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वैदिक आरती (यजुर्वेद मंत्र)

Vedic Aarti (Yajurveda Mantras)

वैदिक आरती (यजुर्वेद मंत्र)
ॐ ये देवासो दिव्येकादश स्थ पृथिव्यामध्येकादश स्थ।
अप्सुक्षितो महिनैकादश स्थ ते देवासो यज्ञमिमं जुषध्वम् ॥
(यजुर्वेद ७।१९)

ॐ आ रात्रि पार्थिवरजः पितुरप्रायि धामभिः ।
दिवः सदा सि बृहती वितिष्ठस आ त्वेषं वर्तते तमः ॥
(यजुर्वेद ३४।३२)

ॐ इदं हविः प्रजननं मे अस्तु दशवीर सर्वगण स्वस्तये ।
आत्मसनि प्रजासनि पशुसनि लोकसन्यभयसनि ।
अग्निः प्रजां बहुलां मे करोत्वन्नं पयो रेतो अस्मासु धत्त ॥
(यजुर्वेद १९।४८)
॥ इति संपूर्णंम् ॥

वैदिक आरती का विशिष्ट महत्व

यह "वैदिक आरती" केवल साधारण गायन नहीं है, बल्कि यजुर्वेद (Yajurveda) के तीन अत्यंत शक्तिशाली और पवित्र मंत्रों (Mantras) का संग्रह है. हिंदू धर्म की सनातन परंपरा में, किसी भी बड़े हवन (Havan), यज्ञ (Yajna) या विशेष पूजा के समापन पर इन मंत्रों का उच्चारण 'नीराजना' (Aarti) या 'मंत्र पुष्पांजलि' के रूप में किया जाता है। ये मंत्र देवताओं का आह्वान करते हैं और वातावरण को शुद्ध करते हैं.

मंत्रों के प्रमुख भाव और अर्थ

यहाँ प्रस्तुत तीनों मंत्रों का गहरा आध्यात्मिक और भौतिक अर्थ है:

  • 33 कोटि देवताओं का आह्वान (Invocation of 33 Deities): पहले मंत्र (यजुर्वेद ७।१९) "ॐ ये देवासो..." में ग्यारह देवता आकाश में, ग्यारह पृथ्वी पर और ग्यारह जल/अंतरिक्ष में निवास करने वाले देवताओं का आह्वान किया गया है. यह कुल 33 प्रकार के दिव्य शक्तियों को यज्ञ स्वीकार करने के लिए आमंत्रित करता है.
  • प्रजा और पशु धन की कामना (Prayer for Progeny and Wealth): तीसरे मंत्र (यजुर्वेद १९।४८) "ॐ इदं हविः..." में अग्नि देव से प्रार्थना की गई है कि वे हमें संतान (offspring), पशु धन (cattle/wealth), और साहस (courage) प्रदान करें.
  • अभय और लोक कल्याण (Fearlessness and Welfare): इन मंत्रों के माध्यम से भक्त अपने लिए और समाज के लिए अभय (fearlessness) और आत्म-शांति की मांग करता है.

आरती/पाठ करने की विधि और विशेष अवसर

  • हवन का समापन (Conclusion of Havan): जब 'पूर्णाहुति' (final offering) दी जाती है, तब सभी भक्त खड़े होकर, हाथ में पुष्प (flower) और अक्षत लेकर इन मंत्रों का उच्चारण करते हैं।
  • आरती के समय (During Aarti): कई मंदिरों और वैदिक अनुष्ठानों में, कपूर आरती (Camphor Aarti) के दौरान इन मंत्रों को लयबद्ध तरीके से गाया जाता है।
  • दैनिक प्रार्थना (Daily Prayer): जो साधक वैदिक मार्ग का अनुसरण करते हैं, वे इसे अपनी दैनिक संध्या वंदन या पूजा के अंत में शांति और समृद्धि (peace and prosperity) के लिए पढ़ते हैं।

इस आरती का विशिष्ट महत्व

यह "वैदिक आरती" केवल साधारण गायन नहीं है, बल्कि यजुर्वेद (Yajurveda) के तीन अत्यंत शक्तिशाली और पवित्र मंत्रों (Mantras) का संग्रह है. हिंदू धर्म की सनातन परंपरा में, किसी भी बड़े हवन (Havan), यज्ञ (Yajna) या विशेष पूजा के समापन पर इन मंत्रों का उच्चारण 'नीराजना' (Aarti) या 'मंत्र पुष्पांजलि' के रूप में किया जाता है। ये मंत्र देवताओं का आह्वान करते हैं और वातावरण को शुद्ध करते हैं.

आरती के प्रमुख भाव और अर्थ

यहाँ प्रस्तुत तीनों मंत्रों का गहरा आध्यात्मिक और भौतिक अर्थ है:

  • 33 कोटि देवताओं का आह्वान (Invocation of 33 Deities): पहले मंत्र (यजुर्वेद ७।१९) "ॐ ये देवासो..." में ग्यारह देवता आकाश में, ग्यारह पृथ्वी पर और ग्यारह जल/अंतरिक्ष में निवास करने वाले देवताओं का आह्वान किया गया है. यह कुल 33 प्रकार के दिव्य शक्तियों को यज्ञ स्वीकार करने के लिए आमंत्रित करता है.

  • प्रजा और पशु धन की कामना (Prayer for Progeny and Wealth): तीसरे मंत्र (यजुर्वेद १९।४८) "ॐ इदं हविः..." में अग्नि देव से प्रार्थना की गई है कि वे हमें संतान (offspring), पशु धन (cattle/wealth), और साहस (courage) प्रदान करें.

  • अभय और लोक कल्याण (Fearlessness and Welfare): इन मंत्रों के माध्यम से भक्त अपने लिए और समाज के लिए अभय (fearlessness) और आत्म-शांति की मांग करता है.

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