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श्रीगुरुगीतारात्रिका

Shri Gurugita Aratrika | Jai Dev Jai Dev Jai Shri Gurugite

श्रीगुरुगीतारात्रिका
जय देव जय देव जय श्रीगुरुगीते जय सद्गुरुगीते।
ब्रह्मानन्दस्वरूपिणि जय विश्वम्भरिते॥

जय जगदम्ब भवानि भवहारिणि भद्रे।
श्रीगुरुतत्त्वसुबोधिनि जयकरुणसान्द्रे॥१॥

भवभयनिरवधिनिपतितदीनाभयतारे।
देहाहङ्कृतिव्याधिदिव्यौषधिसारे॥२॥

भवविषविषयविनाशिनि परमामृतरूपे।
स्वानन्दामृतरूपिणि नामरूपरहिते॥३॥

आत्मज्ञानप्रकाशिनि गुरुसुभक्तिसहिते।
जगदुद्धारिणिपावनि सुन्दरसुरपूते॥४॥

भयं द्वितीयाद्यत्वं शिक्षस्यद्वैतम्।
तत्त्वमसीत्युपदेशं गायसि त्वं नित्यम्॥५॥
॥ इति श्रीमत् परमहंसपरिव्राजकाचार्य सद्गुरु भगवान् श्रीधरस्वामीमहाराजविरचिता श्रीगुरुगीतारात्रिका सम्पूर्णा ॥

आरती का महत्त्व

"श्रीगुरुगीतारात्रिका" सद्गुरु भगवान श्रीधर स्वामी महाराज द्वारा रचित एक दिव्य आरती है जो 'श्री गुरुगीता' की महिमा का गान करती है। यह आरती गुरु तत्त्व और अद्वैत ज्ञान का सार है।

आरती के मुख्य भाव

  • ब्रह्मानन्द स्वरूपिणी (Embodiment of Bliss): "ब्रह्मानन्दस्वरूपिणि" - गुरुगीता साक्षात् ब्रह्मानन्द का स्वरूप है और विश्व का भरण-पोषण करने वाली है।
  • भव रोग नाशिनी (Destroyer of Worldly Disease): "देहाहङ्कृतिव्याधिदिव्यौषधिसारे" - यह देह-अहंकार रूपी व्याधि (रोग) के लिए एक दिव्य औषधि के समान है।
  • अद्वैत उपदेश (Advaita Teaching): "तत्त्वमसीत्युपदेशं" - यह नित्य 'तत्त्वमसि' (वह ब्रह्म तुम ही हो) इस महावाक्य का उपदेश देती है और द्वैत (भेदभाव) के भय को मिटाती है।

गायन विधि और अवसर

  • अवसर (Occasion): यह आरती गुरु पूर्णिमा, दत्तात्रेय जयंती और प्रतिदिन गुरुगीता पाठ के बाद गाई जाती है।
  • विधि (Method): गुरु पादुकाओं या गुरु चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित कर, पूर्ण श्रद्धा और अद्वैत भाव से इस आरती का गान करें।
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