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श्री श्यामसुन्दर जी की आरती

Shree Shyamsundar Ji Ki Aarti

श्री श्यामसुन्दर जी की आरती
आरती कीजे श्यामसुन्दरकी।
नंदकुमार राधिकाबरकी॥

भक्ति दीप कर प्रेम सुबाती।
सत-संगति कर अनुदिनराती॥

आरति ब्रजयुवती मन भावै।
श्यामलीला हितहरिबंस गावै॥
॥ इति संपूर्णंम् ॥

इस आरती का विशिष्ट महत्व

"आरती कीजे श्यामसुन्दरकी" भगवान श्री कृष्ण के 'श्यामसुन्दर' (Shyamsundar) स्वरूप को समर्पित है, जिसका अर्थ है 'सांवले-सलोने और सुंदर'। यह आरती विशेष रूप से राधावल्लभ सम्प्रदाय (Radha Vallabh Sampradaya) में अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसकी रचना इस सम्प्रदाय के प्रवर्तक, श्री हित हरिवंश महाप्रभु (Shri Hit Harivansh Mahaprabhu) ने की थी, जैसा कि अंतिम पंक्ति "श्यामलीला हितहरिबंस गावै" से स्पष्ट है। इस आरती का केंद्रीय भाव 'माधुर्य भक्ति' है, जहाँ भक्त भौतिक पूजा-सामग्री के स्थान पर अपने प्रेम और भक्ति को ही आरती का दीपक और बाती बनाता है।

आरती के प्रमुख भाव और अर्थ

यह छोटी सी आरती भक्ति के गहनतम दर्शन को प्रकट करती है:

  • युगल सरकार की वंदना (Adoration of the Divine Couple): "नंदकुमार राधिकाबरकी।" आरती नंदकुमार श्री कृष्ण की है, जो 'राधिका के वर' अर्थात श्री राधा जी के प्रियतम हैं। यह राधा-तत्व की प्रधानता को दर्शाता है।
  • भक्ति ही पूजा सामग्री (Devotion as the Offering): "भक्ति दीप कर प्रेम सुबाती।" यह इस आरती का सबसे सुंदर और दार्शनिक भाव है। यहाँ भक्त कहता है कि मेरी भक्ति (devotion) ही दीपक है और मेरा प्रेम (love) ही उस दीपक की बाती है, जिससे मैं आरती कर रहा हूँ।
  • सत्संग का महत्व (Importance of Holy Company): "सत-संगति कर अनुदिनराती॥" इस प्रेम और भक्ति को निरंतर प्रज्वलित रखने के लिए दिन-रात संतों और भक्तों की संगति (satsang) आवश्यक है।
  • ब्रज-भाव की प्रधानता (Primacy of Braj's Sentiment): "आरति ब्रजयुवती मन भावै।" यह आरती ब्रज की गोपियों को मन से भाने वाली है, क्योंकि यह उनके शुद्ध, निस्वार्थ प्रेम के भाव को व्यक्त करती है।

आरती करने की विधि और विशेष अवसर

  • यह आरती राधावल्लभ सम्प्रदाय के मंदिरों में नित्य सेवा-पूजा का अभिन्न अंग है, जिसे विशेषकर संध्या आरती के समय गाया जाता है।
  • राधाष्टमी (Radhashtami) और जन्माष्टमी (Janmashtami) के उत्सवों पर इस आरती का गायन विशेष आनंद प्रदान करता है।
  • इस आरती को करने के लिए बाहरी आडम्बरों से अधिक आंतरिक भाव की शुद्धता पर जोर दिया जाता है।
  • शांत चित्त से श्री राधा-कृष्ण के युगल स्वरूप का ध्यान करें और मन में यह भाव लाएं कि आपकी भक्ति और प्रेम ही पूजा की सच्ची सामग्री है। इस भाव से आरती करने पर भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
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