Logoपवित्र ग्रंथ

Sri Gopijana Vallabha Ashtakam 1 – श्री गोपीजनवल्लभाष्टकम् – १ (श्रीवह्निसूनु विरचितम्)

Sri Gopijana Vallabha Ashtakam 1 – श्री गोपीजनवल्लभाष्टकम् – १ (श्रीवह्निसूनु विरचितम्)
॥ श्री गोपीजनवल्लभाष्टकम् ॥ (श्रीवह्निसूनु विरचितम्) नवाम्बुदानीकमनोहराय प्रफुल्लराजीवविलोचनाय । वेणुस्वनैर्मोदितगोकुलाय नमोऽस्तु गोपीजनवल्लभाय ॥ १ ॥ किरीटकेयूरविभूषिताय ग्रैवेयमालामणिरञ्जिताय । स्फुरच्चलत्काञ्चनकुण्डलाय नमोऽस्तु गोपीजनवल्लभाय ॥ २ ॥ दिव्याङ्गनाबृन्दनिषेविताय स्मितप्रभाचारुमुखाम्बुजाय । त्रैलोक्यसम्मोहनसुन्दराय नमोऽस्तु गोपीजनवल्लभाय ॥ ३ ॥ रत्नादिमूलालयसङ्गताय कल्पद्रुमच्छायसमाश्रिताय । हेमस्फुरन्मण्डलमध्यगाय नमोऽस्तु गोपीजनवल्लभाय ॥ ४ ॥ श्रीवत्सरोमावलिरञ्जिताय वक्षःस्थले कौस्तुभभूषिताय । सरोजकिञ्जल्कनिभांशुकाय नमोऽस्तु गोपीजनवल्लभाय ॥ ५ ॥ दिव्याङ्गुलीयाङ्गुलिरञ्जिताय मयूरपिञ्छच्छविशोभिताय । वन्यस्रजालङ्कृतविग्रहाय नमोऽस्तु गोपीजनवल्लभाय ॥ ६ ॥ मुनीन्द्रवृन्दैरभिसंस्तुताय क्षरत्पयोगोकुलसङ्कुलाय । धर्मार्थकामामृतसाधकाय नमोऽस्तु गोपीजनवल्लभाय ॥ ७ ॥ मनस्तमस्तोमदिवाकराय भक्तस्य चिन्तामणिसाधकाय । अशेषदुःखामयभेषजाय नमोऽस्तु गोपीजनवल्लभाय ॥ ८ ॥ ॥ इति श्रीवह्निसूनु विरचितं श्री गोपीजनवल्लभाष्टकम् सम्पूर्णम् ॥

श्री गोपीजनवल्लभाष्टकम्: परिचय एवं भक्ति भाव (Introduction)

श्री गोपीजनवल्लभाष्टकम् (Sri Gopijana Vallabha Ashtakam) भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम और समर्पण का एक अत्यंत दिव्य स्रोत है। इस अष्टक की रचना श्रीवह्निसूनु (Shri Vahnisunu) द्वारा की गई है। 'गोपीजनवल्लभ' का शाब्दिक अर्थ है - 'गोपियों के अत्यंत प्रियतम'। वैष्णव ग्रंथों में गोपियों का प्रेम 'काम' (Lust) नहीं बल्कि 'प्रेम' (Divine Love) की सर्वोच्च पराकाष्ठा माना गया है, जहाँ भक्त और भगवान के बीच का अंतर समाप्त हो जाता है। यह अष्टक इसी दिव्य प्रेम के केंद्र, श्रीकृष्ण की वंदना करता है।

श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, गोपियों की भक्ति 'अहैतुकी' (निस्वार्थ) है। वे श्रीकृष्ण को अपना सर्वस्व मानती हैं। इस अष्टक में श्रीकृष्ण के उसी मधुर स्वरूप का गान किया गया है जो गोकुल में वंशी बजाता है, मोरपंख धारण करता है और अपनी मंद मुस्कान से त्रैलोक्य को मोहित कर लेता है। श्लोक १ में उन्हें 'नवाम्बुदानीकमनोहराय' (नए बादलों के समान मनमोहक सांवले वर्ण वाले) कहा गया है। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि जो समस्त ब्रह्मांड का नियंता है, वह भक्त के प्रेम के अधीन होकर गोपीजनवल्लभ बन जाता है।

आध्यात्मिक यात्रा में, यह अष्टक साधक को 'अहंकार' से 'प्रेम' की ओर ले जाने वाला सेतु है। श्रीवह्निसूनु ने इसमें श्रीकृष्ण के उन आभूषणों और अंगों का वर्णन किया है जिनका ध्यान मात्र करने से साधक का मन संसार के विषयों से विरक्त होकर प्रभु में लीन होने लगता है। ५०० से अधिक शब्दों के इस विस्तृत परिचय में हमें यह समझना चाहिए कि 'गोपीजनवल्लभ' पुकारना साक्षात् उस प्रेम के सागर में डुबकी लगाना है जहाँ केवल आनंद और शांति है।

भक्ति परंपरा में इस अष्टक को 'शरणागति' का एक प्रभावी साधन माना गया है। श्लोक ८ में भगवान को 'अशेषदुःखामयभेषजाय' कहा गया है, अर्थात् वे समस्त दुखों और रोगों की एकमात्र औषधि हैं। यह स्तोत्र हमें विश्वास दिलाता है कि चाहे जीवन में कितना ही गहरा अंधकार क्यों न हो, गोपीजनवल्लभ की शरण लेने से मन में भक्ति का सूर्य उदित होता है।

स्तोत्र का विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व एवं तत्व (Significance)

श्री गोपीजनवल्लभाष्टकम् का विशिष्ट महत्व इसके रसात्मक और दार्शनिक चित्रण में निहित है। श्लोक ३ में भगवान को 'त्रैलोक्यसम्मोहनसुन्दराय' कहा गया है। यहाँ सुंदरता केवल शारीरिक नहीं है, बल्कि वह आंतरिक तेज है जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश तक को मुग्ध कर देता है। श्रीकृष्ण का प्रत्येक आभूषण—चाहे वह किरीट (मुकुट) हो, केयूर (बाजूबंद) हो, या कुंडल—भक्त के ध्यान को एकाग्र करने के प्रतीक हैं।

श्लोक ४ में वर्णित 'कल्पद्रुमच्छायसमाश्रिताय' (कल्पवृक्ष की छाया में स्थित) का अर्थ है कि भगवान स्वयं वह कल्पवृक्ष हैं जो अपने आश्रित भक्तों की समस्त आध्यात्मिक इच्छाओं को पूर्ण करते हैं। श्लोक ५ में उनके वक्षस्थल पर 'कौस्तुभ' मणि और 'श्रीवत्स' का चिन्ह उनकी विष्णु-शक्ति और लक्ष्मी के साथ उनके शाश्वत संबंध को दर्शाता है। यह अष्टक हमें बताता है कि श्रीकृष्ण केवल एक ऐतिहासिक पुरुष नहीं, बल्कि 'पुरुषोत्तम' (सर्वोच्च पुरुष) और 'विश्वमूर्ति' हैं।

दार्शनिक रूप से, 'गोपीजनवल्लभ' संबोधन जीव और ब्रह्म के मिलन का प्रतीक है। गोपियाँ जीव का प्रतिनिधित्व करती हैं और श्रीकृष्ण परब्रह्म का। अष्टक के अंतिम श्लोक (श्लोक ८) में उन्हें 'मनस्तमस्तोमदिवाकराय' कहा गया है, जिसका अर्थ है—वे मन के अंधकार रूपी समूह को नष्ट करने वाले सूर्य के समान हैं। यह पाठ साधक के भीतर छिपे हुए अज्ञान, ईर्ष्या और क्रोध को भस्म कर हृदय को प्रभु-प्रेम के लिए शुद्ध करता है।

अष्टक पाठ के दिव्य लाभ एवं फलश्रुति (Benefits)

श्री गोपीजनवल्लभाष्टकम् का नित्य पाठ करने से साधक को निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

दुखों का विनाश (Cure for Sorrows): श्लोक ८ के अनुसार, भगवान 'अशेष-दुःख-भेषज' हैं। यह पाठ कैंसर जैसे असाध्य मानसिक और शारीरिक रोगों तथा जीवन के संतापों की दिव्य औषधि है।
मानसिक शांति (Mental Radiance): मन के भीतर छाए हुए अज्ञान और अशांति के अंधकार को यह पाठ सूर्य (दिवाकर) के समान मिटा देता है।
चिंतामणि फल (Wish-Fulfilling): भगवान को 'भक्तस्य चिन्तामणि' कहा गया है। यह पाठ भक्त की सभी सात्विक चिंताओं को समाप्त कर उसे अभीष्ट फल प्रदान करता है।
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष: श्लोक ७ के अनुसार, यह पाठ 'धर्मार्थकामामृतसाधकाय' है, अर्थात् यह चारों पुरुषार्थों की सिद्धि कराने वाला है।
कृष्ण भक्ति का उदय: इस अष्टक के गान से साधक के हृदय में उसी गोपिका-भाव का जन्म होता है जो भगवान को प्राप्त करने के लिए अनिवार्य है।

पाठ विधि एवं साधना के नियम (Ritual Method)

श्री गोपीजनवल्लभाष्टकम् का पाठ अत्यंत रसमय है। इसे पूर्ण फल प्राप्ति के लिए निम्नलिखित विधि से किया जाना चाहिए:

नित्य साधना विधि

  • समय: प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) या संध्या समय पाठ के लिए सर्वश्रेष्ठ है। विशेषकर भगवान की श्रृंगार आरती के समय इसका पाठ अत्यंत रसमय होता है।
  • शुद्धि: स्नान के पश्चात स्वच्छ पीले या केसरिया वस्त्र धारण करें। श्रीकृष्ण को पीला रंग अत्यंत प्रिय है।
  • आसन: कुशा या ऊनी आसन पर बैठकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करें।
  • अर्पण: भगवान के चित्र पर मोरपंख (मयूरपिञ्छ) और वन्य पुष्पों की माला (वन्यस्रजा) चढ़ाएं, जैसा कि श्लोक ६ में वर्णित है।
  • ध्यान: 'नवाम्बुदानीक' (सांवले कृष्ण) का हृदय में ध्यान करें जो वंशी बजा रहे हों।

विशेष साधना अवसर

  • जन्माष्टमी: इस दिन १०८ बार पाठ करने से 'कृष्ण-दास्य' की प्राप्ति होती है।
  • प्रत्येक बुधवार: बुधवार का दिन भगवान विष्णु/कृष्ण का माना जाता है, इस दिन पाठ करना विशेष फलदायी है।
  • एकादशी: मानसिक शांति और एकाग्रता के लिए एकादशी के दिन सस्वर पाठ करें।

श्री गोपीजनवल्लभाष्टकम् संबंधी अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्री गोपीजनवल्लभाष्टकम् के रचयिता कौन हैं?

इस दिव्य अष्टक के रचयिता श्रीवह्निसूनु (Shri Vahnisunu) हैं। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अपने अनन्य प्रेम को इन ८ श्लोकों में पिरोया है।

2. 'गोपीजनवल्लभ' नाम का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?

'गोपीजन' का अर्थ है शुद्ध भक्त (आत्माएं) और 'वल्लभ' का अर्थ है प्रियतम। जो समस्त जीव-आत्माओं का एकमात्र प्रिय स्वामी है, वही गोपीजनवल्लभ है।

3. क्या इस पाठ से बीमारियाँ दूर हो सकती हैं?

जी हाँ, श्लोक ८ में भगवान को 'अशेषदुःखामयभेषजाय' कहा गया है, जिसका अर्थ है समस्त रोगों और दुखों की दवा। श्रद्धापूर्वक पाठ करने से मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में लाभ होता है।

4. 'नवाम्बुदानीक' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है "नए जल से भरे बादलों के समूह के समान सांवला"। यह श्रीकृष्ण के उस अत्यंत मनमोहक श्याम वर्ण का वर्णन है जो भक्तों के नेत्रों को शीतलता प्रदान करता है।

5. क्या इस अष्टक को घर के मंदिर में पढ़ सकते हैं?

हाँ, इसे घर पर पढ़ना अत्यंत मंगलकारी है। इससे घर का वातावरण भक्तिमय और शुद्ध होता है।

6. 'चिन्तामणि' शब्द का यहाँ क्या तात्पर्य है?

'चिन्तामणि' एक ऐसा दिव्य रत्न है जो मांगने पर सब कुछ दे देता है। श्लोक ८ के अनुसार, भगवान स्वयं अपने भक्तों के लिए चिन्तामणि के समान हैं, जो उनकी सभी चिंताओं का हरण कर लेते हैं।

7. क्या संस्कृत न जानने वाले व्यक्ति को भी फल मिलता है?

भगवान भावग्राही हैं। यदि आप अर्थ समझकर श्रद्धा से इसका पाठ करते हैं या सुनते हैं, तो आपको समान फल प्राप्त होता है।

8. पाठ के दौरान किस भगवान का ध्यान करना चाहिए?

अष्टक के अनुसार, मोरपंख धारण किए हुए, वंशी बजाते हुए और गोपियों से घिरे हुए 'राधिकानाथ' श्रीकृष्ण का ध्यान करना चाहिए।

9. 'मयूरपिञ्छ' धारण करने का क्या रहस्य है?

मोरपंख में इंद्रधनुष के सात रंग होते हैं, जो यह दर्शाते हैं कि भगवान संपूर्ण सृष्टि के रंगों (अवस्थाओं) को अपने मस्तक पर धारण करते हैं, फिर भी उनसे अछूते (निर्लिप्त) रहते हैं।

10. क्या इसके पाठ से आर्थिक समस्याएँ हल होती हैं?

जी हाँ, श्लोक ७ में उन्हें 'धर्मार्थकाम-साधकाय' कहा गया है। सच्ची भक्ति से भगवान भक्त की सांसारिक आवश्यकताओं (अर्थ) की भी पूर्ति करते हैं।