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श्रीकृष्णारार्तिका (शरणागतभीतिनिवृत्तिपरं)

Shrikrishna Arartika (Sanskrit)

श्रीकृष्णारार्तिका (शरणागतभीतिनिवृत्तिपरं)
शरणागतभीतिनिवृत्तिपरं परपक्षतमोनिकरांशुनिधिम्।
निधिसेवितपादसरोजयुगं युगधर्मनिवर्त्तककालफलम्॥१॥

करजोल्लिखितप्रमदोच्चकुचं कुचकुङ्कुमलिप्तयशोहृदयम्।
हृदयस्थितगोकुलवासिजनं जनसञ्चितपुण्यचयैकफलम्॥२॥

फलदानपरातिसमर्थभुजं भुजदण्डगृहीतकुचाग्रमणिम्।
मणिशोभितहस्तधृताद्रिवरं वरगोपवधूचयसंवलितम्॥३॥

वलितप्रमदायुतरासकरं करपद्मयुगाहितवेणुवरम्।
वरभक्तिशिरःस्थितपद्मकरं करमर्दितयादवयूथरिपुम्॥४॥

रिपुयूथभुजङ्गमदर्पहरं हरपूजितरम्यसरोजपदम्।
पदपद्मयुगार्चनदत्तपदं पदपद्मनखस्थितभक्तिरसम्॥५॥

रसपूरितगोपवधूशारणं शरणागतघोषजनाभयदम्।
भयदाधशिरोहरखङ्गधरं धरणीकृतपुण्यचयैकफलम्॥६॥

फलहेतुविमर्दितदुष्टखरं खरमुक्तिदपादसरोजवरम्।
वरबर्हिशिखण्डिकयुक्तकचं कचपाशिनिवेशितपुष्पचयम्॥७॥

घोषाधिपतिं कमलाधिपतिं वन्दे तमहं मथुराधिपतिम्॥८॥
॥ इति श्रीविठ्ठलेशविरचिता श्रीकृष्णारार्तिका समाप्ता ॥

इस आरती का विशिष्ट महत्व

"शरणागतभीतिनिवृत्तिपरं" (Sharanagatabhitinivrittiparam) यह अत्यंत दुर्लभ और प्रभावशाली संस्कृत आरती है, जिसकी रचना पुष्टिमार्ग (Pushtimarg) के प्रवर्तक श्री वल्लभाचार्य जी के पुत्र, श्री विट्ठलेश (गुसाईं जी) (Shri Vitthalesha/Gusaiji) ने की थी. यह आरती भगवान श्रीकृष्ण के उस स्वरूप को समर्पित है जो शरणागत वत्सल हैं और अपने भक्तों के सभी भयों का नाश करते हैं। पुष्टिमार्गीय मंदिरों और हवेली संगीत परंपरा में इसका विशेष स्थान है और इसे अक्सर संध्या आरती या राजभोग आरती के समय गाया जाता है।

आरती के प्रमुख भाव और अर्थ

यह आरती भगवान कृष्ण की लीलाओं और उनके करुणामयी स्वभाव का सुंदर चित्रण करती है:

  • भय का नाश (Removal of Fear): "शरणागतभीतिनिवृत्तिपरं" - भगवान कृष्ण उन सभी के भय को दूर करने वाले हैं जो उनकी शरण में आते हैं.
  • अज्ञान का नाश (Dispeller of Ignorance): "परपक्षतमोनिकरांशुनिधिम्" - वे सूर्य के समान हैं जो शत्रुओं (अज्ञान या विपरीत पक्ष) के अंधकार को नष्ट कर देते हैं.
  • गोवर्धन लीला (Govardhan Leela): "मणिशोभितहस्तधृताद्रिवरं" - उन्होंने अपने मणियों से सुशोभित हाथ पर श्रेष्ठ पर्वत (गोवर्धन) को धारण किया था, जिससे गोकुल वासियों की रक्षा हुई.
  • रास और भक्ति (Rasa and Devotion): "वलितप्रमदायुतरासकरं" - वे गोपियों के साथ रास रचाने वाले और प्रेम व भक्ति का रस प्रदान करने वाले हैं.
  • दुष्टों का संहार (Destroyer of Evil): "फलहेतुविमर्दितदुष्टखरं" - इसमें दुष्ट 'खर' (यहाँ धेनुकासुर या सामान्य रूप से दुष्टों का प्रतीक) के वध और उसे मोक्ष देने का उल्लेख है.

आरती करने की विधि और विशेष अवसर

  • शरणागति भाव (Surrender): इस आरती को गाते समय भक्त को पूर्ण शरणागति (total surrender) का भाव रखना चाहिए, क्योंकि यही इस स्तोत्र का मुख्य संदेश है।
  • अवसर (Occasions): इसे जन्माष्टमी (Janmashtami), गोवर्धन पूजा और एकादशी जैसे पर्वों पर गाना अत्यंत शुभ फलदायी होता है।
  • प्रार्थना (Prayer): आरती के अंत में "घोषाधिपतिं कमलाधिपतिं... मथुराधिपतिम्" कहकर भगवान को गोकुल, लक्ष्मी और मथुरा का स्वामी मानते हुए प्रणाम किया जाता है, जिससे भक्त को समृद्धि और मोक्ष (prosperity and salvation) की प्राप्ति होती है.
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