श्री विष्णुनामाष्टकम् (वामनपुराण)

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
अच्युतं केशवं विष्णुंहरिं सत्यं जनार्दनम्।
हंसं नारायणंचैवमेतन्नामाष्टकं पठेत्॥1॥
त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नित्यंदारिद्र्यं तस्य नश्यति।
शत्रुसैन्यं क्षयं यातिदुःस्वप्नः सुखदो भवेत्॥2॥
गङ्गायां मरणं चैवदृढा भक्तिस्तु केशवे।
ब्रह्मविद्याप्रबोधश्चतस्मान्नित्यं पठेन्नरः॥3॥
॥ इति श्रीवामनपुराणे विष्णोर्नामाष्टकस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
इस अष्टकम् का विशिष्ट महत्व
श्री विष्णुनामाष्टकम् (Shri Vishnunamashtakam), जो पवित्र श्री वामन पुराण (Shri Vamana Purana) से लिया गया है, एक अत्यंत संक्षिप्त, सरल और चमत्कारी स्तोत्र है। इसकी शक्ति इसके आठ दिव्य नामों - अच्युत, केशव, विष्णु, हरि, सत्य, जनार्दन, हंस, और नारायण - में निहित है। यह एक नामाष्टकम् है, जिसका अर्थ है 'आठ नामों का स्तोत्र'। कलियुग में, जहाँ लम्बी और जटिल साधनाएं कठिन हैं, वहीं भगवान के नाम का स्मरण ही सबसे सरल और प्रभावी मार्ग माना गया है। यह स्तोत्र उसी सिद्धांत का प्रतीक है। यह छोटा होने के बावजूद अपने भीतर महान फलश्रुति समेटे हुए है, जो इसके नियमित पाठ से प्राप्त होने वाले भौतिक और आध्यात्मिक लाभों को स्पष्ट रूप से बताती है।
अष्टकम् के प्रमुख लाभ और फलश्रुति
यह स्तोत्र स्वयं अपनी फलश्रुति का वर्णन करता है, जो इसके नित्य पाठ के आश्चर्यजनक परिणाम बताती है:
दारिद्र्य का नाश (Destruction of Poverty): स्तोत्र स्पष्ट रूप से कहता है, "दारिद्र्यं तस्य नश्यति"। जो व्यक्ति इसका नित्य पाठ करता है, उसकी दरिद्रता (poverty) और आर्थिक संकट दूर हो जाते हैं।
शत्रुओं पर विजय (Victory over Enemies): "शत्रुसैन्यं क्षयं याति" - यह पंक्ति आश्वासन देती है कि पाठ करने वाले के शत्रुओं का समूह नष्ट हो जाता है। यह हर प्रकार के बाहरी और आंतरिक शत्रुओं से सुरक्षा (protection) प्रदान करता है।
दुःस्वप्नों से मुक्ति (Freedom from Bad Dreams): "दुःस्वप्नः सुखदो भवेत्" - इसका पाठ करने से बुरे और डरावने सपने सुखद सपनों में बदल जाते हैं, जिससे व्यक्ति को मानसिक शांति (mental peace) और अच्छी नींद प्राप्त होती है।
दृढ़ भक्ति और ब्रह्मज्ञान (Unwavering Devotion and Spiritual Knowledge): साधक को भगवान केशव के प्रति "दृढा भक्ति" (अटूट भक्ति) प्राप्त होती है और "ब्रह्मविद्याप्रबोधश्च" अर्थात् उसे ब्रह्मज्ञान का बोध होता है, जो आध्यात्मिक उन्नति (spiritual progress) का सर्वोच्च स्तर है।
शुभ अंत (Auspicious End of Life): स्तोत्र "गङ्गायां मरणं चैव" का भी आशीर्वाद देता है, जिसका अर्थ है कि साधक को गंगा तट पर पवित्र मृत्यु प्राप्त होती है, जो हिन्दू धर्म में मोक्ष (liberation) का द्वार मानी जाती है।
पाठ करने की विधि और विशेष अवसर
सर्वोत्तम फल के लिए, स्तोत्र के अनुसार इसका पाठ नित्य त्रिसन्ध्यं (Trisandhya) अर्थात् दिन में तीन बार - सुबह, दोपहर और शाम को करना चाहिए।
यदि तीन बार संभव न हो, तो प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान के बाद भगवान विष्णु की मूर्ति के समक्ष इसका पाठ अवश्य करें।
एकादशी (Ekadashi) और गुरुवार (बृहस्पतिवार) के दिन इस नामाष्टकम् का पाठ विशेष रूप से फलदायी होता है।
इसकी सरलता के कारण, इसे बच्चे भी आसानी से याद कर सकते हैं और इसे अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बना सकते हैं।