Logoपवित्र ग्रंथ

श्री गणेश आरती (नानापरिमळ दुर्वा)

Ganesh Aarti (Nanaparimal Durva)

श्री गणेश आरती (नानापरिमळ दुर्वा)
नानापरिमळ दुर्वा शेंदूर शमिपत्रें ।
लाडू मोद्क अन्ने परिपूरित पात्रें ।।
ऎसे पूजन केल्या बीजाक्षरमंत्रे ।
अष्टहि सिद्धी नवनिधी देसी क्षणमात्रें ।। १ ।।

जय देव जय देव

जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती ।
तुझे गुण वर्णाया मज कैची स्फ़ूर्ती ।। जय देव जय देव. ।।


तुझे ध्यान निरंतर जे कोणी करिती ।
त्यांची सकलही पापे विघ्नेंही हरती ।
वाजी वारण शिबिका सेवक सुत युवती ।
सर्वहि पावती अंती भवसागर तरती ।। २ ।।

जय देव जय देव

जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती ।
तुझे गुण वर्णाया मज कैची स्फ़ूर्ती ।। जय देव जय देव ।।


शरणांगत सर्वस्वें भजती तव चरणी ।
कीर्ती तयांची राहे जोवर शशितरणि ।।
त्रैलोक्यी ते विजयी अदभूत हे करणी ।
गोसावीनंदन रत नामस्मरणी ।। ३ ।।

जय देव जय देव

जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती ।
तुझे गुण वर्णाया मज कैची स्फ़ूर्ती ।। जय देव जय देव ।।

इस आरती का विशिष्ट महत्व

"नानापरिमळ दुर्वा" भगवान गणेश को समर्पित एक पारंपरिक मराठी आरती है जो उनकी पूजा की विधि और उसके फल का सुंदर वर्णन करती है। 'नानापरिमळ' का अर्थ है 'अनेक प्रकार की सुगंध'। यह आरती भगवान गणेश को प्रिय विभिन्न पवित्र वस्तुओं के अर्पण के महत्व को उजागर करती है, जैसे कि सुगंधित दूर्वा, शेंदूर, शमी पत्र, और लड्डू-मोदक। इस आरती की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह स्वयं एक 'फलश्रुति' है - अर्थात, यह पूजा करने के लाभों का वर्णन करती है। यह केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि एक आश्वासन है कि जो भी भक्त इन वस्तुओं और 'बीजाक्षर मंत्र' के साथ भगवान गणेश की पूजा करता है, उसे तत्काल अष्टसिद्धि और नवनिधि की प्राप्ति होती है।

आरती के प्रमुख भाव और अर्थ

यह आरती भगवान गणेश की पूजा के लाभों और उनकी महिमा पर केंद्रित है:

  • अष्टसिद्धि और नवनिधि की प्राप्ति (Attainment of 8 Siddhis and 9 Treasures): "ऎसे पूजन केल्या बीजाक्षरमंत्रे। अष्टहि सिद्धी नवनिधी देसी क्षणमात्रें॥" - आरती स्पष्ट रूप से घोषणा करती है कि इस प्रकार से (दूर्वा, मोदक आदि से) और बीजाक्षर मंत्रों के साथ पूजन करने पर, आप क्षण भर में आठों सिद्धियाँ और नौ निधियाँ प्रदान करते हैं, जो ultimate material and spiritual wealth का प्रतीक है।
  • पाप और विघ्नों का नाश (Destruction of Sins and Obstacles): "तुझे ध्यान निरंतर जे कोणी करिती। त्यांची सकलही पापे विघ्नेंही हरती।" - जो कोई भी आपका निरंतर ध्यान करता है, आप उसके सभी पापों और विघ्नों को हर लेते हैं। यह गणेश जी के 'विघ्नहर्ता' स्वरूप की पुष्टि करता है।
  • सांसारिक सुख और मोक्ष (Worldly Pleasures and Liberation): "वाजी वारण शिबिका सेवक सुत युवती। सर्वहि पावती अंती भवसागर तरती॥" - आपके भक्त सभी प्रकार के सांसारिक सुख (घोड़े, हाथी, पालकियाँ, सेवक, पुत्र, युवतियाँ) प्राप्त करते हैं और अंत में भवसागर से भी तर जाते हैं, अर्थात मोक्ष प्राप्त करते हैं।
  • अमर कीर्ति (Eternal Fame): "शरणांगत सर्वस्वें भजती तव चरणी। कीर्ती तयांची राहे जोवर शशितरणि॥" - जो भक्त सर्वस्व समर्पण करके आपके चरणों को भजते हैं, उनकी कीर्ति इस संसार में तब तक रहती है, जब तक सूर्य और चंद्रमा (शशि-तरणि) रहेंगे।

आरती करने की विधि और विशेष अवसर

  • यह आरती विशेष रूप से गणेश चतुर्थी (Ganesh Chaturthi) और संकष्टी चतुर्थी के दिनों में पूजा के दौरान गाने के लिए अत्यंत उपयुक्त है।
  • आरती करते समय भगवान गणेश को उनकी प्रिय वस्तुएं जैसे दूर्वा की माला, लाल सिंदूर (शेंदूर), शमी के पत्ते और मोदक का भोग अवश्य लगाना चाहिए।
  • चूंकि यह आरती स्वयं पूजा के फल का वर्णन करती है, इसे पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ गाने से मन में सकारात्मकता और भगवान के प्रति आस्था (faith and devotion) मजबूत होती है।
  • किसी भी नए कार्य की शुरुआत से पहले इस आरती का पाठ करना विघ्नों को दूर करता है और कार्य में सफलता (success in endeavors) सुनिश्चित करने में मदद करता है।
Back to aartis Collection