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श्रीमूकाम्बिकाष्टकम्

श्रीमूकाम्बिकाष्टकम्
श्रीमूकाम्बिकाष्टकम्

नमस्ते जगद्धात्रि सद्‍ब्रह्मरूपे
नमस्ते हरोपेन्द्रधात्रादिवन्द्ये ।
नमस्ते प्रपन्नेष्टदानैकदक्षे
नमस्ते महालक्ष्मि कोलापुरेशि ॥ १॥
विधिः कृत्तिवासा हरिर्विश्वमेतत्-
सृजत्यत्ति पातीति यत्तत्प्रसिद्धम् ।
कृपालोकनादेव ते शक्तिरूपे
नमस्ते महालक्ष्मि कोलापुरेशि ॥ २॥
त्वया मायया व्याप्तमेतत्समस्तं
धृतं लीयसे देवि कुक्षौ हि विश्वम् ।
स्थितां बुद्धिरूपेण सर्वत्र जन्तौ
नमस्ते महालक्ष्मि कोलापुरेशि ॥ ३॥
यया भक्तवर्गा हि लक्ष्यन्त एते
त्वयाऽत्र प्रकामं कृपापूर्णदृष्ट्या ।
अतो गीयसे देवि लक्ष्मीरिति त्वं
नमस्ते महालक्ष्मि कोलापुरेशि ॥ ४॥
पुनर्वाक्पटुत्वादिहीना हि मूका
नरास्तैर्निकामं खलु प्रार्थ्यसे यत् ।
निजेष्टाप्तये तेन मूकाम्बिका त्वं
नमस्ते महालक्ष्मि कोलापुरेशि ॥ ५॥
यदद्वैतरूपात्परब्रह्मणस्त्वं
समुत्था पुनर्विश्वलीलोद्यमस्था ।
तदाहुर्जनास्त्वां च गौरीं कुमारीं
नमस्ते महालक्ष्मि कोलापुरेशि ॥ ६॥
हरेशादि देहोत्थतेजोमयप्र-
स्फुरच्चक्रराजाख्यलिङ्गस्वरूपे ।
महायोगिकोलर्षिहृत्पद्मगेहे
नमस्ते महालक्ष्मि कोलापुरेशि ॥ ७॥
नमः शङ्खचक्राभयाभीष्टहस्ते
नमः त्र्यम्बके गौरि पद्मासनस्थे ।
नमः स्वर्णवर्णे प्रसन्ने शरण्ये
नमस्ते महालक्ष्मि कोलापुरेशि ॥ ८॥
इदं स्तोत्ररत्नं कृतं सर्वदेवै-
र्हृदि त्वां समाधाय लक्ष्म्यष्टकं यः ।
पठेन्नित्यमेष व्रजत्याशु लक्ष्मीं
स विद्यां च सत्यं भवेत्तत्प्रसादात् ॥ ९॥

इति श्रीमूकाम्बिकाष्टकं सम्पूर्णम् ।

इस अष्टकम् का विशिष्ट महत्व

श्रीमूकाम्बिकाष्टकम् (Shri Mookambika Ashtakam) देवी के एक अत्यंत शक्तिशाली और करुणामयी स्वरूप, माँ मूकाम्बिका (Goddess Mookambika) को समर्पित है, जिनका प्रसिद्ध मंदिर कर्नाटक के कोल्लूर में स्थित है। 'मूकाम्बिका' नाम के पीछे एक पौराणिक कथा है, जिसके अनुसार देवी ने मूक नामक एक असुर का वध किया था, जिसने अपनी तपस्या से वाक्-शक्ति (बोलने की शक्ति) का वरदान प्राप्त करने का प्रयास किया था। देवी ने उसे मूक बनाकर उसकी आसुरी योजनाओं को विफल कर दिया। इसीलिए वे 'मूकाम्बिका' कहलाईं। यह स्तोत्र, जिसे देवताओं द्वारा रचा गया बताया जाता है, देवी को "कोलापुरेशि" (कोल्लूर की रानी) और महालक्ष्मी के रूप में संबोधित करता है, जो त्रिदेवी (महालक्ष्मी, महासरस्वती और महाकाली) की एकीकृत शक्ति का प्रतीक है।

अष्टकम् के प्रमुख भाव और लाभ

इस स्तोत्र की फलश्रुति और श्लोकों में वर्णित गुणों के आधार पर, इसके पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • वाक्-सिद्धि और विद्या की प्राप्ति (Attainment of Eloquence and Knowledge): जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, जो लोग बोलने में असमर्थ (मूका) या अपनी बात कहने में संकोच करते हैं, वे देवी से 'वाक्पटुत्व' के लिए प्रार्थना करते हैं। फलश्रुति में भी कहा गया है कि पाठ करने वाला शीघ्र ही "विद्यां" अर्थात् ज्ञान और विद्या (knowledge and learning) को प्राप्त करता है।

  • धन और समृद्धि (Wealth and Prosperity): स्तोत्र में देवी को बार-बार 'महालक्ष्मी' कहा गया है। फलश्रुति कहती है कि इसका नित्य पाठ करने वाला "व्रजत्याशु लक्ष्मीं" अर्थात् शीघ्र ही धन और ऐश्वर्य (wealth and prosperity) को प्राप्त करता है।

  • मनोकामनाओं की पूर्ति (Fulfillment of Desires): देवी को "प्रपन्नेष्टदानैकदक्षे" अर्थात् शरणागतों को इच्छित वरदान देने में एकमात्र कुशल कहा गया है। उनकी कृपा से भक्त की सभी शुभ मनोकामनाएं (auspicious wishes) पूरी होती हैं।

  • बुद्धि और विवेक का विकास (Development of Intellect and Discernment): तीसरे श्लोक में देवी को सभी प्राणियों में "बुद्धिरूपेण" स्थित बताया गया है। उनकी उपासना से साधक की बुद्धि निर्मल होती है और उसे सही-गलत का निर्णय लेने की क्षमता प्राप्त होती है।

  • परम सत्य की प्राप्ति (Realization of the Ultimate Truth): फलश्रुति का अंतिम वचन है कि भक्त "सत्यं भवेत्" अर्थात् सत्य को प्राप्त करता है। देवी की कृपा से साधक को परब्रह्म का ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार (self-realization) होता है।

पाठ करने की विधि और विशेष अवसर

  • इस स्तोत्र का पाठ करने के लिए शुक्रवार (Friday) का दिन अत्यंत शुभ माना जाता है।

  • नवरात्रि (Navaratri) के दिनों में, विशेषकर सरस्वती पूजा (वसन्त पंचमी) और दीपावली पर लक्ष्मी पूजन के समय, इसका पाठ करना त्रिदेवी की संयुक्त कृपा दिलाता है।

  • फलश्रुति के अनुसार, इसका "नित्यम्" अर्थात् प्रतिदिन पाठ करना चाहिए। प्रातःकाल स्नान के बाद, देवी की मूर्ति या चित्र के समक्ष हृदय में उनका ध्यान करके इसका पाठ करें।

  • जो बच्चे बोलने में कठिनाई महसूस करते हैं या जिनकी वाणी स्पष्ट नहीं है, उनके लिए माता-पिता द्वारा इस स्तोत्र का पाठ करना विशेष लाभकारी माना जाता है।