष्ट उल्लेख किया गया है:

अदैन्य की प्राप्ति: "निजाचार्यपदाम्भोजसेवकोऽदैन्यमाप्नुयात्" — अर्थात् जो भक्त अपने गुरु के चरणों का सेवक होकर इस अष्टक का पाठ करता है, वह दीनता (असहायता) से मुक्त होकर आत्मिक बल और ईश्वर का सान्निध्य प्राप्त करता है।
मानसिक शांति और निर्भयता: संसार के सर्प (मृत्यु और काल) का भय इस पाठ के प्रभाव से समाप्त हो जाता है और साधक को परम निर्भयता प्राप्त होती है।
विषय आसक्ति से मुक्ति: निरंतर 'श्रीकृष्णः शरणं मम' के भाव से हृदय में विषयों के प्रति विरक्ति और भगवान के प्रति अनुराग उत्पन्न होता है।
पाप नाश (Destruction of Sins): 'पापपीन' जीव के संचित और प्रारब्ध पापों का क्षय होकर अंतःकरण शुद्ध हो जाता है।
भगवत्-सान्निध्य का अनुभव: यह अष्टक साधक को यह अनुभूति कराता है कि भगवान हर समय उसके साथ हैं और उसकी रक्षा कर रहे हैं।

पाठ विधि एवं साधना निर्देश (Ritual Method)

श्री कृष्ण शरणाष्टकम् १ का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए इसे 'भाव' के साथ पढ़ना अनिवार्य है। यहाँ कुछ शास्त्रीय निर्देश दिए गए हैं:

दैनिक साधना के नियम

  • समय: प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) पाठ के लिए सर्वश्रेष्ठ है। संध्या के समय शयन से पूर्व इसका पाठ दिनभर के मानसिक संतापों को दूर करता है।
  • शुद्धि: स्नान के पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण करें। तिलक (चन्दन या केसर) मस्तक पर अवश्य लगाएं।
  • आसन: ऊनी या कुशा के आसन पर बैठकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करें।
  • पूजन: भगवान श्रीकृष्ण के सम्मुख घी का दीपक प्रज्वलित करें और उन्हें तुलसी पत्र अर्पित करें।
  • एकाग्रता: प्रत्येक श्लोक को पढ़ते समय अपने दोषों को प्रभु के चरणों में समर्पित करें और अंत में 'शरणं मम' कहते समय पूर्ण समर्पण का अनुभव करें।

विशेष साधना अवसर

  • जन्माष्टमी: इस दिन १०८ बार पाठ करने से विशेष शरणागति सिद्ध होती है।
  • कार्तिक मास: पूरे महीने दीपदान के साथ इसका गान अक्षय पुण्य प्रदायक है।
  • एकादशी: मानसिक पापों के प्रायश्चित के लिए एकादशी के दिन सस्वर पाठ करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्री कृष्ण शरणाष्टकम् १ के रचयिता कौन हैं?

इस दिव्य अष्टक की रचना श्रीहरिरायाचार्य जी (Shri Harirayacharya) ने की है। वे पुष्टिमार्ग के महान संत और महाप्रभु वल्लभाचार्य के वंशज थे।

2. 'सर्वसाधनहीनस्य' का वास्तविक अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है - वह व्यक्ति जिसके पास आध्यात्मिक प्रगति के लिए कोई भी बाह्य साधन (जैसे कठोर योग, यज्ञ या भारी दान) नहीं है। यह पाठ ऐसे ही 'साधनहीन' जीवों के लिए भगवान की शरण का मार्ग है।

3. क्या इस पाठ को प्रतिदिन करना अनिवार्य है?

हाँ, आध्यात्मिक शांति और अहंकार के दमन के लिए इसे नित्य दिनचर्या का हिस्सा बनाना अत्यंत शुभ माना जाता है।

4. 'संसारसर्पदष्टस्य' का क्या तात्पर्य है?

संसार के दुख, ईर्ष्या, क्रोध और मृत्यु को 'सर्प' की संज्ञा दी गई है। यह अष्टक इस विष को उतारने वाली एक दिव्य औषधि के रूप में कार्य करता है।

5. क्या इस पाठ से आर्थिक कष्ट दूर होते हैं?

श्लोक ४ में 'लौकिकप्राप्तिकष्टस्य' का उल्लेख है। जब हम भगवान की शरण लेते हैं, तो वे हमारी लौकिक (भौतिक) चिंताओं का भार भी स्वयं वहन करते हैं, जिससे जीवन सुगम होता है।

6. 'श्रीकृष्णः शरणं मम' का क्या प्रभाव है?

यह एक अष्टाक्षर मंत्र की तरह कार्य करता है। यह साधक के अवचेतन मन में यह विश्वास भर देता है कि ब्रह्मांड का स्वामी स्वयं उसकी रक्षा कर रहा है।

7. क्या संस्कृत न जानने वाले भी पाठ कर सकते हैं?

हाँ, ईश्वर केवल 'भाव' के भूखे हैं। आप इसका हिंदी अर्थ समझकर भावपूर्वक पाठ कर सकते हैं या इसके ऑडियो को सुनकर मानसिक रूप से जुड़ सकते हैं।

8. 'विस्मृतस्वीयधर्मस्य' का अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है अपनी वास्तविक आध्यात्मिक प्रकृति को भूल जाना। हम शरीर नहीं, आत्मा हैं—यह ज्ञान विस्मृत होने के कारण ही हम दुखी होते हैं। यह पाठ उस ज्ञान को पुनः जाग्रत करता है।

9. क्या स्त्रियों को यह पाठ करने की अनुमति है?

बिल्कुल। भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में कोई लिंग भेद नहीं है। शुद्ध हृदय से कोई भी श्रद्धालु इसे पढ़ सकता है।

10. इस अष्टक का मुख्य रस क्या है?

इस अष्टक का मुख्य रस 'शान्त रस' और 'भक्ति रस' का मिश्रण है, जहाँ साधक स्वयं को प्रभु के चरणों में शून्य अनुभव करता है।