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जगदम्बार्तिक्यम्

Jagadamba Artikyam (Sanskrit Aarti)

जगदम्बार्तिक्यम्
सर्वस्य स्वमसि मता सद्विदुषामाद्या
श्रुतिभिः स्मृतिभिः शास्त्रैः कविभिः प्रतिपाद्या।
गायन्ति त्वच्चरितं निपुणा वृतवाद्याः
सा का त्वत्तोऽन्यावति नाम्ना पापाद्या॥

जय देवि प्रणमदखिलवरवितरणदक्षे
जय जगदम्ब समुद्धृतशरणागतलक्षे॥

मातर्जगदुत्पत्तिस्थितिसंहृतिलीले
संश्रितजनकल्मषवनकल्पदहनकीले।
सर्वत्र सदा सादरनतलालनशीले
स्वविमलगुणगणरञ्जितविधिशिवधननीले॥
जय देवि...॥

तव सेवाऽर्थिजनानां चिन्तामणिशाला
भक्तमयूराणां ते स्मृतिरम्बुदमाला।
त्वां स्तोतुं त्वत्पुरतो गीरपि खलु बाला
का तत्रान्यकविकथा क्व सुधा क्व च हाला?॥
जय देवि...॥
॥ इति श्रीरामनन्दनमयूरेश्वरकृतं जगदम्बार्तिक्यं सम्पूर्णम् ॥

इस आरती का विशिष्ट महत्व

'जगदम्बार्तिक्यम्' एक सुंदर और दार्शनिक संस्कृत आरती है जो माँ जगदम्बा (Maa Jagdamba), अर्थात जगत की माता, को समर्पित है। इस आरती की रचना श्री रामानंदन के पुत्र, कवि मयूरेश्वर (Poet Mayureshvar) ने की थी। 'आर्तिक्यम्' आरती का ही एक संस्कृत रूप है। यह स्तुति देवी के सर्वोपरि, सर्वव्यापी और कृपापूर्ण स्वरूप का वर्णन करती है। इसमें उन्हें न केवल सृष्टि, स्थिति और संहार की लीला करने वाली माना गया है, बल्कि शरणागत भक्तों का उद्धार करने वाली परम शक्ति के रूप में भी पूजा गया है।

आरती के प्रमुख भाव और अर्थ

यह संस्कृत आरती देवी के तात्विक और कृपापूर्ण स्वरूप का गुणगान करती है:

  • जगत की आदि माता (The Primal Mother of the Universe): "सर्वस्य स्वमसि मता सद्विदुषामाद्या।" - आप सभी की माता हैं और विद्वानों द्वारा आदि शक्ति मानी गई हैं। श्रुति, स्मृति, शास्त्र और कवि सभी आपका ही प्रतिपादन करते हैं।
  • सृष्टि की लीला (The Divine Play of Creation): "मातर्जगदुत्पत्तिस्थितिसंहृतिलीले।" - हे माता! इस जगत की उत्पत्ति, स्थिति और संहार आपकी लीला मात्र है। आप ही अपने भक्तों के पाप रूपी वन को जलाने के लिए अग्नि के समान हैं।
  • भक्तों के लिए कल्पवृक्ष (Wish-Fulfilling Tree for Devotees): "तव सेवाऽर्थिजनानां चिन्तामणिशाला, भक्तमयूराणां ते स्मृतिरम्बुदमाला।" - आपकी सेवा भक्तों के लिए चिंतामणि के समान है, और आपका स्मरण भक्त रूपी मयूरों के लिए बादलों की माला के समान आनंददायक है।
  • सर्व-पूजित (Worshipped by All): आरती में बताया गया है कि आपके गुणों से रंजित होकर ब्रह्मा, शिव, और विष्णु (धननीले) भी आपकी वंदना करते हैं। आपकी स्तुति के सामने अन्य कवियों की वाणी फीकी पड़ जाती है।

आरती करने की विधि और विशेष अवसर

  • यह आरती नवरात्रि (Navratri) के नौ दिनों में, विशेषकर दुर्गाष्टमी और महानवमी पर, संध्या आरती के समय गाने के लिए अत्यंत उपयुक्त है।
  • इसे घर पर भी दैनिक संध्या-आरती के समय गाया जा सकता है ताकि घर में सकारात्मक ऊर्जा (positive energy) का संचार हो।
  • माँ जगदम्बा की प्रतिमा या चित्र के समक्ष घी का दीपक जलाएं और उन्हें लाल पुष्प अर्पित करें।
  • इस संस्कृत आरती का शुद्ध उच्चारण के साथ पाठ करने से मन पवित्र होता है, बुद्धि तीव्र होती है और भक्त को देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
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