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Sri Krishna Bhujanga Prayata Ashtakam – श्री कृष्ण भुजङ्गप्रयाताष्टकम् (श्रीहरिरायाचार्य विरचितम्)

Sri Krishna Bhujanga Prayata Ashtakam – श्री कृष्ण भुजङ्गप्रयाताष्टकम् (श्रीहरिरायाचार्य विरचितम्)
॥ श्री कृष्ण भुजङ्गप्रयाताष्टकम् ॥ (श्रीहरिरायाचार्य विरचितम्) सदा गोपिकामण्डले राजमानं लसन्नृत्यबन्धादिलीलानिदानम् । गलद्दर्पकन्दर्पशोभाभिदानं भजे नन्दसूनुं सदानन्दरूपम् ॥ १ ॥ व्रजस्त्रीजनानन्दसन्दोहसक्तं सुधावर्षिवंशीनिनादानुरक्तम् । त्रिभङ्गाकृति स्वीकृतस्वीयभक्तं भजे नन्दसूनुं सदानन्दरूपम् ॥ २ ॥ स्फुरद्रासलीलाविलासातिरम्यं परित्यक्तगेहादिदासैकगम्यम् । विमानस्थिताशेषदेवादिनम्यं भजे नन्दसूनुं सदानन्दरूपम् ॥ ३ ॥ स्वलीलारसानन्ददुग्धोदमग्नं प्रियस्वामिनीबाहुकण्ठैकलग्नम् । रसात्मैकरूपाऽवबोधं त्रिभङ्गं भजे नन्दसूनुं सदानन्दरूपम् ॥ ४ ॥ रसामोदसम्पादकं मन्दहासं कृताभीरनारीविहारैकरासम् । प्रकाशीकृतस्वीयनानाविलासं भजे नन्दसूनुं सदानन्दरूपम् ॥ ५ ॥ जिताऽनङ्गसर्वाङ्गशोभाभिरामं क्षपापूरितस्वामिनीवृन्दकामम् । निजाधीनतावर्तिरामातिवामं भजे नन्दसूनुं सदानन्दरूपम् ॥ ६ ॥ स्वसङ्गीकृतानन्तगोपालबालं वृतस्वीयगोपीमनोवृत्तिपालम् । कृतानन्तचौर्यादिलीलारसालं भजे नन्दसूनुं सदानन्दरूपम् ॥ ७ ॥ धृताद्रीशगोवर्धनाधारहस्तं परित्रातगोगोपगोपीसमस्तम् । सुराधीशसर्वादिदेवप्रशस्तं भजे नन्दसूनुं सदानन्दरूपम् ॥ ८ ॥ ॥ इति श्रीहरिरायाचार्य विरचितं श्री कृष्ण भुजङ्गप्रयाताष्टकम् ॥

श्री कृष्ण भुजङ्गप्रयाताष्टकम्: परिचय एवं दार्शनिक पृष्ठभूमि (Introduction)

श्री कृष्ण भुजङ्गप्रयाताष्टकम् (Sri Krishna Bhujanga Prayata Ashtakam) भगवान श्रीकृष्ण के सदानन्द (शाश्वत आनंद) स्वरूप को समर्पित एक अत्यंत दिव्य और रसात्मक स्तोत्र है। इस अष्टक की रचना पुष्टिमार्गीय भक्ति परंपरा के महान आचार्य और प्रकांड विद्वान श्रीहरिरायाचार्य (Shri Harirayacharya) द्वारा की गई है। श्रीहरिरायाचार्य जी महाप्रभु वल्लभाचार्य जी के वंशज थे और उन्होंने भक्ति मार्ग, विशेषकर 'पुष्टि' (ईश्वर की कृपा) पर आधारित अनेक ग्रंथों की रचना की है।

इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता इसका 'भुजङ्गप्रयात' छंद (Chhanda) है। संस्कृत साहित्य में 'भुजङ्गप्रयात' छंद चार 'यगणों' (य-य-य-य) के मेल से बनता है। इसकी गति एक सर्प (भुजङ्ग) के समान टेढ़ी-मेढ़ी और लयबद्ध होती है, जो सुनने में अत्यंत कर्णप्रिय और मनोहारी लगती है। श्रीहरिरायाचार्य जी ने इस छंद का प्रयोग श्रीकृष्ण की उन लीलाओं के वर्णन के लिए किया है, जिनमें चपलता, गतिशीलता और प्रेम का संचार है।

अष्टक के प्रत्येक श्लोक का अंत 'भजे नन्दसूनुं सदानन्दरूपम्' (मैं उन नन्दनन्दन श्रीकृष्ण की भजना करता हूँ जो सदानन्द स्वरूप हैं) के साथ होता है। यह पुनरावृत्ति साधक के चित्त में भगवान के आनंदमयी स्वरूप को स्थिर कर देती है। इस स्तोत्र में गोपी-मण्डल, रासलीला, मुरली की मधुर तान, त्रिभंगी मुद्रा और गोवर्धन धारण जैसी महत्वपूर्ण लीलाओं का सार समाहित है। यह केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि भक्त के हृदय का वह उल्लास है जो साक्षात् परब्रह्म को अपने सम्मुख खेलते हुए देख रहा है।

स्तोत्र का विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व (Significance)

श्री कृष्ण भुजङ्गप्रयाताष्टकम् का आध्यात्मिक महत्व इसके रसात्मक चित्रण में निहित है। श्लोक २ में "सुधावर्षिवंशीनिनादानुरक्तम्" का उल्लेख है, जो यह बताता है कि भगवान की वंशी से निकलने वाली ध्वनि केवल संगीत नहीं, बल्कि अमृत की वर्षा है। यह ध्वनि जीव को माया के बंधनों से मुक्त कर सीधे गोलोक की ओर आकर्षित करती है।

श्लोक ४ में 'प्रियस्वामिनीबाहुकण्ठैकलग्नम्' के माध्यम से राधा-कृष्ण (स्वामिनी-प्रभु) के अभिन्न संबंध को दर्शाया गया है। पुष्टिमार्ग में राधा जी को 'स्वामिनी' कहा जाता है और उनकी कृपा के बिना श्रीकृष्ण की प्राप्ति असंभव मानी गई है। यह अष्टक उस दिव्य प्रेम (Premlakshana Bhakti) का परिचायक है जहाँ भगवान स्वयं अपने भक्तों के प्रेम के वशीभूत हो जाते हैं।

अंतिम श्लोक (श्लोक ८) में गोवर्धन पर्वत को धारण करने की लीला का वर्णन है। यहाँ श्रीकृष्ण को 'परायण' और 'परित्राता' (रक्षक) के रूप में चित्रित किया गया है। यह श्लोक हमें विश्वास दिलाता है कि जो प्रभु सात दिनों तक अपनी कनिष्ठ उंगली पर पहाड़ उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा कर सकते हैं, वे अपने शरणागत भक्त के जीवन की बड़ी से बड़ी बाधा को भी सहज ही दूर कर सकते हैं। यह अष्टक जीव को 'अहंकार' से मुक्त कर 'आनंद' की ओर ले जाने वाली एक नौका के समान है।

पाठ से होने वाले दिव्य लाभ — फलश्रुति (Benefits)

यद्यपि इस अष्टक का मुख्य उद्देश्य निष्काम भक्ति है, परंतु शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार इसके नियमित पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

मानसिक परमानन्द: 'सदानन्दरूपम्' के निरंतर स्मरण से मन की व्याकुलता और अवसाद (Depression) समाप्त हो जाता है और हृदय में अकारण प्रसन्नता का अनुभव होता है।
भक्ति भाव की जागृति: यह स्तोत्र साधक के भीतर 'राधा भाव' और 'सख्य भाव' को पुष्ट करता है, जिससे ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम का उदय होता है।
समस्त भय से मुक्ति: गोवर्धन धारी श्रीकृष्ण का स्मरण करने से व्यक्ति सांसारिक शत्रुओं और विपत्तियों के प्रति निर्भय हो जाता है।
पाप ताप का शमन: भगवान की रासलीला और उनके मंगलमय स्वरूप का वर्णन करने से जन्म-जन्मान्तरों के पाप नष्ट हो जाते हैं।
ब्रज रस की प्राप्ति: जो भक्त नित्य इसका पाठ करते हैं, वे अंततः भगवान की गोकुल लीलाओं में प्रवेश के अधिकारी बनते हैं।

पाठ विधि एवं विशेष साधना निर्देश (Ritual Method)

श्री कृष्ण भुजङ्गप्रयाताष्टकम् का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए इसे पुष्टिमार्गीय भाव के साथ पढ़ना चाहिए। यहाँ कुछ महत्वपूर्ण निर्देश दिए गए हैं:

साधना के मुख्य अंग

  • समय: प्रातःकाल स्नान के पश्चात 'श्रृंगार आरती' के समय या संध्या काल में पाठ करना सर्वोत्तम है।
  • शुद्धि: मन और शरीर की शुद्धि के साथ पीले रेशमी वस्त्र धारण करना शुभ माना जाता है।
  • ध्यान: पाठ करते समय श्रीकृष्ण की त्रिभंगी मुद्रा (तीन जगह से मुड़ी हुई देह) और उनके मुकुट पर मोरपंख का ध्यान अवश्य करें।
  • नैवेद्य: भगवान को केसरिया मिश्री, माखन या दूध से बनी मिठाई का भोग अर्पण करें।
  • सस्वर पाठ: इस छंद की सुंदरता इसके स्वर में है। इसे गुनगुनाते हुए या मध्यम स्वर में लयबद्ध तरीके से पढ़ने से एकाग्रता बढ़ती है।

विशेष अवसर

  • जन्माष्टमी: इस दिन मध्यरात्रि में इस अष्टक का पाठ करने से विशेष सिद्धि मिलती है।
  • शरद पूर्णिमा: रासलीला के वर्णन के कारण शरद पूर्णिमा की रात्रि को इसका गान परम सुखदायी है।
  • गोवर्धन पूजा: अन्नकूट उत्सव के अवसर पर श्लोक ८ का विशेष पाठ करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्री कृष्ण भुजङ्गप्रयाताष्टकम् के वास्तविक लेखक कौन हैं?

इस अष्टक के रचयिता श्रीहरिरायाचार्य हैं। वे पुष्टिमार्ग के एक अत्यंत तेजस्वी आचार्य थे और वल्लभाचार्य जी के वंश की सप्तम पीढ़ी से संबंधित थे।

2. 'भुजङ्गप्रयात' छंद का क्या अर्थ है?

यह एक वर्णिक छंद है जिसमें १२ वर्ण होते हैं। इसकी चाल सर्प की तरह लहरदार होती है, जो भक्त के हृदय में भावों की लहरें उत्पन्न करती है।

3. इस स्तोत्र में श्रीकृष्ण को 'सदानन्दरूपम्' क्यों कहा गया है?

श्रीकृष्ण साक्षात् सच्चिदानन्द (सत्य, चित् और आनंद) हैं। उनका आनंद कभी समाप्त नहीं होता और वह सदैव नवीन रहता है, इसीलिए उन्हें 'सदानन्द' कहा गया है।

4. क्या स्त्रियाँ भी यह पाठ कर सकती हैं?

हाँ, भगवद्-भक्ति में कोई भेदभाव नहीं है। श्रीकृष्ण स्वयं गोपिकाओं और अपनी भक्तों को विशेष स्नेह देते हैं, अतः स्त्रियाँ पूरी श्रद्धा से इसका पाठ कर सकती हैं।

5. 'त्रिभङ्गाकृति' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है "तीन जगह से झुकी हुई आकृति"। जब श्रीकृष्ण बांसुरी बजाते हैं, तब उनकी गर्दन, कमर और घुटने मुड़े हुए होते हैं, जो उनकी सुंदरता का प्रतीक है।

6. क्या इस पाठ से कुंडली दोष दूर होते हैं?

भक्ति ग्रंथों के अनुसार, जब जीव 'सदानन्द' की शरण में आता है, तो उसके सभी सांसारिक दोष और प्रारब्ध के कष्ट क्षीण होने लगते हैं।

7. पुष्टिमार्ग में इस अष्टक का क्या स्थान है?

पुष्टिमार्ग में इसे 'भाव' जगाने वाला श्रेष्ठ स्तोत्र माना गया है, जो ठाकुर जी (श्रीनाथजी) के प्रति प्रेम को पुष्ट करता है।

8. 'जिताऽनङ्गसर्वाङ्ग' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है - जिन्होंने कामदेव (अनङ्ग) को भी अपने अंग-प्रत्यंग की सुंदरता से जीत लिया है। अर्थात् वे परम सौंदर्यशाली हैं।

9. क्या इस पाठ के लिए चन्दन की माला आवश्यक है?

नहीं, यह एक स्तोत्र है जिसे पढ़ा जाता है। माला की आवश्यकता मंत्र जप के लिए होती है। फिर भी तुलसी की माला धारण करके पाठ करना अत्यंत शुभ है।

10. इस अष्टक का पाठ कितनी बार करना चाहिए?

नियमित रूप से एक बार पाठ करना श्रेष्ठ है। विशेष संकल्प के लिए ८ बार या २१ बार पाठ किया जा सकता है।