गणपति हरी शिवभास्कर अंबा सुखमूर्ती॥
अघसंकटभयनाशन सुखदा विग्धेशा।
आद्या सुरवरवंद्या नरवारण वेशा॥
पाशांकुशधर सुंदर पुरवीसी आशा।
निजवर देऊनि हरिसी भ्रांतीच्या पाशा॥१॥
पयसागरजाकांता धरणीधरशयना।
करुणालय वारिसि भववारिजदलनयना॥
गरुडध्वज भजन प्रिय पीतप्रभवसना।
अनुदिनिं तव कीर्तनरस चाखो हे रसना॥२॥
नंदीवहना गहना पार्वतिच्या रमणा।
मन्मथदहना शंभो वातातमजनयना॥
सर्वोपाय विवर्जित तापत्रयशमना।
कैलासाचलवासा करिसी सुरनमना॥३॥
पद्मबोधकरणा नेत्रभ्रमहरणा।
गोधन बंधनहरता द्योतक आचरणा॥
किरण स्पर्शे वारिसि या तम आवरणा।
शरणागत भयनाशन सुखवर्धनकरणा॥४॥
त्रिभुवनउत्पति पालन करिसीइ तूं माया।
नाहीं तुझिया रूपा दुसरी उपमा या॥
तुझा गुणगणमहिमा न कळे निगमा या।
करुणा करिसी अंबे मनविश्रामा॥५॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥
Ganapati Hari Shivbhaskar Amba Sukhamurti. ||
Aghasankatabhayanashan Sukhada Vighnesha,
Aadya Suravaravandya Naravaran Vesha. ||
Pashankushadhar Sundar Puravisi Aasha,
Nijavar Deuni Harisi Bhrantichya Pasha. ||1||
Payasagarajakanta Dharanidharashayana,
Karunalaya Varisi Bhavavarijadalayanayana. ||
Garudadhwaj Bhajan Priya Pitaprabhavasana,
Anudinin Tav Kirtanaras Chakho He Rasana. ||2||
Nandivahana Gahana Parvatichya Ramana,
Manmathadahana Shambho Vatatmajanayana. ||
Sarvopaya Vivarjit Tapatrayashamana,
Kailasachalavasa Karisi Suranamana. ||3||
Padmabodhakarna Netrabhramaharana,
Godhan Bandhanaharata Dyotak Acharana. ||
Kiran Sparshe Varisi Ya Tam Aavarana,
Sharanagat Bhayanashan Sukhavardhanakarana. ||4||
Tribhuvan-utpati Palan Karisi Tu Maya,
Nahin Tujhiya Rupa Dusari Upama Ya. ||
Tujha Gunaganamahima Na Kale Nigama Ya,
Karuna Karisi Ambe Manavishrama. ||5||
॥ Iti Sampurnam ॥
इस आरती का विशिष्ट महत्व
"पंचायतन आरती" एक बहुत ही अनूठी और महत्वपूर्ण मराठी आरती है जो हिंदू धर्म की 'स्मार्त' परंपरा के मूल सिद्धांत को दर्शाती है। 'पंचायतन पूजा' की अवधारणा 8वीं शताब्दी के महान दार्शनिक आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित की गई थी, जिसका उद्देश्य विभिन्न हिंदू संप्रदायों के बीच सद्भाव लाना था। इसमें पांच प्रमुख देवताओं - गणपति, विष्णु (हरी), शिव, सूर्य (भास्कर), और देवी (अंबा) - की एक साथ पूजा की जाती है, यह मानते हुए कि ये सभी एक ही निराकार ब्रह्म के विभिन्न स्वरूप हैं। यह आरती इसी पंचायतन पूजा का संगीतमय रूप है। इसका प्रत्येक पद एक-एक देवता को समर्पित है, जो उनके गुणों का सुंदर वर्णन करता है। इस एक आरती को गाने से पांचों प्रमुख देवताओं की पूजा का फल प्राप्त होता है, जो इसे an all-encompassing prayer बनाती है।
आरती के प्रमुख भाव और अर्थ
यह आरती पांच देवताओं के गुणों का क्रमिक रूप से वर्णन करती है:
- गणपति (Ganapati): "अघसंकटभयनाशन सुखदा विग्धेशा।" - पहला पद भगवान गणेश का 'विघ्नेश' के रूप में आह्वान करता है, जो सभी पापों (अघ), संकटों और भय का नाश करके सुख प्रदान करते हैं।
- विष्णु / हरी (Vishnu/Hari): "पयसागरजाकांता धरणीधरशयना।" - दूसरा पद भगवान विष्णु का 'क्षीरसागर की पुत्री (लक्ष्मी) के पति' और 'धरती को धारण करने वाले (शेषनाग पर शयन करने वाले)' के रूप में वर्णन करता है, जो उनके पालक स्वरूप को दर्शाता है।
- शिव (Shiva): "नंदीवहना गहना पार्वतिच्या रमणा।" - तीसरा पद भगवान शिव का 'नंदी वाहन वाले', 'पार्वती के पति', और 'कामदेव का दहन करने वाले' के रूप में स्तुति करता है, जो उनके योगी और पारिवारिक दोनों रूपों को दर्शाता है।
- सूर्य / भास्कर (Surya/Bhaskar): "पद्मबोधकरणा नेत्रभ्रमहरणा।" - चौथा पद सूर्य देव का 'कमल को खिलाने वाले (ज्ञान का प्रकाश करने वाले)' और 'आंखों के भ्रम को हरने वाले' के रूप में गुणगान करता है, जो अंधकार पर प्रकाश की विजय (victory of light over darkness) का प्रतीक है।
- देवी / अंबा (Devi/Amba): "त्रिभुवनउत्पति पालन करिसीइ तूं माया।" - पांचवां और अंतिम पद देवी 'अंबा' की स्तुति करता है, जो 'माया' के रूप में तीनों लोकों की उत्पत्ति, पालन और संहार करती हैं और जिनकी महिमा को वेद भी नहीं समझ सकते।
आरती करने की विधि और विशेष अवसर
- यह आरती किसी भी दैनिक पूजा के अंत में की जा सकती है, क्योंकि यह सभी प्रमुख देवताओं को एक साथ नमन करती है।
- यह विशेष रूप से उन घरों के लिए उपयुक्त है जहाँ परिवार के सदस्य अलग-अलग देवताओं को अपना इष्ट मानते हैं। इस एक आरती को गाने से सभी की पूजा संपन्न हो जाती है, जो promoting family harmony में मदद करता है।
- पूजा करते समय, पंचायतन पूजा की पारंपरिक विधि के अनुसार, बीच में अपने मुख्य इष्ट देव को और चारों कोनों पर अन्य चार देवताओं को (प्रतीकात्मक रूप से सुपारी या मूर्तियों के रूप में) स्थापित करके यह आरती की जा सकती है।
- इस आरती का पाठ करने से मन में उदारता और सभी देवताओं के प्रति समान सम्मान का भाव पैदा होता है, जो अद्वैत वेदांत के मूल सिद्धांत "एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति" (सत्य एक है, ज्ञानी उसे कई नामों से पुकारते हैं) को पुष्ट करता है।
