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Sri Gokulesha Ashtakam – श्री गोकुलेशाष्टकम् (श्रीरघुनाथाचार्य विरचितम्)

Sri Gokulesha Ashtakam – श्री गोकुलेशाष्टकम् (श्रीरघुनाथाचार्य विरचितम्)
॥ श्री गोकुलेशाष्टकम् ॥ (श्रीरघुनाथाचार्य विरचितम्) नन्दगोपभूपवंशभूषणं विदूषणं भूमिभूतिभूरिभाग्यभाजनं भयापहम् । धेनुधर्मरक्षणावतीर्णपूर्णविग्रहं नीलवारिवाहकान्ति गोकुलेशमाश्रये ॥ १ ॥ गोपबालसुन्दरीगणावृतं कलानिधिं रासमण्डलीविहारकारिकामसुन्दरम् । पद्मयोनिशङ्करादिदेवबृन्दवन्दितं नीलवारिवाहकान्ति गोकुलेशमाश्रये ॥ २ ॥ गोपराजरत्नराजिमन्दिरानुरिङ्गणं गोपबालबालिकाकलानुरुद्धगायनम् । सुन्दरीमनोजभावभाजनाम्बुजाननं नीलवारिवाहकान्ति गोकुलेशमाश्रये ॥ ३ ॥ कंसकेशिकुञ्जराजदुष्टदैत्यदारणं इन्द्रसृष्टवृष्टिवारिवारणोद्धृताचलम् । कामधेनुकारिताभिधानगानशोभितं नीलवारिवाहकान्ति गोकुलेशमाश्रये ॥ ४ ॥ गोपिकागृहान्तगुप्तगव्यचौर्यचञ्चलं दुग्धभाण्डभेदभीतलज्जितास्यपङ्कजम् । धेनुधूलिधूसराङ्गशोभिहारनूपुरं नीलवारिवाहकान्ति गोकुलेशमाश्रये ॥ ५ ॥ वत्सधेनुगोपबालभीषणास्यवह्निपं केकिपिञ्छकल्पितावतंसशोभिताननम् । वेणुवादमत्तघोषसुन्दरीमनोहरं नीलवारिवाहकान्ति गोकुलेशमाश्रये ॥ ६ ॥ गर्वितामरेन्द्रकल्पकल्पितान्नभोजनं शारदारविन्दबृन्दशोभिहंसजारतम् । दिव्यगन्धलुब्धभृङ्गपारिजातमालिनं नीलवारिवाहकान्ति गोकुलेशमाश्रये ॥ ७ ॥ वासरावसानगोष्ठगामिगोगणानुगं धेनुदोहदेहगेहमोहविस्मयक्रियम् । स्वीयगोकुलेशदानदत्तभक्तरक्षणं नीलवारिवाहकान्ति गोकुलेशमाश्रये ॥ ८ ॥ ॥ इति श्रीरघुनाथाचार्य विरचितं श्री गोकुलेशाष्टकम् सम्पूर्णम् ॥

श्री गोकुलेशाष्टकम्: परिचय एवं पुष्टिमार्गीय तत्व (Introduction)

श्री गोकुलेशाष्टकम् (Sri Gokulesha Ashtakam) वैष्णव भक्ति धारा के अंतर्गत पुष्टिमार्ग (Vallabh Sampradaya) की एक अत्यंत प्रभावशाली और रसमय रचना है। इस अष्टक के रचयिता महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के पुत्र श्रीविट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी) के चतुर्थ पुत्र श्रीरघुनाथजी (श्रीरघुनाथाचार्य) हैं। पुष्टिमार्ग में 'गोकुलेश' का तात्पर्य उस पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण से है, जो गोकुल के स्वामी हैं और अपनी 'पुष्टि' (कृपा) के माध्यम से भक्तों का उद्धार करते हैं।

इस अष्टक की सबसे बड़ी विशेषता इसका प्रभावी स्थायी पद (Refrain) है— "नीलवारिवाहकान्ति गोकुलेशमाश्रये"। इसका अर्थ है: "मैं उन गोकुलेश की शरण लेता हूँ जिनकी कांति नील वर्ण के मेघों के समान श्याम और शीतल है।" श्रीरघुनाथजी ने इन ८ श्लोकों में श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं, उनके रसिक स्वरूप और उनके असुर-मर्दन सामर्थ्य का जो चित्रण किया है, वह साधक के हृदय में साक्षात् ब्रज रस प्रवाहित कर देता है। ५०० से अधिक शब्दों के इस विस्तृत परिचय में हमें यह समझना चाहिए कि 'गोकुलेश' संबोधन भक्त और भगवान के बीच के उस आत्मीय संबंध को दर्शाता है जहाँ ईश्वर केवल पूजनीय नहीं, बल्कि घर का आभूषण और प्राणों का आधार बन जाते हैं।

अष्टक का प्रारंभ नन्द वंश के भूषण और पृथ्वी के भाग्य के रूप में भगवान के वर्णन से होता है। श्लोक संख्या १ में उन्हें 'धेनुधर्मरक्षणावतीर्ण' कहा गया है, जो यह प्रमाणित करता है कि भगवान का अवतार गौओं और धर्म की रक्षा के लिए हुआ है। श्रीरघुनाथजी, जो स्वयं पुष्टिमार्ग के महान आचार्य थे, उन्होंने इस स्तोत्र में अपनी आनुवंशिक भक्ति और दार्शनिक प्रज्ञा का सुंदर समन्वय किया है। यह अष्टक न केवल भक्ति का गान है, बल्कि यह एक शरणागति मंत्र है जो जीव के अहंकार को विलीन कर उसे ईश्वरीय आनंद में लीन कर देता है।

पुष्टिमार्गीय परंपरा में श्री गोकुलेशाष्टकम् का विशेष स्थान है क्योंकि यह 'चतुर्थ लालजी' (श्रीरघुनाथजी) के द्वारा हृदय से निकली हुई आर्त पुकार है। जब साधक इस अष्टक का गान करता है, तो उसे अनुभव होता है कि वह यमुना के किनारे, कदम के वृक्षों के बीच, सखाओं और गोपियों के साथ साक्षात् प्रभु की उपस्थिति में खड़ा है। यह पाठ 'लीला चिंतन' की एक सर्वश्रेष्ठ विधि मानी गई है।

श्री गोकुलेशाष्टकम् का विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व (Significance)

श्री गोकुलेशाष्टकम् का आध्यात्मिक महत्व इसके रसात्मक और रक्षक दोनों स्वरूपों के समन्वय में निहित है। श्लोक ४ में भगवान को 'कंसकेशिकुञ्जराजदुष्टदैत्यदारणं' कहा गया है, जो उनके वीर रस को दर्शाता है, जबकि श्लोक ५ में माखन चोरी की लीला (गव्यचौर्यचञ्चलं) उनके माधुर्य रस को प्रकट करती है। यह विरोधाभास ही पुष्टिमार्ग का सार है—कि जो समस्त ब्रह्मांड का नियंता है, वह भक्त के प्रेम के अधीन होकर दही का पात्र टूटने पर लज्जित हो जाता है।

इस अष्टक का दार्शनिक पक्ष 'अहैतुकी शरणागति' पर आधारित है। श्लोक ८ में उल्लेख है कि भगवान अपनी गौओं के पीछे-पीछे वन से लौट रहे हैं (गोगणानुगं), यह दर्शाता है कि ईश्वर अपने आश्रितों के प्रति कितने समर्पित हैं। 'नीलवारिवाहकान्ति' शब्द का निरंतर प्रयोग साधक के ध्यान को भगवान के श्याम सुंदर रूप पर एकाग्र करता है, जो आध्यात्मिक उन्नति के लिए अनिवार्य है।

श्रीरघुनाथजी ने इसमें 'कामधेनु' द्वारा भगवान का अभिषेक और उनके नाम का गान करने की लीला का भी समावेश किया है। यह भक्त को यह विश्वास दिलाता है कि जब वह गोकुलेश की शरण लेता है, तो समस्त दैवीय शक्तियाँ उसकी सहायता के लिए तत्पर हो जाती हैं। यह अष्टक जीव के हृदय के 'तम' (अंधकार) को मिटाकर उसमें 'शारदारविन्द' (शरद ऋतु के कमल) जैसी शुद्धता और शीतलता प्रदान करता है।

फलश्रुति एवं पाठ से होने वाले आध्यात्मिक लाभ (Benefits)

आचार्य श्रीरघुनाथजी की इस दिव्य वाणी का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

भय का नाश (Removal of Fear): श्लोक १ में भगवान को 'भयापहम्' कहा गया है। इस अष्टक का पाठ करने से साधक के हृदय से काल, मृत्यु और शत्रुओं का भय समूल नष्ट हो जाता है।
संतान और वंश की सुरक्षा: चूंकि यह अष्टक 'भूपवंशभूषणं' प्रभु को समर्पित है, इसके गान से भक्त के वंश की वृद्धि और सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
मानसिक सुख और शांति: भगवान की रसमय लीलाओं (रास मण्डली, वेणु वादन) का स्मरण करने से मन की चंचलता दूर होती है और गहरा आंतरिक सुख प्राप्त होता है।
पाप नाशन: भगवान को 'विदूषणं' और 'पूर्णविग्रह' कहा गया है। उनके नामों और लीलाओं का उच्चारण पूर्व जन्मों के संचित पापों को भस्म कर हृदय को पवित्र बनाता है।
भगवत्-सान्निध्य का अनुभव: अष्टक के अंतिम श्लोक के अनुसार, जो भक्त गोकुलेश की शरण लेता है, प्रभु स्वयं उसकी 'देह-गेह' (शरीर और घर) की रक्षा का भार उठा लेते हैं।

पाठ विधि एवं विशेष साधना निर्देश (Ritual Method)

श्री गोकुलेशाष्टकम् का सर्वोत्तम लाभ प्राप्त करने के लिए इसे पुष्टिमार्गीय सेवा पद्धति के अनुरूप पढ़ना चाहिए। यहाँ कुछ शास्त्रीय निर्देश दिए गए हैं:

नित्य पाठ के नियम

  • समय (Time): प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) ४ से ६ बजे के बीच पाठ करना सर्वोच्च फलदायी है। संध्या आरती के समय भी इसका गान किया जा सकता है।
  • शुद्धि (Purity): स्नान के पश्चात शुद्ध पीले या श्वेत वस्त्र धारण करें। माथे पर गोपी-चन्दन या केसर का तिलक लगाएं।
  • आसन: ऊनी या कुशा के आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • पूजन: ठाकुर जी या श्रीकृष्ण के चित्र के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें और उन्हें माखन-मिश्री या तुलसी दल अर्पित करें।
  • भाव: पाठ करते समय यह दृढ़ निश्चय रखें कि 'नीलवारिवाहकान्ति' प्रभु साक्षात् आपकी पुकार सुन रहे हैं।

विशेष साधना अवसर

  • श्रीकृष्ण जन्माष्टमी: इस दिन १०८ बार पाठ करने से विशेष शरणागति सिद्ध होती है।
  • कार्तिक मास: पूरे महीने दीपदान के साथ इसका गान अक्षय पुण्य प्रदायक है।
  • प्रत्येक बुधवार: चूंकि बुधवार श्रीकृष्ण का प्रिय दिन माना जाता है, इस दिन पाठ करने से बुद्धि और सुख में वृद्धि होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्री गोकुलेशाष्टकम् के रचयिता कौन हैं?

इस दिव्य अष्टक की रचना श्रीरघुनाथजी (श्रीरघुनाथाचार्य) ने की है, जो महाप्रभु वल्लभाचार्य के पौत्र और पुष्टिमार्ग के चतुर्थ पीठाधीश्वर थे।

2. 'नीलवारिवाहकान्ति' शब्द का क्या अर्थ है?

'नील' का अर्थ है नीला, 'वारिवाह' का अर्थ है जल ले जाने वाला बादल (मेघ), और 'कान्ति' का अर्थ है चमक। अर्थात् वह प्रभु जिनकी चमक नीले बादलों के समान श्याम और शीतल है।

3. इस पाठ को प्रतिदिन करने के क्या लाभ हैं?

प्रतिदिन पाठ करने से मानसिक अशांति दूर होती है, शत्रुओं का भय समाप्त होता है और भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम (पुष्टि भक्ति) की प्राप्ति होती है।

4. पुष्टिमार्ग में गोकुलेश का क्या स्वरूप माना गया है?

पुष्टिमार्ग में गोकुलेश को 'सच्चिदानंद' पूर्ण पुरुषोत्तम माना गया है, जो भक्तों की कृपा के लिए गोकुल में लीलाएं करते हैं और प्रेम के अधीन रहते हैं।

5. क्या इस पाठ से घर की आर्थिक स्थिति में सुधार होता है?

हाँ, श्लोक १ में भगवान को 'भूमिभूतिभूरिभाग्यभाजनं' कहा गया है, जो पृथ्वी की समृद्धि और सौभाग्य के प्रदाता हैं। सच्ची श्रद्धा से पाठ करने पर लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है।

6. श्लोक ४ में 'इन्द्रसृष्टवृष्टिवारिवारण' का क्या तात्पर्य है?

इसका तात्पर्य श्रीकृष्ण की 'गोवर्धन लीला' से है, जहाँ उन्होंने इंद्र द्वारा भेजी गई प्रलयंकारी वर्षा से ब्रजवासियों की रक्षा के लिए गिरिराज पर्वत को धारण किया था।

7. क्या संस्कृत न जानने वाले व्यक्ति भी इसे पढ़ सकते हैं?

बिल्कुल। भगवान केवल भक्त के 'भाव' को ग्रहण करते हैं। आप इसका हिंदी अर्थ समझकर श्रद्धापूर्वक पाठ कर सकते हैं या इसके ऑडियो को सुन सकते हैं।

8. 'वासरावसान' शब्द का श्लोक ८ में क्या अर्थ है?

'वासरावसान' का अर्थ है दिन का अंत (संध्या काल)। यह उस समय का वर्णन है जब श्रीकृष्ण वन से अपनी गौओं को लेकर गोकुल लौटते हैं।

9. क्या स्त्रियों को यह पाठ करने की अनुमति है?

जी हाँ, भगवान की भक्ति में कोई लिंग भेद नहीं है। अष्टक में स्वयं 'गोपबालसुन्दरी' (गोपियों) के प्रेम का वर्णन है, अतः स्त्रियाँ इसे विशेष श्रद्धा से कर सकती हैं।

10. इस अष्टक का मुख्य संदेश क्या है?

इसका मुख्य संदेश 'पूर्ण शरणागति' (Total Surrender) है। यह सिखाता है कि जो जीव गोकुलेश की शरण में आता है, उसकी रक्षा और पोषण का दायित्व स्वयं भगवान उठा लेते हैं।