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नित्यानन्दाष्टकम् (वृन्दावन दास ठाकुर कृत)

नित्यानन्दाष्टकम् (वृन्दावन दास ठाकुर कृत)
प्रेमे घूर्णित, नयन पूर्णित, चञ्चल मृदुगतिनिन्दितं
वदनमण्डल, चन्द निरमल, वचन अमृतखण्डितम् ।
असीम गुणगणे, तारिले जगजने, मोहे काहे कुरु वञ्चितं
जयति जय, वसुजाह्नवप्रिय, देहि मे स्वपदान्तिकम् ॥ १॥

मिहिरमण्डल, श्रवणेकुण्डल, गण्डमण्डले दोलितं
किये निरुपम, मालतीर दाम, अङ्गे अनुपमशोभितम् ।
मधुरमधुमदे, मत्त मधुकर, चारु चौदिके चुम्बितं
जयति जय, वसुजाह्नवप्रिय, देहि मे स्वपदान्तिकम् ॥ २॥

आजानुलम्बित, बाहुसुवलित, मत्तकरिबरनिन्दितं
भाया भाया बकि, गभीर डाकै, करु दशदिक भेदितम् ।
अमर किन्नर, नागनरलोक, सर्वचित्त सुदर्शितं
जयति जय, वसुजाह्नवप्रिय, देहि मे स्वपदान्तिकम् ॥ ३॥

क्षणे हुहुङ्कृत, लम्फ झम्फ कृत, मेघ निन्दितगर्जितं
सिंहडमरु, क्षीण कटितट, नीलपट्टवासशोभितम् ।
सो पङ्हु धुनीतीरे, सघने धाबै, चरण भरे मही कम्पितं
जयति जय, वसुजाह्नवप्रिय, देहि मे स्वपदान्तिकम् ॥ ४॥

अबनीमण्डल, प्रेमे बादल, करल अवधौत धाबितं
तापी दीन हीन, तार्किक दुर्ज्जन, केह ना भेल बञ्चितम् ।
श्रीपदपल्लव, मधुरमधुरी, भजत भ्रमरसुखपीतं
जयति जय, वसुजाह्नवप्रिय, देहि मे स्वपदान्तिकम् ॥ ५॥

ओ मणिमञ्जीर, चारु तरलित, मधुर मधुर सुनादितं
अतुल रातुल, युगल पदतल, अमलकमलसुराजितम् ।
तेजिया अमर, अबनी हिमकर, निताइपदनख शोभितं
जयति जय, वसुजाह्नवप्रिय, देहि मे स्वपदान्तिकम् ॥ ६॥

याङ्हार भये, कलिभुजग, भागल भेल सभे हर्षितं
अपनकिरणे जनु, तिमिर नाशै, तैछे कमलसुराजितम् ।
दुरितभये क्षिति, अबहि आतुर, भार तार करु नाशितं
जयति जय, वसुजाह्नवप्रिय, देहि मे स्वपदान्तिकम् ॥ ७॥

ईषत हसैते, झलके दामिनी, कामिनीगण मन मोहितं
सो पाङ्हु धुनीतीरे, ना जानि कार भावे, आबनी उपरे गिरितम् ।
बचन बलैते, अधर कम्पै, बाहु तुलि क्षणे रोदितं
जयति जय, वसुजाह्नवप्रिय, देहि मे स्वपदान्तिकम् ॥ ८॥

इस अष्टकम् का विशिष्ट महत्व

नित्यानन्दाष्टकम् (Nityananda Ashtakam) गौड़ीय वैष्णव परम्परा के आराध्य श्री नित्यानंद प्रभु (Nityananda Prabhu) को समर्पित एक अत्यंत मधुर और भावपूर्ण स्तुति है। इसकी रचना श्री चैतन्य महाप्रभु के लीला-व्यास, श्री वृन्दावन दास ठाकुर (Vrindavana Dasa Thakura) ने की थी। नित्यानंद प्रभु को भगवान बलराम का अवतार माना जाता है और वे चैतन्य महाप्रभु के सबसे प्रमुख पार्षद और मूल गुरु-तत्त्व हैं। यह अष्टकम् उनके प्रेममय, उन्मत्त और असीम करुणामय स्वरूप का वर्णन करता है। प्रत्येक श्लोक का अंत "जयति जय, वसुजाह्नवप्रिय, देहि मे स्वपदान्तिकम्" से होता है, जिसका अर्थ है, "हे वसुधा और जाह्नवा के प्रिय (नित्यानंद प्रभु), आपकी जय हो, जय हो! मुझे अपने श्रीचरणों के समीप स्थान दीजिये।"

अष्टकम् के प्रमुख भाव और लाभ

यह स्तोत्र भगवान नित्यानंद की कृपा प्राप्त करने का एक सीधा और सरल मार्ग है:

  • प्रेममय स्वरूप का ध्यान (Meditation on His Loving Form): स्तोत्र उनके प्रेम से भरे नेत्रों ("प्रेमे घूर्णित, नयन पूर्णित"), निर्मल चन्द्रमा जैसे मुखमंडल और अमृतमय वचनों का सुंदर चित्रण करता है। उनके इस प्रेम-स्वरूप (ecstatic form of love) का ध्यान करने से हृदय में भक्ति का संचार होता है।

  • असीम करुणा (Boundless Compassion): "तापी दीन हीन, तार्किक दुर्ज्जन, केह ना भेल बञ्चितम्" - यह पंक्ति उनकी अहैतुकी कृपा को दर्शाती है। उन्होंने पापी, दीन-हीन, और यहाँ तक कि नास्तिक तार्किकों को भी अपनी कृपा से वंचित नहीं किया। उनकी शरण लेने से किसी भी योग्यता या अयोग्यता का विचार किए बिना कृपा प्राप्त होती है।

  • कलियुग के दोषों का नाश (Destruction of Kali Yuga's Evils): "याङ्हार भये, कलिभुजग, भागल" - जिनके भय से कलियुग का सर्प भी भाग जाता है। नित्यानंद प्रभु की कृपा प्राप्त करने से व्यक्ति कलियुग (Age of Kali) के पापों और दुष्प्रभावों से सुरक्षित रहता है।

  • परम आश्रय की प्राप्ति (Attainment of Supreme Shelter): इस अष्टकम् का मूल भाव शरणागति है। "देहि मे स्वपदान्तिकम्" (मुझे अपने चरणों के समीप स्थान दें) की प्रार्थना करने से भक्त को नित्यानंद प्रभु (Lord Nityananda) का आश्रय प्राप्त होता है, जो चैतन्य महाप्रभु की कृपा प्राप्त करने का एकमात्र द्वार है।

पाठ करने की विधि और विशेष अवसर

  • गौड़ीय वैष्णव भक्त इस अष्टकम् का पाठ अपनी नित्य साधना के अंग के रूप में, विशेषकर प्रातःकाल में करते हैं।

  • नित्यानंद त्रयोदशी (Nityananda Trayodashi), जो कि भगवान नित्यानंद का प्राकट्य दिवस है, और गौर पूर्णिमा (Gaura Purnima) के दिन इसका पाठ करना अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है।

  • जो भक्त कृष्ण-प्रेम प्राप्त करना चाहते हैं, उनके लिए इस स्तोत्र का पाठ अनिवार्य माना जाता है, क्योंकि नित्यानंद प्रभु की कृपा के बिना चैतन्य महाप्रभु की कृपा प्राप्त करना संभव नहीं है।

  • इसका पाठ करने से जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और आध्यात्मिक प्रगति (spiritual progress) के मार्ग में आने वाले अवरोध समाप्त होते हैं।