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श्रीरामचंद्रांची आरती (त्रिभुवनमंडित माळ)

Ram Aarti by Sant Namdev

श्रीरामचंद्रांची आरती (त्रिभुवनमंडित माळ)
त्रिभुवनमंडित माळ गळां। आरति ओवाळू पाहूं ब्रह्मपुतळा॥१॥

श्रीराम जयराम जयजय राम। आरति ओंवाळू पाहूं सुंदर मेघश्याम॥

ठकाराचे ठाण वारीं धनुष्य बाण। मारुती सन्मुख उभा कर जोडून॥२॥

भरतशत्रुघ्न दोघे चामर ढाळिती। स्वर्गाहून देव पुष्पवृष्टी करीती॥३॥

रत्नजडित हार वर्णं काय मुकुटी। आरती ओंवाळू चौदा भुवनांच्या कोटी॥४॥

विष्णुदास नामा म्हणे मागतो तूतें। आरती ओवाळू पाहूं सीतापतीतें॥५॥

इस आरती का विशिष्ट महत्व

"त्रिभुवनमंडित माळ" भगवान श्रीरामचंद्र (Lord Ramachandra) को समर्पित एक प्रसिद्ध मराठी आरती है, जिसकी रचना महान संत नामदेव (Sant Namdev) ने की थी। संत नामदेव महाराष्ट्र के वारकरी संप्रदाय (Varkari Sampradaya) के एक प्रमुख संत थे, जो अपनी अभंग रचनाओं के लिए जाने जाते हैं। यह आरती भगवान राम के राज्याभिषेक के बाद उनके भव्य दरबार का एक सजीव चित्रण प्रस्तुत करती है। इसमें भगवान के सुंदर मेघ-श्यामल स्वरूप, उनके सेवकों की भक्ति और दिव्य वातावरण का मनमोहक वर्णन है। यह आरती केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि भगवान के प्रति संत नामदेव के गहरे प्रेम और दास्य भाव की अभिव्यक्ति है।

आरती के प्रमुख भाव और अर्थ

यह आरती श्री राम के राज दरबार के वैभव और भक्तिपूर्ण माहौल को दर्शाती है:

  • दिव्य स्वरूप का वर्णन (Description of the Divine Form): "त्रिभुवनमंडित माळ गळां" अर्थात जिनके गले में तीनों लोकों को सुशोभित करने वाली माला है। आरती में उनके मेघश्याम (cloud-dark complexion) वर्ण और रत्नजड़ित मुकुट की शोभा का भी वर्णन किया गया है।
  • भक्तों द्वारा सेवा (Service by Devotees): आरती में भगवान के दरबार का सुंदर चित्रण है, जहाँ "मारुती सन्मुख उभा कर जोडून" - हनुमान जी हाथ जोड़े सामने खड़े हैं, और "भरतशत्रुघ्न दोघे चामर ढाळिती" - भरत और शत्रुघ्न दोनों ओर से चंवर डुला रहे हैं। यह सेवा और भक्ति (devotion) का आदर्श प्रस्तुत करता है।
  • देवताओं द्वारा वंदना (Adoration by the Gods): "स्वर्गाहून देव पुष्पवृष्टी करीती" - यह पंक्ति दर्शाती है कि स्वर्ग से देवता भी भगवान राम पर पुष्प वर्षा कर रहे हैं, जो उनकी सार्वभौमिक महिमा का प्रतीक है।
  • संत नामदेव की विनम्रता (Humility of Sant Namdev): अंतिम पंक्ति में, संत नामदेव स्वयं को 'विष्णुदास नामा' कहते हुए सीतापति राम से केवल उनकी भक्ति की याचना करते हैं। यह एक सच्चे भक्त की निस्वार्थ और विनम्र भावना को प्रकट करता हैं।।

आरती करने की विधि और विशेष अवसर

  • यह आरती विशेष रूप से राम नवमी (Ram Navami) और विजयादशमी (Vijayadashami) के दिन भगवान राम की पूजा के समापन पर गाई जाती हैं।।
  • महाराष्ट्र में, विशेषकर वारकरी संप्रदाय के अनुयायी, इसे अपने दैनिक भजन और कीर्तन में शामिल करते हैं।
  • इस आरती का भक्तिपूर्वक गान करने से मन में श्री राम के राजसी और करुणामय स्वरूप का चित्र उभरता हैं।, जिससे मानसिक शांति (mental peace) और आनंद की प्राप्ति होती हैं।।
  • यह आरती भक्तों को सेवा और समर्पण का महत्व सिखाती है, और जीवन में सकारात्मकता (positivity) का संचार करती हैं।।
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