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सर्वरूप भगवान् की आरती (जय जगदीश हरे प्रभु)

Sarvaroop Bhagwan Ki Aarti

सर्वरूप भगवान् की आरती (जय जगदीश हरे प्रभु)
जय जगदीश हरे, प्रभु! जय जगदीश हरे।
मायातीत, महेश्वर मन-वच-बुद्धि परे॥

आदि, अनादि, अगोचर, अविचल, अविनाशी।
अतुल, अनन्त, अनामय, अमित, शक्ति-राशि॥
जय जगदीश हरे...॥

अमल, अकल, अज, अक्षय, अव्यय, अविकारी।
सत-चित-सुखमय, सुन्दर शिव सत्ताधारी॥
जय जगदीश हरे...॥

विधि-हरि-शंकर-गणपति-सूर्य-शक्तिरूपा।
विश्व चराचर तुम ही, तुम ही जगभूपा॥
जय जगदीश हरे...॥

माता-पिता-पितामह-स्वामि-सुहृद-भर्ता।
विश्वोत्पादक पालक रक्षक संहर्ता॥
जय जगदीश हरे...॥

साक्षी, शरण, सखा, प्रिय प्रियतम, पूर्ण प्रभो।
केवल-काल कलानिधि, कालातीत, विभो॥
जय जगदीश हरे...॥

राम-कृष्ण, करुणामय, प्रेमामृत-सागर।
मन-मोहन मुरलीधर नित-नव नटनागर॥
जय जगदीश हरे...॥

सब विधि हीन, मलिन-मति, हम अति पातकि-जन।
प्रभुपद-विमुख अभागी, कलि-कलुषित तन-मन॥
जय जगदीश हरे...॥

आश्रय-दान दयार्णव! हम सबको दीजै।
पाप-ताप हर हरि! सब, निज-जन कर लीजै॥
जय जगदीश हरे...॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥

इस आरती का विशिष्ट महत्व

"सर्वरूप भगवान् की आरती" एक अत्यंत गहरी और दार्शनिक प्रार्थना है, जो प्रसिद्ध "ॐ जय जगदीश हरे" आरती का ही एक विस्तृत और तात्विक रूप है। जहाँ प्रसिद्ध आरती मुख्यतः भगवान विष्णु (Lord Vishnu) के सगुण रूप पर केंद्रित है, वहीं यह आरती ईश्वर के सर्वरूप (universal form) या निर्गुण ब्रह्म (Nirgun Brahman) की अवधारणा को प्रस्तुत करती है। यह अद्वैत वेदांत (Advaita Vedanta) के उस सिद्धांत को दर्शाती है जिसके अनुसार ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गणपति, सूर्य और शक्ति - ये सभी उसी एक परम सत्ता के विभिन्न रूप हैं। यह आरती हमें याद दिलाती है कि ईश्वर हर रूप में, हर कण में और मन-वचन-बुद्धि से परे विद्यमान है।

आरती के प्रमुख भाव और अर्थ

यह आरती ईश्वर के वास्तविक स्वरूप और भक्त के संबंध का सुंदर वर्णन करती है:

  • परम ब्रह्म का स्वरूप (Nature of the Absolute): आरती में ईश्वर को मायातीत (माया से परे), अगोचर (इंद्रियों से न जानने योग्य), अविनाशी (जिसका नाश न हो) और अविकारी (जिसमें कोई विकार न हो) कहा गया है। यह ईश्वर के निर्गुण, निराकार और शाश्वत स्वरूप का वर्णन है।
  • सर्व-देवता स्वरूप (Embodiment of All Deities): "विधि-हरि-शंकर-गणपति-सूर्य-शक्तिरूपा" पंक्ति इस आरती का सार है। यह स्पष्ट करती है कि आप ही ब्रह्मा (सृष्टिकर्ता), विष्णु (पालक), शंकर (संहारक), गणपति, सूर्य और देवी शक्ति के रूप में प्रकट होते हैं। यह विभिन्न संप्रदायों के बीच एकता का संदेश देती है।
  • सर्व-संबंध स्वरूप (Embodiment of All Relationships): ईश्वर को केवल स्वामी ही नहीं, बल्कि माता, पिता, पितामह, सखा, और प्रियतम भी कहा गया है। यह दर्शाता है कि हमारा हर मानवीय संबंध उसी एक दिव्य स्रोत से जुड़ा है, और वही हमारा अंतिम आश्रय है।
  • भक्त की विनम्रता और शरणागति (Devotee's Humility and Surrender): अंतिम छंदों में भक्त स्वयं को "सब विधि हीन, मलिन-मति" और "अति पातकि" मानकर ईश्वर से दया और आश्रय की याचना करता है। यह पूर्ण शरणागति (complete surrender) का भाव है, जो भक्ति मार्ग का सर्वोच्च शिखर है।

आरती करने की विधि और विशेष अवसर

  • यह एक सार्वभौमिक आरती है, इसलिए इसे किसी भी देवी-देवता की पूजा के बाद या दैनिक संध्या आरती में गाया जा सकता है।
  • इस आरती का पाठ करने के लिए कोई विशेष दिन निर्धारित नहीं है, क्योंकि यह सभी रूपों में ईश्वर की स्तुति है। इसे प्रतिदिन करना श्रेष्ठ है।
  • इस आरती का चिंतन-मनन करने से मन में संप्रदायवाद और भेदभाव की भावना समाप्त होती है और आध्यात्मिक एकता (spiritual unity) का बोध होता है।
  • यह आरती भक्तों को मानसिक शांति (mental peace) प्रदान करती है और उन्हें ईश्वर के सर्वव्यापी स्वरूप का अनुभव करने में मदद करती है।
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