Logoपवित्र ग्रंथ

श्री हनुमान् मङ्गलाष्टकम्

Shri Hanuman Mangalashtakam

श्री हनुमान् मङ्गलाष्टकम्
॥ श्री हनुमान् मङ्गलाष्टकम् ॥ वैशाखे मासि कृष्णायां दशम्यां मन्दवासरे । पूर्वाभाद्रा प्रभूताय मङ्गलं श्रीहनूमते ॥ १ ॥ करुणारसपूर्णाय फलापूपप्रियाय च । माणिक्यहारकण्ठाय मङ्गलं श्रीहनूमते ॥ २ ॥ सुवर्चलाकलत्राय चतुर्भुजधराय च । उष्ट्रारूढाय वीराय मङ्गलं श्रीहनूमते ॥ ३ ॥ दिव्यमङ्गलदेहाय पीताम्बरधराय च । तप्तकाञ्चनवर्णाय मङ्गलं श्रीहनूमते ॥ ४ ॥ भक्तरक्षणशीलाय जानकीशोकहारिणे । सृष्टिकारणभूताय मङ्गलं श्रीहनूमते ॥ ५ ॥ रम्भावनविहाराय गन्धमादनवासिने । सर्वलोकैकनाथाय मङ्गलं श्रीहनूमते ॥ ६ ॥ पञ्चाननाय भीमाय कालनेमिहराय च । कौण्डिन्यगोत्रजाताय मङ्गलं श्रीहनूमते ॥ ७ ॥ केसरीपुत्र दिव्याय सीतान्वेषपराय च । वानराणां वरिष्ठाय मङ्गलं श्रीहनूमते ॥ ८ ॥ ॥ इति श्री हनुमान् मङ्गलाष्टकम् सम्पूर्णम् ॥

इस अष्टकम् का विशिष्ट महत्व

श्री हनुमान् मङ्गलाष्टकम् (Shri Hanuman Mangalashtakam) भगवान हनुमान को समर्पित एक अत्यंत शुभ और मंगलकारी स्तुति है। प्रत्येक श्लोक का अंत "मङ्गलं श्रीहनूमते" से होता है, जो हनुमान जी के लिए मंगल की कामना करता है। यह स्तोत्र हनुमान जी के जन्म (वैशाख मास, कृष्ण दशमी, शनिवार, पूर्वाभाद्रा नक्षत्र), उनके दिव्य स्वरूप, करुणा, वीरता और भक्त-वत्सलता का वर्णन करता है।

अष्टकम् के प्रमुख भाव और लाभ

  • मंगल प्राप्ति: प्रत्येक श्लोक में "मङ्गलं श्रीहनूमते" का उच्चारण जीवन में शुभता और मंगल लाता है।

  • करुणा और कृपा: "करुणारसपूर्णाय" - हनुमान जी करुणा से परिपूर्ण हैं और अपने भक्तों पर सदैव कृपा बरसाते हैं।

  • शोक निवारण: "जानकीशोकहारिणे" - जैसे उन्होंने माता सीता का शोक दूर किया, वैसे ही भक्तों के दुखों को भी हरते हैं।

  • भक्त रक्षा: "भक्तरक्षणशीलाय" - हनुमान जी का स्वभाव ही भक्तों की रक्षा करना है।

पाठ करने की विधि

  • इस अष्टकम् का पाठ मंगलवार और शनिवार को करना विशेष फलदायी है।

  • किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले इसका पाठ करें।

  • हनुमान जयंती के दिन इसका पाठ विशेष कृपा प्रदान करता है।