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गङ्गारात्रिका

Ganga Aratrika (Sanskrit Aarti)

गङ्गारात्रिका
जय मातर्गङ्गे जय जय मातर्गङ्गे।
सच्चित्सुखस्वरूपिणि जय जय भवभङ्गे॥

भगवच्चरणे या सा शक्तिर्मोक्षप्रदा।
त्वद्रूपेण निःसृता शुभमङ्गलभद्रा॥१॥

सन्दर्शनेन नाम्ना मज्जनतोऽपि तथा।
ज्ञानं ददासि मातस्त्वेवं तव गाथा॥२॥

शङ्करशिरोविभूषिणि जाह्नवि भागीरथि।
ब्रह्मस्वरूपं प्रापय याचे देहरथी॥३॥
॥ इति श्रीमत् परमहंसपरिव्राजकाचार्य सद्गुरु भगवान् श्रीधरस्वामीमहाराजविरचिता गङ्गारात्रिका सम्पूर्णा ॥

इस आरती का विशिष्ट महत्व

'गङ्गारात्रिका' (गंगा-आरात्रिका) माँ गंगा को समर्पित एक सुंदर संस्कृत आरती है। 'आरात्रिका' आरती का ही संस्कृत शब्द है। इस स्तोत्र की रचना परम पूजनीय संत श्रीधर स्वामी महाराज (Shridhar Swami Maharaj) ने की थी। यह आरती माँ गंगा के दिव्य और आध्यात्मिक स्वरूप का गुणगान करती है। इसमें उन्हें केवल एक नदी के रूप में नहीं, बल्कि भगवान के चरणों से निकली मोक्षदायिनी शक्ति (liberating power) के रूप में पूजा गया है। यह आरती गंगा जी के विभिन्न नामों, जैसे जाह्नवी और भागीरथी, का भी स्मरण करती है और अंत में ब्रह्म-स्वरूप की प्राप्ति की प्रार्थना करती है।

आरती के प्रमुख भाव और अर्थ

यह संस्कृत आरती माँ गंगा के तात्विक स्वरूप को दर्शाती है:

  • सच्चिदानंद स्वरूप (The Form of Satchidananda): "सच्चित्सुखस्वरूपिणि जय जय भवभङ्गे।" - हे सच्चिदानंद सुख-स्वरूपिणी माँ, आपकी जय हो! आप संसार के बंधनों का नाश (भवभंग) करने वाली हैं।
  • मोक्षदायिनी शक्ति (The Power of Salvation): "भगवच्चरणे या सा शक्तिर्मोक्षप्रदा। त्वद्रूपेण निःसृता शुभमङ्गलभद्रा॥" - जो भगवान के चरणों में मोक्ष प्रदान करने वाली शक्ति है, वही आपके रूप में इस धरती पर शुभ और मंगल करने के लिए अवतरित हुई है।
  • ज्ञान की प्रदाता (Giver of Knowledge): "सन्दर्शनेन नाम्ना मज्जनतोऽपि तथा। ज्ञानं ददासि मातस्त्वेवं तव गाथा॥" - आपके दर्शन, नाम-स्मरण और आप में स्नान करने मात्र से ही आप भक्तों को तत्वज्ञान (spiritual knowledge) प्रदान करती हैं, ऐसी आपकी गाथा है।
  • ब्रह्म-स्वरूप की प्राप्ति (Attainment of the Ultimate Reality): "ब्रह्मस्वरूपं प्रापय याचे देहरथी॥" - अंत में, भक्त प्रार्थना करता है कि हे माँ, मैं इस शरीर रूपी रथ पर सवार होकर आपसे ब्रह्म-स्वरूप (form of Brahman) की प्राप्ति की याचना करता हूँ।

आरती करने की विधि और विशेष अवसर

  • यह आरती विशेष रूप से गंगा दशहरा (Ganga Dussehra) और कार्तिक पूर्णिमा (Kartik Purnima) के दिन गंगा तट पर सायंकाल में की जाती है।
  • इसे घर पर भी दैनिक संध्या-आरती के समय गाया जा सकता है। पूजा में गंगाजल का प्रयोग करें।
  • माँ गंगा की तस्वीर के समक्ष या गंगा नदी की ओर मुख करके घी का दीपक जलाएं।
  • इस संस्कृत आरती का शुद्ध उच्चारण के साथ पाठ करने से मन पवित्र होता है और व्यक्ति को पापों से मुक्ति (freedom from sins) मिलती है।
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