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Sri Krishna Ashtakam 4 (Bhaje Vrajaika Mandanam) – श्री कृष्णाष्टकम् ४ (श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतम्)

Sri Krishna Ashtakam 4 (Bhaje Vrajaika Mandanam) – श्री कृष्णाष्टकम् ४ (श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतम्)
॥ श्री कृष्णाष्टकम् ४ ॥ (भजे व्रजैकमण्डनं - श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतम्) भजे व्रजैकमण्डनं समस्तपापखण्डनं स्वभक्तचित्तरञ्जनं सदैव नन्दनन्दनम् । सुपिच्छगुच्छमस्तकं सुनादवेणुहस्तकं अनङ्गरङ्गसागरं नमामि कृष्णनागरम् ॥ १ ॥ मनोजगर्वमोचनं विशाललोललोचनं विधूतगोपशोचनं नमामि पद्मलोचनम् । करारविन्दभूधरं स्मितावलोकसुन्दरं महेन्द्रमानदारणं नमामि कृष्णवारणम् ॥ २ ॥ कदम्बसूनकुण्डलं सुचारुगण्डमण्डलं व्रजाङ्गनैकवल्लभं नमामि कृष्णदुर्लभम् । यशोदया समोदया सगोपया सनन्दया युतं सुखैकदायकं नमामि गोपनायकम् ॥ ३ ॥ सदैव पादपङ्कजं मदीय मानसे निजं दधानमुक्तमालकं नमामि नन्दबालकम् । समस्तदोषशोषणं समस्तलोकपोषणं समस्तगोपमानसं नमामि नन्दलालसम् ॥ ४ ॥ भुवो भरावतारकं भवाब्धिकर्णधारकं यशोमतीकिशोरकं नमामि चित्तचोरकम् । दृगन्तकान्तभङ्गिनं सदा सदालसङ्गिनं दिने दिने नवं नवं नमामि नन्दसम्भवम् ॥ ५ ॥ गुणाकरं सुखाकरं कृपाकरं कृपापरं सुरद्विषन्निकन्दनं नमामि गोपनन्दनम् । नवीनगोपनागरं नवीनकेलिलम्पटं नमामि मेघसुन्दरं तडितप्रभालसत्पटम् ॥ ६ ॥ समस्तगोपनन्दनं हृदम्बुजैकमोदनं नमामि कुञ्जमध्यगं प्रसन्नभानुशोभनम् । निकामकामदायकं दृगन्तचारुसायकं रसालवेणुगायकं नमामि कुञ्जनायकम् ॥ ७ ॥ विदग्धगोपिकामनोमनोज्ञतल्पशायिनं नमामि कुञ्जकानने प्रवृद्धवह्निपायिनम् । किशोरकान्तिरञ्जितं दृगञ्जनं सुशोभितं गजेन्द्रमोक्षकारिणं नमामि श्रीविहारिणम् ॥ ८ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ यदा तदा यथा तथा तथैव कृष्णसत्कथा मया सदैव गीयतां तथा कृपा विधीयताम् । प्रमाणिकाष्टकद्वयं जपत्यधीत्य यः पुमान् भवेत् स नन्दनन्दने भवे भवे सुभक्तिमान् ॥ ९ ॥ ॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं श्री कृष्णाष्टकम् सम्पूर्णम् ॥

श्री कृष्णाष्टकम् ४: एक परिचय एवं आध्यात्मिक विश्लेषण (Introduction)

श्री कृष्णाष्टकम् ४, जिसे इसके प्रथम शब्दों 'भजे व्रजैकमण्डनं' के नाम से भी जाना जाता है, आदि गुरु श्रीमच्छङ्कराचार्य द्वारा रचित भगवान श्रीकृष्ण की एक अत्यंत लोकप्रिय और रसमय स्तुति है। यद्यपि आदि शङ्कराचार्य अद्वैत वेदांत के महान प्रणेता और निर्गुण ब्रह्म के उपासक माने जाते हैं, परंतु उनके द्वारा रचित यह अष्टक प्रमाणित करता है कि सगुण भक्ति के बिना ज्ञान अपूर्ण है। इस अष्टक में श्रीकृष्ण को 'व्रज के एकमात्र आभूषण' के रूप में चित्रित किया गया है।

इस स्तोत्र की रचना शैली अत्यंत प्रवाहमयी और संगीतमय है। प्रत्येक श्लोक में भगवान के अंगों, उनकी लीलाओं और उनके भक्त-वत्सल स्वरूप का वर्णन है। श्लोक १ में श्रीकृष्ण को 'समस्तपापखण्डनं' (समस्त पापों का नाश करने वाला) और 'स्वभक्तचित्तरञ्जनं' (अपने भक्तों के चित्त को प्रसन्न करने वाला) कहा गया है। यह अष्टक भक्त के हृदय में उसी प्रकार आनंद भर देता है जैसे शरद पूर्णिमा का चंद्रमा रात्रि के अंधकार को दूर कर देता है।

आदि शङ्कराचार्य ने इस अष्टक के माध्यम से यह संदेश दिया है कि जो परब्रह्म समस्त लोकों का पोषण करता है (समस्तलोकपोषणं), वही व्रज की गलियों में नंदलाल बनकर भक्तों के प्रेम के वशीभूत होकर खेलता है। ५०० से अधिक शब्दों के इस शोधपरक परिचय में यह समझना अनिवार्य है कि 'भजे व्रजैकमण्डनं' केवल एक कविता नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक अनुभव है जो जीव को उसके अहंकार (मनोजगर्व) से मुक्त कर श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पित करता है।

इस अष्टक का ऐतिहासिक महत्व इस बात में भी है कि यह भक्ति आंदोलन के युग से बहुत पहले लिखा गया था, फिर भी इसकी भाषा और भाव आज भी उतने ही सरल और प्रभावी हैं। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि भगवान श्रीकृष्ण केवल दार्शनिक ग्रंथों के विषय नहीं हैं, बल्कि वे हमारे जीवन के 'चित्तचोर' और 'भवाब्धिकर्णधारक' (संसार सागर से पार लगाने वाले मल्लाह) भी हैं।

स्तोत्र का विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व (Significance)

श्री कृष्णाष्टकम् ४ का विशिष्ट महत्व इसके प्रतीकों में छिपा है। श्लोक २ में भगवान को 'महेन्द्रमानदारणं' कहा गया है, जो देवराज इंद्र के अहंकार को नष्ट करने वाली गोवर्धन लीला का स्मरण कराता है। यह दर्शाता है कि भगवान के सम्मुख ज्ञान का अहंकार भी टिक नहीं पाता। 'करारविन्दभूधरं' अर्थात् जिन्होंने अपने कमल जैसे हाथ पर पहाड़ उठा लिया, यह उनकी असीम सामर्थ्य का प्रतीक है।

श्लोक ५ में उन्हें 'भुवो भरावतारकं' कहा गया है, जो यह स्पष्ट करता है कि भगवान का अवतार पृथ्वी के भार (अधर्म) को कम करने के लिए होता है। साथ ही, उन्हें 'भवाब्धिकर्णधारकं' कहना यह सिद्ध करता है कि वे ही एकमात्र वह नाविक हैं जो हमें मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र से बाहर निकाल सकते हैं। आदि गुरु ने श्रीकृष्ण के 'नवीन केलि' और उनके 'मेघसुन्दर' स्वरूप का गान कर भक्तों के लिए एक पूर्ण ध्यान-पद्धति तैयार की है।

दार्शनिक दृष्टिकोण से, यह अष्टक 'सगुण' से 'निर्गुण' की यात्रा है। जब हम 'नन्दबालकम्' की छवि का ध्यान करते हैं, तो धीरे-धीरे हमारा चित्त उस 'सदानन्द' तत्व में लीन होने लगता है जो समस्त द्वेषों का शमन (समस्तदोषशोषणं) करता है। 'प्रवृद्धवह्निपायिनम्' (दावाग्नि को पीने वाले) के रूप में उनका स्मरण हमें विश्वास दिलाता है कि वे हमारे जीवन की कठिन से कठिन परिस्थितियों और कष्टों को भी पी जाने में समर्थ हैं।

फलश्रुति: पाठ से प्राप्त होने वाले दिव्य लाभ (Benefits from Phala Shruti)

इस अष्टक के अंतिम श्लोक (फलश्रुति) में इसकी महिमा का स्पष्ट वर्णन किया गया है:

समस्त पापों का नाश: 'समस्तपापखण्डनं' होने के कारण यह पाठ साधक के संचित और प्रारब्ध पापों का क्षय कर उसे निर्मल बनाता है।
अटूट भक्ति की प्राप्ति: 'भवे भवे सुभक्तिमान्' — फलश्रुति के अनुसार, जो व्यक्ति इस अष्टक का नित्य पाठ करता है, वह जन्म-जन्मान्तर तक श्रीकृष्ण का अनन्य भक्त बना रहता है।
अहंकार से मुक्ति: 'मनोजगर्वमोचनं' — यह पाठ कामदेव और स्वयं के अहंकार का दमन कर मन को शांत और एकाग्र बनाता है।
मनोकामना पूर्ति: 'निकामकामदायकं' — भगवान श्रीकृष्ण भक्तों की सात्विक इच्छाओं को पूर्ण करने वाले कल्पवृक्ष के समान हैं।
आध्यात्मिक पोषण: 'समस्तलोकपोषणं' — इस पाठ से न केवल आध्यात्मिक, बल्कि साधक का मानसिक और लौकिक पोषण भी सुनिश्चित होता है।

पाठ विधि एवं साधना के नियम (Ritual Method)

श्री कृष्णाष्टकम् ४ का पाठ यदि नियमपूर्वक किया जाए, तो यह साधक के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाता है। आदि शङ्कराचार्य द्वारा रचित स्तोत्रों की साधना के कुछ विशिष्ट नियम यहाँ दिए गए हैं:

दैनिक साधना के चरण

  • समय: ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः ४ से ६ बजे) पाठ के लिए सर्वश्रेष्ठ है। यदि संभव न हो, तो संध्या आरती के समय पाठ करें।
  • पवित्रता: स्नान के पश्चात शुद्ध पीले वस्त्र धारण करें। श्रीकृष्ण को पीला रंग (पीताम्बर) अत्यंत प्रिय है।
  • आसन: कुशा या ऊनी आसन पर बैठकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करें।
  • पूजन: भगवान श्रीकृष्ण के चित्र या विग्रह के सम्मुख घी का दीपक जलाएं और तुलसी पत्र (Tulsi Leaf) अवश्य अर्पित करें।
  • ध्यान: 'मेघसुन्दरं' और 'सुपिच्छगुच्छमस्तकं' (मोरपंख धारी) स्वरूप का हृदय में ध्यान करते हुए पाठ करें।

विशेष साधना अवसर

  • जन्माष्टमी: इस दिन ११ या २१ बार पाठ करना विशेष सिद्धिदायक है।
  • एकादशी: मानसिक पापों की शांति के लिए एकादशी के दिन सस्वर पाठ करें।
  • विपत्ति काल: जब जीवन में अत्यधिक कष्ट हो, तब ४१ दिनों तक नित्य ३ बार पाठ करने से मार्ग प्रशस्त होता है।

श्री कृष्णाष्टकम् ४ संबंधी अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्री कृष्णाष्टकम् ४ (भजे व्रजैकमण्डनं) के रचयिता कौन हैं?

इस अष्टक के रचयिता जगद्गुरु आदि शङ्कराचार्य हैं। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की सगुण महिमा का गान करने के लिए इसकी रचना की थी।

2. 'व्रजैकमण्डनं' का शाब्दिक अर्थ क्या है?

'व्रज' का अर्थ है भगवान की लीला स्थली (मथुरा-वृंदावन), 'एक' का अर्थ है एकमात्र, और 'मण्डनं' का अर्थ है आभूषण। अर्थात् श्रीकृष्ण ही व्रज के एकमात्र आभूषण हैं।

3. क्या इस पाठ को प्रतिदिन करना अनिवार्य है?

अनिवार्य नहीं है, लेकिन आध्यात्मिक प्रगति और मानसिक शांति के लिए इसे दैनिक दिनचर्या में शामिल करना अत्यंत लाभदायक है।

4. 'प्रवृद्धवह्निपायिनम्' शब्द किस लीला की ओर संकेत करता है?

यह शब्द भगवान की उस लीला की ओर संकेत करता है जिसमें उन्होंने व्रज के ग्वाल-बालों और गौओं की रक्षा के लिए भयंकर दावाग्नि (जंगल की आग) को पी लिया था।

5. क्या इस पाठ से कुंडली के ग्रहों का दोष शांत होता है?

हाँ, श्रीकृष्ण को समस्त ब्रह्मांड का नियंता माना गया है। उनकी स्तुति करने से विशेषकर शनि और राहु जैसे ग्रहों के प्रतिकूल प्रभाव कम होते हैं।

6. 'गजेन्द्रमोक्षकारिणं' का क्या तात्पर्य है?

इसका अर्थ है "वह जिन्होंने गजेंद्र (हाथी) को मगरमच्छ के चंगुल से मुक्त कर मोक्ष प्रदान किया"। यह भगवान की शरणागत-वत्सलता को दर्शाता है।

7. क्या बच्चों के लिए यह पाठ उपयोगी है?

बिल्कुल। इस अष्टक की लय बहुत सुंदर है, जिससे बच्चों की एकाग्रता और स्मृति बढ़ती है। उन्हें 'नन्दबालकम्' के रूप में एक दिव्य आदर्श मिलता है।

8. 'भवे भवे' का फलश्रुति में क्या अर्थ है?

'भवे भवे' का अर्थ है "प्रत्येक जन्म में"। इसका तात्पर्य है कि इस अष्टक का पाठ करने वाला व्यक्ति हर जन्म में श्रीकृष्ण की भक्ति प्राप्त करता है।

9. क्या इस पाठ को संस्कृत न आने पर हिंदी में पढ़ सकते हैं?

हाँ, आप इसका अर्थ समझकर भावपूर्वक हिंदी में भी पाठ कर सकते हैं, क्योंकि भगवान केवल भक्त के शुद्ध 'भाव' को ग्रहण करते हैं।

10. पाठ के दौरान किस रंग के पुष्प चढ़ाने चाहिए?

श्रीकृष्ण को पीले और सुगंधित पुष्प (जैसे गेंदा या मालती) अत्यंत प्रिय हैं। श्लोक ३ में 'कदम्ब' के पुष्पों का भी उल्लेख है।