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Sri Achyuta Ashtakam 2 – श्री अच्युताष्टकम् २ (श्रीमच्छङ्कराचार्य विरचितम्)

Sri Achyuta Ashtakam 2 – श्री अच्युताष्टकम् २ (श्रीमच्छङ्कराचार्य विरचितम्)
॥ श्री अच्युताष्टकम् २ ॥ (श्रीमच्छङ्कराचार्य विरचितम्) अच्युताच्युत हरे परमात्मन् राम कृष्ण पुरुषोत्तम विष्णो । वासुदेव भगवन्ननिरुद्ध श्रीपते शमय दुःखमशेषम् ॥ १ ॥ विश्वमङ्गल विभो जगदीश नन्दनन्दन नृसिंह नरेन्द्र । मुक्तिदायक मुकुन्द मुरारे श्रीपते शमय दुःखमशेषम् ॥ २ ॥ रामचन्द्र रघुनायक देव दीननाथ दुरितक्षयकारिन् । यादवेन्द्र यदुभूषण यज्ञ श्रीपते शमय दुःखमशेषम् ॥ ३ ॥ देवकीतनय दुःखदवाग्ने राधिकारमण रम्यसुमूर्ते । दुःखमोचन दयार्णव नाथ श्रीपते शमय दुःखमशेषम् ॥ ४ ॥ गोपिकावदनचन्द्रचकोर नित्य निर्गुण निरञ्जन जिष्णो । पूर्णरूप जय शङ्कर शर्व श्रीपते शमय दुःखमशेषम् ॥ ५ ॥ गोकुलेश गिरिधारण धीर यामुनाच्छतटखेलनवीर । नारदादिमुनिवन्दितपाद श्रीपते शमय दुःखमशेषम् ॥ ६ ॥ द्वारकाधिप दुरन्तगुणाब्धे प्राणनाथ परिपूर्ण भवारे । ज्ञानगम्य गुणसागर ब्रह्मन् श्रीपते शमय दुःखमशेषम् ॥ ७ ॥ दुष्टनिर्दलन देव दयालो पद्मनाभ धरणीधर धर्मिन् । रावणान्तक रमेश मुरारे श्रीपते शमय दुःखमशेषम् ॥ ८ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ अच्युताष्टकमिदं रमणीयं निर्मितं भवभयं विनिहन्तुम् । यः पठेद्विषयवृत्तिनिवृत्ति- -र्जन्मदुःखमखिलं स जहाति ॥ ९ ॥ ॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्य विरचितं श्री अच्युताष्टकम् सम्पूर्णम् ॥

श्री अच्युताष्टकम् २: परिचय एवं दार्शनिक स्वरूप (Introduction)

श्री अच्युताष्टकम् २ (Sri Achyuta Ashtakam 2) अद्वैत वेदांत के महान प्रणेता जगद्गुरु आदि शङ्कराचार्य द्वारा रचित एक अत्यंत मर्मस्पर्शी और भक्तिपूर्ण स्तोत्र है। 'अच्युत' शब्द का अर्थ है — 'वह जो कभी अपने स्वरूप से च्युत (अलग) नहीं होता' या 'वह जो अविनाशी है'। यद्यपि शङ्कराचार्य निर्गुण ब्रह्म के उपासक माने जाते हैं, किंतु उनकी यह रचना सिद्ध करती है कि सगुण भक्ति और निर्गुण ज्ञान वास्तव में एक ही सत्य के दो पहलू हैं।

इस अष्टक की अद्वितीयता इसकी पुकार में है — "श्रीपते शमय दुःखमशेषम्"। प्रत्येक श्लोक का यह चतुर्थ चरण भक्त की उस आकुलता को दर्शाता है जहाँ वह संसार के त्रिविध तापों (आदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक) से त्रस्त होकर साक्षात् लक्ष्मीपति अच्युत की शरण में आता है। यहाँ 'अशेष' शब्द का अर्थ है 'पूर्णतः' या 'बिना किसी अवशेष के'। भक्त केवल कुछ दुखों की निवृत्ति नहीं चाहता, बल्कि वह दुखों के मूल कारण यानी जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति की याचना करता है।

इस स्तोत्र में शङ्कराचार्य जी ने भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों और उनके दिव्य नामों का स्मरण किया है। श्लोक १ में वे 'अच्युत', 'हरे', 'परमात्मन्', 'राम', 'कृष्ण' और 'वासुदेव' कहकर एक ही परम तत्व को पुकारते हैं। यह स्तोत्र वैष्णव भक्ति का सार है जो आदि गुरु की अगाध विद्वत्ता और कोमल भक्ति का सुंदर संगम है। ५०० से अधिक शब्दों के इस गहन विश्लेषण में यह स्पष्ट होता है कि यह पाठ केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि हृदय के अंधकार को मिटाने वाली एक दिव्य मशाल है।

अच्युताष्टकम् २ का आध्यात्मिक एवं विशिष्ट महत्व (Significance)

इस अष्टक का विशिष्ट महत्व इसके 'दुःख निवारक' पक्ष में है। श्लोक ४ में भगवान को 'दुःखदवाग्ने' (दुखों के वन की आग) कहा गया है। जिस प्रकार दावानल (वन की आग) सूखी घास और लकड़ियों को क्षण भर में भस्म कर देती है, उसी प्रकार अच्युत का नाम साधक के प्रारब्ध और वर्तमान कष्टों को जला देता है। शङ्कराचार्य जी ने यहाँ श्रीकृष्ण के 'राधिका-रमण' स्वरूप और उनके 'रम्य-सुमूर्ते' (सुंदर विग्रह) का भी गान किया है, जो भक्त के मन को आनंदित करता है।

श्लोक ५ में प्रयुक्त विशेषण 'नित्य निर्गुण निरञ्जन जिष्णो' वेदांत के दर्शन को स्पष्ट करते हैं। यहाँ भगवान को गुणातीत और माया से रहित बताया गया है, जो 'जिष्णु' (सदा विजयी) हैं। यह स्तोत्र हमें सिखाता है कि जो समस्त ब्रह्मांड का नियंता है, वही भक्तों के प्रेम के वशीभूत होकर 'गोपिकावदनचन्द्रचकोर' (गोपियों के मुख-चंद्र का चकोर) बन जाता है।

आदि गुरु शङ्कराचार्य ने इस रचना में रामायण और महाभारत दोनों के सार को पिरोया है। श्लोक ३ में 'रामचन्द्र' और 'रघुनायक' का स्मरण है, जबकि श्लोक ८ में 'रावणान्तक' और 'पद्मनाभ' के माध्यम से सृष्टि की उत्पत्ति और दुष्टों के संहार की शक्ति को नमन किया गया है। यह अष्टक साधक को यह विश्वास दिलाता है कि चाहे दुःख कितना ही गहरा क्यों न हो, प्रभु के श्रीचरणों में आने पर वह 'अशेष' (पूरी तरह) शांत हो जाता है।

फलश्रुति: पाठ से प्राप्त होने वाले लाभ (Benefits)

इस अष्टक के ९वें श्लोक में इसकी महिमा का वर्णन किया गया है:

भवभय नाशन: 'भवभयं विनिहन्तुम्' — यह पाठ संसार के भय और मृत्यु के डर को जड़ से समाप्त कर देता है।
विषय निवृत्ति: 'विषयवृत्तिनिवृत्तिः' — संसार की नाशवान वस्तुओं और इंद्रियों के भोगों के प्रति जो आसक्ति है, यह पाठ उसे समाप्त कर मन को वैराग्य प्रदान करता है।
जन्म दुःख मुक्ति: 'जन्मदुःखमखिलं स जहाति' — इस अष्टक का नियमित गान करने वाला व्यक्ति जन्म-मरण के कष्टदायक चक्र से मुक्त होकर मोक्ष की प्राप्ति करता है।
मानसिक शांति: 'शमय दुःखमशेषम्' की पुकार से साधक का अशांत मन शांत होता है और उसे आध्यात्मिक शीतलता का अनुभव होता है।
पाप क्षय: 'दुरितक्षयकारिन्' होने के कारण यह स्तोत्र अनजाने में किए गए सभी पापों का नाश कर हृदय को पवित्र बनाता है।

पाठ विधि एवं साधना के नियम (Ritual Method)

श्री अच्युताष्टकम् २ का पाठ अत्यंत फलदायी है यदि इसे एकाग्र मन और शुद्ध भाव से किया जाए। आदि गुरु द्वारा निर्देशित साधना के अनुसार इसके कुछ विशेष नियम हैं:

दैनिक साधना निर्देश

  • ब्रह्म मुहूर्त: प्रातःकाल ४ से ६ बजे के बीच पाठ करना सर्वोच्च फलदायी है, क्योंकि उस समय बुद्धि सात्विक होती है।
  • शुद्धि: स्नान के पश्चात श्वेत या पीले वस्त्र पहनकर, भगवान विष्णु या लड्डू गोपाल के सम्मुख बैठें।
  • आसन: कुशा या ऊनी आसन का प्रयोग करें। मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखें।
  • दीपार्पण: शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें और संभव हो तो तुलसी का पत्ता प्रभु को अर्पित करें।
  • ध्यान: 'शमय दुःखमशेषम्' कहते समय अपने कष्टों को प्रभु के चरणों में समर्पित करने का भाव रखें।

विशेष अवसर

  • एकादशी: प्रत्येक एकादशी को ११ बार पाठ करने से घर की दरिद्रता और अशांति दूर होती है।
  • जन्माष्टमी एवं रामनवमी: भगवान के अवतार दिवसों पर इसका गान विशेष सिद्धि प्रदान करता है।
  • विपत्ति काल: जब जीवन में कोई बड़ा संकट आए, तब ४१ दिनों तक नित्य ८ बार पाठ करने से चमत्कारिक लाभ होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्री अच्युताष्टकम् २ और अच्युताष्टकम् १ में क्या अंतर है?

दोनों ही स्तोत्र आदि शङ्कराचार्य द्वारा रचित हैं। प्रथम अष्टक (अच्युतं केशवं...) भगवान के नामों और उनकी मधुरता पर अधिक केंद्रित है, जबकि द्वितीय अष्टक (अच्युताच्युत हरे...) में दुखों की शांति (शमय दुःखमशेषम्) और शरणागति की पुकार मुख्य है।

2. 'अच्युत' नाम का वास्तविक अर्थ क्या है?

'अच्युत' का अर्थ है — वह जो कभी अपने स्थान या शक्ति से च्युत (अलग) नहीं होता। अर्थात् वह परम सत्य जो हर परिस्थिति में स्थिर और अविनाशी है।

3. क्या इस पाठ को संध्या समय किया जा सकता है?

हाँ, शयन से पूर्व या संध्या आरती के समय इसका पाठ करने से दिनभर की मानसिक थकान दूर होती है और शांत निद्रा आती है।

4. क्या स्त्रियाँ और बच्चे भी यह पाठ कर सकते हैं?

बिल्कुल। भगवान के नाम में कोई बंधन नहीं है। बच्चों को यह पाठ सिखाने से उनकी स्मृति शक्ति और एकाग्रता बढ़ती है।

5. 'शमय दुःखमशेषम्' का क्या प्रभाव होता है?

यह एक अत्यंत शक्तिशाली मंत्र की तरह कार्य करता है। यह हमारे अवचेतन मन में यह विश्वास जगाता है कि ईश्वर हमारे दुखों को हर रहे हैं, जिससे मानसिक शक्ति बढ़ती है।

6. क्या इस पाठ से शारीरिक रोग ठीक हो सकते हैं?

अनेक भक्तों का अनुभव है कि श्रद्धापूर्वक पाठ करने से मानसिक अशांति दूर होती है, जिसका सकारात्मक प्रभाव शारीरिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है।

7. क्या इस अष्टक के लिए चन्दन की माला आवश्यक है?

नहीं, यह एक स्तोत्र है जिसका सस्वर पाठ किया जाता है। माला की आवश्यकता केवल नाम जप (जैसे - ॐ अच्युताय नमः) के लिए होती है।

8. 'विषयवृत्तिनिवृत्तिः' का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है इंद्रियों का विषयों (जैसे अत्यधिक काम, क्रोध, लोभ) से हटकर भगवान में लीन हो जाना। यह वास्तविक आनंद की प्राप्ति की शर्त है।

9. क्या इस पाठ को संस्कृत न आने पर हिंदी में पढ़ सकते हैं?

हाँ, आप इसका अर्थ समझकर हिंदी में भी भाव व्यक्त कर सकते हैं, क्योंकि भगवान केवल भक्त के शुद्ध 'भाव' को ग्रहण करते हैं।

10. आदि शङ्कराचार्य ने इस अष्टक की रचना क्यों की थी?

उन्होंने संसार के दुखों से पीड़ित मानवता को एक ऐसा सरल और शक्तिशाली साधन देने के लिए इसकी रचना की थी जिससे साधारण मनुष्य भी ईश्वर से जुड़ सके।