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श्रीमद्भागवत की आरती

Shrimad Bhagwat Ki Aarti | Aarti Atipavan Puran Ki

श्रीमद्भागवत की आरती
आरति अतिपावन पुरानकी,
धर्म-भक्ति-विज्ञान-खानकी॥

महापुराण भागवत निर्मल।
शुक-मुख-विगलित निगम-कल्प-फल।
परमानंद-सुधामय रसमय कल।
लीला-रति-रस-रसनिधानकी॥

कलिमल-मथनि त्रिताप-निवारिणि।
जन्ममृत्युमय भव-भयहारी।
सेवत सतत् सकल सुखकारिणि।
सुमहोोषधि हरि-चरित गानकी॥

विषय-विलास-विमोह-विनाशिनि।
विमल विराग विवेक विकासिनि।
भगवत्तत्त्व-रहस्य-प्रकाशिनि।
परम ज्योति परमात्माज्ञानकी॥

परमहंस-मुनि-मन-उल्लासिनि।
रसिक-हृदय रस-रास-विलासिनि।
भुक्ति-मुक्ति-रति-प्रेम-सुदासिनि।
कथा अकिञ्चन प्रिय सुजानकी॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥

आरती का महत्त्व

"आरति अतिपावन पुरानकी" श्रीमद्भागवत महापुराण की एक दिव्य आरती है। यह पुराण वेदों का सार और भगवान श्रीकृष्ण का वाङ्मय स्वरूप माना जाता है। यह आरती भागवत के महात्म्य, भक्ति, ज्ञान और वैराग्य के संदेश को जन-जन तक पहुँचाती है।

आरती के मुख्य भाव

  • निगम-कल्प-फल (Fruit of Vedas): "शुक-मुख-विगलित निगम-कल्प-फल" - भागवत पुराण वेदरूपी कल्पवृक्ष का पका हुआ फल है, जो शुकदेव जी के मुख से प्रकट हुआ।
  • कलिमल-मथनी (Destroyer of Kali's Sins): "कलिमल-मथनि त्रिताप-निवारिणि" - यह ग्रंथ कलियुग के पापों का नाश करने वाला और तीनों प्रकार के तापों (दैहिक, दैविक, भौतिक) को दूर करने वाला है।
  • परम ज्योति (Supreme Light): "परम ज्योति परमात्माज्ञानकी" - यह परमात्मा के ज्ञान की परम ज्योति है, जो अज्ञान के अंधकार को मिटाती है।

गायन विधि और अवसर

  • अवसर (Occasion): यह आरती भागवत कथा के दौरान, एकादशी, और नित्य पाठ के समय गाई जाती है।
  • विधि (Method): भागवत जी की पोथी को उच्च आसन पर विराजमान कर, पुष्प, धूप और दीप से पूजन करें और श्रद्धापूर्वक आरती गाएं।
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