श्री गणेशाष्टकम् - व्यास कृतम् (Sri Ganesha Ashtakam - Vyasa Krutam)
Sri Ganesha Ashtakam (by Vyasa)

परिचय (Introduction)
श्री गणेशाष्टकम् (Sri Ganesha Ashtakam) एक अत्यंत मधुर और भक्तिपूर्ण स्तुति है, जिसकी रचना स्वयं वेद व्यास (Veda Vyasa) जी ने की है। यह स्तोत्र पद्म पुराण (Padma Purana) के उत्तर खंड में मिलता है।
इसका प्रारम्भ "गणपतिपरिवारं चारुकेयूरहारं" श्लोक से होता है। इसमें गणेश जी के सुंदर आभूषणों, उनके विशाल कुल (परिवार), और उनके वक्रतुंड अवतार की महिमा गाई गई है।
स्तोत्र का महत्व (Significance)
महर्षि व्यास द्वारा रचित यह अष्टक गणेश जी के "सर्व-विघ्न-विनाशक" और "आनंद-कंद" (आनंद का मूल) रूप को उजागर करता है।
- योगिनीचक्रचारम्: गणेश जी मूलाधार चक्र के स्वामी हैं और योगिनियों (शक्तियों) के समूह के मध्य विहार करते हैं।
- मानसे राजहंसम्: वे भक्तों के हृदय रूपी मानसरोवर में राजहंस की तरह विराजते हैं (विवेकमयी बुद्धि के देवता)।
- सूर्यकोटिप्रकाशम्: उनका तेज करोड़ों सूर्यों के समान है, जो अज्ञान के अंधकार को मिटाता है।
पाठ के लाभ (Benefits - Phala Shruti)
अंतिम श्लोक (फलश्रुति) में इसके पाठ के विशिष्ट लाभ बताए गए हैं:
दुःख और दरिद्रता का नाश: "दुःखनाशाय" - यह स्तोत्र जीवन के दुःखों और गरीबी (Daridrya) को दूर करने के लिए रामबाण माना जाता है।
विद्या और लक्ष्मी प्राप्ति: "विद्यां सश्रियमश्नुते" - पाठ करने वाले को विद्या (ज्ञान) और श्री (धन/लक्ष्मी) दोनों का आशीर्वाद मिलता है।
भय से मुक्ति: "भवभयपरिहारं" - यह संसार के भय (जन्म-मृत्यु के चक्र और सांसारिक कष्ट) से रक्षा करता है।
पाठ विधि (Method of Recitation)
- शुद्धता: स्नान करके पवित्र मन से आसन ग्रहण करें।
- ध्यान: गणेश जी के "वक्रतुण्ड" स्वरूप का ध्यान करें।
- समय: प्रातःकाल या संन्ध्या वंदन के समय इसका पाठ करना उत्तम है।
- समर्पण: अंत में आरती करें और अपनी मनोकामना गणेश जी के चरणों में निवेदन करें।
प्रश्नोत्तरी (FAQ)